रविवार, 18 फ़रवरी 2018

राष्ट्र को समर्पित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज



हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आप यक़ीन करेंगे, कि इस देश में श्रम समेत कई बिषयों के क़ानून के आधार ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले रिसर्चर्स की रिपोर्ट के आदार पर ड्राफ्ट की गई है। इस तरह की रचनात्मक काम देश में केवल एक ही संस्थान कर रहा है और वह है टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज।

भारत की सामाजिक दशा कई सदियों ही नहीं हज़ारों साल से बड़ी दयनीय रही है। मगर दुनिया इससे बेख़बर रही। देश की सामाजिक स्थिति पर किसी का ध्यान इसलिए नहीं गया, क्योंकि इस सब्जेक्ट पर काम करने वाला कोई नहीं था। संयोग से पिछली सदी के 1920-30 के दशक में इस तरह के संस्थान की ज़रूरत महसूस की गई और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के रूप में एक संस्थान सामने आया।

राष्ट्रीय मूल्‍यांकन और प्रत्यायन परिषद की ओर से 5-स्टार सम्मान और 'ए' ग्रेड पा चुका टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज यानी टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टिस्स) सोशल साइंस की स्टडी के लिए भारत ही नहीं दुनिया का अग्रणी संस्थान रहा है। इसकी महत्ता इसी बात से जानी जा सकती है कि इसकी कई रिपोर्ट्स पर कानून भी बनाए जा चुके हैं। भारत का जो श्रम कानून है, वह टिस्स की देन है।

सृजित संपत्ति के उचित आवंटन के जरिए नए समाज का निर्माण उद्योग का असली मकसद है। यह विजन टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा और उनके बेटे सर दोराबजी टाटा का है। इसी विजन के तहत टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज का जन्म हुआ। 1920 के दशक में मुंबई के नागपाडा की चालों में अमेरिकी मिशनरी क्लिफोर्ड मैंशर्ट ने जमशेदजी के सहयोग से शहरी सामुदायिक प्रोग्राम शुरू किया।

इनमें दोराबजी भी सहयोग करते थे। इसी दौरान एक संस्थान की जरूरत हुई और 1936 में नागपाडा नेबरहुड हाउस में दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क शुरू हुआ। डॉ मैंशर्ट निदेशक बने। पहले साल ही डिप्लोमा कोर्स होने के बावजूद 20 सीटों के लिए 400 आवेदन आए। इसका नाम बदलकर 1944 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज कर दिया गया। टिस्स एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र में सामाजिक कार्य शिक्षा में अग्रणी संस्था है। इसने सामाजिक नीति, नियोजन, हस्तक्षेप रणनीतियों और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

1936 और 1948 के दौरान संस्थान ने ऐसी रिपोर्ट्स तैयार कीं, जिनका असर राष्ट्रीय कानूनों व नीतियों पर पड़ा। पूर्व निदेशक एस परशुरामन टिस्स के इतिहास में बारे में बताते हैं, “टिस्स की रिपोर्ट्स पर कानून बने। हमने श्रम कल्याण एवं औद्योगिक प्रबंधन कोर्स चलाए। उसी पर 1948 में श्रम कानू बना। देश की श्रम कल्याण की नीति सीधे-सीधे सर दोरबाजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल के कार्य से विकसित हुई।”

देवनार कैंपस का शुभारंभ 6 अक्टूबर 1954 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया। 1964 में इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से डीम्ड यूनिवर्सिटी की मान्यता मिली। तब से टिस्स ने शिक्षा कार्यक्रमों का लगातार विस्तार किया। संस्थान सामाजिक व शैक्षणिक की बदलती जरूरतों के अनुसार सामाजिक कार्य के क्षेत्रमें व्यापक स्तर पर काम कर रहा है। टिस्स मानव संसाधनों और समाज कार्य में पेशेवर प्रशिक्षण देता है। यहां संगठित और सुव्यवस्थित फील्ड प्रोजेक्ट्स होते हैं, जहां विभिन्न समस्याओं पर रिसर्च होता है। संस्थान ने 500 से अधिक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की हैं। 32 फील्ड एक्शन प्रोजेक्ट आरंभ किए हैं।

हालांकि टिस्स डीम्ड यूनिवर्सिटी है, फिर भी संचालन बोर्ड का अध्यक्ष ट्रस्ट प्रतिनिधि ही होता है। जेआरडी टाटा ने कई साल बोर्ड की अध्यक्षता की। उनका मानना था कि संपत्ति वापस समाज के विकास में लगाई जानी चाहिए। सोलापुर में सूखाग्रस्त इलाके में ग्रामीण कैंपस है। वहां पूरी तरह से सूखी पहाड़ियों को सफलतापूर्वक हर-भरा बनाया जा चुका है। कई अन्य परियोजनाएं आकार ले रही हैं। संस्थान की आगामी योजनाओं में विकासपरक अध्ययन, आपदा प्रबंधन, घरेलू हिंसा और मानवाधिकार से संबंधित अन्य केंद्रों की शुरुआत शामिल है। टिस्स शिक्षा, ट्रेनिंग और रिसर्च में योगदान दे रहा है। एनजीओज को तकनीकी मदद देता टाटा समूह ने ऐसे संस्थान का निर्माण किया है जिसने देश को संवारा, आगे बढ़ने में मदद की और अब सशक्त बना रहा है।

टिस्स सामाजिक विज्ञान, कार्मिक प्रबंधन, औद्योगिक संबंध एवं स्वास्थ्य, अस्पताल प्रबंधन और सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की डिग्रियां देता है। टिस्स में नौ शिक्षण विभाग, आठ अनुसंधान इकाइयां, दो संसाधन इकाइयां और संसाधन सेल हैं।

'टिस्सा' की वेबसाइट
छात्रों और रिसर्चर्स का 'अल्मा मैटर', टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के बारे में यह लैटिन मुहावरा एकदम सही है, क्योंकि टिस्स अपने छात्रों के लिए के लिए मातृ संस्थान ही नहीं, मां की तरह भी है, जो अपने हर छात्र का भरण-पोषण बौद्धिक ख़ुराक देकर करता रहा है। इसीलिए आपका अल्मा मैटर टिस्स, आप सबकी महान उपलब्धियों की दास्तान जानना और तमाम दूसरे टिस्सियन्स के साथ ख़ुशी के साथ शेयर करना चाहता है। यह अपने तमाम टिस्सियन्स की कीर्ति, सफलता, उपलब्धि, विशेषज्ञता, जीवन-अनुभव, सम्मान, अपेक्षा, प्रतिबद्धता, दोस्ती और अपने स्वयं के संस्थान टिस्स, जिसे ख़ुद मिल चुका है, का आभार व्यक्त करने वाली भावनाओं का लिए स्वागत करता हैं।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस अलामस एसोसिएशन यानी टिस्सा का मुख्य उद्देश्य छात्रों और पूर्व छात्रों को सलाह, अनुसंधान और परियोजनाओं, मार्गदर्शन, इंटर्नशिप, फील्डवर्क अवसर, नौकरी पोस्टिंग, संदर्भ, छात्रवृत्ति और पुरस्कार के जरिए संबंधित क्षेत्रों में आपसी विकास के लिए एकजुट करना है। टिस्स और टिस्सियन्स को आपस में जोड़ने, उनसे संवाद करने और अल्ट्रास्पेशल बॉन्डिंग फिर से जीवंत करने का सबसे आसान, सबसे तेज़ और सबसे सुरक्षित माध्यम वेबसाइट है। टिस्सा की वेबसाइट 3 फरवरी, 2018 को शुरू हो गई। यह सुपर स्पेशल वेबसाइट दुनिया भर में फैले टिस्स के छात्रों को समर्पित है और चार दशकों के बाद पुराने और नए बैच को साथ लाएगा। इसीलिए टिस्सा वेबसाइट हमेशा ट्रेंडी और अपटूडेट रहती है।

टिस्स की स्नातक और कोंकण बाज़ार की ओनर नयन खड़पकर कहते हैं, "सच पूछो तो टाटा इंस्टीयूट ऑफ़ सोशल साइंस की कीर्ति और महिमा को दुनिया के कोने कोने में ले जाने के लिए सबसे परफेक्ट ब्रांड अंबेसेडर टिस्सियन्स ही हैं। टिस्स ने हम सबके जीवन को प्रकाशमान किया है, समग्र शिक्षा उपलब्ध कराकर हमारे भविष्य को उज्जवल बनाया है। इसीलिए टिस्स की फिर से कल्पना करके अपने प्यार, सम्मान और कृतज्ञता दिखाने की हम सबकी बारी है।"

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सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

ट्रिपल तलाक़ - राजीव गांधी की ग़लती को सुधारने का समय

हरिगोविंद विश्वकर्मा

कांग्रेस की मौलवियों और कट्टरपंथियों के सामने हथियार डालने की परंपरागत नीति, जिसके कारण आज यह पार्टी अस्तित्व के संकट से  गुज़र रही है, के चलते ट्रिपल तलाक़ यानी तीन तलाक़ की अमानवीय परंपरा को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाला विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में लटक गया, क्योंकि संसद के ऊपरी सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का बहुमत नहीं था। अब उम्मीद की जा रही है कि मुस्लिम पुरुषों की अनैतिक और अमानवीय मनमानी के चलते मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी को नारकीय बनाने वाली इस प्रथा को बंद करने के लिए मौजूदा बजट सत्र में उसे क़ानूनी जामा पहना दिया जाएगा।

उधर ट्रिपल तलाक़ पर क़ानूनी पाबंदी लगाने का पुरज़ोर विरोध कर रहा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब भी ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध की श्रेणी में रखने के पक्ष में नहीं दिख रहा है। हालांकि इस परंपरा का पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तो नहीं, उनकी पत्नी सलमा अंसारी ने ज़रूर खुलकर विरोध किया। तीन तलाक़ की प्रथा को अमानवीय और बकवास क़रार देते हुए सलमा अंसारी कट्टरपंथी पुरुषों को क़ुरआन पढ़ने की सलाह दे चुकी हैं, लेकिन मौलवी और कट्टरपंथी अब भी झुकने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। इसीलिए ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा एक राष्ट्रीय मसाइल बन गया है। हैरत की बात है कि मीडिया, सोशल मीडिया और जनचर्चा में बुद्धिजीवी मुसलमान अब भी नरेंद्र मोदी सरकार के ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाने की कोशिश का विरोध कर रहे हैं। विरोधियों में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सबसे आगे है।

सलमा अंसारी के विपरीत ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहता आया है कि तीन तलाक़ का मुद्दा भी पवित्र क़ुरआन और हदीस की बुनियाद पर है। इसमें किसी भी तरह का बदलाव मुमकिन नहीं और मुसलमान किसी भी बदलाव को क़बूल नहीं कर सकता। मज़ेदार बात है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक साथ तीन तलाक़ को सामाजिक बुराई तो मानता है, परंतु वह इस प्राचीन परंपरा पर सामाजिक स्तर पर ही पाबंदी लगाने के पक्ष में है। बोर्ड पहले ही तलाक़ के मामले में कोड ऑफ़ कंडक्ट जारी करके एक साथ तीन तलाक़ देने वाले का सामाजिक बहिष्कार करने का ऐलान कर चुका है। बोर्ड ने कहा है कि अब निकाह के क़ुबूलनामे के वक़्त ही शौहर को यह भी क़ुबूल करना होगा कि वह एक साथ तीन तलाक़ नहीं बोलेगा। एक साथ तीन तलाक के बेज़ा इस्तेमाल को रोकने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मॉडल निकाहनामा में यह प्रावधान कर रहा है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड हैदराबाद में 9 फरवरी को होने वाली तीन दिवसीय बैठक में इस मसाइल पर चर्चा करेगा।

गौरतलब है कि अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की पांच विद्वान न्यायाधीशों, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय के जज थे, की संवैधानिक पीठ ने मुस्लिम महिलाओं को तलाक़-तलाक़-तलाक़ की सदियों पुरानी अमानवीय और बर्बर परंपरा से निजात दिला दी थी। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सबसे ज़्यादा स्वागत ज़ाहिर तौर पर ट्रिपल तलाक़ और हलाला की विभीषिका से दो चार होने वाली देश की मुस्लिम महिलाओं ने किया था। इन महिलाओं ने खुले दिल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए उनका शुक्रिया अदा किया था। कहा तो यह भी गया कि तीन तलाक़ के मुद्दे के चलते ही पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने अपने शौहरों के निर्देश को अंगूठा दिखाया और उनकी मर्जी के विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया था और भाजपा सवा तीन सौ सीट जीतने में कामयाब रही थी।

तीन तलाक़ के मुद्दे पर केंद्र सरकार को धन्यवाद देने वाली महिलाओं में अभिनेत्री सलमा आगा भी शामिल रहीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक़ के अमानवीय पहलू को समाज के सामने लाने वाली पहली फिल्म 'निकाह' में यादगार अभिनय किया था। उस फिल्म के प्रदर्शन के बाद भारतीय समाज ने शिद्दत से महसूस किया कि वाक़ई मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक़ किसी भयावह सपने से कम नहीं है। चूंकि देश में आज़ादी के बाद कांग्रेस की सरकार रही और वह सरकार ट्रिपल तलाक़ की पैरवी करने वाले मुल्लों के निर्देश पर काम करती थी, इसलिए इन कुप्रथाओं को दूर नहीं किया जा सका।

ट्रिपल तलाक़ को असंवैधानिक क़रार देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद केंद्र सरकार सक्रिय हो गई और तीन तलाक़ को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाले विधेयक की ड्राफ्टिंग की गई और उसे लोकसभा, जहां एनडीए के पास बहुमत है, में पारित करवा लिया गया, लेकिन राज्यसभा में यह चर्चित विधेयक लटक गया। हालांकि कट्टरपंथियों की तर्ज पर कांग्रेस भी तीन तलाक़ की परंपरा का विरोध करने का दावा कर रही है और इसी बिना पर देश की इस सबसे पुरानी पार्टी ने लोकसभा में विधेयक का विरोध नहीं किया।

बहरहाल, ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा पिछले एक साल से चर्चा में है। इस मसले ने सन् 1980 के दशक में देश विदेश में चर्चा का विषय बनने वाले बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण की याद ताज़ा कर दी है। उस समय भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने तलाक़शुदा शाहबानो के पक्ष में फ़ैसला दिया था। लेकिन कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुरी तरह डरा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को इस्लाम में दख़ल मानकर केंद्र सरकार ने नया क़ानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू होने से ही रोक दिया था। इस तरह कांग्रेस के इस बेहद अमानवीय क़दम से ट्रिपल तलाक़ की गंभीर शिकार शाहबानो इंसाफ़ पाने से वंचित रह गई।

यह कहने में गुरेज़ नहीं कि सन् 1986 में शाहबानो के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फ़ैसले को बदलने के लिए क़ानून बनाकर राजीव गांधी की सरकार ने जो ब्लंडर किया था उसे इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक सरकार संशोधित करने की कोशिश कर रही है। यानी जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बारे में राय मांगी तो केंद्र ने साफ़ कहा कि ट्रिपल तलाक़ का धर्म से कोई संबंध नहीं, लिहाज़ा सरकार इसे ख़त्म करने के पक्ष में है। अपनी उसी लाइन ऑफ़ ऐक्शन के तहत केंद्र सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पारित करवाया। केंद्र सरकार के फ़ैसले का नतीजा देश की मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति के रूप में सामने आया है। कहना न होगा कि यह काम कोई दूरदर्शी सरकार ही कर सकती थी।

दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो पांच-पांच बच्चों की मां थीं। उनके शौहर ने सन् 1978 में ही तलाक़ तलाक़ तलाक़ कहते हुए उनसे पत्नी का दर्जा छीन लिया था। मुस्लिम पारिवारिक क़ानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा कर सकता है। अपनी और बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो पति से गुज़ारा लेने के लिए अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल गुज़र गए। सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फ़ैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए। तब भी रूढ़िवादी मुसलमानों को कोर्ट का फ़ैसला मजहब में हस्तक्षेप लगा। असुरक्षा की भावना के चलते उन्होंने इसका विरोध किया। लिहाज़ा, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मान लीं और इसे धर्म-निरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाज़ा, मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून 1986 में आसानी से पास हो गया।

मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून के अनुसार जब मुसलमान त़लाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुज़ारा नहीं कर सके तो कोर्ट उन संबंधियों को उसे गुज़ारा देने का आदेश दे सकता है जो मुस्लिम क़ानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। परंतु, ऐसे रिश्तेदार अगर नहीं हैं अथवा गुज़ारा देने की स्थिति में नहीं हैं, तो कोर्ट प्रदेश वक्फ़ बोर्ड को गुज़ारा देने का आदेश देगा। इस प्रकार से मुस्लिम महिला के शौहर के गुज़ारा देने का उत्तरदायित्व और जवाबदेही सीमित कर दी गई।

मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून राजीव गांधी के कार्यकाल में एक बदनुमा दाग़ की तरह माना जाता है, क्योंकि कांग्रेस के उस फ़ैसले ने एक मज़लूम मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता पाने से वंचित कर दिया और भविष्य में तलाक़ की विभीषिका झेलने वाली हर मुस्लिम महिला को और ज़्यादा लाचार कर दिया। उस समय कट्टरपंथी मुसलमानों को छोड़कर हर किसी ने राजीव गांधी की तुष्टिकरण वाली नीति की आलोचना की थी। वह क़ानून आज भी काग्रेस के उस असली चरित्र को सामने लाता है, जिसके कारण सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी यह पार्टी विलेन बन गई और आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। उस फ़ैसले को कांग्रेस का राजनैतिक लाभ के लिए अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण का सटीक उदाहरण माना जाता है।

बहरहाल, इस बार केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार सही मायने में मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने की ओर अग्रसर है। इसीलिए पिछले दस साल से शौहर के अमानवीय फ़ैसले की शिकार हुई सायराबानो के पक्ष में केंद्र एक दीवार की तरह खड़ा हो गया है। ट्रिपल तलाक़ की गैरइस्लामिक परंपरा ने मुस्लिम पुरुषों को निरंकुश और बेलगाम बना दिया था। यहां तक, 'ट्रैजिडी क्वीन' मीना कुमारी (महज़बीन बानो) के साथ इस्लामिक रीति रिवाज़ से निकाह करने वाले फिल्मकार कमाल अमरोही ने मतभेद होने पर ग़ुस्से में तीन बार तलाक़ कहकर शादी तोड़ दी थी। मीना कुमारी इससे सीरियस डिप्रेशन में चली गईं, जो अंततः उनकी मौत की वजह बनी। ऐसी ही मज़लूम सायरा बानो को केद्र सरकार का सहारा मिला। केंद्र सरकार के विधि मंत्रालय ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और अंततः मुस्लिम महिलाओं को इस परंपरा से मुक्ति दिलाने की पहल की। 

वैसे भी हर धर्म की भी अपनी एक सीमा होनी ही चाहिए। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म, मजहब या रिलिजन नहीं हो सकता। तीन तलाक़ निश्चित रूप से इंसानियत के दायरे से बहुत ज़्यादा दूर था। पहले सुप्रीम कोर्ट और अब केंद्र सरकार ज़्यादा कुछ नहीं कर रही है, बस उसे बेहतर करने की कोशिश कर रही है। दुनिया का कोई भी धर्म नागरिकों के मनुष्य अधिकारों से बड़ा नहीं हो सकता है। इसीलिए मोदी सरकार ने इस परंपरा को हमेशा के लिए ख़त्म करने की पहल की है। इसलिए मानवीय आधार पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कांग्रेस समेत तमाम सेक्यूलर पार्टियों को इसका समर्थन करना चाहिए ताकि ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाया जा सके। यक़ीन मानिए, अगर कांग्रेस ने इस बार भूल सुधार नहीं किया तो 2019 के आम चुनाव में यह सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा और नरेंद्र मोदी सरकार की हर नाकामी को ढंकते हुए भाजपा को 2014 के चुनाव से भी बड़ी जीत दिलाएगा, क्योंकि इस निरक्षर बाहुल्य देश में विकास या भ्रष्टाचार नहीं बल्कि धर्म सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा होता है।

दरअसल, कांग्रेस की नीतियों के चलते सदियों से उदार रहा हिंदू समाज यह महसूस करने लगा है कि  वन नेशन वन लॉ की थ्यौरी पर चलना चाहिए और देश में हर नागरिक के लिए एक ही क़ानून होना चाहिए, इसी मन:स्थिति के चलते देश का बहुसंख्यक समाज सांप्रदायिक कही जाने वाली पार्टियों को आंख मूंदकर वोट दे रहा है, क्योंकि वह मानने लगा है कि एनडीए अगर बुरा भी करेगा तो भी वह कट्टरपंथियों, जिन्हें सेक्यूलर कहने का फ़ैशन है, से बेहतर ही होगा।

सोमवार, 29 जनवरी 2018

गांधी पुण्यतिथि पर विशेष : तो क्या बचाया जा सकता था गांधीजी को?


हरिगोविंद विश्वकर्मा

क्या वाक़ई देश के बंटवारे के बाद लोग राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी, जिन्हें पूरी दुनिया सम्मान के साथ महात्मा गांधी कहती है, से नफ़रत करने लगे थे और हर कोई चाहता था कि गांधीजी या तो मर जाएं, या फिर उन्हें कोई मार दे? उपलब्ध दस्तावेज़ बताते हैं कि कई कांग्रेस नेता ख़ुद चाहते थे कि कोई गांधीजी की हत्या कर दे, तो अच्छा हो और इसी मन:स्थिति के चलते गांधीजी की सुरक्षा पुख़्ता नहीं की गई और उनकी हत्या कर दी गई। अन्यथा अगर केंद्र और बॉम्बे सरकार और सुरक्षा तंत्र चौकस रहा होता तो शर्तिया गांधीजी की हत्या टाली जा सकती थी।

दरअसल, दस्तावेज़ बताते हैं कि आज़ादी मिलने के बाद अगस्त 1947 से जनवरी 1948 के बीच गांधीजी बहुत अलोकप्रिय हो गए थे। उनके ब्रम्हचर्य के प्रयोग से पं. जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल समेत सभी लोग उनको कोस रहे थे। ख़ासकर पाकिस्तान ने जब कश्मीर पर आक्रमण करवाया तो सरदार पटेल ने 12 जनवरी 1948 की सुबह इस्लामाबाद को क़रार के तहत दी जाने वाली 55 करोड़ रुपए की राशि को रोकने का फ़रमान जारी कर दिया। गांधीजी ने उसी दिन शाम को इस फ़ैसले के विरोध में आमरण अनशन शुरू करने की घोषणा कर दी। गांधीजी के दबाव के चलते दो दिन बाद भारत ने पाक को 55 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया। इससे पूरा देश गांधीजी से नाराज़ हो गया था।

इसके अलावा विभाजन की त्रासदी झेलने वाला सिंधी और पंजाबी समुदाय का हर व्यक्ति सार्वजनिक तौर पर कहता था कि वह गांधीजी को गोली मार देगा। लोगों में आक्रोश उनकी मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के कारण पनपा था। ज़ाहिर है गांधीजी की अहिंसा अव्यवहारिक थी, क्योंकि उनकी अहिंसा के चलते अखंड भारत के 30 लाख नागरिक मारे गए और कई लाख लोगों का जमाया हुआ कारोबार नष्ट हो गया जिससे करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए थे।

ज़्यादातर लोग मानते थे कि गांधीजी की तुष्टीकरण नीति के चलते ही भारत का दो देश में विभाजन हो गया। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना भी गांधीजी की तुष्टीकरण नीति की मुख़ालफ़त करते थे। लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि जिन्ना हैरान थे कि मुसलमानों की हर छोटी बड़ी समस्या में गांधीजी क्यों इतनी ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं। दरअसल, गांधीजी ने जब ख़िलाफ़त आंदोलन (1919-1922) शुरू किया तो जिन्ना अचरज में पड़ गए, क्योंकि उसका संबंध भारतीय मुसलमानों से था ही नहीं। वह तुर्की का मामला था। जैसे आजकल रोहिंग्या मुसलमानों के लिए लोग आंसू बहाते हैं, वैसे ही अली बंधुओं समेत कई मुसलमान उस आंदोलन को हवा दे रहे थे। जबकि उस समय मुसलमानों की और भी समस्याएं थी, जो ख़िलाफ़त आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण थीं और जिन्हें तत्काल हल करने की ज़रूरत थी। लेकिन गांधीजी हमेशा अपनी बात को ही सच मानते थे। सच पूछो तो गांधीजी आला दर्जे के ज़िद्दी इंसान थे और अपने आगे किसी की भी नहीं सुनते थे। बहरहाल, सन् 1946-48 के आसपास लोग मानने लगे थे कि अगर गांधीजी अनावश्यक ज़िद न करते तो बात इतनी न बिगड़ती और मुल्क के विभाजन की नौबत न आती। गांधीजी के मुस्लिम प्रेम से लोग उसी तरह चिढ़ते थे, जिस तरह धर्मनिरपेक्षता का राग आलापने वालों से आजकल लोग चिढ़ते हैं।


बहरहाल, गांधीजी के आमरण अनशन की ख़बर एजेंसी के ज़रिए 12 जनवरी की शाम पुणे से प्रकाशित अख़बार हिंदूराष्ट्रके दफ्तर में पहुंची। नारायण आप्टे उर्फ नाना अख़बार का प्रकाशक और नाथूराम गोडसे संपादक थे। संभवतः उसी समय नाथूराम ने गांधीजी की हत्या करने का निश्चय कर लिया। क्योंकि अगले दो दिन उसने 3-3 हज़ार रुपए की दो बीमा पालिसींज का नॉमिनी उसने दोस्त नारायण आप्टे उर्फ नाना, जिसे गांधीजी की हत्या की साज़िश में शामिल होने के आरोप में फांसी दे दी गई, की पत्नी चंपूताई आप्टे और छोटे भाई गोपाल गोडसे की पत्नी सिंधुताई को बना दिया। यही बात नाना आप्टे और गोपाल के ख़िलाफ़ गई और दोनों फंस गए।

गांधीजी से लोग इस कदर चिढ़े हुए कि यह पता चलने के बाद भी कि उनकी हत्या होने वाली है, उनकी सुरक्षा चाक-चौबंद नहीं की गई और इसका नतीजा यह हुआ कि जिस जगह उनकी हत्या की कोशिश की गई थी, उसी जगह दस दिन बाद हत्या कर दी गई। दरअसल, देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होने वाला मदनलाल पाहवा, जिसे गांधी हत्याकांड में आजीवन कारावास हुई थी, गांधीजी के ख़ून का प्यासा था। उसने 20 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस परिसर में गांधीजी के सभा स्थल के पास बम फोड़ा और घटनास्थल पर ही पकड़ा गया। दुर्भाग्य से उसी बिड़ला हाउस में 30 जनवरी शाम गांधीजी के सीने में तीन गोलियां उतार कर नाथूराम ने उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी।



गांधी हत्याकांड की सुनवाई लालकिले में बनाई गई एक विशेष अदालत में हुई। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एमए और बंबई यूनिवर्सिटी से पीएचडी माटुंगा के रामनारायण रूइया कॉलेज में हिंदी भाषा पढ़ाने वाले डॉ. जगदीश जैन गांधी हत्याकांड के मुक़दमे में गवाह थे। उनकी गवाही 45 अगस्त 1948 को हुई। जैन के अदालत को बताया, "मदनलाल पाहवा, जिसे बाद में हत्याकांड के षड़यंत्र में शामिल पाया गया और आजीवन कारावास की सज़ा हुई, 7 जनवरी 1948 को मेरे घर आया और बताया कि कुछ लोगों के साथ मिलकर वह गांधीजी की हत्या करने वाला है। मैंने उसकी बात को ज़्यादा अहमियत नहीं दी, क्योंकि उस समय हर सिंधी-पंजाबी गांधी-हत्या की बात करता था। लेकिन तीन दिन बाद जब मदन फिर मुझसे मिला और बताया कि उसे गांधीजी की सभा में विस्फोट करने का काम सौंपा गया है, ताकि उनकी हत्या की जा सके। यह सुनकर मैं परेशान हो उठा।"

जैन ने कोर्ट को आगे बताया, "15 जनवरी को मदन दिल्ली चला गया। 17 जनवरी को जेवियर कॉलेज में जयप्रकाश नारायण का भाषण हुआ। मैं उनसे मिलकर साज़िश के बारे में बताने की चेष्टा की, लेकिन उनके आसपास बहुत भीड़ होने से पूरी बात नहीं बता पाया, पर दिल्ली में गांधीजी की हत्या की साज़िश की संभावना से उन्हें अवगत करा दिया। जब 21 जनवरी की सुबह अख़बारों में बिड़ला भवन में बम विस्फोट और मदनलाल की गिरफ़्तारी की ख़बर पढ़ी तो मेरे पांव तले ज़मीन खिसक गई। मैंने टेलीफोन पर सरादर पटेल को बताना चाहा, पर असफल रहा। कांग्रेस नेता एसके पाटिल से मिलने की कोशिश की, पर उनसे भी नहीं मिल सका। 22 जनवरी को शाम 4 बजे मुख्यमंत्री बीजी खेर से सचिवालय में मिला। तब गृहमंत्री मोरारजी देसाई भी मौजूद थे। मैंने मदनलाल की सारी बातें दोनों को बता दी।"


बहारहाल, गांधी हत्याकांड में मोरारजी की गवाही 23, 2425 अगस्त 1048 को हुई। जैन के वक्तव्य की पुष्टि करते हुए उन्होंने कहा, "22 जनवरी 1948 को ही अहमदाबाद जाने से पहले मैंने डिप्टी पुलिस कमिश्नर जमशेद दोराब नागरवाला को रात 8 बजे बॉम्बे सेंट्रल रेलवे स्टेशन बुलाया और विष्णु करकरे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया। यह सूचना मैंने मुंबई के तत्कालीन (पहले भारतीय) पुलिस कमिश्नर जेएस भरुचा को भी दे दी थी। दूसरे दिन 23 जनवरी को सुबह सरदार पटेल से मिला और उन्हें भी सारी जानकारी दे दी और बता दिया कि करकरे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया गया है।"

कहने का मतलब गांधीजी की हत्या की साज़िश रची गई है यह जानकारी सरदार पटेल, जय प्रकाश नारायण, बीजी खेर और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं के अलावा जांच करने वाले जेडी नागरवाला और दिल्ली पुलिस कमिश्नर डीडब्ल्यू मेहरा और डिप्टी सुपरिंटेंडेंट जसवंत सिंह को भी थी। इसके बावजूद बिड़ला हाऊस की सुरक्षा शिथिल रही। इसीलिए जज आत्माराम ने अपने फ़ैसले में लिखा, "20 से 30 जनवरी 1948 तक पुलिस की जांच पड़ताल में शिथिलता को मुझे सरकार के संज्ञान में लानी है। 20 जनवरी को मदन की गिरफ्तारी के बाद उसका ब्यौरा पुलिस ने प्राप्त कर लिया था और जैन से गृहमंत्री मोरारजी देसाई और पुलिस को सूचना मिल चुकी थी। खेद की बात है कि अगर बंबई और दिल्ली की पुलिस ने तत्परता दिखाई होती और जांच पड़ताल में शिथिलता नहीं बरती होती तो कदाचित गांधी -हत्या की दुखद घटना टाली जा सकती थी।"


बहरहाल, नाथूराम ने एक बार जेल में ही गांधी-हत्या का ज़िक्र करते हुए गोपाल गोडसे को बताया था, “मैंने छह गोलियों से लोड अपने रिवॉल्वर को लेकर बिड़ला हाउस में शाम 4.55 बजे प्रवेश किया। रक्षकों ने मेरी तलाशी नहीं ली। 5.10 बजे गांधीजी मनु गांधी और आभा गांधी के कंधे पर हाथ रखे बाहर निकले। जैसे ही मेरे सामने आए सबसे पहले मैंने शानदार देश-सेवा के लिए उनका नमस्तेकहकर उनका अभिवादन किया और देश का नुकसान करने के लिए उन्हें ख़त्म करने के उद्देश्य से दोनों कन्याओं को उनसे दूर किया और फिर 5.17 बजे 3 गोलियां गांधीजी के सीने में उतार दी।

नाथूराम ने आगे बताया, “दरअसल, मेरी गोली जैसे ही चली, गांधीजी के साथ चल रहे 10-12 लोग दूर भाग गए। मुझे लगा था कि जैसे ही मैं गांधीजी को मारूंगा, मेरी हत्या कर दी जाएगी, लेकिन सब लोग आतंकित होकर भाग गए। मैंने गांधीजी की हत्या करने के बाद रिवॉल्वर समेत हाथ ऊपर उठा लिया। मैं चाहते था, कोई मुझे गिरफ़्तार कर ले। लेकिन कोई पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मैं पुलिस-पुलिस चिल्लाया। फिर मैंने एक सिपाही को आंखों से संकेत किया कि मेरी रिवॉल्वर ले लो। उसे विश्वास हो गया कि मैं उसे नहीं मारूंगा और वह हिम्मत जुटाकर मेरे पास आया और मेरा हाथ पकड़ लिया। इसके बाद लोग मुझ पर टूट पड़े और मुझे मारने लगे।बहारहाल, डीएसपी जसवंत सिंह के आदेश पर दसवंत सिंह और कुछ पुलिस वाले नाथूराम को तुगलक रोड थाने ले गए। रात को क़रीब पौने दस बजे बापू की हत्या की एफ़आईआर लिखी गई। इसे लिखा था थाने के दीवान-मुंशी दीवान डालू राम ने।

बहरहाल, जब शाम 5:45 बजे आकाशवाणी ने गांधी के निधन की सूचना दी और कहा कि नाथूराम गोडसे नाम के व्यक्ति ने उनकी हत्या की तो सारा देश हैरान रह गया कि मराठी युवक ने यह काम क्यों किया, क्योंकि लोगों को आसंका थी कि कोई पंजाबी या सिंधी व्यक्ति गांधीजी की हत्या कर सकता है। बहरहाल, गांधीजी हत्या में नाथूराम के अलावा नारायाण आप्टे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे, विष्णु करकरे, विनायक सावरकर, शंकर किस्तैया और दिगंबर बड़गे गिरफ्तार कर लिए गए। बाद में और दिगंबर बड़गे वादा माफ़ सरकारी गवाह बन गए। उनकी गवाही को आधार बनाकर नाथूराम और नाना की फ़ांसी दी गई।

गुरुवार, 25 जनवरी 2018

भारतीय गणतंत्र का इतिहास


Addressing a gathering on 69th Republic Day at Mira Road
भारतीय गणतंत्र का इतिहास
दरअसल,कहा जा रहा है कि इस साल 69 वां गणतंत्र दिवस है। जबकि भारत का गणतंत्र समारोह 1930 से मनाया जा रहा है।
दरअसल, सन् 1929 के दिसंबर में लाहौर (अब पाकिस्तान में) में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन पं जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ जिसमें प्रस्ताव पारित कर इस बात की घोषणा की गई कि यदि अंग्रेज सरकार 26 जनवरी 1930 तक भारत को स्वायत्त उपनिवेश (डोमीनियन) का पद नहीं प्रदान करेगी, जिसके तहत भारत ब्रिटिश साम्राज्य में ही स्वशासित एकाई बन जाता, तो भारत अपने को पूर्णतः स्वतंत्र घोषित कर देगा।

26 जनवरी 1930 आकर गुज़र गया। अंग्रेज सरकार ने कुछ नहीं किया तब कांग्रेस ने उस दिन भारत पूर्ण स्वतंत्रता के संकल्प की घोषणा कर दी और अपना सक्रिय आंदोलन आरंभ कर दिया। उस दिन से 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त होने तक 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता रहा। बहहाल, स्वतंत्रता मिलने के बाद 15 अगस्त को भारत के स्वतंत्रता दिवस के रूप में स्वीकार किया गया। भारत के आज़ाद हो जाने के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई। 9 दिसंबर 1947 को संविधान सबा का गठन किया गया, जो 2 साल 11 महीने 18 दिन में पूरा हो गया।

संविधान सभा के सदस्य भारत के राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के द्वारा चुने गए थे। डॉ. भीमराव आंबेडकर, जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि समेत इस सभा में कुल 308 सदस्य थे। संविधान निर्माण में कुल 22 समितियां थी जिसमें प्रारूप समिति (ड्राफ्टिंग कमेटी) सबसे प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण समिति थी और इस समिति का कार्य संपूर्ण संविधान लिखनाया निर्माण करनाथा। प्रारूप समिति के अध्यक्ष विधिवेत्ता डॉ. भीमराव आंबेडकर थे। प्रारूप समिति ने और उसमें विशेष रूप से डॉ. आंबेडकर जी ने भारतीय संविधान का निर्माण किया और संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को 26 नवंबर 1949 को भारत संविधान सुपूर्द किया।  इसलिए 26 नवंबर दिवस को भारत में संविधान दिवस के रूप में प्रति वर्ष मनाया जाता है।

संविधान सभा ने संविधान निर्माण के समय कुल 114 दिन बैठक की। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की स्वतन्त्रता थी। अनेक सुधारों और बदलावों के बाद सभा के कुल 308 सदस्यों ने 24 जनवरी 1950 को संविधान की दो हस्तलिखित कॉपियों पर हस्ताक्षर किए। इसके दो दिन बाद संविधान 26 जनवरी को यह देश भर में लागू हो गया। 26 जनवरी का महत्व बनाए रखने के लिए इसी दिन संविधान निर्मात्री सभा (कांस्टीट्यूएंट असेंबली) द्वारा स्वीकृत संविधान में भारत के गणतंत्र स्वरूप को मान्यता प्रदान की गई।

भारतीय संविधान के विभिन्न प्रावधान इन देशों से लिए गए हैं....
ब्रिटेन: संसदीय प्रणाली, विधि निर्माण, एकल नागरिकता
अमेरीका: न्यायिक, स्वतंत्रता का अधिकार और मौलिक अधिकार
जर्मनी: आपातकाल का सिद्धांत
फ्रांस: गणत्रंतात्मक शासन व्यवस्था
कनाडा: राज्यों में शक्ति का विभाजन
आयरलैंड: नीति निदेशक तत्व
ऑस्ट्रेलिया: समवर्ती सूची
दक्षिणअफ्रीका: संविधान संशोधन की प्रक्रिया
रूस: मूल कर्तव्य


रविवार, 21 जनवरी 2018

इजराइल से क्यों नफ़रत करते हैं मुस्लिम ?

इज़राइल से क्यों नफ़रत करते हैं मुस्लिम ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अकसर देखा जाता है कि इज़राइल का नाम आते ही मुस्लिम समाज के लोग आक्रामक हो जाते हैं। इज़राइल और वहां के नेताओं का विरोध उनका एकमात्र एजेंडा रहता है। अब देखिएइज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू पत्नी सारा समेत भारत की ऐतिहासिक यात्रा पर आए। मुंबई में नेतान्याहू ने फिल्मी सितारों के शलोम बॉलीवुड शो में हिस्सा भी लियाजिसमें अमिताभ बच्चन जैसे कलाकार दिखे लेकिन बॉलीवुड सितारे आमिर ख़ानसलमान ख़ानशाहरुख ख़ान और सैफअली ख़ान नदारद रहे। मेहमान नेता ने सुभाष घईअभिषेकऐश्वर्याकरन जौहरविवेक ओबेरायप्रसून जोशी आदि के साथ सेल्फी ली। ज़हिर हैसेक्यूलरिज़्म का राग आलापने वाले ख़ान्स में कहीं न कहीं वही मुस्लिम मानसिकता हैजिसके तहत यह समाज इज़राइलनरेंद्र मोदी या राष्ट्रीय स्वयसेवक संघ का विरोध करता है। इसी तरह का विरोध वे बालासाहेब ठाकरे का भी करते थे। इज़राइली मेहमान का सबने स्वागत कियालेकिन मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया।


असुरक्षा ने इज़राइल को बनाया आक्रामक
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद 29 नवंबर 1949 को संयुक्त राष्ट्रसंघ ने फ़लीस्‍तीन के विभाजन को मान्यता दीऔर एक अरब और 20,770 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में एक यहूदी देश बना। इस क़रार को यहूदियों ने तुरंत मान लियालेकिन अरब समुदाय ने विरोध किया। 14 मई 1948 को यहूदी समुदाय ने इज़राइल को राष्ट्र घोषित कर दिया। उसी समय सीरियालीबियासउदी अरबमिस्रयमन और इराक ने इज़राइल पर हमला कर दिया। 1949 में युद्धविराम की घोषणा हुई। जोर्डन और इज़राइल के बीच 'ग्रीन लाइननाम की सीमा रेखा बनी। 11 मई 1949 को राष्ट्रसंघ ने इजराइल को मान्यता दे दी। तभी से इज़राइल बहादुरी से मुस्लिम देशों का मुक़ाबला कर रहा है। उसने अरब देशों के नाको चने चबवा दिए। 5 जून 1967 को इज़राइल ने अकेले मिस्रजोर्डनसीरिया और इराक के ख़िलाफ़ युद्ध घोषित कर दिया और महज छह दिनों में ही उन्हें पराजित करके क्षेत्र में अपनी सैनिक प्रभुसत्ता कायम कर ली। तभी से अरब - इज़राइल युद्ध चल रहा है और मुसलमान लोग इज़राइल से नफ़रत करते हैं।

दुनिया का सबसे अल्पसंख्यक समुदाय
यह सच है कि यहूदी दुनिया का सबसे अल्पसंख्यक समुदाय है। विश्व में इनकी आबादी डेढ करोड़ भी नहीं है। 14 मई 1948 से पहले इनका कोई देश भी नहीं थाजबकि ये लोग दुनिया भर में फैले हुए थे। यहूदियों से मुसलमान ही नहींईसाई भी नफ़रत करते थे। शेक्सपीयर के नाटकों में तो अमूमन यहूदी ही विलेन होते हैं। इससे पता चलता है कि यहूदियों के साथ कितना अन्याय किया गया। इस बहादुर कौम से भारत का रिश्ता महाभारत काल से है। यहूदी धर्म क़रीब 3000 वर्ष ईसा पूर्व अस्तित्व में आया। यहूदियों का राजा सोलोमन का व्‍यापारी जहाज कारोबार करने यहां आया। आतिथ्य प्रिय हिंदू राजा ने यहूदी नेता जोसेफ रब्‍बन को उपाधि प्रदान की। यहूदी कश्मीर और पूर्वोत्तर राज्य में बस गए। विद्वानों के अनुसार 586 ईसा पूर्व में जूडिया की बेबीलोन विजय के बाद कुछ यहूदी सर्वप्रथम क्रेंगनोर में बसे। कहने का मतलब भारत में यूहदियों के आने और बसने का इतिहास बहुत पुराना है। वह भी तब से हैजब ईसाई और इस्लाम धर्म का जन्म भी नहीं हुआ था।

ढाई हजार साल पुराना संबंध
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इज़राइल यात्रा और बेंजामिन नेतान्याहू की भारत यात्रा से यहूदियों के बारे में आम भारतीयों की जिज्ञासा बढ़ गईक्योंकि भारत से इज़राइल का ढाई हजार साल पुराना संबंध होने के बावजूद यहां लोग यहूदियों के बारे बहुत कम जानते हैं। भारत में यहूदी 2985 साल पहले से हैं। 973 ईसा पूर्व यहूदी केरल के मालाबार तट पर सबसे पहले आए। दुनिया में जब इन पर अन्याय हो रहा थातब भारत ने इन्हें आश्रय एवं सम्मान दिया। क़रीब ढाई हज़ार साल पहले ये कारोबारी और शरणा‌र्थियों के रूप में समुद्र के रास्ते भारत आए। भारत में यहूदी हिब्रू और भारतीय भाषाएं बोलते हैं।

महाराष्ट्र में 2200 साल पुराना इतिहास
महाराष्ट्र में यहूदियों की मौजूदगी क़रीब 2200 साल से है। सर्वप्रथम यहूदी जहाज रास्ता भटक कर अलीबाग के नवगांव पहुंच गया। जहाज में सवार एक दर्जन से ज़्यादा लोगों ने वहीं आश्रय ले लिया। इसीलिए नवगांव यहूदियों का प्रथम स्थान बन गया। यह भूमि यहूदियों के लिए पवित्र समझी जाती है। इसे 'जेरूसेलम गेटकहते हैं। यहां पर यहूदी पूरी तरह मराठी संस्कृति में घुल मिल गए हैं। इतिहासकार दीपक राव बताते हैं कि अधिकतर भारतीय यहूदी रायगड़ में रहा करते थे और वहीं से देश के दूसरे हिस्सों में गए। बेन इज़राइलियों ने मराठी से नाता जोड़ लिया है और वे यहूदी नववर्ष पर पारंपरिक मिठाई पूरनपोली भी बनाते हैं। रायगड़ के अलावा मुंबई और ठाणे में बड़ी संख्या में यहूदी रहते हैं। ठाणे में उनका 137साल पुराना सिनेगॉग 'गेट ऑफ हेवनहै।

मुंबईठाणेअलीबाग में सिनेगॉग
अलीबाग में यहूदियों की एक बस्ती हैजहां 15-16 यहूदी परिवार रहते हैं। इसके अलावानवगांवरोहापेणथलमुरु और पोयनाड में भी यहूदी बसे हैं। इस क्षेत्र में लगभग 70 यहूदी परिवार हैं। अलीबाग शहर के बीचोंबीच 'इस्राइल आलीनाम की एक गली भी है। उनका पवित्र स्थान इंडियन ज्वेयिशहेरिटेज सेंटर यानी मागेन अबोथ सिनेगॉग है। इसका निर्माण 1848 में किया गया। अगर किसी यहूदी परिवार में शादी होती है तो दुल्हा-दुल्हन यहां ज़रूर आते हैं। मकर संक्रांति के दिन यहूदी जेरूसेलम गेट पहुंचे और पवित्र स्थल को नमन किया। मुंबई में क़रीब 4 हजार यहूदी हैं। क़रीब 1800 ठाणे में बस गए हैं। 1796 में सैमुअल स्ट्रीट पर बना 'गेट ऑफ मर्सीमुंबई का सबसे पुराना सिनेगॉग है। बच्चों का नामकरण संस्कार लंबे समय से यहां होता आया है। मस्जिद स्टेशन का नाम भी यहूदी शब्द 'माशेदसे बना है जिसका प्रयोग यहूदी के लोग सिनेगॉग के लिए करते हैं। पिछले कुछ वर्षों में'गेट ऑफ मर्सीगैरपारंपरिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हुआ है। यहां रोश हशना और योम किपुर जैसे यहूदी त्योहार मनाए जाते हैं। पारंपरिक वेशभूषा किप्पा पहने लोग प्रार्थना वाली शॉल ओढ़े रहते हैं और धार्मिक किताबों का पाठ करते हैं। पूजा के आख़िर में पवित्र यहूदी किताब साफेर तोरा से कुछ हिस्सों का भी पाठ होता है।

भारत में कितने यहूदी समुदाय?
भारत में यहूदियों के तीन बड़े संप्रदाय हैं। पहला संप्रदाय बेन इज़राइल है जो महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा है। जब रोमन ने उनका जीना हराम कर दियातब ये लोग महाराष्ट्र में आकर बस गए। पत्रकार सिफ्रा सैमुअल लेंटिन ने भारतीय यहूदियों पर लिखी किताब 'इंडियाज़ जूइशहेरिटेज में बेन इज़राइल संप्रदाय के 1749 में भारत आने की बात कही है। दूसरा संप्रदाय बग़दादी यहूदियों का है। इनको मिज़राही यहूदी भी कहते हैं। ये क़रीब 280 साल पहले कोलकाता और मुंबई में बस गए। यह शिक्षित और मेहनतकश तबका जल्द ही धनवान हो गया। ये हिंदीमराठी और बांग्ला भाषाएं बोलते हैं। तीसरा संप्रदाय चेन्नई के यहूदियों का है। पुर्तगाली मूल वाले मद्रास के परदेसी यहूदी 17वीं सदी में भारत आए। यहां हीरेकीमती पत्‍थरों और मूंगों का कारोबार करते थे। यूरोप से भी इनके अच्छे संबंध रहे। भारत में एक और संप्रदाय हैजो लोस्ट ट्राइब्स का वंशज है। ब्नेई मेनाश लोग मणिपुर और मिज़ोरम में बसे हैं। उन्होंने यहां का सांस्कृतिक और रीति-रिवाज़ अपना लिया है।

अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा
महाराष्ट्र सरकार ने यहूदियों को अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया है। हालांकि इससे इनकी शिक्षा या रोज़गार के लिए शायद ही कोई लाभ होक्योंकि इन मामलों में कभी भी यहूदियों को किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। हांइतना ज़रूर है कि अल्पसंख्यक दर्जा मिलने से कई नौकरशाही अड़चनें कम हो  जाएंगी। इसका फायदा यह होगा कि जनगणना के समय या बच्चों के जन्म या विवाह पंजीकरण के समय अब कोई कर्मचारी उन्हें 'अन्यकी श्रेणी में नहीं डाल सकेगा।

मुंबई के निर्माण में बड़ा योगदान
यहूदियों को शांतउद्यमी और समाज से जुड़े व्यक्ति के रूप में देखा जाता है। तेल के धंधे और खेती के बाद यहूदियों ने कारोबार का रुख किया और धीरे-धीरे सेनासरकारी सेवातकनीक और कला के क्षेत्र में भी लोहा मनवाने लगे। ब्रिटिश काल के दस्तावेजों में इन की गिनती यूरोप-निवासी के रूप में की जाती थी। उन्हें प्रशासनिक ढांचे में ऊपरी ओहदा मिलता था। उन्नीसवीं शताब्दी में कारोबारी डेविड सासून और उनके परिजनों ने मुंबई को बेहतर बनाने में अहम योगदान दिया था। सासून खानदान ने भायखला के जीजामाता उद्यान में घंटाघर बनवाने के अलावा काला घोड़ा इलाके में सासून लाइब्रेरी और कोलाबा में सासून बंदरगाह भी बनवाया।

फिल्म जगत में भी दस्तक
यहूदी समुदाय की फिल्म जगत में भी अच्छी-खासी मौजूदगी रही है। मूक फिल्मों के दौर की अदाकारा हेनोक आइसैक साटमकर ने 'श्री 420और 'पाकीजाजैसी फिल्मों में भी यादगार भूमिकाएं की। दरअसल लोग उन्हें नादिरा के नाम से ज़्यादा जानते हैं। 'बूट पालिश' (1954) और 'गोलमाल'(1979) जैसी फिल्मों में यादगार अभिनय करने वाले डेविड अब्राहम चेउलकर भी इसी समुदाय से हैं। मशहूर नृत्यांगना और सेंसर बोर्ड की पूर्व अध्यक्ष लीला सैमसन भी यहूदी ही हैं। वैसे भारत में यहूदी की मौजूदगी 1971 युद्ध के हीरो लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब की चर्चा के बिना अधूरी रहेगीजिन्होंने 93 हज़ार पाकिस्तानी सैनिकों का आत्मसमर्पण करने पर मजबूर कर दियाथा।

'इजरायल पितृभूमिभारत मातृभूमि
राल्फी जिराद बड़े गर्व से बताते हैं कि 6 यहूदियों को अब तक पद्मश्री मिल चुका है।। जिराद पत्नी येल के साथ मुंबई के यहूदियों पर शोध को बढ़ावा देने में लगे हैं। पति-पत्नी त्योहारों पर बाहर से आने वाले मेहमानों का नेपियन सी रोड के अपने घर में स्वागत करते हैं। उन्हें यहूदियों से जुड़े स्मारकों की सैर पर भी ले जाते हैं। जिराद कहते हैं, 'इजरायल हमारी पितृभूमि हैतो भारत हमारी मातृभूमि। वह बताते हैं कि ब्रिटिश काल में भारतीय यहूदियों की आबादी 35 हजार के क़रीब थी। फ़िलहाल दुनिया में भारतीय यहूदी क़रीब दो लाख हैजिनमें से ज़्यादा इजरायल में रहते हैं। इन लोगों ने मराठी में यहूदी कीर्तन गाए हैं। मराठी से इनका इतना लगाव है कि अवीव विश्वविद्यालय में मराठी भाषा पढ़ाई जाती है।

हिंदुत्व और यहूदीवाद
यहूदीवाद आंदोलन यूरोप में 19 वीं सदी में शुरू हुआ। इसका मक़सद यूरोप और दूसरी जगह रहने वाले यहूदियों को 'अपने देश इज़राइलभेजना थाक्योंकि उनका कोई देश नहीं था। पराए देशों में उनके लिए अपनी संस्कृति को महफूज़ रखना मुश्किल था। पिछले चंद सालों से हिंदुत्ववादी और ज़ायनिज़्म यानी यहूदीवाद के बीच सकारात्मक समानताएं खोजने की कोशिशें चल रही हैं। ऑनलाइन मैगज़ीन 'स्वराज्यके कंसल्टिंग एडिटर जयदीप प्रभु कहते हैं, "हिंदू और यहूदी धर्म में तीन मूल समानताएं हैं। पहलादोनों विचारधारा बेघर रही हैं। वैसे 1948 में यहूदियों को अपना देश मिल गयालेकिन हिंदुत्व का सियासी मक़सद पूरा नहीं हुआ हैक्योंकि भारत अभी हिंदू राष्ट्र नहीं बना है। दूसरादोनों विचारधाराओं का दुश्मन एक हैवह है इस्लाम। हालांकि अपनी लड़ाकू प्रवृत्ति के कारण इस्लाम हर धर्म का दुश्मन बन गया है। और तीसराअसुरक्षा के एहसास से ग्रस्त दोनों विचारधाराओं ने सियासी लक्ष्य हासिल करने के लिए सांस्कृतिक पुनरुद्धार का सहारा लिया।"

नरसिंह राव ने बनाया राजनयिक संबंध
वैसे इज़राइल ने हमेशा भारत के साथ दोस्ती की पहल की हैक्योंकि वह अपने को इकलौता यहूदी देश और भारत को इकलौता हिंदू देश। लेकिन कांग्रेस की अल्पसंख्यक-तुष्टीकरण नीति इसमें सबसे बड़ी बाधा रही है। आतंकवादी कौम फ़लीस्‍तीन का समर्थन करने से भारत को कुछ हासिल नहीं हुआ। अभी हाल ही में पाकिस्तान में फ़लीस्‍तीनी राजदूत ने आतंकी मौलाना हाफिज़ सईद के साथ मंच शेयर किया। कहने का मतलब फ़लीस्‍तीन भी उसी मानसिकता की शिकार हैजिसके तहत इस धर्म को मानने वाले लोग 14 साल से जिहाद छेड़े हुए हैं। इसके विपरीत इज़राइल हमारा शुभचिंतक हैलेकिन मुस्लिमों के नाराज़ होने के डर से भारत ने उसके कोई संबंध नहीं रखा। वह तो धन्यवाद कहिए पीवी नरसिंह राव को जिन्होंने 1992 में इज़राइल से राजनयिक संबंध बनाया। 






आतंक से लड़ने में सबसे माहिर इज़राइल सर्जिकल स्ट्राइक में मास्टर है। 1976 में अपहृत विमान को छुड़ाने के लिए इज़राइली कमांडो 4000 किलोमीटर दूर यूगांडा की राजधानी एंतेब्बे एयरपोर्ट में घुस गए। संघर्ष में फ़लीस्‍तीनी आतंकियों और सेना के 37 जवानों को मार डाला और अपने106 सभी यात्रियों को सुरक्षित अपने वतन ले आए। उस ऑपरेशन की अगुवाई करने वाले प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू के बड़े भाई योनातन नेतान्याहू शहीद हो गए थे। एयरइंडिया के विमान आईसी-814 को जब आतंकी कंधार ले गए तब इज़राइल ने कमांडो सहायता की पेशकश की थीलेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण ने भारत को बेड़ियों में जकड़ दिया था और नई दिल्ली ने इज़राइल की मदद से कंधार में हमला करने की बजाय ख़तरनाक आतंकी मौलाना मसूद अज़हरमुश्ताक अहमद जरगर और अहमद उमर सईद शेख को रिहा कर दिया। बहरहालनरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपने नैसर्गिक दोस्त इजराइल के साथ संबंधों को आगे बढ़ा रहा हैयह व्यापक राष्ट्रहित में है। यह मोदी सरकार की विदेश नीति में बहुत बड़ी सफलता भी है।