मंगलवार, 1 मई 2018

जस्टिस दीपक मिश्रा से भी ज़्यादा संदिग्ध आचरण वाले न्यायाधीश




हरिगोविंद विश्वकर्मा
सुप्रीम कोर्ट ने जज बीएच लोया की मौत की एसआईटी जांच से इनकार क्या किया, वामपंथी विचारकों और मुस्लिम बुद्धिजीवियों की भृकुटी ही तन गई है। इन लोगों ने सामूहिक रूप से देश की सबसे बड़ी अदालत के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया है। भारतीय न्याय पालिका के इतिहास में संभवतः पहली बार सुप्रीम कोर्ट के किसी फ़ैसले के ख़िलाफ़ इतना ज़्यादा हो हल्ला मच रहा है। अदालत को इससे पहले किसी ने इतना खुलकर पक्षपाती करार नहीं दिया था, जितना पक्षपाती अपने को सेक्यूलर कहने वाले कट्टरपंथी जमात के लोग आजकल कह रहे हैं। कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष के निशाने पर सीधे देश के मुख्य न्यायधीश जस्टिस दीपक मिश्रा हैं।

जस्टिस दीपक मिश्रा के करीयर पर नज़र डालें तो साफ़ पता चलता है कि उन्हें जज नियुक्त करने से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में भेजने तक सब कुछ कांग्रेस के ही कार्यकाल में हुआ है। जज बनने से पहले वह वकालत करते थे। पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में उन्हें 17 फरवरी 1996 को उड़ीसा हाईकोर्ट में अतिरिक्त जज बनाया गया। मनमोहन सिंह के शासन में वह 2009 में पटना हाईकोर्ट एवं 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने। इतना ही नहीं, 10 अक्टूबर 2011 को कांग्रेस के कार्यकाल में उन्हें एलिवेट करके सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। बीजेपी के शासन में पिछले साल 28 अगस्त को वह सीनियारिटी के आधार पर 14 महीने के लिए मुख्य न्यायाधीश बनाए गए। अब उनको जज बनाने वाली कांग्रेस उन्हें किसी भी कीमत पर हटाना चाहती है। कारण यह है कि उन्होंने जज लोया की मौत की जांच एसआईटी से कराने का आदेश देने से इनकार कर दिया।

कांग्रेस की नज़र में जस्टिस दीपक मिश्रा तब आए जब उन्होंने याक़ूब मेमन की फ़ांसी पर रोक लगाने वाली सभी याचिकाओं को आधी रात को निरस्त कर दिया, जिससे मुंबई सीरियल ब्लास्ट के मास्टरमाइंड अपराधी को फांसी पर लटकाया जा सका। कांग्रेस ने पहली बार महसूस किया कि इस जज की निष्ठा कम से कम कांग्रेस में तो बिलकुल नहीं है। कांग्रेस को शक था कि यह जज यह राष्ट्र को सेक्युलरिज़्म से ऊपर मानता है। जस्टिस दीपक मिश्रा ने जब देश के सिनेमाघरों में राष्ट्रगान ज़रूरी करने का आदेश दिया, तब कांग्रेस का शक हक़ीक़त में बदल गया। कांग्रेस ने मान लिया कि यह जज पक्का राष्ट्रवादी है। इतना ही नहीं, जब जस्टिस ने जज लोया के केस की एसआईटी जांच से मना कर दिया तो कांग्रेस ने पक्के तौर उन्हें न्यायाधीश नहीं, बल्कि भाजपा का आदमी मान लिया।

लिहाज़ा, देश की सबसे पुरानी पार्टी जस्टिस दीपक मिश्रा पर महाभियोग चलाकर उन्हें पद से हटाना चाहती है। इसीलिए आनन फानन में राज्यसभा के 54 सदस्यों के हस्ताक्षर वाला महाभियोग नोटिस उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू को दिया गया। नोटिस में कुछ महीने पहले सुप्रीम कोर्ट के चार सीनियर न्यायाधीशों की प्रेस कॉन्फ्रेंस का हवाला किया गया, जिसमें इन चारों जजों ने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है, क्योंकि महत्वपूर्ण मुक़दमे इनको नहीं दिए जा रहे हैं। मतलब अगर किसी जज को उसकी पसंद का मुक़दमा नहीं दिया जाएगा तो लोकतंत्र ख़तरे में पड़ जाएगा। इतना ही नहीं, महाभियोग नोटिस में पॉसिबली, लाइकली (संभवतः) और मे बी, कैन बी (हो सकता है) जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। विधि विशेषज्ञों की मदद से नोटिस पर विचार करने के बाद ही उपराष्ट्रपति ने उसे ख़ारिज़ किया, क्योंकि नोटिस में दिए गए तथ्य महाभियोग चलाने लायक नहीं थे। किसी भी क़ीमत पर जस्टिस दीपक मिश्रा को हटाने पर आमादा वामपंथी विचारक और मुस्लिम बुद्धिजीवी उपराष्ट्रपति के फ़ैसले पर भी सवाल उठा रहे हैं।

बहरहाल, सवाल यहां यह उठता है कि अगर जस्टिस दीपक मिश्रा जज लोया के मामले में कांग्रेस के अनुकूल फ़ैसला देते तब क्या वह कांग्रेस के गुडविल लिस्ट में रहते? यानी वह कह देते कि जज लोया हार्टअटैक से नहीं मरे, बल्कि एक साज़िश के तहत उनकी हत्या की गई है, लिहाज़ा उनकी मौत की एसआईटी या उससे भी बड़ी एजेंसी से जांच होनी चाहिए, ताकि लोया के हत्यारों की शिनाख़्त की जा सके, तब शायद कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष को उनका भ्रष्टाचार न दिखता। सवाल यहां यह भी है कि कांग्रेस को जस्टिस दीपक मिश्रा का भ्रष्टाचार उनको जज बनाते समय क्यों नहीं दिखा? कांग्रेस इस सवाल का भी जवाब नहीं देगी कि अगर उनका आचरण इतना संदिग्ध था तब उन्हें हाईकोर्ट का जज क्यों बनाया गया? क्या हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के जज की चयन प्रक्रिया इतनी लचर और कमज़ोर है कि भ्रष्टाचार करने वाला व्यक्ति भी जज बन सकता है।

बहरहाल, अगर न्यायाधीशों के कथित भ्रष्टाचार की बात करें तो इतिहास गवाह है कि कांग्रेस कई जजों के भ्रष्टाचार पर आंख मूंदती रही है। 1989-91 में देश के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस रंगनाथ मिश्रा (जस्टिस दीपक मिश्रा के चाचा) कांग्रेस को बहुत प्रिय रहे। उन्होंने 1984 के सिख दंगों के मामले में कांग्रेस के नेताओं को क्लीन चिट दे दिया था। सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज के रूप में उन्होंने सिख की हत्या की जांच करने वाले आयोग की अध्यक्षता की। पूछताछ और जांच की कार्यवाही अत्यधिक पक्षपातपूर्ण तरीक़े से निपटाया और कांग्रेस नेताओं को क्लीन चिट दे दिया। जबकि आधिकारिक जांच रिपोर्ट और सीबीआई जांच में कांग्रेस के नेताओं के ख़िलाफ़ गंभीर साक्ष्य मिले थे। बहरहाल, कांग्रेस ने रंगनाथ मिश्रा को पुरस्कृत करते हुए राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया।

कांग्रेस को 1991 में 18 दिनों के लिए मुख्य न्यायाधीश रहे न्यायमूर्ति कमल नारायण सिंह कभी भ्रष्टाचारी नहीं दिखे। उन पर आरोप लगा कि जैन एक्सपोर्ट्स और उसकी सिस्टर कन्सर्न जैन शुद्ध वनस्पति के पक्ष में फ़ैसला देते समय जज साहब अप्रत्याशित रूप से बेहद उदार हो गए। उनके आदेश से कंपनी ने औद्योगिक नारियल का तेल आयात किया था, जबकि उस पर प्रतिबंध लगा था। कंपनी पर कस्टम विभाग के लगाए 5 करोड़ रुपए के ज़ुर्माने को भी जस्टिस सिंह ने अपने आदेश में घटाकर 35 फ़ीसदी कम कर दिया। बाद में न्यायमूर्ति एमएन वेंकटचलैया ने उस आदेश को रद्द कर दिया और टिप्पणी भी की, "मैं वर्तमान हलफ़नामे पर टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं लेकिन मैं न्यायाधीश पर भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में चिंतित हूं।"

राजनीतिक दलों को सन् 1994-1997 के दौरान मुख्य न्यायाधीश रहे एएम अहमदी का पक्षपात या भ्रष्टाचार नहीं दिखा, जब अहमदी ने भोपाल गैस त्रासदी में हज़ारों नागरिकों को इंसाफ़ से वंचित कर दिया। उन्होंने हत्या के लिए ज़िम्मेदार यूनियन कार्बाइड कंपनी के ख़िलाफ़ अपराधी हत्या के आरोप को ही खारिज कर दिया। उनके फ़ैसले पर भी गंभीर टिप्पणी हुई कि न्याय के साथ विश्वासघात किया गया। सबसे मज़ेदार बात यह रही अहमदी ने बाद में यूनियन कार्बाइड अस्पताल ट्रस्ट मंडल का अध्यक्ष पद स्वीकार कर लिया। इतना ही नहीं अहमदी ने पर्यावरण संबंधी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को अंगूठा दिखाते हुए बड़खल और सूरजकुंड झील के पांच किलोमीटर के दायरे में कांत एनक्लेव, फरीदाबाद में अपना शानदार घर बनवाया। 1998 में मुख्य न्यायाधीश रहे एमएम पुंछी का वह फ़ैसला किसी को पक्षपात या भ्रष्टाचार के दायरे में नहीं लगा, जब उन्होंने शिकायतकर्ता से समझौता करने के आरोप में जेल की सज़ा भुगत रहे एक प्रभावशाली व्यक्ति को अपने मन से बरी कर दिया। जबकि यह नॉर्म का खुल्मखुल्ला उल्लंघन था।

मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस आदर्श सेन आनंद पर तो फ़र्ज़ी हलफ़नामे से ज़मीन हथियाने के एक नहीं तीन-तीन गंभीर आरोप लगे। जस्टिस आनंद पर आरोप था कि उन्होंने जम्मू कश्मीर के होटल व्यापारी के पक्ष में फ़ैसला दिया, बदले में व्यापारी ने उनकी बेटी को औने-पौने दाम पर भूखंड दे दिया। जस्टिस आनंद सेन ने तो अपने ख़िलाफ़ घोटाले को प्रकाशित करने वाले पत्रकार विनीत नारायण को बहुत टॉर्चर किया था। उनको अब तक का सबसे भ्रष्ट मुख्य न्यायाधीश कहें तो हैरानी नहीं। वह कितने ताक़तवर थे इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब भ्रष्टाचार के बारे में आनंद से क़ानून मंत्री राम जेठमलानी ने स्पष्टीकरण मांगा तो आनंद ने उनको क़ानूनमंत्री पद से हटवा दिया। उस समय कांग्रेस या किसी दूसरे दल के किसी सांसद ने आनंद के ख़िलाफ़ महाभियोग लाना तो दूर, लाने की सोची भी नहीं। सबसे अहम जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद करने वाले कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल उस समय जस्टिस आनंद का बचाव कर रहे थे।

न्यायमूर्ति वाईके सभरवाल भी भ्रष्टाचार से अछूते नहीं रहे। उन्होंने कुछ बिल्डरों और न्यायाधीश के बेटों को फायदा पहुंचाने के लिए दिल्ली में कॉमर्शियल गालों को सील करने का आदेश दिया। इसके बाद उनका बेटा भी रियल इस्टेट के कारोबार में उतर गया और एक लाभ पाने वाले बिल्डर का पार्टनर बन गया। सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि उनके बेटे की कंपनी का पंजीकृत ऑफिस न्यायाधीश का सरकारी घर था। लेकिन उनके ख़िलाफ़ किसी ने महाभियोग लाने के बारे में सोचा भी नहीं। इसके अलावा समय समय पर हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज ऐसे फ़ैसले देते रहे हैं, जिनसे फेवर और भ्रष्टाचार की बू आती है, लेकिन कभी किसी जज पर महाभियोग नहीं लाया गया।

विनीत नारायण की किताब 'भ्रष्टाचार, आतंकवाद और हवाला कारोबार' में कहा गया कि हवाला कांड को मुख्य न्यायाधीश रहे जगदीश शरण वर्मा पर गंभीर आरोप लगाया है। उनके मुताबिक जस्टिस वर्मा ने एक साज़िश के तहत बिना सघन जांच के ठंडे बस्ते में डाल दिया। इसी तरह तीन साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने अभिनेता सलमान ख़ान को हिट रन केस में कुछ घंटे के भीतर आनन-फानन में सुनवाई करके ज़मानत दे दिया और जेल जाने से बचा लिया था। जस्टिस एआर जोशी ने अपने रिटारमेंट से पहले सलमान खान को रिहा ही कर दिया। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने महाभ्रष्टाचारी जे जयललिता को निर्दोष करार देकर फिर उसे मुख्यमंत्री बना दिया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने वह फ़ैसला बदल दिया और जयललिता तो नहीं उनकी सहेली शशिकला जेल में हैं। ज़ाहिर है, इस तरह के अप्रत्याशित फ़ैसलों के पीछे सुनियोजित लेन-देन होता है।

अब तक भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में केवल एक  न्यायाधीश के ख़िलाफ़ महाभियोग की कार्यवाही की गई। 1993 में संसद में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वी रामास्वामी को एक जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करना पड़ा। कपिल सिब्बल ने उस वक़्त लोकसभा में रामास्वामी का जोरदार बचाव किया। नरसिंह राव सरकार के दौरान लाया गया वह महाभियोग प्रस्ताव लोकसभा में पारित नहीं हुआ। हालांकि संसद में महाभियोग का सामना करने वाले रामास्वामी इकलौते जज हैं।

जो भी हो, स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभों कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की मर्यादा और विश्वसनीयता को बनाए रखी जाए। देश की संवैधानिक संस्थाओं को राजनीति से दूर रखने की ज़िम्मेदारी केवल सरकार या सत्तारूढ़ दल अथवा गठबंधन की नहीं, बल्कि हर राजनीतिक दल और हर नेता की होती है। और राजनेता अगर संसद के किसी सदन लोकसभा या राज्यसभा का सदस्य है तो उसकी ज़िम्मेदारी और जवाबदेही कई गुना ज़्यादा बढ़ जाती है। इतना तो तय है कि कांग्रेस ने जस्टिस दीपक मिश्रा के ख़िलाफ़ महाभियोग चलाने का फ़ैसला सही समय पर नहीं लिया। भारतीय समाज में न्यायपालिका को बहुत सम्मान से देखा जाता रहा है। जनता का यह विश्वास अब तक इसलिए भी कायम रहा क्योंकि उसकी सत्ता स्वायत्ता और स्वतंत्र रही। इसी कारण वह लोकतंत्र का अभिभावक रहा है। न्यायपालिका का राजनीतिकरण जम्हूरियत की बुनियाद को कमज़ोर करेगा।
समाप्त

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

भारत में रेपिस्ट को जल्दी फ़ांसी देना मुमकिन ही नहीं!


हरिगोविंद विश्वकर्मा

जम्मू कश्मीर के कठुआ में आठ साल की बच्ची से गैंगरेप और उत्तर प्रदेश के उन्नाव में रेप की वारदात से मीडिया या सोशल मीडिया से इत्तिफ़ाक रखने वाला कमोबेश देश का हर आदमी उद्वेलित है। सोशल मीडिया से लेकर गली-मोहल्ले, सड़क और बस-ट्रेन में यही चर्चा है। लोग कैंडिल मार्च और धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। बलात्कारियों को सरेआम सज़ा-ए-मौत देने की पुरज़ोर पैरवी की जा रही है। कहीं-कहीं तो रिएक्शन और आक्रोश एक्स्ट्रीम पर है, लोग इस तरह रिएक्ट कर रहे हैं कि उनका बस चले तो तालिबानी सोच वालों की तरह रेपिस्ट्स को फ़ौरन फ़ांसी के फ़ंदे से लटका दें। देश का यह रिएक्शन बरबस दिसंबर 2012-जनवरी 2013 की दिल्ली गैंगरेप की याद दिला रहा है। उस समय भी जनआक्रोश सड़क से संसद तक पहुंच गया था और दिल्ली सल्तनत को नया रेप क़ानून बनाने का ऐतिहासिक कदम उठाना पड़ा।

दिल्ली गैंगरेप को साढ़े पांच साल गुज़र गए, लेकिन अभी तक किसी रेपिस्ट को फ़ांसी की सज़ा नहीं हुई। ऐसे में जम्मू कश्मीर की सीएम मेहबूबा मुफ़्ती का हाईकोर्ट से फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन के आग्रह का क्या औचित्य? भारत में न्याय-व्यवस्था चार स्तरीय है, पहली निचली अदालत या फास्ट ट्रैक कोर्ट, दूसरी हाई कोर्ट, तीसरी सुप्रीम कोर्ट और चौथी राष्ट्रपति द्वारा दया याचिका का निपटारा। इसमें कितना समय लगता है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगा लीजिए कि पिछली बार बलात्कार-हत्या के अपराधी धनंजय चटर्जी को कोलकाता के अलीपुर जेल में 14 अगस्त 2004 को फांसी दी गई थी, उसे भी फांसी देने में 14 साल लग गए थे। उसके बाद देश में केवल तीन फ़ांसी हुई लेकिन मौत की सज़ा पाने वाले तीनों अपराधी मोहम्मद कसाब, अफ़ज़ल गुरु और याक़ूब मेमन राष्ट्रद्रोह करने वाले आतंकवादी थे।

दिल्ली गैंगरेप की शिकार ज्योति सिंह के माता-पिता अभी तक राह देख रहे हैं कि उनकी बेटी के साथ बलात्कार करके उसका शरीर ही नष्ट करने वाले अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा, पवन गुप्ता और मुकेश सिंह को कब फ़ांसी के फंदे पर लटकाया जाता है। मुख्य आरोपी ड्राइवर रामसिंह ने सज़ा पाने से पहले ही 11 मार्च 2013 को तिहाड़ जेल में ख़ुदकुशी कर ली थी। 16 दिसंबर की रात पीड़ित लड़की पर सबसे ज़्यादा हैवानियत करने वाला अपराधी मोहम्मद अफरोज़ उर्फ़ राजू भारतीय न्याय-व्यवस्था पर हंसता हुआ 18 दिसंबर 2016 को सुधार घर से बाहर आया, क्योंकि रेप करते समय उसकी उम्र 18 साल से कुछ दिन कम थी यानी वह नाबालिग था।

दरअसल, नया क़ानून बनने और फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित होने से लगा लोग सीरियस हैं। अपराधियों की खैर नहीं। दिल्ली पुलिस ने रिकॉर्ड समय में केस का आरोप पत्र दाख़िल कर दिया। रोहिणी फास्ट ट्रैक कोर्ट ने 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 180 दिन के अंदर सज़ा पर मुहर लगा दी। उस समय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों कार्यपालिका (पुलिस+सरकार), विधायिका (संसद) और न्यायपालिका (निचली अदालत+दिल्ली हाईकोर्ट) की सक्रियता देखकर भरोसा हुआ कि महिलाओं पर अत्याचार को अब सहन नहीं किया जाएगा।

लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ। हर कवायदें टांय-टांय फिस्स होने लगीं, क्योंकि देश के सबसे महत्वपूर्ण मुक़दमे पर फ़ैसला देने में देश की सबसे बड़ी अदालत को 1508 दिन या चार साल का समय लग गया। सुप्रीम कोर्ट ने 14 मार्च 2014 के केस का फ़ैसला 5 मई 2017 को दिया। अगर कहें कि बलत्कृत महिला को जल्दी न्याय दिलाने की कोशिश की हवा सुप्रीम कोर्ट ने निकाल दी, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। क़रीब साल भर उस फ़ैसले को भी बीत गया, लेकिन दरिंदों को सज़ा नहीं दी जा सकी। मतलब, आप सरकार में हैं तो चाहे जितना उछल कूद लें, कमेटी बिठा लें, जांच करवा लें और फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बना लें, लेकिन फ़ैसला अदालत मुक़दमे की प्रक्रिया पूरी होने पर ही देगी। अब व्यवस्था ही ऐसी है तो सुप्रीम कोर्ट क्या करे।

दिल्ली गैंगरेप पर बीबीसी के लिए ब्रिटिश फिल्मकार लेस्‍ली एडविन ने 'इंडियाज डॉटर्स' नाम से डॉक्‍यूमेंट्री बनाई थी, जिसमें उन्होंने महिलाओं या लड़कियों के प्रति पुरुष की मानसिकता को बताने की हर संभव कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने तिहाड़ जेल में एक आरोपी का इंटरव्यू भी लिया था। उस इंटरव्यू के कारण डॉक्यूमेंट्री विवाद में आ गई। उस पर प्रसारण से पहले ही बैन लग गया। भारत सरकार के सख़्त होने पर डॉक्यूमेंट्री के कंटेंट को यू-ट्यूब से भी हटाना पड़ा। दिल्ली गैंगरेप की घटना कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि केंद्र ने महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन अपराध को रोकने के लिए कठोर क़ानून बनाने की घोषणा की। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया गया। कमेटी ने दिन रात काम किया। उसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी समेत देश-विदेश से क़रीब 80 हज़ार सुझाव मिले। कमेटी ने रिकॉर्ड 29 दिन में 630 पेज की रिपोर्ट 23 जनवरी 2013 को सरकार को सौंप दी।

कमेटी को महिलाओं पर यौन अत्याचार करने वालों को कठोरतम दंड देने की सिफ़ारिश करनी थी। लोगों को उम्मीद थी कि रेपिस्ट को फ़ांसी की सज़ा का प्रावधान होगा। मगर रिपोर्ट निराशाजनक रही। कमेटी ने रेप को रेयर ऑफ़ रेयरेस्ट केस माना ही नहीं, जबकि देश का हर आदमी रेपिस्ट को फ़ांसी देने के पक्ष में था। इसीलिए, वर्मा कमेटी की रिपोर्ट पढ़कर कई महिला संगठनों ने आरोप लगाया कि पुरुष प्रधान समाज में पले-बढ़े और न्याय-व्यवस्था का संचालन करने वाले जस्टिस वर्मा बलत्कृत स्त्री की पीड़ा महसूस करने में असफल रहे, अन्यथा बलात्कारी के लिए फ़ांसी की सज़ा की सिफ़ारिश ज़रूर करते। वस्तुतः कमेटी ने रेप के बाद लड़की की हत्या या मौत को रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर ज़रूर माना और हत्यारे रेपिस्ट के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान किया। इसके अलावा यौन अपराध करने वालों को कड़ी सज़ा का प्रावधान किए गए जिसके चलते तरुण तेजपाल जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी पुलिस की गिरफ़्त में आए। बहरहाल, 21 मार्च 2013 को लोकसभा ने बलात्कार विरोधी बिल पास कर दिया और इस क़ानून को क्रिमिनल लॉ संशोधन अधिनियम 2013 कहा गया।

जो भी हो, नया अपराध क़ानून के बने क़रीब पांच साल होने वाले हैं, लेकिन इसके तहत अभी तक किसी को सज़ा नहीं हुई है। नए क़ानून के बाद दिल्ली के अलावा मुंबई शक्ति मिल कंपाउंड गैंगरेप समेत कई बलात्कार के आरोपियों को निचली अदालतों की ओर से फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है, लेकिन सभी मुक़दमे ऊपरी अदालतों में लटके पड़े हैं। बेशक न्यायपालिका के पास वर्कलोड ज़्यादा है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज कह चुके हैं कि देश में 65 हज़ार (64,919) आपराधिक मुक़दमे लंबित हैं। वैसे पूरे देश में तीन करोड़ मुकदमे अंडरट्रायल हैं।

संभवतः नए क़ानून के तहत किसी को सज़ा न दे पाने के कारण ही तमाम कोशिश के बावजूद रेप की वारदातें रोके नहीं रुक रही हैं। अगर नेशनल क्राइम ब्यूरो के डेटा पर गौर करें तो नया रेप क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद देश में रेप की घटनाएं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ी हैं। सन् 2009, 2010, 2011 और 2012 में रेप के मामले क्रमशः 21,397, 22172, 24206 और 24923 थे। 2013 में नया क़ानून बनने के बाद रेप 2013, 2014, 2015 और 2016 में ऊछलकर क्रमशः 33707, 34098, 36,735 और 38,947 हो गया। आजकल रोज़ाना रेप के 101 केस दर्ज हो रहे हैं। यानी 14 मिनट में एक महिला अपनी इज्ज़त गंवा रही है। दिल्ली और मुंबई महिलाओं के लिए सेफ़ मानी जाती है, लेकिन यहां बलात्कार की घटनाएं सबसे ज़्यादा होती है। अकेले दिल्ली में रोज़ाना चार महिलाएं रेप की शिकार होती हैं।

उर्दू के मशहूर शायर ख़्वाज़ा हैदर अली 'आतिश' का शेर “बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जब चीरा तो क़तरा-ए-खूं न निकला।“ इस देश की व्यवस्था की कथनी-करनी में अंतर बयां कर देता है। मतलब, कभी लोग क्रांति करने के लिए उतावले हो जाते हैं और कभी घटना ही विस्मृत कर देते हैं। सरकार भी पीछे नहीं रहती और घोषणा पर घोषणा करने लगती है, यह सोचे बिना ही कि घोषणा पर अमल संभव है या नहीं। इतनी सक्रियता देखकर लगता है कि अब ऐसी वारदातें भविष्य में नहीं होंगी, लेकिन जल्द ही लोग घटना ही भूल जाते हैं और पुलिस कांख में डंडा दबाए फिर से वही ”खैनी खाने” वाली मुद्रा में आ जाती है। उसका यह अप्रोच हर घटना को लेकर रहता है। चाहे वह आतंकी हमला हो या फिर महिलाओं पर यौन हमला यानी गैंगरेप।
समाप्त

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

#मुंबईकागौरव - #राजाबाई #क्लॉक #टॉवर

मुंबई का गौरव - राजाबाई क्लॉक टॉवर

पहले समय देखने की घड़ी उतनी प्रचलन में नहीं थी। घड़ी वही लोग पहन पाते थे, जिनके पास उसे खरीदने की हैसियत होती थी। इसीलिए अंग्रेजों के शासनकाल में हर शहर में कम से कम एक क्लॉक टावर या घड़ी टॉवर या फिर घंटा घर बनाने की शानदार परंपरा शुरू हुई। व्रिटिश काल में ही सन् 1860 से 1890 के बीच कमोबेश हर शहर में क्लॉक टॉवर या घंटाघर बनाया गया। उस समय घड़ी टॉवर या घंटाघर शहर और कस्बे में समय को बताने में अभिन्न भूमिका निभाते थे। सबसे अहम आज पुराने घड़ी टॉवर शहर के प्रमुख लैंडमार्क में तब्दील हो गए हैं।

करीब दो सदी पहले मुंबई में भी लोगों को सही समय क्या है, इसे जानने में बहुत असुविधा होती थी। इसीलिए मुंबई में घंटाघर यानी क्लॉक टॉवर बनाने के कवायद 18 वीं सदी के साठ के दशक में शुरू हुई। सबसे पहले सोचा जाने लगा कि इसे बनाया कहां जाए। चूंकि अध्ययन के दृष्टि से मुंबई विश्वविद्यालय का पोर्ट कैंपस (तब कालीना कैंपस नहीं था) अहम केंद्र था, लिहाज़ा, विश्वविद्यालय परिसर में काउंसिल क्षेत्र में ही क्लॉक टॉवर बनाने की फैसला किया गया।

अपने अंदर एक लंबा इतिहास समेटे राजाबाई क्लॉक टॉवर आज भी मुंबई विश्वविद्यालय परिसर में शान से खड़ा है। ब्रिटिश वास्तुकार सर गिलबर्ट स्कॉट ने इसकी डिजाइनिंग की। राजाबाई क्लॉक टावर लंदन के बिग बेन की प्रतिकृति है। इसके निर्माण की पहली ईंट 1 मार्च 1869 में रखी गई और नवंबर 1878 में यह पूरा हो गया। इसका ग्राउंड फ्लोर पर 17 मीटर बाई 8.5 मीटर के दो साइड रूम हैं। इसकी ऊचाई को चार चरण विभाजित किया गया है। इसकी ऊंचाई लगभग 29 मंजिली इमारत के बराबर है। बहुमंजिली इमारतों के दौर में यह ऊचाई भले कम लगे, लेकिन कभी इतना ऊंचा निर्माण असंभ कार्य माना जाता था।

टॉवर की वास्तुकला विनीशियन और गॉथिक शैलियों का संगम है। यह स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बफर रंगीन कुर्ला पत्थर से बनाया गया है। उस समय इसके निर्माण पर पांच लाख 50 हजार रुपए खर्च हुए थे। उस समय यह बहुत बड़ी राशि थी। दरअसल, बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के संस्थापक प्रेमचंद रायचंद ने राजाबाई क्लॉक टावर बनाने के लिए एक मोटी धनराशि आर्थिक सहायता के रूप में दी थी। इसीलिए क्लॉक टॉवर का नाम रॉयचंद की मां राजाबाई के नाम पर राजाबाई कलॉक टॉवर रखा गया।

दरअसल, प्रेमचंद रॉयचंद की मां राजाबाई नेत्रहीन थीं। वह जैन धर्म की कट्टर अनुयायी थीं और अपना रात का खाना सूर्यास्त से पहले खा लेती थीं। इस टॉवर के बन जाने के बाद उसमें लगी घड़ी की शाम की घंटी राजाबाई की समय जानने में बड़ी मदद करने लगी। बीच में दर्दीले फिल्मी गीतों की परंपरा शुरू होने पर असफल प्रेमी टॉवर की इस्तेमाल खुदकुशी करने के लिए करने लगे। इसलिए इसे जनता के लिए बंद कर दिया गया।  

जनवरी 2012 में इस ऐतिहासिक की इमारत को संरक्षित करने के लिए टाटा कंसल्टिंग सर्विस ने राजाबाई क्लॉक टॉवर और विश्वविद्यालय लाइब्रेरी की इमारत की मरम्मत इंडियन हेरिटेज सोसाइटी के साथ मिलकर की। बड़ी चुनौतियों में से एक यह थी कि उस घड़ी टावर के संवेदनशील पुनःनिर्माण कार्य तथा मरम्मत कार्य को अंजाम देना जो कि 87 मीटर की ऊंचाई पर चल रही है। बहरहाल मरम्मत कार्य पर कुल 4 करोड़ 20 लाख रुपये का खर्च आया। मुंबई यूनिवर्सिटी को यह धनराशि टीसीएस ने आर्थिक सहायता के रूप में दी। मरम्मत का काम विशेषज्ञ श्रमिकों एवं विशेषज्ञों द्वारा किया गया। जो परिणाम आखिरकार मिला वो एक भव्य भवन का हैजिसकी भव्यता फिर से लौटा दी गई है। ऐसे समय जब मुंबई शहर में अनेक धरोहरें देखभाल के अभाव में खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। तब राजाबाई टॉवर का उसी शान-शौकत से खड़े रहकर मुंबई का गौरव बढ़ाना महत्वपूर्ण है। वैसे तो मुंबई विश्वविद्यालय भवन को भी गिलबर्ट स्कॉट ने इसका डिजाइन तैयार किया है और यह 15वीं शताब्दी का इटेलियन भवन जैसा दिखता है। लेकिन राजाबाई टॉवर ने उसकी सुंदरता में चार चांद लगा दिया है।

रविवार, 25 मार्च 2018

ग़ज़ल - मेरा क्या कर लोगे ज्यादा से ज्यादा




















ग़ज़ल

मेरा क्या कर लोगे ज़्यादा से ज़्यादा,
गुफ़्तगू ना करोगे ज़्यादा से ज़्यादा।

पता है वसूलों से समझौते की कीमत,
मालामाल कर दोगे ज़्यादा से ज़्यादा।

ना जाऊंगा मसजिद ना करूंगा पूजा,
तुम काफ़िर कहोगे ज़्यादा से ज़्यादा।

फ़साद में तुम्हारा साथ दे सकता नहीं,
मेरा घर जला दोगे ज़्यादा से ज़्यादा।

ग़लत को ग़लत सदा कहता ही रहूंगा,
मुझे क़त्ल कर दोगे ज़्यादा से ज़्यादा।

कभी भी ना छोड़ूगा सत्य का दामन,
बोटी-बोटी कर दोगे ज़्यादा से ज़्यादा।

कभी न जाऊंगा देशद्रोहियों के साथ,
कोई नाम दे दोगे ज़्यादा से ज़्यादा।
-हरिगोविंद विश्वकर्मा

शनिवार, 17 मार्च 2018

#बर्मा के बाद अब #श्रीलंका में #मुसलमान संकट में

बर्मा के बाद अब श्रीलंका में मुसलमान संकट में

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दक्षिण एशिया में हिंद महासागर के सबसे उत्तरवर्ती छोर पर चारों ओर से उफनते समुद्र से घिरे द्वीप पर बसा ख़ूबसूरत सा छोटा देश श्रीलंका इन दिनों अशांत है। यह अशांति और न बढ़े इसलिए श्रीलंका सरकार ने पूरे देश में इमरजेंसी लगा दी है। दुर्भाग्य से यहां भी समस्या की जड़ इस्लाम धर्म को मानने वाले चंद सिरफ़िरे लोग हैं, जिनकी हरकतों के कारण शांतिपूर्ण जीवन जीने के अभिलाषी मुसलमान ख़ूनी संघर्ष में अपना सब कुछ गंवा रहे हैं। इससे पहले ग़रीब और मज़लूम मुसलमान बर्मा यानी म्यांमार में ख़ूनी संघर्ष के कारण पलायन करने को मजबूर हुए। चंद सिरफ़िरे आतंकवादियों के कारण दूसरे धर्मों के लोग सारे मुसलमानों को उपद्रवी मानते हैं और उन्हें शरण देने तक से कतराते हैं। भारत और श्रीलंका में यही हुआ है। बहरहाल, घूमने-फिरने के लिए शानदार डेस्टिनेशन श्रीलंका भारतीय समुद्र तट से महज 31 किलोमीटर की दूरी पर है, फिर भी भारत के लोग अपने पड़ोसी देश की मौजूदा समस्या से बहुत इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हैं। म्यांमार की तरह श्रीलंका में भी मुसलमानों के विरोध में आवाज़ें उठने लगी हैं। यह पड़ोसी देश होने के नाते भारत के लिए भी यह खतरे की घंटी से कम नहीं है।

म्यांमार की तरह श्रीलंका में भी मुसलमानों का टकराव बहुसंख्यक बौद्ध धर्म के अनुयायियों से हो रहा है। अहिंसा का सिद्धांत आमतौर पर अन्य धर्मों की तुलना में बौद्ध धर्म में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। बौद्ध भिक्षुओं को सदैव हिंसा से दूर रहने की नसीहत दी जाती है। उन्हें हथियार न उठाने और मानव हत्या से दूर रहने की भी शिक्षा दी जाती है। कुल मिलाकर बौद्ध धर्म ‘जीयो और जीने दो’ की फिलॉसफी पर चलता आया है। इसके बावजूद श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुओं का संघर्ष मुसलमानों से हो रहा है। सबसे अहम् बर्मा में भी मुसलमानों को देश से निकालने की मांग करने वाले बौद्ध भिक्षु ही हैं। जिस समुदाय का अतीत शांति के दूत का रहा हो, अगर वह समुदाय हिंसा में शामिल हो जाए और एक समुदाय के लोगों को ही देश से निकालने की मांग करने लगे तो कान खड़े हो जाते हैं। यह उसी तरह की घटना है, जैसे कोई पढ़ा-लिखा शांतिप्रिय नागरिक अचानक हथियार उठा ले। आमतौर पर किसी चीज़ की अति हो जाने पर ही शांति की राह पर चलने वाले लोग हिंसा की ओर क़दम बढ़ाते हैं। कमोबेश पहले म्यांमार और अब श्रीलंका में वही हो रहा है। बहरहाल, आइए जानते हैं, श्रीलंका में बौद्ध सिंहलियों और मुसलमानों के बीच क्यों हो रहा है ख़ूनी संघर्ष।

दरअसल, चंद साल पहले तक श्रीलंका में जातीय हिंसा की ख़बरें आती थीं। जब उत्तरी श्रीलंका के जाफना प्रायद्वीप में स्वतंत्र राष्ट्र की मांग करने वाले तमिल विद्रोहियों के साथ वहां की बहुसंख्यक जनता का संघर्ष होता था, जो लिट्टे के सरगना वेलुपिल्लई प्रभाकरण के मई 2009 में मारे जाने के बाद क़रीब-क़रीब समाप्त हो गया। प्रभाकरण के बाद श्रीलंका में चार-पांच साल पूर्ण शांति रही। मगर जून 2014 में अचानक श्रीलंका में धार्मिक दंगे भड़क उठे। देश में मजहबी ख़ूनी टकराव की यह पहली वारदात थी। अब क़रीब साढ़े तीन साल के समयांतराल के बाद फिर से धार्मिक दंगे हो रहे हैं। इस बार भी दंगे 2014 की तरह चंद अतिवादी और सिरफ़िरे मुस्लिम युवकों द्वारा बर्बर तरीक़े से सिंहली समाज के एक व्यक्ति की हत्या कर देने से हिंसा की चिंगारी उठी और पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया। मामला बहुसंख्यक सिंहली समाज के अल्पसंख्यक मुसलमानों के साथ खूनी संघर्ष का था, जिसे यथाशीघ्र रोकने के लिए श्रीलंका सरकार को आनन-फानन में पूरे देश में आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी।

श्रीलंका में धार्मिक दंगे के बाद सिंहली और मुस्लिम समाज के बीच भयानक तनाव है। पिछले कई साल से बौद्ध समुदाय के लोग मुस्लिमों पर आरोप लगाते रहे हैं कि यहां के मुसलमान आजकल ग़रीब लोगों का धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं। इसके बाद सिंहली आक्रामक हो गए। चंद सिरफ़िरे लोगों की हरकत की कीमत पूरे मुल्क को चुकानी पड़ रही है। पिछले अक्टूबर से गॉल में मुसलमानों की मिल्कियत वाली कंपनियों और मस्जिदों पर हमले की कई वारदातों हो चुकी हैं। श्रीलंका में धार्मिक हिंसा के लिए चंद सिरफ़िरे मुसलमानों के साथ-साथ कट्टरपंथी बौद्ध संगठन 'बोदुबाला सेना' को भी ज़िम्मेदार माना जा रहा है। 'बोदुबाला सेना' के जनरल सेक्रटरी गालागोदा ऐथे गनानसारा अकसर कहते रहे हैं कि मुस्लिमों की बढ़ती आबादी देश के मूल सिंहली बौद्धों के लिए गंभीर ख़तरा है। उनकी बात से इनकार नहीं किया जा सकता। आंकड़े बताते हैं कि मुसलमानों की आबादी श्रीलंका में सबसे ज़्यादा बढ़ रही है। श्रीलंका में 2012 में हुई जनगणना के अनुसार श्रीलंका की में 70 फ़ीसदी बौद्ध धर्म के, 12 फ़ीसदी हिंदू, 10 फ़ीसदी मुसलमान और 7.8 फ़ीसदी ईसाई हैं। 31 साल में बौद्ध धर्म की जनसंख्या में मामूली बढ़ोतरी हुई और वहां 69.30 से70.10 फ़ीसदी तक पहुंची। इसी दौरान मुसलमानों की आबादी 7.56 फ़ीसदी से बढ़कर क़रीब 10 (9.77) फ़ीसदी हो गई। 1931 में यहां 5.46 फ़ीसदी मुसलमान थे। क़रीब नब्बे साल में इनकी आबादी दोगुनी हो गई। सबसे अहम श्रीलंका में हिंदुओ की आबादी बड़ी तेज़ी से घट रही है।1981 में वहां 15.43 फ़ीसदी हिंदू थे, जबकि 2012 में यह घटकर 12.58 फ़ीसदी रह गई है, जबकि ईसाइयों की आबादी 7..8 के आसपास यानी स्थिर रही है।

क़रीब 2 करोड़ 65 लाख आबादी वाले इस द्वीप का वर्णन भारतीय पौराणिक काव्यों में लंका के रूप में मिलता है। पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में यूरोपीय व्यापारियों ने इस भूभाग पर क़दम रखा। शुरू में इस पर पुर्तगालियों का आधिपत्य रहा, बाद में फ्रांसिसियों ने इस पर क़ब्ज़ा कर लिया। अठारहवीं सदी के आते-आते इस तटीय इलाकों पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया। 1818 में कैंडी के राजा के आत्मसमर्पण करने के बाद देश पर अंग्रेजों का एकाधिकार हो गया। अंग्रेजों ने इसका नाम 'सीलोन' रख दिया। 'सीलोन' नाम 1972 तक प्रचलन में रहा। बाद में इसे बदलकर 'लंका' कर दिया गया। सन् 1978 में इसके आगे 'श्री' जोड़कर औपचारिक रूप से श्रीलंका कर दिया गया। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो समुद्री परिवहन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बंदरगाह है। प्रशासकीय रूप से श्रीलंका केंद्रीय प्रांत, उत्तरी मध्य प्रांत, उत्तरी प्रांत, पूर्वी प्रांत, उत्तर पश्चिमी प्रांत, दक्षिणी प्रांत, उवा प्रांत, सबरगमुव प्रांत और पश्चिमी प्रांत के रूप में नौ प्रांतों और 25 जनपदों में बंटा हुआ है।

जहां तक श्रीलंका में इस्लाम के फलने-फूलने की बात है तो यह सिलसिला सातवीं सदी में शुरू हुआ, जब कुछ अरब व्यापारी भारत के साथ श्रीलंका में आकर व्यापार करने लगे। अरब व्यापारी बाद में यहां की स्थानीय महिलाओं के साथ निकाह और उनका धर्म परिवर्तन करवाने लगे। इन व्यापारियों को ‘श्रीलंकन मूर’ कहा जाता है। आठवीं सदी तक अरब व्यापारियों ने श्रीलंका समेत पूरे हिंद महासागर के व्यापार को अपने नियंत्रण में ले लिया। व्यापार पर नियंत्रण करने के बाद इन व्यापारियों ने इस्लाम का प्रचार प्रसार करना शुरू किया। यह सिलसिला 15वीं सदी तक चलता रहा। 16 वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारी श्रीलंका पहुंचे। उन्होंने श्रीलंकन मूर के कारोबार पर हमला करके उसे पंगु बना दिया। पुर्तगालियों के अत्याचार से तंग मुस्लिम व्यापारी पलायन करने लगे। इस दौरान एक समय ऐसा भी आया जब श्रीलंका में मुसलमानों की आबादी घटने लगी।

18वीं और 19वीं सदी में हालैंड और अंग्रेज़ व्यापारी जावा और मलेशिया से मुसलमानों को श्रीलंका लेकर आए। इस तरह इस छोटे से द्वीप पर मुसलमानों की जनसंख्या बढ़ने लगी। इसके अलावा 19 वीं और 20 वीं सदी में पड़ोसी भारत से भी मुसलमान श्रीलंका जाकर बस गए। इनमें मेमन, बोहरा और खोजा प्रमुख थे। सबसे अहम पाकिस्तानी और दक्षिण भारतीय मुसलमानों ने श्रीलंका में शफी और हनीफी विचारधारा को शुरू किया। यहां के मुसलमान सामान्यतया सुन्नी रवायत और देवबंदी तबलिगी जमात, जमाते इस्लाम और थवाहीद परंपरा को मानते हैं,  जिनके कई केंद्र कोलंबो में हैं। मौजूदा समय में श्रीलंका में मुसलमानों के मसाइल को मुस्लिम रिलिजियस एंड कल्चर अफेयर्स डिपार्टमेंट देखता है, जिसकी स्थापना 1980 में की गई। इस विभाग की स्थापना श्रीलंका में मुसलमानों को देश की मुख्य धारा में लाने के लिए किया गया था। आधुनिक श्रीलंका में मिश्रित मुसलमान हैं, जिनमें मुख्य रूप से मूर, मलाया और धर्मांतरण कर चुके तमिल मुसलमान हैं।

श्रीलंका सरकार एक और समस्या से जूझ रही है। जहां जहां मुसलमानों की जनसंख्या ज़्यादा है, वहां हिंसा और अपराध की ख़बरें ज़्यादा आती रहती हैं। 'बोदुबाला सेना ने प्रमाण जारी करके आरोप लगाया है कि मुस्लिम समुदाय के लोग बौद्ध पुरातात्विक स्थलों को तोड़ रहे हैं। आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि म्यांमार से पलायन करके बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमानों ने श्रीलंका में पनाह ली है। इस बार की हिंसा की कई वजहों में से एक वजह म्यांमार से पलायन करके श्रीलंका में शरण ले रहे रोहिंग्याओं का भी मसला है। भारतीय जनता की तरह श्रीलंका की बहुसंख्यक सिंहली आबादी भी रोहिंग्या मुसलमानों को प्रॉब्लमक्रिएटर मानती रही है और उन्हें अपने देश में बसाने के एकदम से ख़िलाफ़ हैं। गनानसारा आरोप लगाते हैं कि मुस्लिम समुदाय का अतिवाद ख़तरे की घंटी है और श्रीलंका के मुसलमानों को मध्य पूर्व के मुस्लिम देशों से आर्थिक मदद मिलती है।

हालांकि आधिकारिक तौर पर कहा जा रहा है कि धार्मिक दंगों पर पूरी तरह से नियंत्रण पा लिया गया है, लेकिन दोनों पक्षों के बाच तनाव अब भी बरक़रार है। इसीलिए श्रीलंका की कैबिनेट ने दंगों को रोकने के लिए इमरजेंसी लगाई। आपातकाल लगाने का फैसला कैबिनेट की विशेष मीटिंग में किया गया था। सबसे अहम् बात सन् 2014 की तरह इस बार भी दंगे की आग सिरफ़िरे मुसलमानों के एक समूह की हिंसक हरकतों के कारण भड़की। कैंडी जिले के डिगना इलाके में 26फरवरी को गाड़ी चलाने वाले 41 साल के सिंहली पर चार मुस्लिम युवकों ने कातिलाना हमला कर दिया। सिंहली ड्राइवर की पीट-पीट कर हत्या करने बाद उस इलाके में सिंहलियों के घर और दुकानें भी तोड़ी गईं। सबसे अहम् बात, एक दूसरे से क़रीब एक हज़ार मील दूर म्यांमार और श्रीलंका में रहने वाले मुसलमान चंद वर्ष पहले तक शांतिप्रिय नागरिक माने जाते थे। यही वजह है कि न तो म्यांमार और न ही श्रीलंका में इस्लामी चरमपंथी आतंकवाद की समस्या पैदा हुई, जैसा कि भारत में है। हालांकि दुनिया भर में जारी इस्मालिक आतंकवाद का असर पिछले तीन-चार साल से इन दोनों देशों में भी चंद सिरफिरे मुसलमानों में जिहाद की भावना उठने लगी। ये सिरफिरे अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, फलीस्तीन और कश्मीर में मुसलमानों पर हो रहे तथाकथित अत्याचार की बात करने लगे थे। इसकी वजह से इनमें बहुसंख्यक बौद्ध समाज के प्रति नफरत पैदा होने लगी और ये लोग हिंसक हो गए। अब दोनों देश के आम मुसलमान उसी का नतीजा भुगत रहे हैं। कई साल पहले श्रीलंका में पशुओं को हलाल करने का मुद्दा उठा था। वह शांत हो गया।

यहां गौर करने वाली बात है कि सांस्कृतिक युद्ध घातक हथियारों से लड़े जाने वाले खुले युद्ध से ज़्यादा भयानक होता है। हथियारों के युद्ध एक समयांतराल के बाद समाप्त हो जाते हैं और हालात सामने हो जाते हैं लेकिन संप्रदाय और संस्कृति की आड़ में चलने वाले युद्ध लोगों को मजहबी पहचान देकर बांट देते हैं, और इसके दूरगामी परिणाम बेहद खतरनाक होते हैं जो कभी कभी मुल्क के विभाजन के रूप में सामने आता है। भारत इसकी जीती जागती मिसाल है। शायद श्रीलंका सरकार इसीलिए चौकन्नी हो गई है और इन दंगों को यथाशीघ्र रोकने के लिए ही देश में इमर्जेंसी लगाई है।

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

राष्ट्र को समर्पित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज



हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आप यक़ीन करेंगे, कि इस देश में श्रम समेत कई बिषयों के क़ानून के आधार ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले रिसर्चर्स की रिपोर्ट के आदार पर ड्राफ्ट की गई है। इस तरह की रचनात्मक काम देश में केवल एक ही संस्थान कर रहा है और वह है टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज।

भारत की सामाजिक दशा कई सदियों ही नहीं हज़ारों साल से बड़ी दयनीय रही है। मगर दुनिया इससे बेख़बर रही। देश की सामाजिक स्थिति पर किसी का ध्यान इसलिए नहीं गया, क्योंकि इस सब्जेक्ट पर काम करने वाला कोई नहीं था। संयोग से पिछली सदी के 1920-30 के दशक में इस तरह के संस्थान की ज़रूरत महसूस की गई और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के रूप में एक संस्थान सामने आया।

राष्ट्रीय मूल्‍यांकन और प्रत्यायन परिषद की ओर से 5-स्टार सम्मान और 'ए' ग्रेड पा चुका टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज यानी टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान (टिस्स) सोशल साइंस की स्टडी के लिए भारत ही नहीं दुनिया का अग्रणी संस्थान रहा है। इसकी महत्ता इसी बात से जानी जा सकती है कि इसकी कई रिपोर्ट्स पर कानून भी बनाए जा चुके हैं। भारत का जो श्रम कानून है, वह टिस्स की देन है।

सृजित संपत्ति के उचित आवंटन के जरिए नए समाज का निर्माण उद्योग का असली मकसद है। यह विजन टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी टाटा और उनके बेटे सर दोराबजी टाटा का है। इसी विजन के तहत टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज का जन्म हुआ। 1920 के दशक में मुंबई के नागपाडा की चालों में अमेरिकी मिशनरी क्लिफोर्ड मैंशर्ट ने जमशेदजी के सहयोग से शहरी सामुदायिक प्रोग्राम शुरू किया।

इनमें दोराबजी भी सहयोग करते थे। इसी दौरान एक संस्थान की जरूरत हुई और 1936 में नागपाडा नेबरहुड हाउस में दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क शुरू हुआ। डॉ मैंशर्ट निदेशक बने। पहले साल ही डिप्लोमा कोर्स होने के बावजूद 20 सीटों के लिए 400 आवेदन आए। इसका नाम बदलकर 1944 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज कर दिया गया। टिस्स एशिया पैसिफ़िक क्षेत्र में सामाजिक कार्य शिक्षा में अग्रणी संस्था है। इसने सामाजिक नीति, नियोजन, हस्तक्षेप रणनीतियों और मानव संसाधन विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

1936 और 1948 के दौरान संस्थान ने ऐसी रिपोर्ट्स तैयार कीं, जिनका असर राष्ट्रीय कानूनों व नीतियों पर पड़ा। पूर्व निदेशक एस परशुरामन टिस्स के इतिहास में बारे में बताते हैं, “टिस्स की रिपोर्ट्स पर कानून बने। हमने श्रम कल्याण एवं औद्योगिक प्रबंधन कोर्स चलाए। उसी पर 1948 में श्रम कानू बना। देश की श्रम कल्याण की नीति सीधे-सीधे सर दोरबाजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल के कार्य से विकसित हुई।”

देवनार कैंपस का शुभारंभ 6 अक्टूबर 1954 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने किया। 1964 में इसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से डीम्ड यूनिवर्सिटी की मान्यता मिली। तब से टिस्स ने शिक्षा कार्यक्रमों का लगातार विस्तार किया। संस्थान सामाजिक व शैक्षणिक की बदलती जरूरतों के अनुसार सामाजिक कार्य के क्षेत्रमें व्यापक स्तर पर काम कर रहा है। टिस्स मानव संसाधनों और समाज कार्य में पेशेवर प्रशिक्षण देता है। यहां संगठित और सुव्यवस्थित फील्ड प्रोजेक्ट्स होते हैं, जहां विभिन्न समस्याओं पर रिसर्च होता है। संस्थान ने 500 से अधिक शोध रिपोर्ट प्रकाशित की हैं। 32 फील्ड एक्शन प्रोजेक्ट आरंभ किए हैं।

हालांकि टिस्स डीम्ड यूनिवर्सिटी है, फिर भी संचालन बोर्ड का अध्यक्ष ट्रस्ट प्रतिनिधि ही होता है। जेआरडी टाटा ने कई साल बोर्ड की अध्यक्षता की। उनका मानना था कि संपत्ति वापस समाज के विकास में लगाई जानी चाहिए। सोलापुर में सूखाग्रस्त इलाके में ग्रामीण कैंपस है। वहां पूरी तरह से सूखी पहाड़ियों को सफलतापूर्वक हर-भरा बनाया जा चुका है। कई अन्य परियोजनाएं आकार ले रही हैं। संस्थान की आगामी योजनाओं में विकासपरक अध्ययन, आपदा प्रबंधन, घरेलू हिंसा और मानवाधिकार से संबंधित अन्य केंद्रों की शुरुआत शामिल है। टिस्स शिक्षा, ट्रेनिंग और रिसर्च में योगदान दे रहा है। एनजीओज को तकनीकी मदद देता टाटा समूह ने ऐसे संस्थान का निर्माण किया है जिसने देश को संवारा, आगे बढ़ने में मदद की और अब सशक्त बना रहा है।

टिस्स सामाजिक विज्ञान, कार्मिक प्रबंधन, औद्योगिक संबंध एवं स्वास्थ्य, अस्पताल प्रबंधन और सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर और डॉक्टरेट की डिग्रियां देता है। टिस्स में नौ शिक्षण विभाग, आठ अनुसंधान इकाइयां, दो संसाधन इकाइयां और संसाधन सेल हैं।

'टिस्सा' की वेबसाइट
छात्रों और रिसर्चर्स का 'अल्मा मैटर', टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के बारे में यह लैटिन मुहावरा एकदम सही है, क्योंकि टिस्स अपने छात्रों के लिए के लिए मातृ संस्थान ही नहीं, मां की तरह भी है, जो अपने हर छात्र का भरण-पोषण बौद्धिक ख़ुराक देकर करता रहा है। इसीलिए आपका अल्मा मैटर टिस्स, आप सबकी महान उपलब्धियों की दास्तान जानना और तमाम दूसरे टिस्सियन्स के साथ ख़ुशी के साथ शेयर करना चाहता है। यह अपने तमाम टिस्सियन्स की कीर्ति, सफलता, उपलब्धि, विशेषज्ञता, जीवन-अनुभव, सम्मान, अपेक्षा, प्रतिबद्धता, दोस्ती और अपने स्वयं के संस्थान टिस्स, जिसे ख़ुद मिल चुका है, का आभार व्यक्त करने वाली भावनाओं का लिए स्वागत करता हैं।

टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस अलामस एसोसिएशन यानी टिस्सा का मुख्य उद्देश्य छात्रों और पूर्व छात्रों को सलाह, अनुसंधान और परियोजनाओं, मार्गदर्शन, इंटर्नशिप, फील्डवर्क अवसर, नौकरी पोस्टिंग, संदर्भ, छात्रवृत्ति और पुरस्कार के जरिए संबंधित क्षेत्रों में आपसी विकास के लिए एकजुट करना है। टिस्स और टिस्सियन्स को आपस में जोड़ने, उनसे संवाद करने और अल्ट्रास्पेशल बॉन्डिंग फिर से जीवंत करने का सबसे आसान, सबसे तेज़ और सबसे सुरक्षित माध्यम वेबसाइट है। टिस्सा की वेबसाइट 3 फरवरी, 2018 को शुरू हो गई। यह सुपर स्पेशल वेबसाइट दुनिया भर में फैले टिस्स के छात्रों को समर्पित है और चार दशकों के बाद पुराने और नए बैच को साथ लाएगा। इसीलिए टिस्सा वेबसाइट हमेशा ट्रेंडी और अपटूडेट रहती है।

टिस्स की स्नातक और कोंकण बाज़ार की ओनर नयन खड़पकर कहते हैं, "सच पूछो तो टाटा इंस्टीयूट ऑफ़ सोशल साइंस की कीर्ति और महिमा को दुनिया के कोने कोने में ले जाने के लिए सबसे परफेक्ट ब्रांड अंबेसेडर टिस्सियन्स ही हैं। टिस्स ने हम सबके जीवन को प्रकाशमान किया है, समग्र शिक्षा उपलब्ध कराकर हमारे भविष्य को उज्जवल बनाया है। इसीलिए टिस्स की फिर से कल्पना करके अपने प्यार, सम्मान और कृतज्ञता दिखाने की हम सबकी बारी है।"

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सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

ट्रिपल तलाक़ - राजीव गांधी की ग़लती को सुधारने का समय

हरिगोविंद विश्वकर्मा

कांग्रेस की मौलवियों और कट्टरपंथियों के सामने हथियार डालने की परंपरागत नीति, जिसके कारण आज यह पार्टी अस्तित्व के संकट से  गुज़र रही है, के चलते ट्रिपल तलाक़ यानी तीन तलाक़ की अमानवीय परंपरा को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाला विधेयक लोकसभा में पारित होने के बाद राज्यसभा में लटक गया, क्योंकि संसद के ऊपरी सदन में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का बहुमत नहीं था। अब उम्मीद की जा रही है कि मुस्लिम पुरुषों की अनैतिक और अमानवीय मनमानी के चलते मुस्लिम महिलाओं की ज़िंदगी को नारकीय बनाने वाली इस प्रथा को बंद करने के लिए मौजूदा बजट सत्र में उसे क़ानूनी जामा पहना दिया जाएगा।

उधर ट्रिपल तलाक़ पर क़ानूनी पाबंदी लगाने का पुरज़ोर विरोध कर रहा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अब भी ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध की श्रेणी में रखने के पक्ष में नहीं दिख रहा है। हालांकि इस परंपरा का पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी तो नहीं, उनकी पत्नी सलमा अंसारी ने ज़रूर खुलकर विरोध किया। तीन तलाक़ की प्रथा को अमानवीय और बकवास क़रार देते हुए सलमा अंसारी कट्टरपंथी पुरुषों को क़ुरआन पढ़ने की सलाह दे चुकी हैं, लेकिन मौलवी और कट्टरपंथी अब भी झुकने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। इसीलिए ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा एक राष्ट्रीय मसाइल बन गया है। हैरत की बात है कि मीडिया, सोशल मीडिया और जनचर्चा में बुद्धिजीवी मुसलमान अब भी नरेंद्र मोदी सरकार के ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाने की कोशिश का विरोध कर रहे हैं। विरोधियों में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सबसे आगे है।

सलमा अंसारी के विपरीत ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कहता आया है कि तीन तलाक़ का मुद्दा भी पवित्र क़ुरआन और हदीस की बुनियाद पर है। इसमें किसी भी तरह का बदलाव मुमकिन नहीं और मुसलमान किसी भी बदलाव को क़बूल नहीं कर सकता। मज़ेदार बात है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक साथ तीन तलाक़ को सामाजिक बुराई तो मानता है, परंतु वह इस प्राचीन परंपरा पर सामाजिक स्तर पर ही पाबंदी लगाने के पक्ष में है। बोर्ड पहले ही तलाक़ के मामले में कोड ऑफ़ कंडक्ट जारी करके एक साथ तीन तलाक़ देने वाले का सामाजिक बहिष्कार करने का ऐलान कर चुका है। बोर्ड ने कहा है कि अब निकाह के क़ुबूलनामे के वक़्त ही शौहर को यह भी क़ुबूल करना होगा कि वह एक साथ तीन तलाक़ नहीं बोलेगा। एक साथ तीन तलाक के बेज़ा इस्तेमाल को रोकने के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड मॉडल निकाहनामा में यह प्रावधान कर रहा है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड हैदराबाद में 9 फरवरी को होने वाली तीन दिवसीय बैठक में इस मसाइल पर चर्चा करेगा।

गौरतलब है कि अगस्त में सुप्रीम कोर्ट की पांच विद्वान न्यायाधीशों, जिसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई समुदाय के जज थे, की संवैधानिक पीठ ने मुस्लिम महिलाओं को तलाक़-तलाक़-तलाक़ की सदियों पुरानी अमानवीय और बर्बर परंपरा से निजात दिला दी थी। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सबसे ज़्यादा स्वागत ज़ाहिर तौर पर ट्रिपल तलाक़ और हलाला की विभीषिका से दो चार होने वाली देश की मुस्लिम महिलाओं ने किया था। इन महिलाओं ने खुले दिल से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ करते हुए उनका शुक्रिया अदा किया था। कहा तो यह भी गया कि तीन तलाक़ के मुद्दे के चलते ही पिछले उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में मुस्लिम महिलाओं ने अपने शौहरों के निर्देश को अंगूठा दिखाया और उनकी मर्जी के विरुद्ध भारतीय जनता पार्टी को वोट दिया था और भाजपा सवा तीन सौ सीट जीतने में कामयाब रही थी।

तीन तलाक़ के मुद्दे पर केंद्र सरकार को धन्यवाद देने वाली महिलाओं में अभिनेत्री सलमा आगा भी शामिल रहीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक़ के अमानवीय पहलू को समाज के सामने लाने वाली पहली फिल्म 'निकाह' में यादगार अभिनय किया था। उस फिल्म के प्रदर्शन के बाद भारतीय समाज ने शिद्दत से महसूस किया कि वाक़ई मुस्लिम महिलाओं के लिए ट्रिपल तलाक़ किसी भयावह सपने से कम नहीं है। चूंकि देश में आज़ादी के बाद कांग्रेस की सरकार रही और वह सरकार ट्रिपल तलाक़ की पैरवी करने वाले मुल्लों के निर्देश पर काम करती थी, इसलिए इन कुप्रथाओं को दूर नहीं किया जा सका।

ट्रिपल तलाक़ को असंवैधानिक क़रार देने के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद केंद्र सरकार सक्रिय हो गई और तीन तलाक़ को गैरज़मानती अपराध की कैटेगरी में रखने वाले विधेयक की ड्राफ्टिंग की गई और उसे लोकसभा, जहां एनडीए के पास बहुमत है, में पारित करवा लिया गया, लेकिन राज्यसभा में यह चर्चित विधेयक लटक गया। हालांकि कट्टरपंथियों की तर्ज पर कांग्रेस भी तीन तलाक़ की परंपरा का विरोध करने का दावा कर रही है और इसी बिना पर देश की इस सबसे पुरानी पार्टी ने लोकसभा में विधेयक का विरोध नहीं किया।

बहरहाल, ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा पिछले एक साल से चर्चा में है। इस मसले ने सन् 1980 के दशक में देश विदेश में चर्चा का विषय बनने वाले बहुचर्चित शाहबानो प्रकरण की याद ताज़ा कर दी है। उस समय भी देश की सबसे बड़ी अदालत ने तलाक़शुदा शाहबानो के पक्ष में फ़ैसला दिया था। लेकिन कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति ने तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को बुरी तरह डरा दिया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को इस्लाम में दख़ल मानकर केंद्र सरकार ने नया क़ानून बनाया और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को लागू होने से ही रोक दिया था। इस तरह कांग्रेस के इस बेहद अमानवीय क़दम से ट्रिपल तलाक़ की गंभीर शिकार शाहबानो इंसाफ़ पाने से वंचित रह गई।

यह कहने में गुरेज़ नहीं कि सन् 1986 में शाहबानो के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के दिए गए फ़ैसले को बदलने के लिए क़ानून बनाकर राजीव गांधी की सरकार ने जो ब्लंडर किया था उसे इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक सरकार संशोधित करने की कोशिश कर रही है। यानी जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से इस बारे में राय मांगी तो केंद्र ने साफ़ कहा कि ट्रिपल तलाक़ का धर्म से कोई संबंध नहीं, लिहाज़ा सरकार इसे ख़त्म करने के पक्ष में है। अपनी उसी लाइन ऑफ़ ऐक्शन के तहत केंद्र सरकार ने इस बिल को लोकसभा में पारित करवाया। केंद्र सरकार के फ़ैसले का नतीजा देश की मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक़ से मुक्ति के रूप में सामने आया है। कहना न होगा कि यह काम कोई दूरदर्शी सरकार ही कर सकती थी।

दरअसल, 62 वर्षीय मुस्लिम महिला शाहबानो पांच-पांच बच्चों की मां थीं। उनके शौहर ने सन् 1978 में ही तलाक़ तलाक़ तलाक़ कहते हुए उनसे पत्नी का दर्जा छीन लिया था। मुस्लिम पारिवारिक क़ानून के अनुसार शौहर बीवी की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ ऐसा कर सकता है। अपनी और बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो पति से गुज़ारा लेने के लिए अदालत पहुंचीं। उस लाचार महिला को सुप्रीम कोर्ट पहुंचने में ही सात साल गुज़र गए। सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत फ़ैसला दिया जो हर किसी पर लागू होता है, चाहे वह व्यक्ति किसी भी धर्म, जाति या संप्रदाय का हो। सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए। तब भी रूढ़िवादी मुसलमानों को कोर्ट का फ़ैसला मजहब में हस्तक्षेप लगा। असुरक्षा की भावना के चलते उन्होंने इसका विरोध किया। लिहाज़ा, तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उनकी मांगें मान लीं और इसे धर्म-निरपेक्षता की मिसाल के रूप में पेश किया। तब सरकार के पास 415 लोकसभा सांसदों का बंपर बहुमत था, लिहाज़ा, मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून 1986 में आसानी से पास हो गया।

मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून के अनुसार जब मुसलमान त़लाकशुदा महिला इद्दत के समय के बाद अपना गुज़ारा नहीं कर सके तो कोर्ट उन संबंधियों को उसे गुज़ारा देने का आदेश दे सकता है जो मुस्लिम क़ानून के अनुसार उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। परंतु, ऐसे रिश्तेदार अगर नहीं हैं अथवा गुज़ारा देने की स्थिति में नहीं हैं, तो कोर्ट प्रदेश वक्फ़ बोर्ड को गुज़ारा देने का आदेश देगा। इस प्रकार से मुस्लिम महिला के शौहर के गुज़ारा देने का उत्तरदायित्व और जवाबदेही सीमित कर दी गई।

मुस्लिम महिला (तलाक़ अधिकार सरंक्षण) क़ानून राजीव गांधी के कार्यकाल में एक बदनुमा दाग़ की तरह माना जाता है, क्योंकि कांग्रेस के उस फ़ैसले ने एक मज़लूम मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता पाने से वंचित कर दिया और भविष्य में तलाक़ की विभीषिका झेलने वाली हर मुस्लिम महिला को और ज़्यादा लाचार कर दिया। उस समय कट्टरपंथी मुसलमानों को छोड़कर हर किसी ने राजीव गांधी की तुष्टिकरण वाली नीति की आलोचना की थी। वह क़ानून आज भी काग्रेस के उस असली चरित्र को सामने लाता है, जिसके कारण सवा सौ साल से ज़्यादा पुरानी यह पार्टी विलेन बन गई और आज अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। उस फ़ैसले को कांग्रेस का राजनैतिक लाभ के लिए अल्पसंख्यक वोट बैंक के तुष्टीकरण का सटीक उदाहरण माना जाता है।

बहरहाल, इस बार केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार सही मायने में मुस्लिम महिलाओं को इंसाफ़ दिलाने की ओर अग्रसर है। इसीलिए पिछले दस साल से शौहर के अमानवीय फ़ैसले की शिकार हुई सायराबानो के पक्ष में केंद्र एक दीवार की तरह खड़ा हो गया है। ट्रिपल तलाक़ की गैरइस्लामिक परंपरा ने मुस्लिम पुरुषों को निरंकुश और बेलगाम बना दिया था। यहां तक, 'ट्रैजिडी क्वीन' मीना कुमारी (महज़बीन बानो) के साथ इस्लामिक रीति रिवाज़ से निकाह करने वाले फिल्मकार कमाल अमरोही ने मतभेद होने पर ग़ुस्से में तीन बार तलाक़ कहकर शादी तोड़ दी थी। मीना कुमारी इससे सीरियस डिप्रेशन में चली गईं, जो अंततः उनकी मौत की वजह बनी। ऐसी ही मज़लूम सायरा बानो को केद्र सरकार का सहारा मिला। केंद्र सरकार के विधि मंत्रालय ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया और अंततः मुस्लिम महिलाओं को इस परंपरा से मुक्ति दिलाने की पहल की। 

वैसे भी हर धर्म की भी अपनी एक सीमा होनी ही चाहिए। इंसानियत से बड़ा कोई धर्म, मजहब या रिलिजन नहीं हो सकता। तीन तलाक़ निश्चित रूप से इंसानियत के दायरे से बहुत ज़्यादा दूर था। पहले सुप्रीम कोर्ट और अब केंद्र सरकार ज़्यादा कुछ नहीं कर रही है, बस उसे बेहतर करने की कोशिश कर रही है। दुनिया का कोई भी धर्म नागरिकों के मनुष्य अधिकारों से बड़ा नहीं हो सकता है। इसीलिए मोदी सरकार ने इस परंपरा को हमेशा के लिए ख़त्म करने की पहल की है। इसलिए मानवीय आधार पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और कांग्रेस समेत तमाम सेक्यूलर पार्टियों को इसका समर्थन करना चाहिए ताकि ट्रिपल तलाक़ को गैरज़मानती अपराध बनाया जा सके। यक़ीन मानिए, अगर कांग्रेस ने इस बार भूल सुधार नहीं किया तो 2019 के आम चुनाव में यह सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा और नरेंद्र मोदी सरकार की हर नाकामी को ढंकते हुए भाजपा को 2014 के चुनाव से भी बड़ी जीत दिलाएगा, क्योंकि इस निरक्षर बाहुल्य देश में विकास या भ्रष्टाचार नहीं बल्कि धर्म सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा होता है।

दरअसल, कांग्रेस की नीतियों के चलते सदियों से उदार रहा हिंदू समाज यह महसूस करने लगा है कि  वन नेशन वन लॉ की थ्यौरी पर चलना चाहिए और देश में हर नागरिक के लिए एक ही क़ानून होना चाहिए, इसी मन:स्थिति के चलते देश का बहुसंख्यक समाज सांप्रदायिक कही जाने वाली पार्टियों को आंख मूंदकर वोट दे रहा है, क्योंकि वह मानने लगा है कि एनडीए अगर बुरा भी करेगा तो भी वह कट्टरपंथियों, जिन्हें सेक्यूलर कहने का फ़ैशन है, से बेहतर ही होगा।

सोमवार, 29 जनवरी 2018

गांधी पुण्यतिथि पर विशेष : तो क्या बचाया जा सकता था गांधीजी को?


हरिगोविंद विश्वकर्मा

क्या वाक़ई देश के बंटवारे के बाद लोग राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी, जिन्हें पूरी दुनिया सम्मान के साथ महात्मा गांधी कहती है, से नफ़रत करने लगे थे और हर कोई चाहता था कि गांधीजी या तो मर जाएं, या फिर उन्हें कोई मार दे? उपलब्ध दस्तावेज़ बताते हैं कि कई कांग्रेस नेता ख़ुद चाहते थे कि कोई गांधीजी की हत्या कर दे, तो अच्छा हो और इसी मन:स्थिति के चलते गांधीजी की सुरक्षा पुख़्ता नहीं की गई और उनकी हत्या कर दी गई। अन्यथा अगर केंद्र और बॉम्बे सरकार और सुरक्षा तंत्र चौकस रहा होता तो शर्तिया गांधीजी की हत्या टाली जा सकती थी।

दरअसल, दस्तावेज़ बताते हैं कि आज़ादी मिलने के बाद अगस्त 1947 से जनवरी 1948 के बीच गांधीजी बहुत अलोकप्रिय हो गए थे। उनके ब्रम्हचर्य के प्रयोग से पं. जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल समेत सभी लोग उनको कोस रहे थे। ख़ासकर पाकिस्तान ने जब कश्मीर पर आक्रमण करवाया तो सरदार पटेल ने 12 जनवरी 1948 की सुबह इस्लामाबाद को क़रार के तहत दी जाने वाली 55 करोड़ रुपए की राशि को रोकने का फ़रमान जारी कर दिया। गांधीजी ने उसी दिन शाम को इस फ़ैसले के विरोध में आमरण अनशन शुरू करने की घोषणा कर दी। गांधीजी के दबाव के चलते दो दिन बाद भारत ने पाक को 55 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया। इससे पूरा देश गांधीजी से नाराज़ हो गया था।

इसके अलावा विभाजन की त्रासदी झेलने वाला सिंधी और पंजाबी समुदाय का हर व्यक्ति सार्वजनिक तौर पर कहता था कि वह गांधीजी को गोली मार देगा। लोगों में आक्रोश उनकी मुस्लिम तुष्टीकरण नीति के कारण पनपा था। ज़ाहिर है गांधीजी की अहिंसा अव्यवहारिक थी, क्योंकि उनकी अहिंसा के चलते अखंड भारत के 30 लाख नागरिक मारे गए और कई लाख लोगों का जमाया हुआ कारोबार नष्ट हो गया जिससे करोड़ों लोग बेरोज़गार हो गए थे।

ज़्यादातर लोग मानते थे कि गांधीजी की तुष्टीकरण नीति के चलते ही भारत का दो देश में विभाजन हो गया। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना भी गांधीजी की तुष्टीकरण नीति की मुख़ालफ़त करते थे। लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि जिन्ना हैरान थे कि मुसलमानों की हर छोटी बड़ी समस्या में गांधीजी क्यों इतनी ज़्यादा दिलचस्पी लेते हैं। दरअसल, गांधीजी ने जब ख़िलाफ़त आंदोलन (1919-1922) शुरू किया तो जिन्ना अचरज में पड़ गए, क्योंकि उसका संबंध भारतीय मुसलमानों से था ही नहीं। वह तुर्की का मामला था। जैसे आजकल रोहिंग्या मुसलमानों के लिए लोग आंसू बहाते हैं, वैसे ही अली बंधुओं समेत कई मुसलमान उस आंदोलन को हवा दे रहे थे। जबकि उस समय मुसलमानों की और भी समस्याएं थी, जो ख़िलाफ़त आंदोलन से ज़्यादा महत्वपूर्ण थीं और जिन्हें तत्काल हल करने की ज़रूरत थी। लेकिन गांधीजी हमेशा अपनी बात को ही सच मानते थे। सच पूछो तो गांधीजी आला दर्जे के ज़िद्दी इंसान थे और अपने आगे किसी की भी नहीं सुनते थे। बहरहाल, सन् 1946-48 के आसपास लोग मानने लगे थे कि अगर गांधीजी अनावश्यक ज़िद न करते तो बात इतनी न बिगड़ती और मुल्क के विभाजन की नौबत न आती। गांधीजी के मुस्लिम प्रेम से लोग उसी तरह चिढ़ते थे, जिस तरह धर्मनिरपेक्षता का राग आलापने वालों से आजकल लोग चिढ़ते हैं।


बहरहाल, गांधीजी के आमरण अनशन की ख़बर एजेंसी के ज़रिए 12 जनवरी की शाम पुणे से प्रकाशित अख़बार हिंदूराष्ट्रके दफ्तर में पहुंची। नारायण आप्टे उर्फ नाना अख़बार का प्रकाशक और नाथूराम गोडसे संपादक थे। संभवतः उसी समय नाथूराम ने गांधीजी की हत्या करने का निश्चय कर लिया। क्योंकि अगले दो दिन उसने 3-3 हज़ार रुपए की दो बीमा पालिसींज का नॉमिनी उसने दोस्त नारायण आप्टे उर्फ नाना, जिसे गांधीजी की हत्या की साज़िश में शामिल होने के आरोप में फांसी दे दी गई, की पत्नी चंपूताई आप्टे और छोटे भाई गोपाल गोडसे की पत्नी सिंधुताई को बना दिया। यही बात नाना आप्टे और गोपाल के ख़िलाफ़ गई और दोनों फंस गए।

गांधीजी से लोग इस कदर चिढ़े हुए कि यह पता चलने के बाद भी कि उनकी हत्या होने वाली है, उनकी सुरक्षा चाक-चौबंद नहीं की गई और इसका नतीजा यह हुआ कि जिस जगह उनकी हत्या की कोशिश की गई थी, उसी जगह दस दिन बाद हत्या कर दी गई। दरअसल, देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान से विस्थापित होने वाला मदनलाल पाहवा, जिसे गांधी हत्याकांड में आजीवन कारावास हुई थी, गांधीजी के ख़ून का प्यासा था। उसने 20 जनवरी 1948 को बिड़ला हाउस परिसर में गांधीजी के सभा स्थल के पास बम फोड़ा और घटनास्थल पर ही पकड़ा गया। दुर्भाग्य से उसी बिड़ला हाउस में 30 जनवरी शाम गांधीजी के सीने में तीन गोलियां उतार कर नाथूराम ने उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी।



गांधी हत्याकांड की सुनवाई लालकिले में बनाई गई एक विशेष अदालत में हुई। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एमए और बंबई यूनिवर्सिटी से पीएचडी माटुंगा के रामनारायण रूइया कॉलेज में हिंदी भाषा पढ़ाने वाले डॉ. जगदीश जैन गांधी हत्याकांड के मुक़दमे में गवाह थे। उनकी गवाही 45 अगस्त 1948 को हुई। जैन के अदालत को बताया, "मदनलाल पाहवा, जिसे बाद में हत्याकांड के षड़यंत्र में शामिल पाया गया और आजीवन कारावास की सज़ा हुई, 7 जनवरी 1948 को मेरे घर आया और बताया कि कुछ लोगों के साथ मिलकर वह गांधीजी की हत्या करने वाला है। मैंने उसकी बात को ज़्यादा अहमियत नहीं दी, क्योंकि उस समय हर सिंधी-पंजाबी गांधी-हत्या की बात करता था। लेकिन तीन दिन बाद जब मदन फिर मुझसे मिला और बताया कि उसे गांधीजी की सभा में विस्फोट करने का काम सौंपा गया है, ताकि उनकी हत्या की जा सके। यह सुनकर मैं परेशान हो उठा।"

जैन ने कोर्ट को आगे बताया, "15 जनवरी को मदन दिल्ली चला गया। 17 जनवरी को जेवियर कॉलेज में जयप्रकाश नारायण का भाषण हुआ। मैं उनसे मिलकर साज़िश के बारे में बताने की चेष्टा की, लेकिन उनके आसपास बहुत भीड़ होने से पूरी बात नहीं बता पाया, पर दिल्ली में गांधीजी की हत्या की साज़िश की संभावना से उन्हें अवगत करा दिया। जब 21 जनवरी की सुबह अख़बारों में बिड़ला भवन में बम विस्फोट और मदनलाल की गिरफ़्तारी की ख़बर पढ़ी तो मेरे पांव तले ज़मीन खिसक गई। मैंने टेलीफोन पर सरादर पटेल को बताना चाहा, पर असफल रहा। कांग्रेस नेता एसके पाटिल से मिलने की कोशिश की, पर उनसे भी नहीं मिल सका। 22 जनवरी को शाम 4 बजे मुख्यमंत्री बीजी खेर से सचिवालय में मिला। तब गृहमंत्री मोरारजी देसाई भी मौजूद थे। मैंने मदनलाल की सारी बातें दोनों को बता दी।"


बहारहाल, गांधी हत्याकांड में मोरारजी की गवाही 23, 2425 अगस्त 1048 को हुई। जैन के वक्तव्य की पुष्टि करते हुए उन्होंने कहा, "22 जनवरी 1948 को ही अहमदाबाद जाने से पहले मैंने डिप्टी पुलिस कमिश्नर जमशेद दोराब नागरवाला को रात 8 बजे बॉम्बे सेंट्रल रेलवे स्टेशन बुलाया और विष्णु करकरे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया। यह सूचना मैंने मुंबई के तत्कालीन (पहले भारतीय) पुलिस कमिश्नर जेएस भरुचा को भी दे दी थी। दूसरे दिन 23 जनवरी को सुबह सरदार पटेल से मिला और उन्हें भी सारी जानकारी दे दी और बता दिया कि करकरे को गिरफ़्तार करने का आदेश दिया गया है।"

कहने का मतलब गांधीजी की हत्या की साज़िश रची गई है यह जानकारी सरदार पटेल, जय प्रकाश नारायण, बीजी खेर और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं के अलावा जांच करने वाले जेडी नागरवाला और दिल्ली पुलिस कमिश्नर डीडब्ल्यू मेहरा और डिप्टी सुपरिंटेंडेंट जसवंत सिंह को भी थी। इसके बावजूद बिड़ला हाऊस की सुरक्षा शिथिल रही। इसीलिए जज आत्माराम ने अपने फ़ैसले में लिखा, "20 से 30 जनवरी 1948 तक पुलिस की जांच पड़ताल में शिथिलता को मुझे सरकार के संज्ञान में लानी है। 20 जनवरी को मदन की गिरफ्तारी के बाद उसका ब्यौरा पुलिस ने प्राप्त कर लिया था और जैन से गृहमंत्री मोरारजी देसाई और पुलिस को सूचना मिल चुकी थी। खेद की बात है कि अगर बंबई और दिल्ली की पुलिस ने तत्परता दिखाई होती और जांच पड़ताल में शिथिलता नहीं बरती होती तो कदाचित गांधी -हत्या की दुखद घटना टाली जा सकती थी।"


बहरहाल, नाथूराम ने एक बार जेल में ही गांधी-हत्या का ज़िक्र करते हुए गोपाल गोडसे को बताया था, “मैंने छह गोलियों से लोड अपने रिवॉल्वर को लेकर बिड़ला हाउस में शाम 4.55 बजे प्रवेश किया। रक्षकों ने मेरी तलाशी नहीं ली। 5.10 बजे गांधीजी मनु गांधी और आभा गांधी के कंधे पर हाथ रखे बाहर निकले। जैसे ही मेरे सामने आए सबसे पहले मैंने शानदार देश-सेवा के लिए उनका नमस्तेकहकर उनका अभिवादन किया और देश का नुकसान करने के लिए उन्हें ख़त्म करने के उद्देश्य से दोनों कन्याओं को उनसे दूर किया और फिर 5.17 बजे 3 गोलियां गांधीजी के सीने में उतार दी।

नाथूराम ने आगे बताया, “दरअसल, मेरी गोली जैसे ही चली, गांधीजी के साथ चल रहे 10-12 लोग दूर भाग गए। मुझे लगा था कि जैसे ही मैं गांधीजी को मारूंगा, मेरी हत्या कर दी जाएगी, लेकिन सब लोग आतंकित होकर भाग गए। मैंने गांधीजी की हत्या करने के बाद रिवॉल्वर समेत हाथ ऊपर उठा लिया। मैं चाहते था, कोई मुझे गिरफ़्तार कर ले। लेकिन कोई पास आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। मैं पुलिस-पुलिस चिल्लाया। फिर मैंने एक सिपाही को आंखों से संकेत किया कि मेरी रिवॉल्वर ले लो। उसे विश्वास हो गया कि मैं उसे नहीं मारूंगा और वह हिम्मत जुटाकर मेरे पास आया और मेरा हाथ पकड़ लिया। इसके बाद लोग मुझ पर टूट पड़े और मुझे मारने लगे।बहारहाल, डीएसपी जसवंत सिंह के आदेश पर दसवंत सिंह और कुछ पुलिस वाले नाथूराम को तुगलक रोड थाने ले गए। रात को क़रीब पौने दस बजे बापू की हत्या की एफ़आईआर लिखी गई। इसे लिखा था थाने के दीवान-मुंशी दीवान डालू राम ने।

बहरहाल, जब शाम 5:45 बजे आकाशवाणी ने गांधी के निधन की सूचना दी और कहा कि नाथूराम गोडसे नाम के व्यक्ति ने उनकी हत्या की तो सारा देश हैरान रह गया कि मराठी युवक ने यह काम क्यों किया, क्योंकि लोगों को आसंका थी कि कोई पंजाबी या सिंधी व्यक्ति गांधीजी की हत्या कर सकता है। बहरहाल, गांधीजी हत्या में नाथूराम के अलावा नारायाण आप्टे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे, विष्णु करकरे, विनायक सावरकर, शंकर किस्तैया और दिगंबर बड़गे गिरफ्तार कर लिए गए। बाद में और दिगंबर बड़गे वादा माफ़ सरकारी गवाह बन गए। उनकी गवाही को आधार बनाकर नाथूराम और नाना की फ़ांसी दी गई।