बुधवार, 6 सितंबर 2017

गौरी लंकेश की हत्या और वामपंथी मीडिया

हरिगोविंद विश्वकर्मा मानव हत्या बेशक अमानवीय, दुखद और निंदनीय वारदात है। हत्या किसी अच्छे नागरिक की हो या फिर बुरे आदमी की, हत्या की भर्त्सना होनी ही चाहिए। दरअसल, हत्या की वारदात में क़ुदरत द्वारा दी हुई बेशकीमती जान चली जाती है। एक इंसान का शरीर ही नष्ट हो जाता है। मानव हत्या को इंसान के जीने के अधिकार का गंभीर और क्रूरतम हनन भी माना जाता है, इसीलिए दुनिया भर के मानवाधिकार समर्थक इसी फिलॉसफी के तहत मानव हत्याओं को ग़लत मानते हैं और उनका विरोध करते हैं। हत्या कमोबेश हर संवेदनशील को विचलित करती है। कोई सभ्य आदमी हत्या के बारे में सोच कर ही दहल उठता है। यही मानसिकता मानव को हत्या की वारदात को लेकर संवेदनशील बनाती है। इसीलिए जो लोग हत्याओं को अंजाम देते हैं यानी अपने जैसे ही किसी इंसान की हत्या करते हैं, वे मानव समाज से ख़ुद ब ख़ुद बाहर हो जाते हैं। हत्यारों को जानवर कहा जाता है, क्योंकि कोई जानवर ही कीसी की हत्या कर सकता है। हर प्राणी की हत्या तो नहीं, हां मानव हत्या को लेकर हर अच्छे नागरिक को संवेदनशील होना ही चाहिए। मीडिया को, ख़ासकर हत्या की वारदात, मारे गए व्यक्ति और हत्यारों की कवरेज करते समय ज़्यादा संवेदनशील होना चाहिए। मानव हत्या पर कोई तर्क-वितर्क नहीं होनी चाहि। एक स्वर से हत्या की भर्त्सना करनी चाहिए। इसी तरह में कन्नड़ पत्रकार और ऐक्टिविस्ट सुश्री गौरी लंकेश की हत्या की भी निंदा की जानी चाहिए। इस दुखद घटना पर विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए। गौरी लंकोश कन्नड़ पत्रकार थीं, फिर भी लोग उनकी हत्या पर विरोध दर्ज करवा रहे हैं। वैसे गौरी लंकेश की हत्या की ख़बर जिसने सुनी उसने ही उसकी भर्त्सना की । गौरी लंकेश की हत्या निःसंदेह एक कायराना हरकत है। इस हत्या का हर भारतीय ही नहीं, थोड़ा भी संवेदनशील व्यक्ति समर्थन नहीं कर सकता। कैसे कोई किसी की हत्या का समर्थन कर सकता है। इसलिए जो लोग गौरी की हत्या पर आपत्तिजनक और गैरज़िम्मेदार कमेंट कर रहे हैं, वे लोग भी उतने ही निंदनीय हैं, जितने गौरी के हत्यारे। गौरी को इन पंक्तियों का लेखक भी उनकी हत्या से पहले नहीं जानता था। हो सकता है यह लेखक की अज्ञानता हो। लेकिन एक पत्रकार वह भी महिला पत्रकार की हत्या मन को व्यथित करने वाली बात है और लेखक इस हत्या से ख़ुद भी विचलित है। गौरी लंकेश या किसी व्यक्ति की हत्या पर हो हल्ला मचना स्वाभाविक है, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। लिहाज़ा, गौरी लंकेश की हत्या की कवरेज करते समय या रिएक्शन देते ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे आम आदमी को लगे कि एक ख़ास वर्ग के लोगों की हत्या को लोकर मीडिया कुछ ज़्यादा ही मुखर हो जाती है। पिछले कुछ लाल के दौरान दुनिया में अनगिनत पत्रकार मारे गए हैं। भारत भी अपवाद नहीं है, यहां भी कलमकारों की आए दिन हत्या होती रहती है। ख़ुद कर्नाटक में भी कई पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। सवाल उठता है कि क्या सरकार ने हत्या के बाद किसी पत्रकार का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ कराया गया है? अगर बड़े और मेनस्ट्रीम पत्रकारों की बात करें तो मुंबई में ही बहुत बड़े पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे डे) की हत्या कर दी गई थी, लेकिन उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ नहीं कराया गया। संयोग से उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी, जैसे आजकल कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की है। फिर गौरी लंकेश का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ क्यों? जे डे की हत्या की मीडिया कवरेज हुई थी, परंतु इतनी नहीं जितनी गौरी लंकेश की हत्या की हो रही है। यह भेदभाव क्यों? कर्नाटक की काग्रेस सरकार ने गौरी का अंतिम संस्कार जिस तरह राजकीय सम्मान के साथ करवाया, उसमें हर किसी को राजनीति की बू आ रही है। सुश्री गौरी लंकेश की हत्या के प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मीडिया, जिसे कई लोग वामपंथी मीडिया करार दे रहे हैं, (यह संकटपूर्ण है कि मीडिया अब मीडिया न रहकर वामपंथी और दक्षिणपंथी मीडिया हो गई है) जिस तरह से गौरी लंकेश की हत्या के लिए बीजेपी और केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं, उससे यह साफ़ लगता है कि इन लोगों ने गौरी के हत्यारों की शिनाख़्त कर ली है कि वे निश्चित रूप से बीजेपी के ही कार्यकर्ता थे। ऐसे में तो कथित वामपंथी मीडिया को सबूत पेश करना चाहिए, ताकि हत्यारों को कठोर सज़ा दिलाई जा सके। इस बात में दो राय नहीं कि बिना सबूत के किसी हत्या के लिए किसी को ज़िम्मेदार ठहराना भी एक तरह का आतंकवाद और गुंडागर्दी है। जो लोग यह कार्य कर रहे हैं, वे भी मानव हत्या जैसा ही काम कर रहे हैं। इस देश में पिछले कुछ साल से अनगिनत पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की हत्या हुई है, लेकिन गौरी की हत्या करते समय केवल और केवल दाभोलकर, पानसरे और कुलबर्गी का ज़िक्र किया जा रहा है, क्योंकि ये लोग वामपंथी विचारधारा के लोग थे। किसी बहस में किसी पैनलिस्ट ने जेडे का नाम नहीं लिया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गौरी की हत्या उस राज्य में हुई है, जहां कांग्रेस का शासन है। लिहाज़ा, सबसे पहले कांग्रेस को कठघर में खड़ा किया जाना चाहिए था, लेकिन यह नहीं किया गया। बीजेपी विरोधी वामपंथी मीडिया गोरी की हत्या के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी पर दोषारोपण कर रही है। कई लोगों ने दमदार तर्क दिया है, कि गौरी लंकेश की हत्या बीजेपी क्यों करवाएगी। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी सत्ता की प्रबल दावेदार है। ऐसे में वह उस पत्रकार की हत्या क्यों करवाएगी जो उसके ख़िलाफ़ लिख रही थी, क्योंकि कोई भी व्यक्ति उन्हें ही हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठाहरा देगा। जिसका निश्चित तौर पर चुनाव में नुकसान हो सकता है। ऐसे में कम से कम बीजेपी गौरी की हत्या करवाने के बारे में सोच ही नहीं सकती। यह भी नहीं कहा जा सकता कि गौरी लंकेश की हत्या कांग्रेस ने करवाई, क्योंकि हत्यारे अज्ञात हैं। हां, अगर कांग्रेस के अतीत पर नज़र डाले तो वह इस तरह की हत्याएं करवाने में पटु रही है। ऐसे में इस आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि गौरी की हत्या के लिए कहीं न कहीं कांग्रेस ज़िम्मेदार तो है। गौरी लंकेश भाजपा और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ लिख रही थीं, इसलिए उनकी सुरक्षा बढ़ाने की ज़रूरत थी, यह काम कांग्रेस ने नहीं किया। बहरहाल, हत्या की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की ज़रूरत है। हालांकि सभी वामपंथी पत्रकार और अफ़ज़ल गुरु की बरसी मनाने वाले खालिद उमर को अपना बेटा मानने वाले अपूर्वानंद जैसे कथित बुद्धिजीवी हत्या के लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। अरे भाई, अगर गौरी लंकेश की हत्या बीजेपी द्वारा करवाने के कोई सबूत नहीं है तो कम से कम सबूत आने तक बीजेपी को बख़्श देना चाहिए था। कल को हत्यारे अगर बीजेपी से जुड़े नहीं मिले तो क्या करेंगे? दो तीन साल पहले उत्तर प्रदेश में एक पत्रकार को समाजवादी पार्टी के मंत्री के गुंडों नेता ने ज़िंदा जला दिया था, तब वामपंथी मीडिया इतनी मुखर नहीं हुई थी। गौरी की हत्या पर मीडिया के मुखर होने का स्वागत करना चाहिए, लेकिन मुखर होने में भी अवसरवाद दिखे तो संदेह होता है। पिछले तीन साल से आम आदमी को कम से कम यह साफ़ लग रहा है कि प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ख़िलाफ़ बोलने वाले व्यक्ति के साथ कुछ होता है या केंद्र सरकार की नीति के ख़िलाफ़ कोई कुछ बोलता है या कोई क़दम उठाता है तो तो मीडिया का एक तबका उसे लपक लेता है। अवार्ड वापसी की मुद्दा या आमिर ख़ान के बयान को मीडिया ने खूब उछाला। उपराष्ट्रपति पद से रिटायर होने के बाद हामिद अंसारी ने जो बयान दिया उसे भी खूब उछाला गया। तो क्या यह कहा जाए कि मीडिया के एक तबके में ऐसे लोग बैठे हैं, जो प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पसंद नहीं करते और कोई भी मुद्दा इनके ख़िलाफ़ आता है तो उसे ख़ूब हवा देते हैं। क्या यही निष्पक्ष पत्रकारिता है?

सोमवार, 14 अगस्त 2017

क्या है आखिर पाकिस्तान का बाबरी मस्जिद कनेक्शन ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आज पड़ोसी देश पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। मतलब पाकिस्तान अपने जन्मदाता भारत के आज़ाद होने से एक दिन पहले ही अस्तित्व में आ गया था। ऐसे में भारत के लोगों लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि पाकिस्तान बनने की पृष्टिभूमि क्या थी? दरअसल, गहराई से रिसर्च करने पर पता चलता है कि पाकिस्तान के जन्म का संबंध अयोध्या की बाबरी मस्जिद से है। सन् 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने अयोध्या में श्री राम मंदिर को लेकर एक रणनीति के तहत एक बहुत भयानक और दीर्घकालीन साज़िश रची, जिसका नतीजा पाकिस्तान है।

दरअसल, सन् 1857 के विद्रोह के पहले सन् 1856 में लॉर्ड पॉमर्स्टन सरकार ने लॉर्ड कैनिंग यानी चार्ल्स जॉन कैनिंग को भारत का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया था। सन् 1857 के गदर के बाद कैनिंग ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड विस्काउंट पॉमर्स्टन को भेजी रिपोर्ट में कहा था कि अगर इंडिया में लंबे समय तक शासन करना है तो यहां की जनता के बीच धर्म के आधार पर मतभेद पैदा करना ही पड़ेगा और इसके लिए हिंदुओं के प्रमुख देवता राम की जन्मस्थली को विवाद में ला दिया जाए।

इतिहास की कई चर्चित किताबों के मुताबिक 1857 के विद्रोह के बाद अयोध्या विवाद की साज़िश रची गई। इसके लिए इंतिहास से छेड़छाड़ भी की गई और इब्राहिम लोदी की बनाई गई मस्जिद को बाबरी मस्जिद का नाम दे दिया गया। कालजयी लेखक कमलेश्वर के भारतीय और विश्व इतिहास पर आधारित चर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में बाबरी मस्जिद पर इतिहास के हवाले से बहुत महत्वपूर्ण तथ्य दिए गए हैं। लेखक ने कई अध्याय अयोध्या मुद्दे को समर्पित किया है। सन 2000 में प्रकाशित ‘कितने पाकिस्तान’ को अटलबिहारी सरकार ने बेहतरीन रचना करार देते हुए 2003 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिया था। किताब को नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, अमृता प्रीतम, राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, हिमांशु जोशी और अभिमन्यु अनंत जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने विश्व-उपन्यास की संज्ञा देते हुए इसकी दिल खोलकर प्रशंसा की है।

‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक, दरअसल, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं) में एक शिलालेख भी लगा था, जिसका जिक्र एक ईमानदार अंग्रेज़ अफ़सर ए फ़्यूहरर ने कई जगह अपनी रिपोर्ट्स में किया है। फ़्यूहरर ने 1889 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा, जिसे बाद में एक साज़िश के तहत अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के आदेश पर सन् 1523 में शुरू हुआ और सन् 1524 में मस्जिद बनकर तैयार हो गई। इतना ही नहीं, शिलालेख के मुताबिक, अयोध्या की मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद था ही नहीं।

दरअसल, ‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक मस्जिद में इब्राहिम लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में ख़ास तौर पर फैजाबाद भेजे गए अंग्रेज़ अफ़सर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। सारी ख़ुराफ़ात और साज़िश का सूत्रधार नेविल ही था। नेविल ने ही आधिकारिक तौर पर फ़ैज़ाबाद का गजेटियर तैयार किया था। नेविल की साज़िश में दूसरा फ़िरंगी अफ़सर कनिंघम भी शामिल था, जिसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने हिंदुस्तान की तवारिख़ और पुरानी इमारतों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। दरअसल, इंडियन सबकॉन्टिनेंट पर एक मुस्लिम देश बनाने की आधारशिला नेविल और कनिंघम ने रख दी थी। यह मुस्लिम देश 14 अगस्त 1947 को अस्तित्व में भी आ गया।

किताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने बड़ी साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद की नींव रखी थी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमला करके बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हज़ार हिंदुओं की हत्या कर दी, जबकि फ़ैज़ाबाद के गजेटियर में आज भी लिखा है कि1869 में, उस लड़ाई के क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद,अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की कुल आबादी महज़ दस हज़ार थी जो 1881 में बढ़कर साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। सवाल उठता है कि जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों को हलाक़ कैसे किया या फिर इतने मरने वाले कहां से आ गए? यहीं, बाबरी मस्जिद के बारे में देश में बनी मौजूदा धारणा पर गंभीर सवाल उठता है।

बहरहाल, हैरान करने वाली बात यह है कि दोनों अफ़सरों नेविल और कनिंघम ने सोची-समझी नीति के तहत बाबर की डायरी बाबरनामा, जिसमें वह रोज़ाना अपनी गतिविधियां दर्ज करता था, के 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच लिखे गए 20 से ज़्यादा पन्ने ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी ‘औध’ को‘अयोध्या’ कर दिया। मज़ेदार बात यह है कि मस्जिद के शिलालेख का फ़्यूहरर द्वारा किए गए अनुवाद को ग़ायब करना अंग्रेज़ अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी आर्कियोल़जिकल इंडिया की फ़ाइल में महफ़ूज़ है और ब्रिटिश अफ़सरों की साज़िश से परदा हटाता है।

दरअसल, बाबर की गतिविधियों की जानकारी बाबरनामा की तरह हुमायूंनामा में भी दर्ज है। लिहाज़ा, बाबरनामा के ग़ायब पन्ने से नष्ट सूचना हुमायूंनामा से ली जा सकती है। हुमायूंनामा के मुताबिक 1528 में बाबर अफ़गान हमलावरों का पीछा करता हुआ घाघरा (सरयू) नदी तक अवश्य गया था, लेकिन उसी समय उसे अपनी बीवी बेग़म मेहम और अन्य रानियों व बेटी बेग़म ग़ुलबदन समेत पूरे परिवार के काबुल से अलीगढ़ आने की इत्तिला मिली। बाबर लंबे समय से युद्ध में उलझने की वजह से परिवार से मिल नहीं पाया था इसलिए वह तुरंत अलीगढ़ रवाना हो गया। पत्नी-बेटी और परिवार के बाक़ी सदस्यों को लेकर वह अपनी राजधानी आगरा आया और 10 जुलाई तक उनके साथ आगरा में ही रहा। उसके बाद बाबर परिवार के साथ पिकनिक मनाने धौलपुर चला गया। वहां से सिकरी पहुंचा, जहां सितंबर के दूसरे हफ़्ते तक रहा।

उपन्यास के मुताबिक अयोध्या की मस्जिद बाबर के आक्रमण और उसके भारत आने से पहले ही मौजूद थी। बाबर आगरा की सल्तनत पर 20 अप्रैल 1526 को क़ाबिज़ हुआ जब उसकी सेना ने इब्राहिम लोदी को हराकर उसका सिर क़लम कर दिया। एक हफ़्ते बाद 27 अप्रैल 1526 को आगरा में बाबर के नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया। मज़ेदार बात यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना है कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाक़ी ने 1528 में मिसमार करके वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी का पूरा नाम मीरबाक़ी ताशकंदी था और वह अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था।

बहरहाल, अयोध्या के राम मंदिर को बाबरी मस्जिद बनाकर अंग्रज़ों ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत का जो बीज बोया वह दिनों-दिन बढ़ता ही गया। इसके बाद मंदिर मस्जिद या दूसरे धार्मिक मुद्दों पर हिंदू-मुसलमान के बीच संघर्ष होने लगे। इस बीच एक साज़िश के तहत भारी विरोध के बावजूद 20 जुलाई 1905 को बंग भंग के प्रस्ताव पर इंडिया सेक्रेटरी का ठप्पा लग गया। राजशाही, ढाका तथा चटगांव कमिश्नरीज़ को आसाम के साथ मिलाकर एक प्रांत नया बनाया गया, जिसका नाम पूर्ववंग और आसाम रखा गया। अंग्रेज़ यहीं नहीं रुके, उन्होंने कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी करार देकर मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक पार्टी बनवाई इसके लिए अंग्रज़ों ने ढाका के चौथे नवाब सर ख्वाजा सलीमुल्लाह बहादुर और अलीगढ़ के नवाब मुहसिनुल मुल्क का इस्तेमाल किया। अंग्रज़ों की शह पर 30 दिसंबर 1906 को औपचारिक रूप से ब्रिटिश इंडिया के बंगाल स्टेट के ढाका शहर (अब बांग्लादेश) में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना की गई।

1909 के बाद से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद गंभीर होने लगे। ख़ुद मोहम्मद अली जिन्ना पहले मुस्लिम लीग के नेतओं से नफरत करते थे। जिन्ना को न तो उर्दू आती थी और न ही वह नमाज पढ़ते थे। वह सूअर का मांस खाने से परहेज नहीं करते थे। कुछ साल पहले लालकृष्ण आडवाणी ने सही कहा था कि जिन्ना वाक़ई सेक्यूलर मुसलमान थे। उन्होंने 1913 में मुस्लिम लीग की सदस्यता स्वीकार की। महात्मा गांधी के ख़िलाफ़त आंदोलन का जिन्ना ने पुरजोर विरोध किया था। जिन्ना उदारवादी नेता थे। वह अली बंधुओं (जिनमें से एक लियाकत अली पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने) से भी नफरत करते थे। 1913 से 1920 तक जिन्ना कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों से जुड़े रहे, लेकिन खिलाफत आंदोलन के बाद उनका गांधी से मतभेद बढ़ गया और वह पूरी तरह लीगी हो गए। बहरहाल, गांधी ने मुस्लिम नेताओं के जितना अपनाने की कोशिश की वे उतने ही दूर होते गए। गांधी के ख़िलाफ़त आंदोलन का ज़रूरत से ज़्यादा समर्थन करने के बाद भी हिंदू मुसलमान नेताओं के बीच दूरी बढ़ती रही। सन् 1930 में सबसे पहले शायर मुहम्मद इक़बाल ने सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब तथा अफ़गान (सूबा-ए-सरहद) जैसे भारत के उत्तर-पश्चिमी चार प्रांतों को मिलाकर एक अलग राष्ट्र की मांग की थी।

सेक्यूलर जिन्ना धीरे धीरे कट्टर मुसलमान होते गए। 1940 में उन्होंने कह दिया कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग अलग धर्म के अनुयायी हैं, दोनों का धर्म ही अलग नहीं है बल्कि दोनों का दर्शन, सामाजिक परंपराएं और साहित्य भी अलग-अलग है। लिहाज़ा, मुसलमानों के लिए पृथक देश बनाया जाए। 1946 में यह तय हो गया कि अंग्रेज़ भारतीय उपमहाद्वीप को अगले तीन-चार साल में छोड़ देंगे। मुसलमानों के लिए पृथक पाकिस्तान की मांग को लेकर जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट ऐक्शन डे की घोषणा कर दी, जिसके बाद हिंदू मुसलमानों में भीषण दंगे शुरू हो गए।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं के बढ़ते झगड़े ने भारत को बांटने के अंग्रेज़ों के मिशन को आसान बना दिया। 30 जून को उन्होंने भारत का विभाजन करने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भारत भेजा। मुहिम नेविल ने शुरू की थी, उसे अमली जामा पहनाते हुए माउंटबेटन ने 3 जून 1947 को भारत भूमि पर भारत और पाकिस्तान नाम के दो राष्ट्र बनाने की घोषणा कर दी और 14 अगस्त यानी आज के दिन पाकिस्तान विश्व के मानचित्र पर अवतरित हुआ।

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

क्या है धारा 35 ए और क्यों चाहिए कश्मीरी नेताओं को विशेष दर्जा?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
यह सुखद संयोग है कि जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370  और 35 ए के औचित्य पर सुप्रीम कोर्ट में पहल हुई है। देश की सबसे बड़ी अदालत में भारतीय संविधान से इन अनुच्छेदों को हटाने के लिए दो याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार हफ़्ते के भीतर इन पर जवाब देने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश जगदीशसिंह केहर की तीन सदस्यीय खंडपीठ कुमारी विजयलक्ष्मी झा की याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में अनुच्छा 370 के तहत राज्य को मिल रहे स्पेशल ग्रांट को चैलेंज किया गया है। यह अनुच्छेद उनके बच्चों को बेदख़ल करता है। 35 ए को चुनौती देने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील और कश्मीरी नागरिक एडवोकेट चारू वालीखन्ना ने कहा है कि धारा 35 ए गैरकश्मीरी युवक से शादी करने वाली कश्मीरी लड़की को नागरिकता से वंचित कर देता है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हैं। इसलिए 35 ए को रद किया जाए।

35 ए के चलते राज्य में बेटियों के साथ घोर पक्षपात होता है। कुपवाड़ा की अमरजीतकौर इस अमानवीय पक्ष की मिसाल हैं। गैरकश्मीरी से शादी के बाद उन्हें नागरिकता साबित करने व पैत्रृक संपति पर अधिकार पाने में 24 साल लग गए। गैरकश्मीरी से शादी के बाद बेटियां नागरिक बनी रहेंगी या नहीं, इस पर आज भी साफ़ गाइडलाइन नहीं है। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के 2002 के फ़ैसले के बाद धारा 35 ए व 370 की विसंगतियां सामने आईं। 2004 में एसेंबली में परमानेंट रेज़िडेंट्स डिसक्वालिफ़िकेशन बिल पेश किया था। मकसद हाईकोर्ट का फैसला निरस्त करना था। यह बिल क़ानून नहीं बन सका तो इसका श्रेय विधान परिषद को जाता है जिसने इसे ख़ारिज़ कर दिया। देश के विभाजन के समय 20 लाख हिंदू शरणार्थी जम्मू-कश्मीर में आए थे, लेकिन धारा 35 ए के चलते ही उन्हें स्टेट सब्जेक्ट नहीं माना गया। वे नागरिकता से वंचित कर दिए गए। इनमें 85 फीसदी पिछड़े और दलित समुदाय से हैं।

अदालत के क़दम से सबसे ज्यादा आगबबुला धारा 35 ए  और 370 का चार पीढ़ी से लाभ लेने वाले डॉ. फारुक अब्दुल्ला हुए हैं। उन्होंने धमकी दी है कि विशेष दर्जे से कोई छेड़छाड़ हुई तो कश्मीरी जनता विद्रोह कर देगी, जिसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने सन् 2008 के आंदोलन का हवाला दिया है, जब श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को श्रद्धालुओं के लिए अस्थाई शेड बनाने के लिए ज़मीन देने के राज्य सरकार के फ़ैसले पर बड़ा आंदोलन हुआ था। अलगाववादी नेताओं ने इस मुद्दे पर 12 अगस्त को बंद का एलान किया है। मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ़्ती भी डॉ. अब्दुल्ला के सुर में सुर मिला रही हैं। महबूबा ने कहा था कि धारा 35ए के साथ छेड़छाड़ किया जाता है तो कश्मीर में कोई तिरंगा थामनेवाला नहीं होगा।

डॉ. फारुक की धमकी महज़ भ्रांति है। राज्य में जितने लोग इसके समर्थक हैं, उससे ज़्यादा इसके विरोधी। इसलिए, अगर इसे ख़त्म किया जाता है, तो बहुत होगा, मुट्ठी भर लोग श्रीनगर की सड़कों पर निकलेंगे। ऐसे विरोध-प्रदर्शन घाटी में पिछले तीन दशक से रोज़ ही हो रहे हैं। एक और विरोध प्रशासन झेल लेगा। वैसे 8 अगस्त 1953 को शेख अब्दुल्ला को कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश रचने के आरोप में डिसमिस करके जेल में डालने पर भी विरोध हुआ था परंतु धीरे-धीरे शांत हो गया। ठीक इसी तरह अनुच्छेद 35 ए या 370 को ख़त्म करने पर विरोध होगा, लेकिन धीरे-धीरे शांत हो जाएगा। दरअसल, पिछले क़रीब सात दशक से सत्तासुख भोगने वाले मेहबूबा-अब्लुल्ला जैसे लोग इसे ख़त्म करना तो दूर इस पर चर्चा से भी डरते हैं। बहस या समीक्षा की मांग सिरे से ख़ारिज़ कर देते हैं। इसमें दो राय नहीं कि 35ए व 370 जैसे विकास-विरोधी प्रावधान को अब्दुल्ला-मुफ्ती जैसे सियासतदां और नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए बनाए रखना चाहती हैं, क्योंकि यह धारा उनकी सियासत को बनाए रखने का कारगर टूल बन गया है।

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद शेख अब्दुल्ला राज्य के प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से सांठगांठ करके राज्य के लिए विशेष दर्जा हासिल कर लिया। लिहाजा, संविधान में अनुच्छेद 370 शामिल किया गया। 1952 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आध्यादेश जारी करके राज्य के हित में संविधान में धारा 35-A का प्रावधान किया। यह धारा 370 का ही हिस्सा है। धारा 35-A राज्य के बाहर से आए लोगों को नागरिकता नहीं देता। उन्हें यहां ज़मीन ख़रीदने, सरकारी नौकरी करने वजीफ़ा या अन्य रियायत पाने का अधिकार भी नहीं है। बहरहाल, जम्मू कश्मीर के कथित राष्ट्रवादी और अलगाववादी नेता भली-भांति यह तथ्य जानते हैं कि राज्य का स्वतंत्र अस्तित्व मुमकिन नहीं। यानी जम्मू कश्मीर कभी भी भारत से अलग नहीं हो सकता। लिहाज़ा, अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए आज़ादी का राग आलापते रहते हैं। देश के पैसे पर पल रहे ये लोग इतने भारत को अपना देश मानते ही नहीं और दुष्प्रचार करते रहते हैं। इनकी पूरी कवायद धारा 370 अक्षुण्ण रखने के लिए होती है।

जम्मू कश्मीर जैसे सीमावर्ती राज्य की समस्या के लिए अगर केवल पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराया जाए,  तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। नेहरू की अदूरदर्शिता नतीजा पूरा मुल्क़ भुगत रहा है। धारा 370 का सभी ने कड़ा विरोध किया था, पर नेहरू अड़े रहे। ’अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और मज़बूरी’ का हवाला देकर इसे लागू कराने में सफल रहे। इसका पुरज़ोर विरोध करते हुए डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1952 में नेहरू से कहा, “आप जो करने जा रहे हैं, वह नासूर बन जाएगा और किसी दिन देश को विखंडित कर देगा। यह प्रावधान भारत देश नहीं,कई राष्ट्रों का समूह मानने वालों को मज़बूत करेगा।

आज घाटी में जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि मुखर्जी की आशंका ग़लत नहीं थी?  धारा 370 के कारण ही राज्य मुख्यधारा से जुडऩे की बजाय अलगाववाद की ओर मुड़ गया। यानी देश के अंदर ही एक मिनी पाकिस्तान बन गया, जहां तिरंगे का अपमान होता है, देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं और भारतीयों की मौत की कामना की जाती है। डॉ. भीमराव आंबेडकर भी कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। शेख़ को लताड़ते हुए उन्होंने ने साफ़ शब्दों में कहा था, “आप चाहते हैं, भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, वह आपके यहां सड़कें बनाए, आपको राशन दे और कश्मीर का वही दर्ज़ा हो जो भारत का है! लेकिन भारत के पास सीमित अधिकार हों और जनता का कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं हो। ऐसे प्रस्ताव को मंज़ूरी देना देश के हितों से दग़ाबाज़ी करने जैसा है। मैं क़ानून मंत्री होते हुए ऐसा कभी नहीं करूंगा।“

एक सच यह भी है कि केंद्र इस राज्य को आंख मूंदकर पैसे देता है, फिर भी राज्य में उद्योग–धंधा खड़ा नहीं हो सका। यहां पूंजी लगाने के लिए कोई तैयार नहीं, क्योंकि यह धारा आड़े आती हैं। उद्योग का रोज़गार से सीधा संबंध है। उद्योग नहीं होगा तो रोज़गार के अवसर नहीं होंगे। राज्य सरकार की रोज़गार देने की क्षमता कम हो रही है। क़ुदरती तौर पर इतना समृद्ध होने के बावजूद इसे शासकों ने दीन-हीन राज्य बना दिया है। यह केंद्र के दान पर बुरी तरह निर्भर है। इसकी माली हालत इतनी ख़राब है कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन का 86 फ़ीसदी हिस्सा केंद्र देता है। इतना ही नहीं इस राज्य के लोग पूरे देश के पैसे पर ऐश करते हैं।

रविवार, 6 अगस्त 2017

रक्षाबंधन: स्त्री को ‘इज़्ज़त’ के बोझ से मुक्त करने की ज़रूरत!

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आज रक्षा बंधन का त्यौहार है। आज के दिन हर लड़की या स्त्री अपने भाई के पास जाती है और आरती उतारने के बाद उसकी कलाई में रक्षा का धागा बांधती है। जिनके भाई दूर हैं, वे स्त्रियां कोरियर या दूसरे माध्यम से अपने भाई तक राखी पहुंचाती हैं। जिन स्त्रियों के भाई नहीं होते, वे स्त्रियां आज के दिन थोड़ी उदासी महसूस करती हैं। भाई की कमी महसूस करती हैं। मन को दिलासा देने के लिए किसी मुंहबोले भाई को राखी बांध कर इस परंपरा का निर्वहन करती हैं। कुल मिलाकर पता नहीं कब से यह परंपरा यूं ही चली आ रही है। पहले यह त्योहार इतना प्रचलित नहीं था। परंतु संचार माध्यम, बाज़ारवाद और बेहतर ट्रांसपोर्ट मोड ने इसे जन-जन में लोकप्रिय बना दिया।

बहुत गहन विचार और चिंतन करने पर यही लगता है कि निश्चित रूप से रक्षाबंधन नाम के इस त्योहार की शुरुआत असुरक्षा के माहौल में हुई है। यानी पहले समाज को स्त्री के लिए एकदम असुरक्षित बना दिया गया, फिर स्त्री की रक्षा की कॉन्सेप्ट विकसित किया गया। मतलब, धीरे धीरे समाज ऐसा हो होता गया होगा, जहां लड़कियां या महिलाएं असुरक्षित हो गई होती गई होंगी। तब उनकी रक्षा की नौबत आई गई होगी। दरअसल, आज से दस हज़ार साल पहले, जब झुंड की मुखिया स्त्री हुआ करती थी, तब न तो स्त्री न ही पुरुष को किसी रक्षा की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, क्योंकि तब सब लोग नैसर्गिक जीवन जीते थे और अपनी रक्षा स्वतः कर लेते थे।

मानव सभ्यता के विकास क्रम में जैसे जैसे समाज विकसित होता गया और झुंड के मुखिया का पद पुरुष ने स्त्री से छीन लिया और स्त्री को भोग की वस्तु बना दिया, तब से स्त्री असुरक्षित हो गई। कालांतर में पुरुष ने स्त्री पर एकाधिकार जताने के लिए उसके साथ साज़िश की। कह दिया स्त्री इज़्जत की प्रतीक है। अगर उसे कोई छू देगा तो वह इज़्ज़त गंवा बैठेगी। दरअसल, यह इज़्ज़त, जिसकी रक्षा स्त्री जीवन भर करती है और समाज में दयनीय हो जाती है, पूरी तरह मनोवैज्ञानिक सोच है। इस इज़्ज़त की रक्षा करने के चक्कर में वह हमेशा असुरक्षित महसूस करती है। कह सकते हैं कि वह बिंदास जीवन ही नहीं जी पाती, जबकि पुरुष इस इज़्ज़त नाम की वैज्ञानिक सोच से परे रहता है और मस्ती से जीवन जीता है। इस इज़्ज़त की रक्षा के चक्कर में स्त्री पुरुष से पिछड़ जाती है। उस अपनी इज़्ज़त की रक्षा के लिए पुरुष की ज़रूरत पड़ती है।

चूंकि आरंभ में स्त्री की मां के गर्भ से पैदा होने वाला पुरुष, जिसे वह भाई कहती है, ही उसकी इज़्ज़त की रक्षा करता है। बाद में यह काम दूसरा पुरुष जो उसका पति कहलाता है। वह पुरुष केवल स्त्री की मांग में सिंदूर भर कर या मंगलसूत्र पहनाकर या निकाह क़ुबूल है, कह कर स्त्री का स्वामी बन जाता है। वह पुरुष अपनी स्त्री की रक्षा करने के नाम पर उसका भयानक शोषण करता है। उसका मन चाहा इस्तेमाल करता है। उससे बलात्कार (इच्छा के विरुद्ध सेक्स) करता है और एक तरह से उस घर में ग़ुलाम बनाकर रखता है। यह ट्रिपल तलाक़ की समस्या भी इसी तरह के माइंडसेट का नतीजा है। पुरुष ख़ुद तो बिंदास जीवन जीता है, लेकिन इज़्ज़त की रखवाली की ज़िम्मेदारी स्त्री पर छोड़ देता है।

यह तो स्त्री की रक्षा नहीं हुई। पतिरूपी इस पुरुष से स्त्री की रक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। ज़रूरत है, ऐसे प्रावधान किए जाएं, कि स्त्री को रक्षा की ज़रूरत ही न पड़े। समाज ऐसा हो कि पुरुष की तरह स्त्री भी उसमें बिंदास सांस ले सके। इसके लिए स्त्री को बताना होगा, कि उसके लिए जीवन महत्वपूर्ण है।  लिहाज़ा, उसे स्वतंत्र माहौल की ज़रूरत है। जहां वह इज़्ज़त के बोझ से परे होकर अपने बारे में सोचे और अपने बारे में हर फ़ैसले वह ख़ुद करे, न कि पिता, भाई या पति के रूप में उसके जीवन में आने वाला पुरुष उसके बारे में हर फ़ैसला ले। यानी स्त्री को करीयर ओरिएंटेड बनाने की ज़रूरत है। उसे बताया जाए कि उसके लिए लिए पति यानी हसबैंड से ज़्यादा ज़रूरी उसका अपना करियर है। कहने का मतलब स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की ज़रूरत है।

आज स्त्री-पुरुष संबंधों को फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत है। जब इस संबंध की शुरुआत हुई थी, तब समाज आज जैसा विकसित नहीं था। तब सूचना क्रांति नहीं हुई थी। आज की तरह दुनिया एक बस्ती में तब्दील नहीं हुई थी, जैसी कि दुनिया आज है। ऐसे में आज जब हर चीज़ नए सिरे से परिभाषित हो रही है, तो स्त्री-पुरुष संबंध भी क्यों न फिर से विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हुए विकास के मुताबिक परिभाषित किए जाएं। अगर ऐसा किया जाता है, तो स्त्री अपने आप सुरक्षित हो जाएगी।

स्त्री को पूरी आज़ादी देने की ज़रूरत है। जितना आजाद पुरुष है, उतनी ही आज़ादी स्त्री को भी होनी चाहिए। स्त्री चाहे तो अकेले रहे या किसी पुरुष के साथ, ऐसे पुरुष के साथ जिसके साथ वह सहज महसूस करे। यानी स्त्री अपने लिए पति नहीं, बल्कि जीवनसाथी चुने और ख़ुद चुने और स्वीकार करे, न कि उसके जीवनसाथी का चयन उसका पिता या भाई करें। ख़ुद जीवनसाथी के चयन में अगर लगे कि उसने ग़लत पुरुष चुना है, तो वह उसका त्याग कर दे और अगर उसके जीवन में उसे समझने वाला कोई पुरुष आता है तो उसके साथ रहने के लिए वह स्वतंत्र हो। इसके लिए स्त्री को उसकी आबादी के अनुसार नौकरी देने के ज़रूरत है। ज़ाहिर है, पुरुष यह सब नहीं करेगा।

बहरहाल, रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसीलिए इसे श्रावणी या सलूनो भी कहते हैं। गहन रिसर्च के बावजूद राखी का त्यौहार कब शुरू हुआ, इसकी एकदम सटिक प्रमाणिक जानकारी नहीं मिल सकी। इसके बावजूद लगता तो यही है कि मानव सभ्यता के विकसित होने के बाद जब समाज पर पुरुषों का वर्चस्व हुआ, तब स्त्री की रक्षा के उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही इस त्यौहार की परिकल्पना की गई होगी। मकसद यह रहा होगा कि समाज में पति-पत्नी के अलावा स्त्री-पुरुष में भाई-बहन का पवित्र रिश्ता कायम हो। बहरहाल, हो सकता है इन पंक्तियों के लेखक का आकलन शत-प्रतिशत सही न हो। लेकिन स्वस्थ्य समाज की संरचना के लिए ऐसा ही कुछ हुआ होगा। वैसे, हमारा देश उत्सवों और परंपराओं का देश है। सदियों से पूरे साल अनेक तीज-त्यौहार, पर्व, परंपराएं मनाए जाते रहे हैं। इन्हीं त्योहारों में रक्षा-बंधन यानी राखी भी है। यह त्यौहार भाई-बहन के बीच अटूट-बंधन और पवित्र-प्रेम को दर्शाता है। भारत के कुछ हिस्सों में इसे 'राखी-पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है।

स्कंध पुराण, पद्म पुराण भविष्य पुराण और श्रीमद्भागवत गीता में वामनावतार नामक कथा में राखी का प्रसंग मिलता है। मसलन, दानवेंद्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इंद्र ने विष्णु से प्रार्थना की। तब विष्णु वामन अवतार लेकर बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। विष्णु ने तीन पग में आकाश पाताल और धरती नापकर बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार विष्णु द्वारा बलि के अभिमान को चकनाचूर कर देने से ही यह त्योहार बलेव नाम से भी मशहूर है। विष्णु पुराण के मुताबिक श्रावण की पूर्णिमा के दिन विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

भविष्य पुराण के मुताबिक सुर-असुर संग्राम में जब दानव हावी होने लगे तब इंद्र घबराकर बृहस्पति के पास गये। इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। मान्यता है कि लड़ाई में इसी धागे की मंत्र शक्ति से ही इंद्र विजयी हुए। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन धागा बांधने की प्रथा शुरू हो गई।

महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा, मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं तब भगवान कृष्ण ने उनकी और उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्यौहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर आपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया।

राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएं उन्हों माथे पर तिलक के साथ साथ हाथ में धागा बांधती थी। इस भरोसे के साथ कि धागा विजयश्री ले आएगा। मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की सूचना मिली। रानी ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा याचना की। हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंचकर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की। एक अन्य प्रसंगानुसार सिकंदर की पत्नी ने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बांधकर मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवन-दान दिया।

राखी सामान्यतः बहनें भाई को ही बांधती हैं, परंतु कई समाज में छोटी लड़कियां संबंधियों को भी राखी बांधती हैं। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बांधी जाती है। अब तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को राखी बांधने की परंपरा भी शुरू हो गई है जो प्रकृति को बचाने के एक प्रयास है। ज़ाहिर है, इस तरह के प्रयास को बढ़ावा देना चाहिए।

राखी पर सभी को शुभकामनाएं।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

लड़कियों व महिलाओं का यौन शोषण करते हैं आतंकवादी


हरिगोविंद विश्वकर्मा
जम्मू कश्मीर के पुलवामा जिले में पहली अगस्त 2017 की सुबह राज्य पुलिसअर्धसैनिक बलों और सेना के संयुक्त कॉम्बैट ऑपरेशन में मारे गए लश्कर-ए-तैयबा का कश्मीर कमांडर अबु दुजाना के बारे में पता चल रहा है कि वह महा ऐय्याश था। यह कोई नई बात नहीं है। जम्मू कश्मीर में युवक ऐय्याशी के लिए ही बंदूक उठाते हैं। उनका मिशन आज़ादी नहीं बल्कि बंदूक के बल पर ऐय्याशी करना होता है। वस्तुतः 1989 से शुरू हुए आतंकवाद का शिकार सबसे ज़्यादा पहाड़ों पर रहने वाले ग़रीब परिवारों की कमज़ोर लड़कियां और महिलाएं हुई हैं। आतंकवादी बंदूक से डराकर कई लड़कियों से शादी कर लेते हैं या प्रेमिका या रखैल बनाकर रखते हैं। आतंकी लड़कियों का भयानक यौन शोषण करते हैं और बाद में उन्हें छोड़ देते हैं। दहशतगर्दों द्वारा छोड़ी गई लड़कियों से डर के मारे कोई शादी नहीं करताजिससे उन लड़कियों का जीवन ही नष्ट हो जाता है।
महा ऐय्याश लश्कर कमांडर दुजाना के लिए घाटी में अलगाववादी नेता पाकिस्तान पैसे लेकर भले विरोध प्रदर्शन करवा रहे होंलेकिन 15 लाख रुपए इनाम के इस आतंकी के मारे जाने से दक्षिण कश्मीर के पुलवामा की पहाड़ी इलाक़ों में रहने वाले लोगख़ासकर लड़कियां और महिलाएं राहत की सांस ले रही हैं। बताया जाता है कि जिले के हाकड़ीपुरागूरूनारबल और छातापुरा जैसे गांव की क़रीब सौ लड़कियों और महिलाओं को दुजाना अपनी हवस की शिकार बना चुका था। दरअसलकश्मीर में पहाड़ों पर घर दूर दूर होते हैं। ऐसे में हर घर को सुरक्षा मुहैया कराना मुमकिन ही नहीं होता। इसी का फ़ायदा आतंकवादी उठाते हैं और जहां रहते हैंरात में वहीं किसी के घर में घुस जाते हैं। आतंकी ऐसे घर चुनते हैंजहां जवान लड़कियां होती हैं। रात रुकने पर घरवालों से खाना तो बनवाते ही हैंघर की लड़की के साथ सोते भी हैं। घर दूर-दूर होने के कारण असुरक्षित लोगों के सामने अपनी बहू-बेटी परोसने के अलावा और कोई विकल्प नहीं होता है। बंदूक के बल पर आतंकी किसी भी लड़की या स्त्री के साथ शारीरिक संबंध बना लेते हैं। लोग बताते हैं कि जिसके जिस घर में आतंकी ठहरते हैंउसके पास वाले घरों की लड़कियां दूर भेज दी जाती हैंताकि इन शैतानों की हवस से इन मासूमों को बचाया जा सके।
हमेशा आधुनिक हथियारों से लैस रहने वाला लश्कर आतंवादी दुजाना का ख़ौफ़ पिछले कई साल से पहाड़ी इलाक़े के ग़रीब परिवार की लड़कियों में सबसे ज़्यादा था। दुजाना जब चाहता था और जहां चाहता था वहीं किसी के भी घर में रात में ठहर जाता था। उसे भले 'ए प्लस प्लसकैटेगरी के आतंकवादियों की सूची में रखा गया था लेकिन वह आतंकवादी से बढ़कर एक ऐय्याश युवक था और नई-नई लड़कियों के साथ सोने के लिए ही पाकिस्तान के गिलगित-बाल्टिस्तान से घाटी में आया था। पूरे इलाक़े में क़रीब 10-15 गांवों में लश्कर कमांडर दुजाना का कई लड़कियों से खुला शारीरिक संबंध थासोमवार की रात जिस लड़की के पास वह सोने के लिए आया थावह उसकी पत्नी नहीं बल्कि रखैल थी। दुजाना अपनी रखैल और दूसरे आतंकवादी परिवार की दूसरी लड़कियों के साथ सोए थे। बताया जाता है कि तंग आकर दुजाना की रखैल के परिवार वालों ने ही सुरक्षा एजेंसियों को उसके आने की टिप दे दी और सुरक्षा बलों ने उसका काम-तमाम कर दिया। दुजाना इस घर में अकसर आता रहता था। उसका विरोध करने का मतलब मौत को दावत देने के समान थाइसलिए घर के लोग ख़ून का घूंट पीकर उसे अपने घर की लड़की के साथ सोते हुए देखा करते थे। सहनशक्ति जब जवाब दे गई तो परिवार के एक सदस्य ने पास में तैनात 55 आरआर (राष्ट्रीय राइफल्स) के एक अफ़सर को यह बात बताई।
इस सूचना के बाद 55 आरआर सतर्क हो गई। सोमवार की रात जैसे ही दुजाना अपनी गर्लफ्रेंड के पास पहुंचाउसकी प्रेमिका के घर के उस सदस्य ने 55 आरआर के उस ऑफीसर को इत्तिला दे दी। आनन-फानन में जम्मू कश्मीर पुलिस की स्पेशल टीम गांव के चारो ओर मोर्चा संभाल लिया। उसकी मदद के लिए 55 आरआर के अलावा सेना की 182 बटालियन, 183 बटालियन और सीआरपीएफ के जवान भी पहुंच गए। चूंकि दुजाना पहले पांच बार सुरक्षा बलों को चकमा दे चुका थाइसलिए पुलिस उसे इस बार कोई मौक़ा नहीं देना चाहती थी। अल-सुबह 4.30 बजे ऑपरेशन शुरू हुआ। दुजाना और दूसरे आतंकवादी अंदर से ही फायर करने लगे। इसके बाद सुरक्षा बलों ने परिजनों को बाहर निकाला और घर में आग लगा दी। घाटी में जिस घर में आतंकवादी छिपे होते हैंवहां उन्हें बाहर निकालने के लिए सेना घर में आग लगा देती है। आगजनी के बाद दुजाना और दूसरे आतंकवादी जैसे ही जलने से बचने के लिए बाहर निकले उन्हें मार गिराया गया। यह ऑपरेशन पांच घंटे से ज़्यादा चला।
वैसे दुजाना पहला आतंकवादी नहीं हैजिसकी जान इश्कबाज़ी के चक्कर में गई हो। इससे पहले भी ऐसे अनेक आतंकवादी कश्मीरी लड़कियों के साथ अफेयर की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं। दरअसलघाटी में आतंकवाद कभी भी किसी तरह का मिशन नहीं रहायह आतंकवाद शुरू से ही पूरी तरह सेक्स-ओरिएंटेड रहा है। बंदूक रखना घाटी में स्टैटस सिंबल हो गया है। बंदूकधारी युवकों का पूरे इलाक़े में दबदबा होता हैवे जिसके घर में चाहे घुस जाते हैं और कबाब के साथ शबाब की मौज़ उड़ाते हैं। दरअसल, कश्मीर में आने वाले अधिकतर आतंकवादी पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के कमज़ोर तबके के परिवारों से होते हैं। आतंकवाद में उतरते ही उन्हें खूब पैसे और हथियार मिलते हैं। लिहाज़ा, अपनी गन का इस्तेमाल कर आतंकी पहाड़ी लड़कियों को इंप्रेस करते हैं और उनसे शारीरिक संबंध बना लेते हैं।
बहरहालआतंकवादियों का इश्क का यह रोग सुरक्षा बलों के लिए कारगर हथियार साबित हो रहा है। इश्क की वजह से आतंकवादी पुलिस या सुरक्षा बलों से थोड़े लापरवाह हो जाते हैं। उनकी गतिविधियों को सेना और सुरक्षाबल के जवान आसानी से ट्रैक कर लेते हैं। कई बार तो यौन शोषण से तंग आकर लड़कियां ही पुलिस या सेना को जानकारी दे देती हैं। इसी तरह लड़कियों के परिजन भी खुफिया विभाग या सैन्य बलों को आतंकवादियों की सूचना दे देते हैं। लश्कर के कई कमांडर शारीरिक सुख हासिल करने के चक्कर में सुरक्षाबलों के रडार में आकर मारे जा चुके हैं। प्रेमिकाओं के अलावा आतंकवादियों यौन शोषण के बाद छोड़ दी गई प्रेमिकाएं भी बदला लेने के लिए उनकी जानकारी सुरक्षा एजेंसियों को दे दती हैं। सेना की मोस्टवॉन्टेड आतंकियों की लिस्ट में शामिल लश्कर कमांडर दुजाना कई बार सुरक्षा बलों को चकमा दे चुका था। वह एक नहीं पांच पांच बार सुरक्षा बलों के ट्रैप को नाकाम करने में कामयाब रहा थालेकिन मंगलवार को सेना के जवानों ने उसे ऐसे घेरा कि उसके लिए भागना नामुमकिन हो गया। जानकारी के मुताबिकवह अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने के लिए हाकड़ीपुरा गांव आया था। प्रेमिका के परिजन की सूचना पर सुरक्षा बलों ने उसे घेर लिया। दो घंटे बाद मौके पर अतिरिक्त फोर्स पहुंची। उसकी मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद तड़के ऑपरेशन शुरू किया गया था और उसका सफ़ाया कर दिया गया।
(लेखक 2005 से 2008 के दौरान समाचार एजेंसी यूएनआई के जम्मू कश्मीर प्रतिनिधि रह चुके हैं)

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

'वंदे मातरम्' मत बोलें, पर शोर भी न मचाएं कि 'वंदे मातरम' नहीं बोलेंगे..

हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय संविधान में देश के राष्ट्रगीत का दर्जा पाने वाला गीत 'वंदे मातरम्' एक बार फिर चर्चा में है। कई मुस्लिम नेता, ख़ासकर जिनकी इमेज कट्टरपंथी नेता की है, वो इसे न गाने के लिए अड़ गए हैं। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमीन के विधायक वारिस पठान ने तो महाराष्ट्र विधान सभा में यहां तक कह दिया कि उन्हें मार भी डाला जाए तब भी वह 'वंदे मातरम्' नहीं बोलेंगे। इसी तरह कभी सांसद असदुद्दीन ओवैसी या अबु आसिम आज़मी तो कभी आज़म ख़ान जैसे अपरिपक्व नेता चिल्ला-चिल्ला कर कहते हैं कि वे 'वंदे मातरम्' नहीं गाएंगे या 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे।

भारतवासियों के मूल अधिकारों को महफूज़ रखने के लिए बनाए गए संविधान में तकनीकी तौर पर कहीं भी नहीं लिखा गया है कि सुबह उठकर सबसे पहले 'वंदे मातरम्'का सरगम छेड़ें या ज़ोर से 'भारत माता की जय' बोलें। संविधान में यह भी नहीं लिखा है कि जो लोग 'वंदे मातरम्'गाएंगे या 'भारत माता की जय' बोलेंगे, केवल वही लोग देशभक्त कहलाएंगे, बाक़ी देशभक्त नहीं कहलाएंगे। परंतु पूरे भारतीय संविधान के किसी भी अनुच्छेद में कहीं भी ये नहीं लिखा है, कि सार्वजनिक तौर पर चिल्ला-चिल्ला कर या फतवा जारी करके कहें कि 'वंदे मातरम्' नहीं गाएंगे या 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे।

यह देश इतना उदार है कि किसी को किसी से किसी बात के लिए सर्टिफिकेट या इजाज़त लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। ओवैसी, आज़मी या पठान जैसे नेताओं को न तो किसी दूसरे नेता से देशभक्ति लेने का सर्टिफिकेट लेने की ज़रूरत है न देने की। लिहाज़ा, कोई व्यक्ति या संगठन अपने को देशभक्तऔर दूसरे को अदेशभक्तभी नहीं कह सकता। देशभक्ति ऐसी चीज़ है जिसे कम से कम साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं। किसी को यह साबित नहीं करना है कि वह वह देशभक्त हैं या नहीं। देशभक्ति नागरिक के बात-व्यवहार से ही झलकती है।

जहां तक वंदे मातरम् की बात है तो स्वतंत्रता संग्राम में इस गाने की ज़बरदस्त धूम थी। इसके बावजूद जब राष्ट्रगान के चयन की बात आई तो वंदे मातरम् के स्थान पर रवींद्रनाथ ठाकुर के 'जन गण मन' को वरीयता दी गई। दरअसल, कई कट्टरपंथी मुसलमानों को तब भी 'वंदे मातरम्' गाने पर आपत्ति थी, क्योंकि इस गीत में देवी दुर्गा को राष्ट्र के रूप में देखा गया है। उनका यह भी मानना था कि यह गीत जिस उपन्यास 'आनंद मठ' से लिया गया है, वह मुसलमानों के ख़िलाफ़ लिखा गया है। इन आपत्तियों पर सन् 1937 में कांग्रेस ने गहरा चिंतन किया। जवाहरलाल नेहरू की अगुआई में समिति का गठन किया गया, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, सुभाषचंद्र बोस और आचार्य नरेंद्र देव भी शामल थे। समिति ने 28 अक्टूबर 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में अपनी रिपोर्ट पेश की। जिसमें 'जन गण मन' को राष्ट्रगान और वंदे मातरम् एवं मोहम्मद इकबाल के कौमी तराने 'सारे जहां से अच्छा' को राष्ट्रगीत बनाने की सिफ़ारिश की गई।

बहरहाल, 14 अगस्त 1947 की रात्रि में संविधान सभा की पहली बैठक का आरंभ वंदे मातरम्के साथ और समापनजन गण मन..के साथ हुआ। आज़ादी के बाद डॉ राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 को 'वंदे मातरम्को राष्ट्रगीत के रूप में वाला बयान पढ़ा जिसे हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई और पारसी सभी धर्मों के प्रतिनिधियों ने आम राय से स्वीकार किया। राजेंद्र प्रसाद ने कहा, "शब्दों की वह संगीतमय रचना जिसे जन गण मन से संबोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है; बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वंदे मातरम् गान, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है; को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। मैं आशा करता हूँ कि यह सदस्यों को संतुष्ट करेगा।" इलके बाद 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के बाद वंदे मातरमको औपचारिक रूप से राष्ट्रगीत और जन गण मनराष्ट्रगान बना दिया गया।

वंदे मातरम् भारत में बेहद लोकप्रिय रहा है। कट्टरपंथी मुसलमान इसका जितना विरोध कर रहे हैं, यह गीत उतना ही फैल रहा है। अभी सन् 2002 में ब्रिटिश ब्रॉड कॉरपोरेशन बीबीसी ने सर्वेक्षण किया था, जिसके मुताबिक वंदे मातरम्विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत है। इसे हर धर्म के लोग गाते हैं, केवल चंद कट्टरपंथी मुसलमानों को ही इस गीत पर संदेह रहता है। गीत की रचना से ही हिंदू इसे गर्व से गाते रहे हैं, जबकि बहुमत में मुसलमान ख़ासकर कट्टर मुसलमाल इसे शायद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का गीत समझ कर इससे परहेज करते हैं। पिछले साल ओवेसी ने तो यहां तक कह दिया था, “गर्दन पर छूरी रख दो तब भी वंदे मातरम्या 'भारत माता की जय' नहीं बोलूंगा।"

दरअसल, सम्मान या भक्ति या देशभक्ति प्रदर्शित करने की चीज़ नहीं। लोग स्वेच्छा से माता-पिता, बड़ों और देश के प्रति सम्मान और भक्ति प्रदर्शित करते हैं। अगर कोई व्यक्ति अपने माता-पिता, बड़ों-बुजुर्गों या देश का सम्मान न करे, तो लोग उससे यह नहीं कहेंगे कि तुम सम्मान करो या भक्ति दिखाओ। सच पूछो तो सम्मान, भक्ति या देशभक्ति इंसान के अंदर ख़ुद पैदा होती है। इस तरह भी कह सकते हैं कि सम्मान या भक्ति या देशभक्ति सच्चे नागरिक यानी सन ऑफ़ सॉइल की पर्सनॉलिटी में इनबिल्ट होती है। इसलिए वंदे मातरम्गाएं या न गाएं, इस महान देश को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। हां, ज़िम्मेदार, गंभीर और समझदार नागरिक पब्लिकली कोई ऐसी ओछी बातें नहीं करते, जिससे किसी को उसकी निष्ठा पर उंगली उठाने का मौक़ा मिले।

वंदे मातरम् या भारत माता की जय जैसे मुद्दे केवल मुस्लिम नेता ही नहीं उठाते हैं। कई इस्लामिक तंजीमें भी इस तरह की आग में तेल डालती रहती हैं। उत्तर प्रदेश सहारनपुर के दारुल उलूम देवबंद का फतवा भी है कि मुसलमान न तो वंदे मातरम् गाएंगे न ही भारत माता की जय बोलेंगे। मुफ़्तियों की खंडपीठ मानती है, इंसान को जन्म इंसान ही दे सकता है, तो धरती मां कैसे हो सकती है। मुसलमान अल्लाह के अलावा किसी की इबादत नहीं कर सकता तो भारत को देवी कैसे मानें। इसी आधार पर देवबंद ने कहा कि भारत माता की जय बोलना इस्लाम में नहीं है। लिहाज़ा मुसलमान भारत माता की जय नहीं बोलेंगे।

दरअसल, इस्माल की ग़लत व्याख्या करने वाले नीम हकीम मुफ़्ती हमेशा अपनी क़ौम का नुकसान करते आए हैं। यहां इनका तर्क है कि लोग पृथ्वी को मां नहीं कह सकते, क्योंकि उन्हें पृथ्वी ने पैदा नहीं किया, बल्कि उन्हें उनकी मां ने पैदा किया है। यह बड़ी अजीब और हास्यास्पद हालत है। इन जाहिलों को कौन समझाए कि इंसान जिससे भोजन लेता है, उसी के लिए उसकी ज़ुबान से मां शब्द निकलता है। वस्तुतः मां परवरिश की सिंबल है। बच्चा पैदा होने के बाद जिस स्त्री का स्तनपान करता है,उसे मां कहता है। इसी तरह पृथ्वी यानी धरती भी मां हैं,क्योंकि ज़िंदगी भर इंसान भोजन धरती से ही लेता है और धरती के हिंद महासागर क्षेत्र में कुल 3,287,263 वर्ग किलोमीटर भूभाग पर फैले हुए हिस्से को भारत, हिंदुस्तान और इंडिया कहा जाता है। चूंकि यही भूखंड यहां पैदा होने और पलने-बढ़ने वालों को भोजन देता है, इसलिए इस भूखंड को सम्मान से भारत माता कहा जाता है।

कहने का मतलब भारत माता ही भारत यानी भारतवर्ष है। जिसका अस्तित्व दुनिया में एक राष्ट्र के रूप में है। एक संपूर्ण स्वाधीन और लोकतांत्रिक राष्ट्र, जो 29 राज्यों और सात केंद्र शासित क्षेत्रों में विभाजित है। इस भूखंड पर रहने वाला हर नागरिक केवल और केवल भारतीय यानी भारतवासी है। बिना किसी संदेह के भारतीयता इस देश का सबसे बड़ा धर्म है। किसी कबिलाई कल्चर की तरह नहीं, बल्कि इस देश को एक सभ्य देश की तरह चलाने के लिए एक वृहद संविधान बनाया गया है, वह देश का सबसे बड़ा धर्मग्रंथ है। हिंदुत्व हो, इस्लाम हो या फिर ईसाइयत या फिर दूसरा कोई धर्म, सभी धर्म भारतीयता नाम के इस धर्म के सामने बौने हैं। इसी तरह देश के धर्मग्रंथ यानी भारतीय संविधानके आगे गीता, क़ुरआन और बाइबल सबके सब दूसरी वरीयता के धर्म हैं। यही अंतिम सच है, इस पर तर्क-वितर्क की कोई गुंजाइश नहीं।

कोई नागरिक अगर हिंदू धर्म को भारतीयता से ऊपर और गीता को भारतीय संविधान से बड़ा मानता है, तो उसे धरती पर ऐसी जगह खोजनी चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। कोई नागरिक अगर इस्लाम को भारतीयता से ऊपर और क़ुरआन को भारतीय संविधान से बड़ा मानता है, तो उसे भी धरती पर ऐसी जगह चले जाना चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। इसी तरह अगर कोई भी नागरिक अपने धर्म को भारतीयता से ऊपर और अपने धर्मग्रंथ को भारतीय संविधान से ऊपर मानता है, तो उसे भी धरती पर ऐसी जगह खोजनी चाहिए, जहां भारत, भारतीयता या भारतीय संविधान न हो। और जब तक इस भारतीय भूखंड पर आप हैं, आप सबसे पहले आप भारतीय हैं, न कि हिंदू, मुस्लिम या ईसाई। इस संप्रभु, सामाजिक और सेक्यूलर देश में हर नागरिक को लिखने, बोलने और धर्म अपनाने की पूरी आज़ादी मिली है। बोलने-लिखने की आज़ादी इतनी ज़्यादा है कि लोग देश के सर्वोच्च शासक प्रधानमंत्री तक की आलोचना करते हैं। उसके फ़ैसलों से सार्वजनिक तौर पर असहमति जताते हैं। इसी आज़ादी के चलते आजकल देश का विभाजन व देश के टुकड़े करने की बात कहना, राष्ट्रगान या राष्ट्रगीत के बारे में अप्रिय बात करना या भारत माता की जय न बोलने की बात करना फैशन सा बन गया है।


दरअसल, वंदे मातरम् बोलने या न बोलने पर विवाद ही नहीं होना चाहिए था। आतंकवाद और ट्रिपल तलाक़ के मुद्दे से मुसलमानों का पहले ही बहुत ज़्यादा नुकसान हो चुका है। लिहाज़ा, ख़ुद मुसलमानों को ही आगे आकर वंदे मातरम् के बारे में अनाप-शनाप बोलने वालों का विरोध करना चाहिए। वंदे मातरम् या भारत माता की जय को विवाद का विषय बनाने वालों का बहिष्कार करना चाहिए। वरना यह मसला मुसलमानों को मुख्यधारा से अलग-थलग कर सकता है। इतना ही नहीं, यदि मुसलमान चुप रहे तो यह संदेश देने की साज़िश भी की जा सकती है कि हर मुसलमान की यही भावना है, जबकि यह सच नहीं है। ओवैसी जैसे मुट्ठी भर लोगों को छोड़ दिया जाए तो देश का आम मुसलमान उसी तरह देशभक्त है, जिस तरह हिंदू। उसे किसी से देशभक्ति का प्रमाणपत्र लेने की ज़रूरत नहीं है। बस इस मसले पर संवेदनशील होने की ज़रूरत है और बहके हुए लोगों से कहना चाहिए कि 'वंदे मातरम्' या'भारत माता की जय' मत बोलें, पर शोर भी न करें कि 'वंदे मातरम्' या 'भारत माता की जय' नहीं बोलेंगे।

रविवार, 25 जून 2017

ईमानदार जज जेल में, भ्रष्टाचारी बाहर !

हरिगोविंद विश्वकर्मा
सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है, इसलिए उसका फ़ैसला सर्वोच्च और सर्वमान्य है। चूंकि भारत में अदालतों को अदालत की अवमानना यानी कॉन्टेम्प्ट ऑफ़ कोर्ट की नोटिस जारी करने का विशेष अधिकार यानी प्रीवीलेज हासिल है, इसलिए कोई आदमी या अधिकारी तो दूर न्यायिक संस्था से परोक्ष या अपरोक्ष रूप से जुड़ा व्यक्ति भी अदालत के फैसले पर टीका-टिप्पणी नहीं कर सकता। इसके बावजूद निचली अदालत से लेकर देश की सबसे बड़ी न्याय पंचायत तक, कई फ़ैसले ऐसे आ जाते हैं, जो आम आदमी को हज़म नहीं होते। वे फ़ैसले आम आदमी को बेचैन करते हैं। मसलन, किसी भ्रष्टाचारी का जोड़-तोड़ करके निर्दोष रिहा हो जाना या किसी ईमानदार का जेल चले जाना या कोई ऐसा फैसला जो अपेक्षित न हो।


चूंकि जज भी इंसान हैं और इंसान काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे पांच विकारों या अवगुणों के चलते कभी-कभार रास्ते से भटक सकता है। ऐसे में इंसान होने के नाते जजों से कभी-कभार गलती होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। इस दलील पर एकाध स्वाभाविक गलतियां स्वीकार्य हैं, हालांकि उन गलतियों का दुरुस्तीकरण भी होना चाहिए, लेकिन कई फैसले ऐसे होते हैं, जिनमें प्रभाव, पक्षपात या भ्रष्टाचार की बहुत तेज़ गंध आती है। कोई बोले भले न, पर उसकी नज़र में फ़ैसला देने वाले जज का आचरण संदिग्ध ज़रूर हो जाता है। किसी न्यायाधीश का आचरण जनता की नज़र में संदिग्ध हो जाना, भारतीय न्याय-व्यवस्था की घनघोर असफलता है।

न्यायपालिका को अपने गिरेबान में झांक कर इस कमी को पूरा करना होगा, वरना धीरे-धीरे उसकी साख़ ही ख़त्म हो जाएगी, जैसे बलात्कार के आरोपी अखिलेश सरकार में मंत्री रहे गायत्री प्रजापति की ज़मानत मंजूर करके जिला एवं सत्र न्यायधीश जस्टिस ओपी मिश्रा ने न्यायपालिका की साख़ घटाई। दो साल पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने अभिनेता सलमान ख़ान को हिट रन केस में कुछ घंटे के भीतर आनन-फानन में सुनवाई करके ज़मानत दे दिया और जेल जाने से बचा लिया था। इसी तरह कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस सीआर कुमारस्वामी ने महाभ्रष्टाचारी जे जयललिता को निर्दोष करार देकर फिर उसे मुख्यमंत्री बना दिया था। ऐसे फ़ैसले न्यायपालिका को ही कठघरे में खड़ा करते हैं।


हाल ही में दो बेहद चर्चित जज न्यायिक सेवा से रिटायर हुए। मई में गायत्री को बेल देने वाले जज ओपी मिश्रा ने अवकाश ग्रहण किया, जून में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस सीएस कर्णन। कर्णन की चर्चा बाद में पहले जज ओपी मिश्रा का ज़िक्र। गायत्री पर एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी से बलात्कार करने का आरोप था, इसके बावजूद जज मिश्रा ने ज़मानत दी। इलाहाबाद हाईकोर्ट की रिपोर्ट में पता चला है कि जज मिश्रा ने गायत्री से 10 करोड़ रुपए लेकर ज़मानत पर रिहा कर दिया था। करोड़ों रुपए डकारने के बावजूद जज मिश्रा और दूसरे रिटायर्ड जज आराम से सेवानिवृत्त जीवन जी रहे हैं।


दूसरी ओर जस्टिस कर्णन पर कभी भी भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा, फिर भी वह जेल की हवा खा रहे हैं। यह भी गौर करने वाली बात है कि जस्टिस कर्णन दलित समुदाय के हैं और दुर्भाग्य से भारतीय न्यायपालिका में दलित और महिला समाज का रिप्रजेंटेशन नहीं के बराबर है। दलित या महिला समुदाय के किसी जज को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट को जज बनाया गया यह विरला ही सुनने को मिलता है। फिर जस्टिस कर्णन ऐसे समय बिना गुनाह (इसे आगे बताया गया है) के जेल की हवा खा रहे हैं, जब किसी दलित व्यक्ति को देश का प्रथम नागरिक बनाकर सर्वोच्च सम्मान देने की होड़ मची है और दलित समाज के दो शीर्ष नेता रामनाथ कोविंद और मीरा कुमार राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं।

जस्टिस कर्णन को सजा देने का फैसला भी किसी एक जज ने नहीं किया, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सात सीनियर मोस्ट जजों की संविधान पीठ ने किया है। संविधान पीठ ने जस्टिस कर्णन को सर्वोच्च न्यायिक संस्था की अवमानना का दोषी पाया और एकमत से सज़ा सुनाई। सुप्रीम कोर्ट के सात विद्वान जजों की पीठ के दिए इस फैसले की न तो आलोचना की जा सकती है और न ही उसे किसी दूसरे फोरम में चुनौती दी जा सकती है। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जस्टिस कर्णन प्रकरण बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी सेवारत जज को जेल की सजा हुई हो।

जबसे जस्टिस कर्णन गिरफ़्तार करके जेल भेजे गए हैं। आम आदमी के मन में यह सवाल बुरी तरह गूंज रहा है कि आख़िर कर्णन का अपराध क्या है? क्या उन्होंने कोई संगीन अपराध किया? उत्तर - नहीं। क्या उन्होंने कोई ग़लत फ़ैसला दिया? उत्तर - नहीं। क्या उन्होंने किसी से पैसे लिए या कोई भ्रष्टाचार किया? उत्तर - नहीं। क्या उन्होंने कोई ऐसा आचरण किया जो किसी तरह के अपरोक्ष भ्रष्टाचार की ही श्रेणी में आता है? उत्तर - नहीं। मतलब न कोई अपराध किया, न ग़लत फ़ैसला दिया और न ही कोई भ्रष्टाचार किया, फिर भी हाईकोर्ट का जज जेल में है। लिहाजा, आम आदमी के मन में सवाल उठ रहा है कि फिर जस्टिस कर्णन जेल में क्यों हैं? उत्तर - उन्होंने कथित तौर पर कई भ्रष्ट जजों के नाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दे दिए थे।

दरअसल, जस्टिस कर्णन ने 23 जनवरी 2017 को पीएम मोदी को लिखे खत में सुप्रीम कोर्ट और मद्रास हाई कोर्ट के दर्जनों जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। कर्णन ने अपनी चिट्ठी में 20 जजों के नाम लिखते हुए उनके खिलाफ जांच की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के इस आचरण को कोर्ट की अवमानना क़रार दिया और उन्हें अवमानना नोटिस जारी कर सात जजों की बेंच के सामने पेश होने का आदेश दिया। इसके बाद जस्टिस कर्णन और सुप्रीम कोर्ट के बीच जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसका गवाह पूरा देश है। भारतीय न्याय-व्यवस्था में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब किसी कार्यरत जस्टिस को जेल की सज़ा हुई हो।

यह मामला सिर्फ़ एक व्यक्ति बनाम न्यायपालिका तक सीमित नहीं रहा। इस प्रकरण का विस्तार हो गया है और यह देश के लोकतंत्र के 80 करोड़ से ज़्यादा स्टैकहोल्डर्स यानी मतदाओं तक पहुंच गया है। देश का मतदाता मोटा-मोटी यही बात समझता है कि जेल में उसे होना चाहिए जिसने अपराध किया हो। जिसने कोई अपराध नहीं किया है, उसे जेल कोई भी नहीं भेज सकता। सुप्रीम कोर्ट भी नहीं। इस देश के लोग भ्रष्टाचार को लेकर बहुत संजीदा हैं, क्योंकि भ्रष्टाचार की बीमारी से हर आदमी परेशान है। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश के लोगों ने भ्रष्टाचार से लड़ने का दावा करने वाली एक नई नवेली पार्टी को सिर-आंखों पर बिठा लिया था।

बहरहाल, भारत का संविधान हर व्यक्ति को अपने ख़िलाफ़ हो रहे अन्याय, पक्षपात या अपने मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ़ बोलने की आज़ादी देता है। अगर कर्णन को लगा कि उनके साथ अन्याय और पक्षपात हो रहा है, तो उसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना उनका मौलिक अधिकार था। इतना ही नहीं, उन्होंने जजों के ख़िलाफ़ आरोप प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में लगाए थे। उस प्रधानमंत्री को जिसे देश के सवा सौ करोड़ जनता का प्रतिनिधि माना जाता है। लिहाज़ा, अवमानना नोटिस जारी करने से पहले जस्टिस कर्णन के आरोपों को सीरियली लिया जाना चाहिए था, उसमें दी गई जानकारी की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए थी। उसके बाद अगर जस्टिस कर्णन गलत पाए जाते तो उनके ख़िलाफ़ ऐक्शन होना चाहिए था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।

सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। लिहाज़ा, उसका ध्यान उन मुद्दों पर सबसे पहले होना चाहिए, जिसका असर समाज या देश पर सबसे ज़्यादा होता है। मसलन, देश की विभिन्न अदालतों में दशकों से करोड़ों की संख्या में विचाराधीन केसों का निपटान कैसे किया जाए, लेकिन ऐसा नहीं हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत सबसे ज़्यादा शिथिल है। इसकी एक नहीं कई कई मिसालें हैं, जिनसे साबित किया जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट संवेदनशील केसेज़ को लेकर भी उतनी संवेदनशील नहीं है, जितना उसे होना चाहिए।


उदाहरण के रूप में दिसंबर 2012 के दिल्ली गैंगरेप केस को ले सकते हैं। जिस गैंगरेप से पूरा देश हिल गया था। सरकार ने जस्टिस जगदीश शरण वर्मा की अध्यक्षता में आयोग गठित किया। उन्होंने दिन रात एक करके रिपोर्ट पेश की। आनन-फानन में संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया और अपराधिक क़ानून में बदलाव किए गए। उस केस की सुनवाई के लिए फॉस्टट्रैक कोर्ट गठित की गई जिसने महज 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी थी और दिल्ली हाईकोर्ट ने भी केवल 180 दिन यानी छह महीने के अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी, लेकिन उसे सुप्रीम कोर्ट ने लटका दिया और उसे फैसला सुनाने में तीन साल (1145 दिन) से ज़्यादा का समय लग गया।

देश का आम आदमी हैरान होता है कि करोड़ों की संपत्ति बनाने वाली जयललिता को निचली अदालत के जज माइकल चून्हा ने 27 सितंबर 2014 को चार साल की सज़ा सुनाई, जिससे उन्हें सीएम की कुर्सी  छोड़नी पड़ी और जेल जाना पड़ा। उनका राजनीतिक जीवन ही ख़त्म हो गया। लेकिन आठ महीने बाद 11 मई 2015 को कर्नाटक हाईकोर्ट के कुमारस्वामी ने जया को निर्दोष करार दे दिया। वह फिर मुख्यमंत्री बन गई और जब मरी तो अंतिम संस्कार राजा की तरह हुआ। जबकि क़रीब दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट को ही कुमारस्वामी का फ़ैसला रद्द करना पड़ा और जयललिता की सहयोगी शशिकला को जेल भेजना पड़ा। देश की सबसे बड़ी अदालत के न्यायाधीशों की नज़र में कुमारस्वामी का आचरण क्यों नहीं आया। अगर उन्होंने ग़लत फ़ैसला न सुनाया होता तो एक भ्रष्टाचारी महिला दोबारा सीएम न बन पाती और उसकी समाधि के लिए सरकारी ज़मीन न देनी पड़ती। इससे पता चलता है कि कुमारस्वामी ने कितना बड़ा अपराध किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उनको कोई नोटिस जारी नहीं किया। सबसे अहम कि कुमारस्वामी पर भी भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं।


इसी तरह हिट ऐंड रन केस में अभिनेता सलमान ख़ान को 7 मई 2015 को निचली अदालत ने सज़ा सुनाई। आम आदमी को ज़मानत लेने में महीनों और साल का समय लग जाता है, लेकिन बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अभय थिप्से ने सलमान ख़ान को कुछ घंटों के भीतर बेल दे दी। इतना ही नहीं जब पूरा देश उम्मीद कर रहा था कि सलमान को शर्तिया सज़ा होगी, तब बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एआर जोशी ने 10 दिसंबर 2015 को रिटायर होने से कुछ पहले दिए गए अपने फ़ैसले में सलमान को बरी कर दिया। इस फ़ैसले से सरकार ही नहीं देश का आम आदमी भी हैरान हुआ। साफ़ लगा कि अभिनेता ने न्यायपालिका को मैनेज कर लिया। जब जज ओपी मिश्रा रिश्वत ले सकते हैं तो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज भी रिश्वत ले सकता है, इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, सलमान को रिहा करने की राज्य सरकार की अपील अब दो साल से सुप्रीम कोर्ट के पास है। अगर सुप्रीम कोर्ट ने सलमान को सज़ा दे दी तो क्या जस्टिस एआर जोशी के ख़िलाफ कार्रवाई होगी, ज़ाहिर है नहीं, क्योंकि इस तरह की कोई व्यवस्था संविधान में नहीं हैं।

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक, 17 सितंबर 2010 को पूर्व क़ानून मंत्री और क़ानूनविद शाति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक अप्लीकेशन देकर कहा था, एकाध नहीं, आठ-आठ मुख्य ऩ्यायाधीश भ्रष्टाचार में लिप्त पाए जा चुके हैं। अगर देश की सबसे बड़ी अदालत के पास हिम्मत है तो उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करें।” इतना ही नहीं मुख्य ऩ्यायधीश रहे जस्टिस जगदीश शरण वर्मा और जस्टिस आदर्श सेन आनंद पर तो भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे थे। देश के चर्चित खोजी पत्रकार विनीत नारायण ने अपनी वीडियो मैगज़ीन कालचक्र ने जस्टिस आदर्श सेन आनंद पर ज़मीन घोटाले के आरोप लगाए थे। बदले में उन्हें बहुत ज़्यादा प्रताड़ित किया गया था। अपने ही लॉ-इंटर्न के यौन उत्पीड़न के आरोपों से घिरे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस ए के गांगुली के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई हुई? सन् 2013 में कई महीने तक यह मामला सुर्खियों में रहा, लेकिन कुछ नहीं। गांगुली से केवल पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से इस्तीफा मांगा गया था।

बहरहाल, अगर भ्रष्टाचार से जुड़े मामले पर जस्टिस कर्णन ने पीएम को पत्र लिखा तो अवमानना नोटिस देने से पहले कर्णन के आरोपों की गंभीरता और तथ्यपरकता की जांच होनी चाहिए थी। जिन पर कर्णन ने आरोप लगाया, उनका बाल भी बांका नहीं हुआ और आरोप लगाने वाले कर्णन को उनके आरोप ग़लत साबित होने से पहले ही जेल भेज दिया गया। न्यायपालिका के भीतर रहते हुए कोई उसकी व्यवस्था पर प्रश्न नहीं उठा सकता और उसके बाहर होने पर भी आलोचना नहीं कर सकता। वह अवमानना का विषय बन जाएगा। यह तो निरंकुशता हुई, जिसका समाधान जल्द से जल्द खोजा जाना चाहिए। इतना ही नहीं न्यायपालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार पर बहस करने का वक़्त आ गया है, ताकि इसमें लोगों की आस्था बनी रहे।


समाप्त