रविवार, 14 जनवरी 2018

ग़ज़ल - किस्मत से ज़ियादा

टूटा है कहर सब पर किस्मत से ज़ियादा
नफरत भरी है यहां मोहब्बत से ज़ियादा
दिल का कदर क्या वह खाक करेगा
जिसके लिए प्यार नहीं तिजारत से ज़ियादा
भाई-चारे का घटना गर यूं ही जारी रहा
खून-खराबा होगा महाभारत से ज़ियादा
खौफज़दा है सारा मुल्क उस शख्स से आज
जो जानता नहीं कुछ शरारत से ज़ियादा
जब तक ना आया था ऊंट पहाड़ के नीचे
समझता था ख़ुद को ऊंचा पर्वत से ज़ियादा
किसी के पास कुछ देख बेशुमार ना कहो
हर चीज मिली सबको ज़रूरत से ज़ियादा
आखिर ख़ुदा बरक्कत करे तो कैसे करे

झूठ बोलता है आदमी इबादत से ज़ियादा
-हरिगोविंद विश्वकर्मा

शनिवार, 13 जनवरी 2018

भारत-पाक युद्ध 1971 - पाक की कमर तोड़ने वाले आईएनएस निर्भीक व आईएनएस निर्घात

हरिगोविंद विश्वकर्मा
सन् 1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध दोनों देशों के इतिहास के साथ दक्षिण एशिया के भूगोल के लिहाज से भी बेहद अहम है। 3 से 16 दिसंबर के बीच 13 दिन चलने वाले युद्ध में इंडियन नेवी के आईएनएस निर्भीक और आईएनएस निर्घात ने युद्ध के दूसरे दिन कराची हारबर पर मिसाइल दाग कर पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था की कमर ही तोड़ दी थी। इसी युद्ध का नतीजा था कि पाकिस्तान पर भारत की शानदार फतह हुई और दक्षिण एशिया के क्षितिज पर एक नया मुल्‍क बांग्‍लादेश उदित हुआ।

कराची पाकिस्‍तान के लिए उतना ही अहम है जितना भारत के लिए मुंबई। कराची समुद्री व्‍यापार का सबसे बड़ा केंद्र था। वहां का बंदरगाह पाकिस्‍तान के लिए अहम था। वहां सिर्फ पाकिस्‍तान नेवी का हेडक्‍वार्टर ही नहीं था बल्कि तेल भंडारण का भी एक प्रमुख केंद्र था। ऑपरेशन ट्राइडेंट के तहत नेवी ने कराची बंदरगाह पर मिसाइल बोटों से हमला किया। इस हमले में पहली बार इस क्षेत्र में युद्धरोधी मिसाइलों का उपयोग किया गया। अभियान बेहद कामयाब रहा लेकिन मुख्‍य लक्ष्‍य तेल भंडारण को नष्‍ट करने में नाकाम रहा। इसलिए उसकी अगली कड़ी के तहत ऑपरेशन पायथन को अंजाम दिया गयाजिससे पाकिस्तान के हौसले पस्त हो गए।

युद्ध में भारतीय पताका फहराने और पाकिस्‍तान के हथियार डालने के पीछे थल सेना और वायुसेना के साथ नेवी की अहम भूमिका रही। दूसरे दिन के हमले के बाद भारतीय सेनाएं रुकी नहीं। कमांडिग ऑफीसर लेफ्टिनेंट कमांडर बहादुर नरिमन (बीएन) काविनालेफ्टिनेंट कमांडर आईजे शर्मालेफ्टिनेंट कमांडर ओपी मेहता के नेतृत्व में नेवी ने पाक नौसेना मुख्यालय और कराची बंदरगाह पर मिसाइल हमला किया। उस हमले को वैश्विक सैन्‍य इतिहास के सबसे जोखिम भरे अभियानों में गिना जाता हैजिसे आईएनएस विनाशनिर्भीकनिर्घातनिपाततलवारत्रिशूल और वीर ने अंजाम दिया।

दरअसल जब भारतीय सेना और वायुसेना अपने अपने मोर्चों पर डटी थीं तो पूर्वी और पश्चिमी तट को ब्‍लॉक करने का मास्‍टर प्‍लान नेवी ने बनाया। उसके तहत पश्चिमी क्षेत्र में जिस अभियान को अंजाम दिया गयाउसको ऑपरेशन ट्राइडेंट कहा गया। 8 दिसंबर 1971 की रात आईएनएस निर्भीक और आईएनएस निर्घात ने मिसाइल बोट आईएनएस विनाश और दो मल्‍टीपर्पज फ्रिगेट आईएनएस तलवार और आईएनएस त्रिशूल ने हमला बोला।

भारतीय नौसेना को ऑपरेशन ट्राइडेंट और ऑपरेशन पायथन के जरिए पाक के कई युद्धपोतों को नष्‍ट करने के साथ तेल और आयुध भंडारों को नष्‍ट करने में कामयाबी मिली। वायुसेना के सहयोग से इन हमलों के चलते कराची जोन के 50 फीसदी से अधिक ईंधन क्षमताएं नष्‍ट हो गईं। इससे दुश्मन की अर्थव्‍यवस्‍था तो नष्ट हुई हीउसे करीब तीन अरब डॉलर का नुकसान हुआ। इस ऑपरेशन के आठवें दिन पाकिस्तानी सेना ने हथियार डाल दिया और 1962 की चीन से हार का सदमा भुलाकर भारत विश्वमंच पर एक शक्ति के रूप में उभरा और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी देश में दुर्गा के रूप में मशहूर हुईं।

भारतीय नौसेना के दो युद्धपोतों आईएनएस निर्भीक और आईएनएस निर्घात को पिछले शुक्रवार को भावभीनी विदाई दी गई। आईएनएस निर्भीक 30 साल तक नौसेना की सेवा में रहाजबकि नेवी के साथ आईएनएस निर्घात का सफर 28 साल तक चला। दरअसलसन् 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान कराची हार्बर पर नौसेना की आक्रामक कार्रवाई को सफलतापूर्वक निभाने वाले दोनों जंगी बेड़ों आईएनएस निर्भीक और आईएनएस निर्घात को नए अवतार में क्रमश: 21 दिसंबर 1987 और 15 दिसंबर 1989 को पूर्व सोवियत संघ ने भारत को सौंप दिया था।

आईएनएस निर्भीक और आईएनएस निर्घात में 70 नाविकों और सात अधिकारियों का दल तैनात रहता था। दोनों जहाजों में चार जमीन से जमीन तक मार करने वाली मिसाइलेंमध्यम श्रेणी की मारक क्षमता से लैस एके 176 गन और एके 630 की कैलिबर गन तैनात रहती थीं। कराची ऑपरेशन के बाद करीब तीन दशकों में दोनों जहाजों ने ऑपरेशन विजय और पराक्रम जैसे कई अभियानों में सफलतापूर्वक हिस्सा लिया। कई अवसरों पर दोनों जंगी बेड़े को गुजरात में भी तैनात किया गया था। कमांडर आनंद मुकुंदन और कमांडर मोहम्मद इकराम दोनों जहाजों के अंतिम कमांडिंग ऑफिसर रहे।

भारतीय नौसेना ने आईएनएस निर्भीक और निर्घात को पारंपरिक तरीके से अंतिम विदाई दी। कार्यक्रम में फ्लैग ऑफिसर वेस्‍टर्न फ्लीट रियर एडमिरल आरबी पंडित मौजूद थे। पंडित ने सबसे पहले आईएनएस निर्घाटत की कमांडिंग की थी। इसके अलावा कमांडर वीआर नाफाडे और कमांडर एस. मैमपुल्ली भी जलसे में मौजूद थे। दोनों कमांडरों ने आईएनएस निर्भीक और निर्घाट को कमीशन किया था। दोनों कमांडरों को गेस्ट ऑफ ऑनर दिया गया।

56 मीटर लंबे और 10.5 मीटर चौड़े आईएनएस निर्भीक और आईएनएस निर्घात भारतीय नौसेना के जंगी जहाज थे। ये दोनों भारतीय नौसेना की वीर कैटेगरी का पोत थे। दोनों का कुल भार 455 टन था। आईएनएस निर्भीक और आईएनएस निर्घात की पानी में रफ्तार 59 किलोमीटर प्रति घंटा है। 971 में भारत-पाकिस्‍तान युद्ध के दौरान कराची बंदरगाह पर दोनों ने अपने मूल अवतार में दुश्‍मनों के छक्‍के छुड़ा दिए थे।


भारतीय नौसेना का इतिहास
भारतीय नौसेना के इतिहास को 1612 के समय से पता लगाया जा सकता है जब सर्वश्रेष्ठ कप्तान ने इनका सामना किया और पुर्तगालियों को पराजित किया। 1686 में इसका नाम बंबई मेरीन रखा गया और 1830 में इसे हर मेजेस्टीर इंडियन नेवी का नाम दिया गया। 1863 से 1877 के दौरान इसे बॉम्बे मरीन नाम दिया गयाजिसके बाद हर मेजेस्टी इंडियन मेरीन बना। इस समयनेवी दो डिविजन किए गए. कलकत्ता में ईस्ट डिविजन और मुंबई में वेस्टर्न डिविजव। इसका शीर्षक 1892 में रॉयल इंडियन मेरीन कर दिया गयाजिस समय तक इसमें 50 से अधिक जंगी जहाज शामिल हुए। पहले भारतीय के रूप में सूबेदार लेफ्टिनेंट डीएन मुखर्जी इंजीनियर अधिकारी के रूप में 1928 में रॉयल इंडियन मरीन में शामिल हुए। सेकंड वर्ल्डवॉर में इसमें आठ युद्धपोत शामिल किए गए और इनकी संख्या् 117 युद्ध पोतों तक बढ़ी और 30,000 जवानों को लाया गया था। आजादी के समय रॉयल इंडियन नेवी में तटीय गश्ती के लिए 32 पुराने जहाजों के साथ 11,000 अफसर और जवान थे। भारतीय नौसेना के प्रथम कमांडर इन चीफ एडमिरल सर एडवर्ड पैरीकेसीबी ने प्रशासन 1951 में एडमिरल सर मार्क पिजीकेबीईसीबीडीएसओ को सौंप दिया था। एडमिरल पिजी भी 1955 में नौसेना के पहले चीफ बन गएऔर उनके बाद वाइस एडमिरल एसएच कारलिलसीबीडीएसओ आए थे। 22 अप्रैल 1958 को वाइस एडमिरल आरडी कटारी ने नौसेना के प्रथम भारतीय चीफ के रूप में पद ग्रहण किया।

सोमवार, 8 जनवरी 2018

चर्चगेट - कोई चर्च नहीं फिर भी है चर्चगेट!


हरिगोविंद विश्वकर्मा
चर्च का गेट है चर्च है लापता!” संभवतः अमिताभ बच्चन पर फिल्माए गए 'डॉनफिल्म के इस गाने को गीतकार अनजान ने बिना गहन रिसर्च के ही लिख दिया थाक्योंकि चर्चगेट के पूरब-दक्षिण में करीब एक किलोमीटर दूर सेंट थॉमस कैथड्रल चर्च अब भी मौजूद है जिसके कारण इस रेलवे स्टेशन का नाम चर्चगेट रखा गया। चर्चगेट की वर्तमान इमारत तो सन् 1957 में बनाई गईजबकि चर्चगेट से रेल सेवा 1873 में ही शुरू हो गई थी।

पहली लोकल ट्रेन
आज जहां चर्चगेट रेलवे स्टेशन हैउसे पंद्रहवीं सदी तक लिटिल कोलाबा या वूमन आईलैंड कहा जाता था। इसके दक्षिण में कोलाबा द्वीप था तो उत्तर में बॉम-बे (जिसे बाद में बॉम्बे कहा गया) था। 16 अप्रैल 1853 को बोरीबंदर और ठाणे के बीच मुंबई में एशिया की पहली रेलगाड़ी शुरू होने पर अंग्रेजों ने पश्चिमी तट यानी अरब सागर के समानांतर रेल सेवा शुरू करने का फैसला किया। इसी परिकल्पना के तहत 2 जुलाई 1855 को द बॉम्बेबड़ौदा एंड सेंट्रल इंडिया रेलवे (बीबी एंड सीआई रेलवे) की स्थापना की गईजिसे आजकल पश्चिम रेलवे कहते हैं। सन्1867 में ग्रांट रोड और वर्तमान मरीन लाइंस रेलवे स्टेशन के पास बॉम्बे बैकबे रेलवे स्टेशन बनाने के बाद 12 अप्रैल, 1867 के दिन पश्चिम रेलवे की लोकल सेवा बॉम्बे बैकबे और विरार के बीच शुरू हुई।

मुंबई का इतिहास
दरअसलयूं तो मुंबई का इतिहास पाषण काल (स्टोन एज) से शुरू होता हैजब इसे हैप्टानेसिया कहते थे। अभी हाल में मिले प्राचीन अवशेषों से संकेत मिलता हैकि यह द्वीप समूह पाषाण युग से बसा हुआ है। मानव आबादी के लिखित प्रमाण 250 ईसा पूर्व तक मिलते हैं। मौर्य साम्राज्यसातवाहन साम्राज्य,,हिंदू सिल्हारा वंशगुजरात सल्तनतपुर्तगाल के बाद यह दहेज के रूप में अंग्रजों को मिला। यह भूभाग 18 वीं  सदी तक सात छोटे द्वीपों में फैला था। सन् 1668 ने इसकी तकदीर बदल दीजब अंग्रज़ों ने इसे 10 पाउंड के वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया। बहरहाल1869 में स्वेज नहर के खुलने के बाद सेमुंबई अरब सागर का सबसे बड़ा बंदरगाह बन गया।

चर्चगेट नाम कैसे
कोलाबा और बैकबे के बीच रिक्लेमेशन का काम पूरा होने पर बॉम्बे सरकार ने 1872 में लंबी जद्दोजहद के बाद रेलवे को ज़मीन दे दी। बैकबे और कोलाबा के बीच स्टेशन बनाने का फैसला हुआ। नए रेलवे स्टेशन का नाम चर्चगेट पड़ा। मज़ेदार बात यह है कि चर्चगेट नाम देखकर लोग हैरान होते हैं कि यहां आसपास कोई चर्च तो है नहीं फिर इसका नाम चर्चगेट कैसे पड़ा। दरअसलजहां चर्चगेट स्टेशन बनाया गया हैउसके पूर्व में चारों ओर से दीवार से घिरा एक किला था। उस जगह को आजकल फोर्ट कहा जाता है। वर्ष 1962 तक बॉम्बे शहर फोर्ट तक ही सीमित था। किले की दीवारे से घिरे क्षेत्र में ऊंची-ऊंची इमारतें थीं। किले के तीन प्रवेश द्वारों में बोरीबंदर के पास उत्तरी छोर वाले को बाज़ार गेटदक्षिणी छोर वाले को अपोलो गेट कहते थे। तीसरा गेट पश्चिमी छोर पर थाजहां से सेंट थॉमस कैथड्रल चर्च स्ट्रीट गुजरती थी। चर्च स्ट्रीट वाले गेट के नाम पर स्टेशन का नाम चर्चगेट पड़ा। 

वैसेबैकबे रिक्लेमेशन प्रोजेक्ट शुरू होने से पहले चर्चगेट समुद्र तट से सटा था। समुद्र की लहरें प्लेटफॉर्म नंबर एक तक आती थीं। पश्चिमी ओर करीब 500 मीटर तक समुद्र भरने के बाद मरीन ड्राइव तक इमारतें बना दी गईं। बहरहाल1873 में रेलसेवा बॉम्बे बैकबे से बढ़ाकर चर्चगेट होते हुए कोलाबा तक कर दिया गया। यानी चर्चगेट से पहली लोकल गाड़ी इसी साल शुरू हुई। 1976 में चर्चगेट का फिर से निर्माण किया गया और आलीशान इमारत बनाई गई। 1914 में साल भर में 2.4 करोड़ यात्रियों ने सफर किया। 1922 में इसे चार ट्रैक करने की परियोजना शुरू हुई जो बोरीवली तक बढ़ा दी गई। पांच साल बाद 5 जनवरी 1928 को चर्चगेट से बोरीवली के लिए पहली इलेक्ट्रिक लोकल रवाना हुई। लिहाजापुराने इमारत के पश्चिम (मौजूदा प्लेटफॉर्म) बिजली के तार वाली इमारत बनाई गई।

18 दिसंबर 1930 को बंबई सेंट्रल स्टेशन अस्तित्व में आया। उसे एक्सप्रेस टर्मिनस और चर्चगेट लोकल टर्मिनस बन गया। बहरहाल, 57 साल तक यात्रियों की सेवा करने वाले कोलाबा स्टेशन को  31 दिसंबर 1930 की रात हमेशा के लिए बंद कर दिया गया। आज़ादी मिलने के बाद नवंबर, 1951 में बीबी एंड सीआई रेलवे पश्चिम रेलवे हो गया।। चर्चगेट प्लेटफॉर्म के ऊपर 108 फीट ऊंची सात मंज़िली इमारत का निर्माण किया गया और जून 1957 से चालू हो गई। बहराहल यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ती रही। आजकल चर्चगेट से रोजाना क़रीब लाख यात्री ट्रेन में चढ़ते या उतरते हैं।

दस्तावेज नष्ट
वर्ष 1905 के नवंबर महीने के दूसरे हफ्ते वेल्स के राजकुमार किंग जार्ज पंचम बॉम्बे के आधिकारिक दौरे पर थे। शाही मेहमान के स्वागत में चर्चगेच की इमारत को तब सजावटी बल्ब का प्रचलन नहीं थालिहाजा तेल वाले दीपक जलाकर दीपावली की तरह इमारत का प्रकाशमान किया गया। लेकिन उन्हीं दीपकों से इमारत में आग लग गई। आग पर फायर ब्रिगेड काबू करती उससे पहले अभिलेखागार जलकर नष्ट हो गाय। उसके साथ पश्चिम रेलवे से जुड़े फोटोग्राफ और ऐतिहासिक दस्तावेज जल कर स्वाहा हो गए। 

वातानुकूलित ट्रेन
1873 से शुरू सेवा दिन प्रतिदिन बेहतर और आरामदायक होती गई और पिछले साल चर्चगेट को यादगार क्रिसमस गिफ्ट मिला। मुंबई उपनगरीय रेलसेवा में वातानुकूलित लोकल ट्रेन के रूप में एक नए युग का आरंभ हुआ। भाप इंजन वाले रैक से लेकर 25000 वोल्ट बिजली वाली 12 डिब्बे की एसी लोकल तक की उपनगरीय रेल की यात्रा में चर्चगेट का अहम किरदार रहा है। चर्चगेट के बारे में जानना बेहद रोचक और रोमांचक है।

रविवार, 31 दिसंबर 2017

कोलाबा रेलवे स्टेशन - 31 दिसंबर 1930 को रात 12 बजे बंद हुआ था

31 दिसंबर 1930 को रात 12 बजे बंद हुआ था कोलाबा रेलवे स्टेशन

पश्चिम रेलवे की लोकल गाड़ियों से यात्रा करने वाले लाखों यात्रियों को पता नहीं होगा कि क़रीब 87-88 साल पहले चर्चगेट पश्चिम रेलवे का अंतिम स्टेशन नहीं था। चर्चगेट से आगे भी एक स्टेशन थाजिसका नाम कोलाबा था। जिसे तत्कालीन द बॉम्बे, बड़ौदा एंड सेंट्रल इंडिया रेलवे (बीबी एंड सीआई रेलवे) ने 57 साल तक चलाकर सन् 1930 में आज ही के दिन रात 12 बजे बदे कर दिया।


आज जहां चर्चगेट रेलवे स्टेशन है, उसे पंद्रहवी सदी तक लिटिल कोलाबा या वूमन आईलैंड कहा जाता था। उसके दक्षिण में कोलाबा द्वीप था तो उत्तर में बॉम-बे (जिसे बाद में बॉम्बे कहा गया) था। 16 अप्रैल 1853 को बोरीबंदर और ठाणे के बीच मुंबई में एशिया की पहली रेलगाड़ी शुरू होने पर अंग्रेजों ने अरब सागर के समानांतर रेलसेवा शुरू करने का फैसला किया। इसी परिकल्पना के तहत 2 जुलाई 1855 को बीबी एंड सीआई रेलवे की स्थापना की गई।, जिसे आजकल पश्चिम रेलवे कहते हैं। इसके बाद कोलाबा से विरार तक रेल सेवा चलाने की संभावना पर विचार होने लगा। 1867 में ग्रांट रोड और मरीन लाइंस के पास बॉम्बे बैकबे रेलवे स्टेशन बनाया गया। बहराल, 12 अप्रैल, 1867 के दिन पश्चिम रेलवे की लोकल सेवा बॉम्बे बैकबे और विरार के बीच शुरू हो गई, लेकिन रेल सेवा को कोलाबा तक विस्तारित करने की योजना थी।


जैसा कि सर्वविदित है मुंबई पहले सात द्वीपों का समूह था। पांच द्वीपों बॉम्बे, मझगांवपरेलवर्ली और माहिम पहले समुद्र को पाटकर (रिक्लेम) आपस में मिला दिए। वूमैंन्स आइलैंड यानी छोटा कोलाबा बॉम्बे आईलैंड के बहुत पास थालेकिन सबसे दक्षिण का कोलाबा द्वीप पूरी तरह कटा हुआ था। केवल नाव से ही वहां जाया जा सकता था। 1835 में कोलाबा को छोटा कोलाबा और बॉम्बे द्वीप से काजवे से जोड़ा गया थाजिसे आजकल शहीद भगत सिंह मार्ग कहा जाता है। बहरहाल बैकबे रिक्लेमेशन कंपनी ने समुद्र को पाटकर पहले छोटा कोलाबा को बॉम्बे से जोड़ा और उसके बाद काजवे के आसपास के समुद्र को पाटकर समतल बना दिया। यह जमीन बीबी एंड सीआई रेलवे को दे दी गई। इसके बाद रिक्लेमेशन का काम युद्धस्तर पर होता रहा। रिक्लेमेशन का काम पूरा होने पर सरकार ने 1872 में लंबी जद्दोजहद के बाद बीबी एंड सीआई रेलवे (अब पश्चिम रेलवे) को ज़मीन दे दी। जैसे जैसे रेलवे को ज़मीन मिलती गई, रेलवे पटरी बिछाई जाती रही। एक साल के भीतर रेल पटरी बिछाने का काम पूरा करके 1873 में कोलाबा स्टेशन शुरू कर दिया गया। रेलवे लाइन को बैकबे बॉम्बे के आगे चर्चगेट होकर कोलाबा तक बढ़ा दिया गया इसके बाद एक्प्रेस, लोकल और माल गाड़ियां बॉम्बे बैकबे से आगे चर्चगेट होती हुई कोलाबा तक जाने लगी थीं। पहले का कोलाबा स्टेशन लकड़ी का अस्थाई शेड के रूप में बना था। 1996 में नया स्टेशन की नई इमारत बनाई गईतब तक रोजाना 24 ट्रेन चलाने लगी थीं इतना ही नहीं 19वी सदी के अंत से पहले कोलाबा रेलवे यार्ड भी बनाया गया था। जहां आजकल बधवार पार्क हैवहां पहले कोलाबा रेलवे स्टेशन का यार्ड था। 


इस बीच यह महसूस किया जाने लगा कि कोलाबा में ज़मीन नहीं रह गई है। लिहाज़ा, कॉटन डिपो को शिवड़ी में स्थानांतरित कर दिया गया। 18 दिसंबर 1930 को बंबई सेंट्रल स्टेशन अस्तित्व में आया। इसके बाद बहुत बड़ा फ़ैसला लेते हुए रेलवे ने बंबई सेंट्रल को एक्सप्रेस टर्मिनस और चर्चगेट को लोकल टर्मिनस बना दिया। 31 दिसंबर की रात कोलाबा से अंतिम ट्रेन बोरीवली के लिए रवाना हुई और उसके बाद कोलाबा स्टेशन इतिहास का हिस्सा बन गया।

   
कोलाबा को जानने के लिए बॉम्बे (अब मुंबई) का संक्षिप्त इतिहास भी जानना ज़रूरी है। दरअसल, यूं तो मुंबई का इतिहास पाषण काल (स्टोन एज) से शुरू होता है, जब इस भूभाग को हैप्टानेसिया कहा जाता था। कांदिवली के पास मिले प्राचीन अवशेष बताते हैं, कि यह द्वीप समूह पाषाण युग से बसा हुआ है। मानव आबादी के लिखित प्रमाण 250 ईसा पूर्व तक मिलते हैं। ईसा पूर्व तीसरी सदी में अशोक महान के शासन में यह भूभाग मौर्य साम्राज्य का हिस्सा था। वैसे इस पर सातवाहन साम्राज्य एवं इंडो-साइथियन वेस्टर्न सैट्रैप का भी नियंत्रण रहा। बाद में यहां 1343 तक हिंदू सिल्हारा वंश और 1534 तक गुजरात सल्तनत का शासन रहा। उनसे इस द्वीप समूह को पुर्तगालियों ने हथिया लिया और 1661 तक इस पर पुर्तगालियों का आधिपत्य रहा। इसी दौर में इस भूभाग को बॉम्बे नाम मिला। कान्हेरी, महाकाली एवं ऐलीफैंटा गुफाएं, वाल्केश्वर मंदिर, हाजी अली दरगाह, पुर्तगीज चर्च अशोक से पुर्तगाल के क़रीब 18 सौ से ज़्यादा के शासन के प्रमाण हैं।


बहरहाल, 1668 तक यह भूभाग सात द्वीपों कोलाबा (कोलाबा, कफपरेड, लिटिल कोलाबा (चर्चगेट, नरीमन पाइंट), बॉम्बे (डोंगरी, गिरगांव, चर्नीरोड, ग्रांट रोड, मलबार हिल, मुंबई सेंट्रल क्षेत्र) मझगांव (मझगांव, रे रोड,), परेल (लालबाग, भायखला) वर्ली (वर्ली, प्रभादेवी) और माहिम (सायन, माहिम, धारावी) के रूप में फैला था। इन शासकों द्वारा बनाए गए स्मारकों, मंदिरों, मस्जिदों और चर्च के अलावा बीरानगी ही थी। कहीम कोई विकास नहीं हुआ था। 1661 में पुर्तगाल ने राजकुमारी कैथरीन की चार्ल्स द्वितीय से शादी के बाद इस भूभाग को अंग्रेज़ों को दहेज के रूप में दे दिया। सन् 1668 के साल ने बॉम्बे की तकदीर बदल दी। उसी साल अंग्रज़ों बॉम्बे को 10 पाउंड के वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया। 1687 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना मुख्यालय सूरत से बॉम्बे स्थानांतरित कर दिया और ये बॉम्बे प्रेसीडेंसी का मुख्यालय बन गया। उसी समय धीरे-धीरे सातों द्वीपों को एक दूसरे से जोड़ने का उपक्रम शुरू हुआ जो सवा सौ साल तक चलता रहा। सातों द्वीपों को पूरी तरह तो नहीं, आंशिक तौर पर ज़रूर एक कर दिया गया। बाद में बड़े पैमाने पर सिविल कार्य हुए, जिनमें कोलाबा और छोटा कोलाबा को छोड़कर सभी द्वीपों को कनेक्ट करने की परियोजना मुख्य थी। इस परियोजना को हॉर्नबाय वेल्लार्ड कहा गया, जो 1845 में पूरी हुई। मुंबई अब विश्वस्तरीय कॉमर्शियल सिटी बनने की ओर अग्रसर थी।




मंगलवार, 12 दिसंबर 2017

कांग्रेस में जान फूंक सकते हैं राहुल गांधी

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुमकिन है आप इस हेडिंग को पढ़ कर हंस दें। यह आपका अधिकार है। किसी भी लेख को पढ़कर उस पर प्रतिक्रिया देने का नैसर्गिक अधिकार। वैसे कांग्रेस की कमान संभालने वाले राहुल गांधी के बारे में पिछले तीन-साढ़े तीन साल के दौरान नकारात्मक बातें बहुत ज़्यादा लिखी और बोली गईं। राहुल को अब भी ऐसा अरिपक्व नेता बताया जाता हैजो अपनी मां पर निर्भर रहा है। इस तरह की सामग्री जो लोग पढ़ते या सुनते रहे हैंउनके दिमाग़ में यह बात बैठ गई कि राहुल वाक़ई नकारा औलाद हैं। राहुल के बारे में हुई निगेटिव रिपोर्टिंग का नतीजा यह हुआ कि जो कभी उनसे नहीं मिलाया जो उन्हें जानता भी नहींवह भी मानता है कि राहुल गांधी-परिवार के अयोग्य उत्तराधिकारी हैं।

यक़ीन कीजिएयह सच निष्कर्ष बिल्कुल नहीं है। दरअसलयह निष्कर्ष नकारात्मक पब्लिसिटी पर आधारित है। सौ फ़ीसदी सच तो यह है कि अगर राहुल गांधी एकदम से सक्रिय हो जाएं और सार्वजनिक जीवन में अपने आपको उसी तरह समर्पित कर देंजिस तरह नरेंद्र मोदी ने 2013 में बीजेपी का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने के बाद अपने आपको पूरी तरह समर्पित कर दिया था। दिल्ली के सेंट कोलंबस स्कूल एवं दून स्कूलहावर्ड यूनिवर्सिटी के रोलिंस कॉलेज फ्लोरिडा से स्नातक और कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज से एमफिल करने वाले राहुल गांधी अगर कांग्रेस संगठन को पर्याप्त समय दें और गैरचुनावी मौसम में भी हर हफ्ते कम से कम देश के किसी भी कोने में रैली ज़रूर करते रहें तो वह निश्चित रूप से कांग्रेस में जान फूंक सकते हैं।

राहुल गांधी के पक्ष में यह बात जाती है कि उनमें विपक्षी नेता बनने के नैसर्गिक गुण हैं। सत्ता पक्ष में राहुल भले सफल नहीं हुएलेकिन विपक्ष में वह बेहद सफल हो सकते हैंक्योंकि उनका तेवर ही विपक्षी नेता का है यानी उनका नैसर्गिक टेस्ट सिस्टम विरोधी है। याद कीजिए2013 की घटना जब राहुल ने अजय माकन की प्रेस कांफ्रेंस में पहुंचकर सबके सामने अध्यादेश को फाड़ दिया था। वस्तुतः केंद्र ने भ्रष्टाचार में फंसे नेताओं के लिए चुनाव लड़ने का रास्ता खोलने के लिए अध्यादेश लाया थाक्योंकि लालू यादव और रशीद मसूद उसी समय जेल भेजे गए थे। तब राहुल ने कहा था कि अध्यादेश सरासर बकवास है और इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए'। राहुल के कृत्य को सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए सरकार की बेइज्जती माना गया था  हालांकि राहुल की इस मुद्दे पर तारीफ ही हुई थी।

दरअसलमनमोहन सरकार के दौर में अकसर राहुल ऐसे-ऐसे बयान देते रहते थेजिससे आम लोगों को भ्रम होता था कि कहीं वह सरकार के विरोधी यानी विपक्ष में तो नहीं हैं। इस तरह का प्योर सिस्टम-विरोधी नेता किसी भी पार्टी का एसेट होना चाहिए थालेकिन दिग्भ्रमित कांग्रेस के नेता राहुल को बोझ मानने लगे थे। राहुल जैसा नेता जो किसी भी विपक्षी पार्टी की पहली पसंद हो सकता थावही नेता कांग्रेस में इतने लंबे समय तक एकदम हाशिए पर रहा। खैर कांग्रेस ने बहुत देर से ही सही भूल सुधार कर लिया है और उसे उसका लाभ भी मिल सकता है।

वैसे कई लोगों का मानना है कि सोनिया गांधी ने राहुल को अध्यक्ष बनाने में बहुत देर कर दीलेकिन इन पंक्तियों का लेखक ऐसे लोगों से इत्तिफाक नहीं रखता। अभी इतनी देर नहीं हुई है कि जहां से वापसी न हो सके। फिलहाल इस देश में अच्छेकुछ गंभीर और थोड़ी जुमलेबाज़ी करने वाले विपक्षी नेता के लिए ज़बरदस्त स्कोप है। विपक्षी नेता विहीन हो चुके इस देश में राहुल ही इकलौते नेता हैंजो भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकते हैं और अगर जमकर मेहनत कीतो कांग्रेस को पुनर्जीवित भी कर सकते हैं।

इतना ही नहीं राहुल में वह भी मैटेरियल है जो उन्हें सीधे जनता से जोड़ता है. मसलन आम आगमी के घर जाकर उसका हालचाल पूछना। सांसद रहते हुए सन् 2008 में राहुल महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त यवतमाल जिले के जालका गांव पहुंच गए थे और आत्महत्या करने वाले किसान की विधवा कलावती से मिलकर उनका दुखदर्द सुना था। उन्होंने किसानों की आत्महत्या का दर्द समझाने के लिए कलावती का जिक्र संसद में किया। राहुल का वह भाषण भी लंबे समय तक मीडिया में चर्चा में रहा। राहुल के इस बयान के बाद पूरा देश कलावती को जान गया। राहुल ने इस तरह के वाहवाही बटोरने वाले कई दौरे किए। इस तरह की खूबी बहुत कम नेताओं में होती है। राहुल के पिता राजीव गांधी में यह ख़ूबी कूट-कूट कर भरी थी।

राहुल गांधी के संसद या संसद से बाहर दिए गए भाषणों पर अगर गौर करें तो पाएंगे कि वह भी लिखा हुआ भाषण नहीं पढ़ते। यानी लोगों को संबोधित करने की नैसर्गिक परिपक्वता उनमें आ गई हैजो किसी बड़े नेता के लिए बहुत ज़रूरी है। राहुल ने कुछ साल पहले कई न्यूज़ चैनलों को इंटरव्यू भी दिया थाजिसमें उन्होंने परिपक्व नेता की तरह बड़ी बेबाकी से हर मुद्दे पर अपना विचार रखा था। इसका मतलब यह कि राहुल का होमवर्क ठीकठाक ही नहींदेश के कई प्रमुख नेताओं के मुक़ाबले बहुत ही अच्छा है। एकाध फ्लंबिंग को छोड़ देंतो कम से कम वह बोलते समय ब्लंडर नहीं करते और जेंटलमैन की तरह अपनी बात रखते हैं। वह जब भी बोलते हैंअच्छा बोलते हैं। भाषण भी अच्छा और प्रभावशाली देते हैं। लोकसभा में कई बार उन्होंने यादगार भाषण दिया भी है।

ऐसे में लोगख़ासकर राजनीतिक टीकाकारअकसर हैरान होते हैं कि कांग्रेस अपने इस अतिलोकप्रिय नेता के पर्फॉरमेंस को लेकर इतने दिन तक आख़िर आश्वस्त क्यों नहीं रहीपार्टी अपने इस फायरब्रांड नेता को लेकर शुरू से ही असमंजस में क्यों रहीउन्हें आगे करने में अनावश्यक हिचकिचाहट क्यों दिखाती रहीख़ासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले उन्हें फ्रंट पर खड़ा करने में। वैसे 19 जून 1970 को जन्मे राहुल गांधी अब बच्चे या युवा नहीं रहेवह 47 साल के हो गए हैं। इस उम्र में तो उनके पिता राजीव गांधी प्रधानमंत्री के रूप में अपना कार्यकाल भी पूरा कर चुके थे। बहरहालराहुल 2004 से अपने माता-पिता और चाचा संजय गांधी के संसदीय क्षेत्र उत्तर प्रदेश अमेठी से लगातार तीसरी बार लोकसभा के सदस्य हैं।

राहुल गांधी के पक्ष में एक और बात जाती है कि वह गांधी वंशवाद के प्रतिनिधि हैं। 38 साल तक देश को प्रधानमंत्री देने वाले नेहरू-गांधी खानदान के वह पुरुष वारिस हैं। भारत के लोग वंशवाद पर भी फिदा रहते हैं। मुलायम सिंह यादवलालूप्रसाद यादवरामविलास पासवानशरद पवारबाल ठाकरेमुंडेसिंधिया परिवारअब्दुल्ला और सोरेन फैमिली,पटनायक और करुणानिधि परिवार जनता की इसी मानसिकता के कारण फलते फूलते रहे हैं। ये नेता जनता की इसी कमज़ोरी को भुनाकर अपने परिवार के लोगों को संसद और विधानसभाओं में भेजते रहे हैं। दरअसलसदियों से खानदानी हिंदू राजाओं या मुस्लिम शासकों के शासन में सांस लेने के कारण यहां की जनता ग़ुलाम मानसिकता की हो गई है। इस मूढ़ जनता को वंशवाद शासन बहुत भाता है। लिहाज़ाइस तरह की भावुक जनता के लिए राहुल गांधी सबसे फिट नेता हैं।

दरअसलसोनिया गांधी और राजीव गांधी का पुत्र होने के नाते भी राहुल को फ्रंट पर रहना चाहिए था। लेकिन ऐसा लगता हैकांग्रेस में एक ऐसा खेमा भी रहा हैजो नहीं चाहता था कि राहुल जैसा बेबाक बोलने वाला नेता पार्टी में फ्रंट पर आए और उन लोगों की जमी जमाई दुकानदारी ही चौपट कर दे। लिहाज़ायह खेमा 10 जनपथ को सलाह देता रहा कि राहुल अभी परिपक्व नहीं हुए हैंलिहाज़ा अभी उन्हें बड़ी ज़िम्मदारी देने का सही समंय नहीं आया है। इसी बिना पर राहुल को मई 2014 में 44 सांसदों के बावजूद लोकसभा में कांग्रेस का नेता नहीं बनाया। उनकी जगह क़ायदे से हिंदी न बोल पाने वाले कर्नाटक के मल्लिकार्जुन खरगे को लोकसभा में नेता बना दिया। यह कांग्रेस का ब्लंडर थाउसे राहुल को कांग्रेस का नेता बनाना चाहिए थाताकि वह भविष्य में देश का नेतृत्व करने के लिए तैयार होते। लेकिन पार्टी ने वह मौक़ा गंवा दिया था।

अगर कहें कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक दल कांग्रेस की कमान संभालने वाले राहुल गांधी अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह अच्छी जुमलेबाज़ी करने लगे हैंतो कोई अतिशयोक्ति या हैरानी नहीं होनी चाहिए। अभी गुजरात विधान सभा चुनाव में उन्होंने जीएसटी को 'गब्बर सिंह टैक्सकहा। इस तरह की जुमलेबाज़ी अब तक नरेंद्र मोदी ही करते आए हैं। मोदी के जुमले पर तो इस देश की जनता आज भी फिदा है। आजकल राहुल भी उसी तरह की जुमलेबाज़ी करने लगे हैंजिस तरह की जुमलेबाज़ी से जनता मंत्रमुग्ध होती रही है। यानी जुमलेबाज़ी के मुद्दे पर भी राहुल मोदी के सामने गंभीर चुनौती पेश करते हैं।

एक बात औरसत्तारूढ़ बीजेपी भली-भांति जानती हैकि राष्ट्रीय स्तर पर उसे मुलायम-लालूपटनायक-नायडूममता-मायावती से कोई ख़तरा नहीं। भगवा पार्टी को ख़तरा केवल राहुल गांधी से है। अगर भविष्य में नरेंद्र मोदी को चुनौती मिली तो राहुल से ही मिलेगी। इसीलिए मोदी समर्थकों के निशाने पर सबसे ज़्यादा राहुल गांधी ही रहते हैं। राहुल को उपहास का पात्र बनाने का कोई मौक़ा मोदी के समर्थक नहीं चूकते। फेसबुकट्विटर और व्हासअप जैसे सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर राहुल के बारे में थोक के भाव में चुटकुले रचे जाते हैं और यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि राहुल नरेंद्र मोदी के मुक़ाबले कहीं नहीं ठहरते हैजबकि हक़ीकत है कि राहुल गांधी बहुत उदार और जेंटलमैन हैं और सबको लेकर चलने वाले नेता हैं। इसके बावजूद लंबे समय तक राहुल कांग्रेस में फ्रंट पर नहीं रहेयह यह कांग्रेस का दुर्भाग्य था। बहरहाल अब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। इसका मतलब यह भी हुआ कि 2019 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी होगाक्योंकि अभी दो महीने पहले राहुल ने यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्नियाबर्कले में पहली बार सार्वजनिक तौर पर कहा था कि पार्टी अगर उन्हें जिम्मेदारी देगी तो वह प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनेंगे।

बुधवार, 15 नवंबर 2017

क्या नाइंसाफ़ी हुई थी नाथूराम गोडसे के साथ?



हरिगोविंद विश्वकर्मा

आजकल राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी की हत्या का प्रकरण एक बार फिर से चर्चा में हैं। अभिनव भारत के एक कार्यकर्ता ने महात्मा गांधी हत्याकांड को रिओपन करने की मांग की है, हालांकि महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी इसका विरोध कर रहे हैं। इस बीच एक सवाल यह भी है कि क्या बीसवीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना से भी बड़ा खलनायक करार दिए गए महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे और कथित तौर पर उनका साथ देने वाले उनके मित्र नारायण आपटे के साथ न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की तरफ़ से गहरी नाइंसाफी हुई थी?

अगर नाथूराम और नारायण के साथ वाक़ई नाइंसाफी हुई तो कह सकते हैं कि आज का दिन शोक का दिन है। हरियाणा के अंबाला में आज यानी 15 नवंबर 1949 को ग़म का माहौल था। सारा शहर शोक के सागर में डूबा था। आज ही के दिन सुबह आठ बजे नाथूराम और नारायण को फ़ांसी की सज़ा दी गई थी। फ़ांसी के विरोध में पूरे शहर के दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद रखीं। गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को शाम पांच बजकर सत्रह मिनट पर हुई थी और हत्या के 645 दिन बाद यानी एक साल 10 महीने और 15 दिन में ही दोनों आरोपियों को फ़ांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

भारतीय न्यायालय ने गांधी हत्याकांड से जुड़े मुक़दमे में जितनी तेज़ी दिखाई, वैसी मिसाल भारतीय न्यायपालिका के पूरे इतिहास में देखने को नहीं मिलती। इस पूरे प्रकरण का जो भी निष्पक्षता से और विचारपूर्वक अध्ययन करेगा, उसे निश्चित रूप से संदेह होगा है कि संभवतः भारतीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों - न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका - ने 30 जनवरी 1948 को ही तय कर लिया था कि महात्मा गांधी की जान लेने वाले अपराधियों को जितने जल्दी हो सके फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। यानी इन तीनों स्तंभों ने उस दिन साज़िश रची थी कि हत्यारे को मृत्युदंड से कम सज़ा नहीं देनी है और जल्दी से जल्दी देनी है। वरना निचली अदालत, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय (तब प्रिवी काउंसिल थी क्योंकि तब तक सुप्रीम कोर्ट का गठन नहीं हुआ था) ने डेढ़ साल से भी कम समय में फ़ांसी की सज़ा को अंतिम स्वीकृति दे दी।

गौरतलब है कि नाथूराम गोडसे ने पहले दिन ही कह दिया था कि उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या की है, एक इंसान की जान ली है, इसलिए उन्हें दंडस्वरूप  फ़ांसी ही मिलनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने अपनी सज़ा के ख़िलाफ हाई कोर्ट में अपील न करने का फ़ैसला किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि गांधी की हत्या का काम उन्होंने अकेले किया है, इसलिए उनके अपराध का दंड उनसे जुड़े दूसरे लोगों को नहीं मिलना चाहिए। इसीलिए जब जुलाई में प्रिवी काउंसिल ने बाकी आरोपियों की अपील को अस्वीकार कर दिया तब उसके सप्ताह भर के भीतर नाथूराम और नारायण आपटे को 15 नवंबर 1949 को फ़ांसी देने की तारीख़ मुकर्रर कर दी गई। तमाम जन भावना की अनदेखी करते हुए 15 नवंबर 1949 को अंबाला कारागार में नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे को फ़ांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

दरअसल, गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या नई दिल्ली के बिड़ला हाउस परिसर में 30 जनवरी 1948 को शाम पांच बजकर सत्रह मिनट पर की थी। पेट्रोलिंग कर रहे तुगलक रोड थाने के इंस्पेक्टर दसौंधा सिंह और पार्लियामेंट थाने के डीएसपी जसवंत सिंह 5.22 बजे बिड़ला हाउस गेट पर पहुंचे। वहां अफरा-तफरी का माहौल था। गांधी के अनुयायी रो रहे थे। पुलिस वालों को पता चला किसी ने गांधीजी को गोली मार दी और ख़ुद को स्वेच्छा से जनता के हवाले कर दिया। गांधी को गोली मारने के बाद अपराधी व्दारा ख़ुद को जनता के हवाले करने की बात सुनकर पुलिस हैरान हुई। बहरहाल, तब तक गांधीजी का शव अंदर ले जाया जा चुका था। लिहाजा, दसौंधा सिंह और कुछ पुलिस वाले जसवंत सिंह के आदेश पर नाथूराम को तुगलक रोड थाने ले गए। रात को क़रीब पौने दस बजे बापू की हत्या की एफ़आईआर लिखी गई। इसे लिखा था थाने के दीवान-मुंशी दीवान डालू राम ने। उस वक्त थाने में दिल्ली के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस डीवी संजीवी और डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल डीडब्ल्यू मेहता भी मौजूद थे। इसके बाद नाथूराम औपचारिक रूप से अंडर अरेस्ट हो गए।

दिल्ली पुलिस की प्रताड़ना और डर के चलते दिगंबर बड़गे सरकारी गवाह बन गया। कहा जाता है कि वह बहुत कपटी स्वभाव का था भी। बहरहाल, अंततः महात्मा गांधी हत्याकांड की सुनवाई 27 मई 1949 को शुरू हुई। उसी दिन सभी 9 आरोपियों को लाल किला में बनाई गई विशेष अदालत में लाया गया और दिल्ली पुलिस ने हत्याकांड की जांच करके 8 आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाखिल किया। 21 जून को सभी पर आरोप तय कर दिए गए और अदालत की कार्यवाही शुरू हुई।

10 फरवरी 1949 को विशेष न्यायालय के न्यायाधीश आत्माचरण ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे उर्फ नाना को फ़ांसी की सज़ा और पांच आरोपियों विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे, शंकर किस्तैया और डॉ. दत्तात्रय परचुरे को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। यानी हत्या के एक साल 11 दिन बाद सज़ा हो गई। इस केस में अदालत ने विनायक दामोदर सावरकर को सबूत के अभाव में रिहा कर दिया और एक अन्य आरोपी दिगंबर बड़गे सरकारी गवाह बन गया था।

ईस्ट पंजाब हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अमरनाथ भंडारी, जस्टिस अच्छरूराम और जस्टिस गोपालदास खोसला की पूर्ण पीठ ने 23 मई 1949 को सुनवाई शुरू की। हाईकोर्ट ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे की फ़ांसी की सज़ा और विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे और शंकर किस्तैया की उम्र क़ैद  की सज़ा को बरकरार रखा और डॉ. दत्तात्रय परचुरे को रिहा कर दिया। सबसे अहम् बात हाई कोर्ट का फ़ैसला 22 जून 1949 को यानी एक महीने से एक दिन कम में ही आ गया।

दरअसल, नाथूराम और नारायण को हत्या के दो साल से भी कम समय में फ़ांसी दे दी गई। जबकि आज के दौर में हत्या की वारदात के 15-15 साल ही नहीं 20-20 साल और कहीं कहीं 25 साल तक फांसी की सज़ा पाए आरोपी को मृत्युदंड नहीं दिया जाता। अभी तीन साल पहले पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की सज़ा सुप्रीम कोर्ट ने इसलिए उम्रक़ैद में बदल दी क्योंकि उसकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में राष्ट्रपति ने कुछ ज़्यादा देरी कर दी। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि मृत्युदंड पाए अपराधियों की दया याचिका पर अनिश्चितकाल की देरी नहीं की जा सकती और देरी किए जाने की स्थिति में उनकी सजा को कम किया जा सकता है। इसी बिना पर 2013 में देश की सबसे बड़ी अदालत ने 22 पुलिसवालों की लैंड माइन ब्लास्ट कर हत्या करने वाले  चंदन तस्कर वीरप्पन के 15 सहयोगियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने का आदेश दिया। इसी तरह 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तानी आतंकी देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भुल्लर की फांसी माफी की याचिका स्वीकार की जा सकती है। दया याचिका निपटाने में देरी के आधार पर फांसी पाने वाले अपराधी को माफ़ी की मांग करने का हक देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मसले पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।

भारत में पिछले 70 साल के दौरान अधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद अब तक केवल 52 लोगों को फांसी की सजा दी गई है। हालांकि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के अनुसार भारत में 1947 से अब तक कुल 755 लोगों की मृत्युदंड की सज़ा पर अमल किया गया है। वैसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज अपने एक शोध में दावा करता है कि देश में फ़ांसी पर लटकाए गए लोगों की संख्या इन आंकड़ो से भी ज़्यादा है। पीयूसीएल के अनुसार केवल 1953 से 1963 के बीच यह संख्या 1422 है। बहरहाल, यह भी ग़ौरतलब है कि आज़ाद भारत में फ़ांसी पर लटकाए जाने वाले नाथूराम पहले अपराधी थे।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के ही शोध के अनुसार भारत में सन् 2000 से अब तक निचली अदालतें कुल 1617 क़ैदियों को मौत की सज़ा सुना चुकी हैं, जिनमें से केवल 71 क़ैदियों को मृत्युदंड की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट व्दारा की गई है। पिछले दो दशक से तो भारत में फ़ांसी की सज़ा पर एक तरह से अमल ही नहीं हो रहा है, क्योंकि ख़ुद सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के बाद 5 अपराधियों को मौत की सज़ा दी है। इस सहस्त्राब्दि में तो केवल 4 लोगों को फांसी हुई, उनमें 3 मोहम्मद अजमक कसाब (21 नवंबर 2012, पुणे की यरवदा जेल), मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु (9 फरवरी 2013, तिहाड़ा जेल) और याक़ूब मेमन (30 जुलाई 2015, नागपुर सेंट्रल जेल) तो आतंकवादी गतिविधियों में दोषी पाए गए थे। इससे पहले धनंजय चटर्जी को एक बच्ची से बलात्कार करके उसकी हत्या करने के अपराधी में 14 अगस्त 2004 को कोलकाता के अलीपुर जेल में फ़ांसी दे दी गई थी।

निचली अदालत ने मुकेश, पवन, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था। इस साल 5 मई को सुप्रीम कोर्ट  भी उस सज़ा पर अपनी मुहर लगा चुका है। उस फ़ैसले को छह महीने से ज़्यादा बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक अपराधी ज़िंदा हैं। 
कहने का मतलब भारतीय न्यायपालिका शुरू से लचर रही है। कोई भी केस हो, उसे टालने की परंपरा रही है। ऐसे में किसी किसी एक केस में अदालतों के साथ पूरे सिस्टम का कुछ ज़्यादा सक्रिय होकर आनन-फानन में फ़ैसला देना मन में संदेह पैदा करता है।