बुधवार, 15 नवंबर 2017

क्या नाइंसाफ़ी हुई थी नाथूराम गोडसे के साथ?



हरिगोविंद विश्वकर्मा

आजकल राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी की हत्या का प्रकरण एक बार फिर से चर्चा में हैं। अभिनव भारत के एक कार्यकर्ता ने महात्मा गांधी हत्याकांड को रिओपन करने की मांग की है, हालांकि महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी इसका विरोध कर रहे हैं। इस बीच एक सवाल यह भी है कि क्या बीसवीं सदी में मोहम्मद अली जिन्ना से भी बड़ा खलनायक करार दिए गए महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे और कथित तौर पर उनका साथ देने वाले उनके मित्र नारायण आपटे के साथ न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका की तरफ़ से गहरी नाइंसाफी हुई थी?

अगर नाथूराम और नारायण के साथ वाक़ई नाइंसाफी हुई तो कह सकते हैं कि आज का दिन शोक का दिन है। हरियाणा के अंबाला में आज यानी 15 नवंबर 1949 को ग़म का माहौल था। सारा शहर शोक के सागर में डूबा था। आज ही के दिन सुबह आठ बजे नाथूराम और नारायण को फ़ांसी की सज़ा दी गई थी। फ़ांसी के विरोध में पूरे शहर के दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद रखीं। गांधी की हत्या 30 जनवरी 1948 को शाम पांच बजकर सत्रह मिनट पर हुई थी और हत्या के 645 दिन बाद यानी एक साल 10 महीने और 15 दिन में ही दोनों आरोपियों को फ़ांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

भारतीय न्यायालय ने गांधी हत्याकांड से जुड़े मुक़दमे में जितनी तेज़ी दिखाई, वैसी मिसाल भारतीय न्यायपालिका के पूरे इतिहास में देखने को नहीं मिलती। इस पूरे प्रकरण का जो भी निष्पक्षता से और विचारपूर्वक अध्ययन करेगा, उसे निश्चित रूप से संदेह होगा है कि संभवतः भारतीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों - न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका - ने 30 जनवरी 1948 को ही तय कर लिया था कि महात्मा गांधी की जान लेने वाले अपराधियों को जितने जल्दी हो सके फांसी पर लटका दिया जाना चाहिए। यानी इन तीनों स्तंभों ने उस दिन साज़िश रची थी कि हत्यारे को मृत्युदंड से कम सज़ा नहीं देनी है और जल्दी से जल्दी देनी है। वरना निचली अदालत, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय (तब प्रिवी काउंसिल थी क्योंकि तब तक सुप्रीम कोर्ट का गठन नहीं हुआ था) ने डेढ़ साल से भी कम समय में फ़ांसी की सज़ा को अंतिम स्वीकृति दे दी।

गौरतलब है कि नाथूराम गोडसे ने पहले दिन ही कह दिया था कि उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या की है, एक इंसान की जान ली है, इसलिए उन्हें दंडस्वरूप  फ़ांसी ही मिलनी चाहिए। इसीलिए उन्होंने अपनी सज़ा के ख़िलाफ हाई कोर्ट में अपील न करने का फ़ैसला किया था। उन्होंने यह भी कहा था कि गांधी की हत्या का काम उन्होंने अकेले किया है, इसलिए उनके अपराध का दंड उनसे जुड़े दूसरे लोगों को नहीं मिलना चाहिए। इसीलिए जब जुलाई में प्रिवी काउंसिल ने बाकी आरोपियों की अपील को अस्वीकार कर दिया तब उसके सप्ताह भर के भीतर नाथूराम और नारायण आपटे को 15 नवंबर 1949 को फ़ांसी देने की तारीख़ मुकर्रर कर दी गई। तमाम जन भावना की अनदेखी करते हुए 15 नवंबर 1949 को अंबाला कारागार में नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे को फ़ांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

दरअसल, गोडसे ने महात्मा गांधी की हत्या नई दिल्ली के बिड़ला हाउस परिसर में 30 जनवरी 1948 को शाम पांच बजकर सत्रह मिनट पर की थी। पेट्रोलिंग कर रहे तुगलक रोड थाने के इंस्पेक्टर दसौंधा सिंह और पार्लियामेंट थाने के डीएसपी जसवंत सिंह 5.22 बजे बिड़ला हाउस गेट पर पहुंचे। वहां अफरा-तफरी का माहौल था। गांधी के अनुयायी रो रहे थे। पुलिस वालों को पता चला किसी ने गांधीजी को गोली मार दी और ख़ुद को स्वेच्छा से जनता के हवाले कर दिया। गांधी को गोली मारने के बाद अपराधी व्दारा ख़ुद को जनता के हवाले करने की बात सुनकर पुलिस हैरान हुई। बहरहाल, तब तक गांधीजी का शव अंदर ले जाया जा चुका था। लिहाजा, दसौंधा सिंह और कुछ पुलिस वाले जसवंत सिंह के आदेश पर नाथूराम को तुगलक रोड थाने ले गए। रात को क़रीब पौने दस बजे बापू की हत्या की एफ़आईआर लिखी गई। इसे लिखा था थाने के दीवान-मुंशी दीवान डालू राम ने। उस वक्त थाने में दिल्ली के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ पुलिस डीवी संजीवी और डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल डीडब्ल्यू मेहता भी मौजूद थे। इसके बाद नाथूराम औपचारिक रूप से अंडर अरेस्ट हो गए।

दिल्ली पुलिस की प्रताड़ना और डर के चलते दिगंबर बड़गे सरकारी गवाह बन गया। कहा जाता है कि वह बहुत कपटी स्वभाव का था भी। बहरहाल, अंततः महात्मा गांधी हत्याकांड की सुनवाई 27 मई 1949 को शुरू हुई। उसी दिन सभी 9 आरोपियों को लाल किला में बनाई गई विशेष अदालत में लाया गया और दिल्ली पुलिस ने हत्याकांड की जांच करके 8 आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाखिल किया। 21 जून को सभी पर आरोप तय कर दिए गए और अदालत की कार्यवाही शुरू हुई।

10 फरवरी 1949 को विशेष न्यायालय के न्यायाधीश आत्माचरण ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे उर्फ नाना को फ़ांसी की सज़ा और पांच आरोपियों विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे, शंकर किस्तैया और डॉ. दत्तात्रय परचुरे को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। यानी हत्या के एक साल 11 दिन बाद सज़ा हो गई। इस केस में अदालत ने विनायक दामोदर सावरकर को सबूत के अभाव में रिहा कर दिया और एक अन्य आरोपी दिगंबर बड़गे सरकारी गवाह बन गया था।

ईस्ट पंजाब हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस अमरनाथ भंडारी, जस्टिस अच्छरूराम और जस्टिस गोपालदास खोसला की पूर्ण पीठ ने 23 मई 1949 को सुनवाई शुरू की। हाईकोर्ट ने नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे की फ़ांसी की सज़ा और विष्णु करकरे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे और शंकर किस्तैया की उम्र क़ैद  की सज़ा को बरकरार रखा और डॉ. दत्तात्रय परचुरे को रिहा कर दिया। सबसे अहम् बात हाई कोर्ट का फ़ैसला 22 जून 1949 को यानी एक महीने से एक दिन कम में ही आ गया।

दरअसल, नाथूराम और नारायण को हत्या के दो साल से भी कम समय में फ़ांसी दे दी गई। जबकि आज के दौर में हत्या की वारदात के 15-15 साल ही नहीं 20-20 साल और कहीं कहीं 25 साल तक फांसी की सज़ा पाए आरोपी को मृत्युदंड नहीं दिया जाता। अभी तीन साल पहले पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के हत्यारे बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की सज़ा सुप्रीम कोर्ट ने इसलिए उम्रक़ैद में बदल दी क्योंकि उसकी दया याचिका पर फ़ैसला लेने में राष्ट्रपति ने कुछ ज़्यादा देरी कर दी। सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि मृत्युदंड पाए अपराधियों की दया याचिका पर अनिश्चितकाल की देरी नहीं की जा सकती और देरी किए जाने की स्थिति में उनकी सजा को कम किया जा सकता है। इसी बिना पर 2013 में देश की सबसे बड़ी अदालत ने 22 पुलिसवालों की लैंड माइन ब्लास्ट कर हत्या करने वाले  चंदन तस्कर वीरप्पन के 15 सहयोगियों की फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील करने का आदेश दिया। इसी तरह 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने खालिस्तानी आतंकी देवेंद्र पाल सिंह भुल्लर की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। सुप्रीम कोर्ट में कहा कि भुल्लर की फांसी माफी की याचिका स्वीकार की जा सकती है। दया याचिका निपटाने में देरी के आधार पर फांसी पाने वाले अपराधी को माफ़ी की मांग करने का हक देने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद इस मसले पर बहस की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।

भारत में पिछले 70 साल के दौरान अधिकारिक सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद अब तक केवल 52 लोगों को फांसी की सजा दी गई है। हालांकि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी दिल्ली के अनुसार भारत में 1947 से अब तक कुल 755 लोगों की मृत्युदंड की सज़ा पर अमल किया गया है। वैसे पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज अपने एक शोध में दावा करता है कि देश में फ़ांसी पर लटकाए गए लोगों की संख्या इन आंकड़ो से भी ज़्यादा है। पीयूसीएल के अनुसार केवल 1953 से 1963 के बीच यह संख्या 1422 है। बहरहाल, यह भी ग़ौरतलब है कि आज़ाद भारत में फ़ांसी पर लटकाए जाने वाले नाथूराम पहले अपराधी थे।

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली के ही शोध के अनुसार भारत में सन् 2000 से अब तक निचली अदालतें कुल 1617 क़ैदियों को मौत की सज़ा सुना चुकी हैं, जिनमें से केवल 71 क़ैदियों को मृत्युदंड की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट व्दारा की गई है। पिछले दो दशक से तो भारत में फ़ांसी की सज़ा पर एक तरह से अमल ही नहीं हो रहा है, क्योंकि ख़ुद सुप्रीम कोर्ट ने 1995 के बाद 5 अपराधियों को मौत की सज़ा दी है। इस सहस्त्राब्दि में तो केवल 4 लोगों को फांसी हुई, उनमें 3 मोहम्मद अजमक कसाब (21 नवंबर 2012, पुणे की यरवदा जेल), मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु (9 फरवरी 2013, तिहाड़ा जेल) और याक़ूब मेमन (30 जुलाई 2015, नागपुर सेंट्रल जेल) तो आतंकवादी गतिविधियों में दोषी पाए गए थे। इससे पहले धनंजय चटर्जी को एक बच्ची से बलात्कार करके उसकी हत्या करने के अपराधी में 14 अगस्त 2004 को कोलकाता के अलीपुर जेल में फ़ांसी दे दी गई थी।

निचली अदालत ने मुकेश, पवन, विनय शर्मा और अक्षय कुमार सिंह को मौत की सज़ा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने बरकरार रखा था। इस साल 5 मई को सुप्रीम कोर्ट  भी उस सज़ा पर अपनी मुहर लगा चुका है। उस फ़ैसले को छह महीने से ज़्यादा बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक अपराधी ज़िंदा हैं। 
कहने का मतलब भारतीय न्यायपालिका शुरू से लचर रही है। कोई भी केस हो, उसे टालने की परंपरा रही है। ऐसे में किसी किसी एक केस में अदालतों के साथ पूरे सिस्टम का कुछ ज़्यादा सक्रिय होकर आनन-फानन में फ़ैसला देना मन में संदेह पैदा करता है।

रविवार, 5 नवंबर 2017

दस्तावेज - मोहम्मद अली जिन्ना का तन कराची और मन मुंबई में था

हरिगोविंद विश्वकर्मा
पाकिस्तान के संस्थापक और क़ायद-ए-आज़म मोहम्मद अली जिन्ना भले ही वहां हीरो हों, लेकिन भारत में आज भी इतिहास के सबसे बड़े खलनायक माने जाते हैं। आम भारतीय उनसे बहुत ज़्यादा नफ़रत करता है और देश के विभाजन के लिए केवल और केवल उन्हीं को ज़िम्मेदार मानता है। इसीलिए जब भी कोई जिन्ना के बारे में सकारात्मक बातें करता है तो सबकी भृकुटी तन जाती है। पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जब 2005 में जिन्ना को सेक्यूलर कह दिया तो पूरे देश में उनकी आलोचना हुई। उनको केवल अपना बयान ही वापस नहीं लेना पड़ा था, बल्कि बीजेपी अध्यक्ष का पद भी छोड़ना पड़ा था।

यह जिन्ना के प्रति लोगों के नफ़रत का ही परिणाम है कि आजकल जिन्ना के मुंबई आवास जिसे 'जिन्ना हाउस' और 'साउथ कोर्ट' कहा जाता है, को तोड़ने की बातें हो रही हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच कड़वे रिश्तों के मौजूदा दौर में लोगों को यह जानकर हैरानी होगी कि जिन्ना मुंबई से बेइंतहां प्यार करते थे और मुंबई में ही रहना चाहते थे। पाकिस्तान के निर्माण के बाद कराची जाते समय वह सामान यहीं छोड़ गए। वह देश के बंटवारे के कुछ अरसा बाद तक यही सोच रहे थे कि दोनों देशों के बीच रिश्ते बेहतर होंगे और उनका मुंबई आना-जाना लगा रहेगा और वह अपने शानदार बंगले में आकर सुकून से रहा करेंगे। कई इतिहासकार कहते हैं कि इसीलिए वह कराची जाते समय मुंबई का अपना मकान पूरी तरह खाली करके नहीं गये थे। यह भी विडंबना ही है कि जिन्ना की एकमात्र संतान दीना ने पाकिस्तान बनने के बाद पिता के साथ पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था। जिन्ना की प्रिय पत्नी रुतिन की मज़ार मुंबई में ही है। पाकिस्तान जाने से पूर्व जिन्ना ने मुंबई में उस कब्र पर अपना अंतिम गुलदस्ता रखा और हमेशा के लिए भारत छोड़कर चले गये।

प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना के क़रीबी रहे पाकिस्तान में भारत के पहले हाई कमिश्नर श्री श्रीप्रकाश ने, ‘हिंदुस्तान टाइम्समें अर्ली मेमरीज़ ऑफ पाकिस्तानसे एक लेखमाला लिखी थी जिसमें गवर्नर जनरल के रूप में जिन्नालेख (23 अप्रैल 1963 अंक) में उन्होंने बंबई के जिन्ना हाउसप्रकरण का जिक्र किया था। उस प्रसंग का यहां जिक्र करना समीचीन होगा। एक बार नेहरू ने पाकिस्तान में भारतीय हाई कमिश्नर श्रीप्रकाश को फोन करके उनसे कहा कि जिन्ना हाउसभारत सरकार के लिए परेशानी का सबब बन रहा है। जिन्ना से मिलकर पूछिए कि उनकी क्या इच्छा है और वह कितना किराया चाहते हैं। नेहरू का संदेश सुनकर जिन्ना ने करीब-करीब चिरौरी करते हुए कहा – “श्रीप्रकाश, मेरा दिल न तोड़ो, जवाहरलाल को कहो मेरा दिल न तोड़ें। मैंने इस मकान को एक-एक ईंट जोड़कर बनवाया है। इसके बरामदे कितने शानदार हैं। यह एक छोटा-सा मकान है जो किसी यूरोपियन परिवार या सुरुचिसंपन्न हिंदुस्तानी प्रिंस के रहने लायक है। आप नहीं जानते मैं मुंबई को कितना चाहता हूं। मैं अभी भी वहां वापस जाने की बाट जोह रहा हूं।श्रीप्रकाश ने कहा – “सच, मिस्टर जिन्ना, आप मुंबई जाना चाहते हैं। मैं जानता हूं कि मुंबई आपकी कितनी देनदार है और आपने इस शहर की कितनी सेवा की है। क्या मैं प्रधानमंत्री को यह बताऊं कि आप वहां वापस जाना चाहते हैं।जिन्ना ने जवाब दिया – “हां आप कह सकते हैं।


अपने संदेश में श्रीप्रकाश ने जिन्ना के जवाब से नेहरू को अवगत कराया। इसके बाद केंद्र सरकार ने जिन्ना हाउसको शत्रु संपत्ति घोषित नहीं किया। कुछ माह बाद, श्रीप्रकाश को नेहरू का एक ज़रूरी टेलीफोन संदेश आया जिसमें उन्होंने कहा कि मकान को अछूता छोड़ देने पर सरकार को लोगों की तीखी आलोचना सहनी पड़ रही है। सरकार अब और अधिक समय तक इसे सह नहीं सकती। इस मकान का अधिग्रहण करना ही होगा। नेहरू चाहते थे कि जिन्ना को इसकी सूचना दे दी जाए और उनसे पूछ लिया जाये कि वह मकान का कितना किराया लेना चाहेंगे। उन दिनों जिन्ना की तबीयत ठीक नहीं थी। वह बलूचिस्तान की राजधानी क्वेटा के पास हिल स्टेशन जियारत में स्वास्थ लाभ कर रहे थे। श्रीप्रकाश ने उन्हें तत्काल चिट्ठी भेजी, जिसके जवाब में जिन्ना ने लिखा कि उन्हें 3000 रुपए मासिक किराए की पेशकश की गयी है। उन्हें उम्मीद है कि किरायेदार के रूप में उनकी भावनाओं का ख्याल रखा जाएगा। मकान ब्रिटिश डिप्टी हाई कमिश्नर को किराये पर दे दिया गया। उनका छोटा सा परिवार था। इसके साथ यह भी तय हुआ कि जब कभी जिन्ना अपने निजी उपयोग के लिए चाहेंगे किराएदार तुरंत मकान खाली कर देगा। श्रीप्रकाश के अनुसार उन्हें यह जानकर बड़ा विचित्र लगा कि जिन्ना ने अपना मकान किसी यूरोपियन या हिंदुस्तानी राजकुमार को देना पसंद किया, लेकिन मुंबई के मुसलमानों को देने का विचार भी नहीं किया। दरअसल, जिन्ना हिंदुस्तानी मुसलमानों ख़ासकर कट्सेटरपंथियों और मौलवियों से बहुत चिढ़ते थे और उन पर तनिक भी खरोसा नहीं करते थे।

98 साल की उम्र में शुक्रवार (3 नवंबर 2017) को न्यूयॉर्क में प्राण त्यागने वाली दीना वाडिया दरअसल, जिन्ना अपनी दूसरी पत्नी रुतिन की बेटी थीं। रुतिन जिन्ना की दूसरी पत्नी थीं और उनसे जिन्ना बेइंतहां मोहब्बत करते थे।  जिन्ना का अपने पारसी व्यापारी मित्र दिनशॉ पेटिट के यहां बहुत ज़्यादा आना जाना था। इसी दौरान उनकी मुलाकात और बातचीत दिनशा की 16 साल की बेहद खूबसूरत बेटी रुतिन से होती थी। नियमित मुलाकात और बातचीत के बाद रुतिन अपने पिता की उम्र के 40 वर्षीय जिन्ना की विद्वता से इस कदर प्रभावित हुई कि उन्हें दिल दे बैठी। अजीत जावेद की किताब 'सेक्यूलर ऐंड नेशनलिस्ट जिन्ना' के मुताबिक एक दिन दिनशा से जिन्ना ने पूछा, "अंतर्धार्मिक विवाह को आप कैसा मानते हैं?" तो दिनशा ने कहा कि इससे राष्ट्रीय एकता को मजबूती मिलती है। उसी समय जिन्ना ने तपाक से कहा, "मैं आपकी बेटी रुतिन से शादी करना चाहता हूं।" लेकिन दिनशा तैयार नहीं हुए। दो साल के अफेयर के बाद जिन्ना ने रुतिन के 18 साल का होते ही शादी कर ली। दिनशा ने जिन्ना पर बेटी के अपहरण का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई, तो मुकदमे की सुनवाई के दिन रुतिन ने अदालत में जाकर कहा, "जिन्ना ने मेरा अपहरण नहीं किया बल्कि मैंने जिन्ना का अपहरण किया।" मुकदमा खारिज हो गया।

24 साल छोटी रुतिन से जिन्ना की शादी परंपरापंथी जमाने में बहुत विवादित रही। मौलवी जिन्ना की शादी को बर्दाश्त नहीं कर सके। लेकिन जिन्ना मौलवियों को भाव नहीं देते थे। रुतिन फैशनेबल लड़की थीं। उन्होंने कभी बुर्का या हिजाब जैसी मुस्लिम पोशाक नहीं पहनी, बल्कि यूरोपियन महिलाओं की तरह लो कटलिबास में रहती थीं। रुतिन से जिन्ना की इकलौती संतान दीना थी। उन्होंने भी मुसलमान से शादी न करके अपनी मां के पारसी समाज के नेविल वाडिया (वाडिया इंडस्ट्रीज़, ‘बॉम्बे डाइंगके चेयरमैन नुस्ली वाडिया के पिता) से शादी की थी। सबसे अहम् रुतिन परदे की जगह लो कटलिबास में मुस्लिम लीग की बैठकों में शिरकत करती थीं, जो कट्टर मुसलमानों को बहुत ज़्यादा नागवार गुजरता था। बहरहाल, 1929 में 29 साल की उम्र में रुतिन का निधन हो गया। जिन्ना रुतिन की जुदाई सहन नहीं कर पाए, उन्हें गहरा सदमा लगा। उस समय देश में राजनीतिक अस्थिरता थी, लिहाजा, जिन्ना 1930 में लंदन चले गए और वहां प्रीवी काउंसिल में प्रैक्टिस करने लगे।


वस्तुतः 1934 में चार साल के राजनीतिक वनवास से लौटने के बाद जिन्ना ने मुंबई के सबसे भव्य और पॉश इलाके दक्षिण मुंबई के मलाबार में समुद्र के किनारे तीन एकड़ जमीन पर अपने सपनों का घर बनाने का फैसला किया। इस भवन का डिजाइन मशहूर ब्रिटिश वास्तुकार क्लाउड बेटली ने यूरोपीय शैली में तैयार की। उनकी ही देखरेख में इसका निर्माण शुरू हुआ। निर्माण के समय खुद जिन्ना नियमित यहां आते थे और पूरे निर्माण कार्य की व्यक्तिगत निगरानी करते थे। सन् 1936 में जिन्ना हाउस बनकर तैयार हो गया। दो मंजिले (ग्राउंड प्लस फर्स्ट फ्लोर) इमारत में तीन कांफ्रेंस हॉल और 14 कमरे हैं। इसके निर्माण पर तब दो लाख रुपए का खर्च आया था। इसमें अखरोट की महंगी लकड़ियों की पैनलिंग की गई है और इटैलियन संगमरमर के इस्तेमाल से शानदार बुर्ज व खूबसूरत खंभे हैं। कभी बेहद खूबसूरत रहे इस बंगले की खिड़कियों से समुद्र का नज़ारा साफ दिखाई देता है। माउंट प्लेज़ेंट रोड(अब भाउसाहब हीरे मार्ग) पर यूरोपियन स्टाइल में बना जिन्ना हाउस अब खंडहर हो चुका है मगर जब ये  बना था तब पहली नजर में ही देखने वालों को मोहित कर लेता था।

एसके धांकी की पुस्तक 'लाला लाजपत राय एंड इंडियन नेशनलिज्म' के मुताबिक, सरोजनी नायडू गांधी के बाद जिन्ना की बहुत इज्जत करती थीं और उन्हें महान धर्मनिरपेक्ष नेता और हिंदू मुस्लिम एकता का राजदूत कहती थी। जिन्ना से मिलने के लिए जिन्ना हाउस में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस जैसे बड़े नेता आते थे। पूर्व वित्तमंत्री जसवंत सिंह की चर्चित किताब "जिन्नाः इंडिया-पार्टिशन इनडेपेंडेंस" के मुताबिक जिन्ना पाकिस्तान जाकर कभी सुकून से नहीं रहे। उनसे जो ब्लंडर हुआ था, उसको लेकर पछताते थे। जिन्ना मुंबई आकर रुतिन की मजार पर जाना चाहते थे। एमएच सईद की किताब 'द साउंड एंड फ्यूरी - ए पोलिटिकल स्टडी ऑफ मोहम्मद अली जिन्ना' के मुताबिक कट्टर मुसलमान रुतिन से शादी करने के लिए जिन्ना को जीवन भर माफ नहीं कर पाए और उन्हें काफिर कहने लगे थे। जिन्ना के कायदे आजम बनने के बाद पाकिस्तान में यह शेर बड़ा प्रचलित हुआ-
इक काफिरा के वास्ते इस्लाम को छोड़ा,
यह कायदे आजम है या काफिरे आजम।

अपने देहांत से कुछ पूर्व मृत्यु शय्या पर पड़े जिन्ना का पाकिस्तान निर्माण के प्रति पूरी तरह मोह भंग हो गया था। उन्हें देश के बंटवारे की महागलतीका एहसास हो चुका था, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और जिन्ना भारतीय इतिहास के सबसे बड़े खलनायक बन चुके थे।


बुधवार, 1 नवंबर 2017

सरदार पटेल को क्या गृहमंत्री पद से हटाना चाहते थे महात्मा गांधी?

हरिगोविंद विश्वकर्मा


क्या आपको पता है, कि मरणोपरांत राष्ट्रपिता का दर्जा पाने वाले मोहनदास कर्मचंद गांधी यानी महात्मा गांधी देश के पहले उपप्रधानमंत्री लौह पुरुष सरदार बल्लभभाई पटेल की नीतियों से बिल्कुल इत्तिफ़ाक नहीं रखते थे। इसीलिए उन्होंने सरदार पटेल को देश का प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। इसके बाद कश्मीर पर हमले करने वाले पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए के भुगतान जब पटेल ने को रोक दिया तब गांधी ने आमरण अनशन की धमकी दे डाली। गांधी के आगे झुकती हुई भारत सरकार ने इसके बाद पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए का भुगतान कर दिया। दरअसल, उस समय एक बार तो नौबत यहां तक आ गई कि अगर गांधी की हत्या न हुई होती तो एक दो दिन में सरदार पटेल के इस्तीफे की ख़बर आ जाती।

नवजीवन प्रकाशन मंदिर की ओर से प्रकाशित गांधी की दिल्ली डायरी में लिखित बयान के अनुसार गांधीजी जनवरी के पहले हफ़्ते में लिखा, "कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले पटेल अब मुझसे कुछ नहीं पूछते, अब वह मेरी उपेक्षा करते हैं।" जब पटेल ने घोषणा कर दी कि जब तक पाकिस्तान अपनी सेना कश्मीर से वापस नहीं बुला लेता तो हम 55 करोड़ रुपए का भुगतान नहीं करेंगे। बकौल सरदार पटेल "कश्मीर पर निर्णय हुए बिना हम कोई रुपया पाकिस्तान को देना स्वीकार नहीं करेंगे।" गांधी की दिल्ली डायरी के अनुसार, गांधी ने 12 जनवरी 1948 की शाम अपने अनुयायियों को संबोधित करते हुए कहा, "ऐसा भी मौक़ा आता है जब अहिंसा का पुजारी किसी अन्याय के सामने विरोध प्रकट करने के लिए उपवास करने पर मजबूर हो जाता है। ऐसा मौक़ा मेरे लिए आ गया है।"

गांधी की दैनिक डायरी पढ़ें तो पता चलता है कि अगर गांधीजी की हत्या न हुई होती तो निश्चित रूप से सरदार पटेल को जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल से अलग होना पड़ सकता था। दरअसल, गांधी के ब्रम्हचर्य का प्रयोग जैसे प्रपंच से पटेल ख़ासे नाराज़ थे। पटेल को ब्रम्हचर्य के प्रयोग के दौरान गांधी का मनु, आभा, सुशीला और आश्रम की दूसरी महिलाओं के साथ नग्न सोना बहुत नागवर लगता था। इससे पटेल उनसे और चिढ़ने लगे थे। इसलिए कोई भी बड़ा फ़ैसला लेने से पहले उन्होंने गांधी की सलाह लेना कम कर दिए थे। हालांकि जब गांधी दिल्ली में होते थे तब पटेल उनसे शुभेच्छा भेंट करने ज़रूर आते थे। 30 जनवरी की शाम गांधी की हत्या से कुछ मिनट पहले पटेल उनसे मिलने आए थे। मुलाकात के कारण ही गांधी को प्रर्थनास्थल पर पहुंचने में विलंब हो गया था।

जिस तरह गांधी का संविधान निर्माता डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर से मतभेद थे, उसी तरह उनका पटेल से सांप्रदायिक मसले पर गंभीर मतभेद था। ख़ासकर जब पाकिस्तान की ओर से कश्मीर पर हमला किया गया तो पटेल ने बयान जारी करके पाकिस्तान को दिए जाने वाले 75 करोड़ रुपए में से 55 करोड़ रुपए (20 करोड़ रुपए का भुगतान पहले ही किया जा चुका था) की अंतिम किश्त रोकने की घोषाणा कर दी। मगर गांधी को पटेल का फ़ैसला बिल्कुल रास नहीं आया। बताया जाता है कि इसके बाद गांधी पटेल के और विरोधी हो गए। गांधी के साथ पटेल के गंभीर मतभेद के चलते ही गांधी की हत्या होने के बाद यह भी सवाल उठने लगे कि कहीं गांधी की हत्या के पीछे पटेल का तो हाथ नहीं।

दरअसल, गांधी के पटेल से मतभेद की वजह मोहम्मद अली जिन्ना के निर्देश पर डायरेक्ट ऐक्शन में नोआखली में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार करवाने वाले बंगाल के शासक हुसैन शहीद सुहरावर्दी थे। पटेल उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करते थे, लेकिन गांधी पटेल के विरोध को उचित नहीं मानते थे। वस्तुतः गांधी नेहरू के मुकाबले पटेल को कट्टरपंथी मानते थे। उनको लगता था आगे चल कर पटेल के कट्टरपंथी दृष्टिकोण के मुकाबले नेहरू की नरम और लचीली नीति देश के लिए ज़्यादा सफल होगी। पर छुपा हुआ सत्य यह भी था कि गांधी की मर्जी के ख़िलाफ़ एक बार सुभाषचंद्र बोस के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद से गांधी कांग्रेस पर अपनी पकड़ को लेकर आश्वस्त नहीं थे। उन्हें लगता था कि अगर पटेल ने अपना नाम वापस नहीं लिया तो नेहरू हार जाएंगे जिसे उनकी हार मानी जाएगी। साथ ही उन्हें यह भी पता था कि पटेल उनके कहने पर अपना नाम वापस ले लेंगे लेकिन नेहरू ऐसा नहीं करेंगे।

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने अपनी जीवनी 'इंडिया विन्स फ्रीडम' में लिखा था, "सरदार पटेल के नाम का समर्थन ना करना मेरी बहुत बड़ी भूल थी। हमारे बीच बहुत सारे मतभेद थे लेकिन मेरा यक़ीन है कि मेरे बाद अगर 1946 में पटेल कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए होते तो आज़ादी के समय कैबिनेट मिशन प्लानको वह नेहरू से बेहतर ढंग से लागू करते। नेहरू की तरह वह जिन्ना को प्लान को फेल करने का अवसर न देते। मैं ख़ुद को कभी इस बात के लिए माफ़ नहीं कर पाऊंगा कि मैंने यह ग़लती न कर पटेल का साथ दिया होता भारत के पिछले दस सालों का इतिहास कुछ और ही होता।"

31 अक्टूबर 1875 को जन्मे पटेल ने सी राजगोपालाचारी को भारत का पहला राष्ट्रपति बनने से रोक दिया था इसके बावजूद राजगोपालाचारी ने लिखा, “इस में कोई संदेह नहीं कि बेहतर होता अगर पटेल प्रधानमंत्री और नेहरू विदेशमंत्री बनाए गए होते। मैं स्वीकार करता हूं कि मैं भी ग़लत सोचता था कि इन दोनों में नेहरू ज़्यादा प्रगतिशील और बुद्धिमान हैं। पटेल के प्रति यह झूठा प्रचार किया गया था कि वह मुस्लिमों के प्रति कठोर थे। अफ़सोस कि यह ग़लत तथ्य होने के बावजूद इसका प्रचार किया जा रहा था।"

दरअसल, सन् 1946 के चुनाव में भारी समर्थन मिलने के बावजूद गांधी ने पटेल को कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बनने दिया। कांग्रेस अध्यक्ष ही आज़ादी मिलने पर देश का प्रधानमंत्री बनता और गांधी की पहली पसंद जवाहरलाल नेहरू थे। इसलिए उन्होंने पटेल से चुनाव मैदान से हटने का आग्रह किया जिसे उन्होंने मान लिया। सन् 1946 में सभी को विश्वास था कि आजादी मिलने वाली है। दूसरा वर्ल्ड वॉर खत्म हो चुका था और अंग्रेज भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण के बारे में विचार-विमर्श करने लगे थे। कांग्रेस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार के गठन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। उस साल चुनावों में कांग्रेस को सबसे अधिक सीटें मिली थीं। अचानक कांग्रेस अध्यक्ष पद की ओर सभी की निगाह चली गई थी। पटेल की कर्मठ जीवन शैली, कामयाब प्रशासक और दृढ़प्रतिज्ञ राजनेता की छवि के कारण कांग्रेस में आम कार्यकर्त्ता ही नहीं वरिष्ठ नेता भी उनको प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे।

भारत छोडो आंदोलन के कारण कांग्रेस के अधिकांश बड़े नेता जेल में थे। इस कारण 6 साल से चुनाव नहीं हो सका था। लिहाज़ा, 6 साल से मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस अध्यक्ष थे। वह भी अध्यक्ष पद के चुनावों में भाग लेने के इच्छुक थे क्योंकि उनकी भी प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा थी। किंतु गांधी ने उन्हें बता दिया कि अध्यक्ष पद का फिर से उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा। आज़ाद ने अध्यक्ष बनने का इरादा त्याग दिया। यही नहीं, गांधी ने साफ तौर अपना समर्थन नेहरू को दिया था। उनकी नज़र में उस समय कांग्रेस की बागडोर संभालने के लिए नेहरू से बढ़कर कोई उम्मीदवार नहीं था।

अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरने की अंतिम तिथि 29 अप्रैल 1946 थी। नामांकन 15 राज्यों की कांग्रेस की क्षेत्रीय कमेटियों द्वारा किया जाना था। हैरत की बात कि गांधी के खुले समर्थन के बावजूद नेहरू को एक भी राज्य की कांग्रेस कमेटी का समर्थन नहीं मिला, जबकि 15 में से 12 राज्यों से सरदार पटेल का नाम कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया गया। बाकी 3 राज्यों ने किसी का भी नाम आगे नहीं आया। स्पष्ट है कि पटेल के पास निर्विवाद समर्थन हासिल था जो उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष बनाने के लिए पर्याप्त था। इसे गांधी ने चुनौती के रूप में लिया। उन्होंने जेबी कृपलानी पर दबाव डाला कि वह कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों को नेहरू के नाम का प्रस्ताव करने के लिए राजी करें। आश्चर्य की बात कि गांधी को अच्छी तरह से मालूम था कि कांग्रेस कार्य समिति के सदस्यों के पास यह अधिकार था ही नहीं कि वह नेहरू के नाम का प्रस्ताव रखते क्योकि यह अधिकार कांग्रेस के संविधान के अनुसार केवल राज्यों की इकाइयों के पास ही था।

बहरहाल, सच तो यह है कि सरदार पटेल ने ही भारत को विभाजित करने के मंसूबों पर पानी फेरा था। आज जो विकासशील भारत हैं, वद 70 साल पहले भारत-श्रेष्ठ भारत के मिशन की कमान संभालने वाले सरदार पटेल की ही देन है। वस्तुतः स्वतंत्रता मिलने से पहले भारत में दो तरह के शासक थे। भारत का एक हिस्सा वह था जिस पर अंग्रेजों का सीधा शासन था, दूसरा हिस्सा वह था जिस पर 562 से ज्यादा रियासते और रजवाड़े थे। रियासतदार और रजवाड़े अंग्रेजों के अधीन शासन कर रहे थे।

विभाजित के समय अंग्रेजों ने चालाकी से रजवाड़ों के सामने दो विकल्प रखा। पहला विकल्प भारत या पाकिस्तान में से किसी एक के साथ विलय था और दूसरा विकल्प आजाद देश के रूप में वजूद कायम रखना। यह पटेल का कमाल था कि उन्होंने सूझबूझ और कूटनीति से बिना किसी खूनखराबे के भारत को एक किया। 6 मई 1947 को सरदार पटेल ने रियासतों और रजवाड़ों का भारत में विलय का मुश्किल मिशन शुरू किया। विलय के बदले रियासतों के वशंजों को प्रिवी पर्सेज के जरिए नियमित आर्थिक मदद का प्रस्ताव रखा। साथ ही रियासतों से उन्होंने देशभक्ति की भावना से फैसला लेने को कहा। 15 अगस्त 1947 तक भारत में शामिल होने की समय सीमा भी तय कर दी। साम-दाम-दंड-भेद की पटेल की इस कूटनीति ने जल्दी ही रंग दिखाना शुरू कर दिया।

आखिरकार 15 अगस्त 1947 को जब लाल किले में तिरंगा फहराया गया तब-तब भारत एक मुल्क के रूप में दुनिया के नक्शे पर वजूद में आया लेकिन जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में शामिल होने का फैसला किया। जम्मू-कश्मीर के राजा हिंदू थे लेकिन बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम थी, जबकि जूनागढ़ और हैदराबाद के शासक मुस्लिम थे, लेकिन उनकी बहुसंख्यक आबादी हिंदू थी। सांप्रदायिक हिंसा के माहौल में इन्हें लेकर कोई भी गलत फैसला बड़ी आफ़त बन सकता था।

87 फीसदी हिंदू आबादी वाले हैदराबाद का नवाब उस्मान अली खान विलय के पक्ष नहीं था, उसके इशारे पर वहां की सेना हैदराबाद की जनता पर अत्याचार कर रही थी। 13 सितंबर 1948 को पटेल ने भारतीय फौज को हैदराबाद पर चढ़ाई करने का आदेश दे दिया। ऑपरेशन पोलो के तहत सेना ने दो ही दिन में हैदराबाद पर क़ब्ज़ा कर लिया।


नोट - व्यस्ता के कारण इसे कल यानी 31 अक्टूबर 2017 को पूरा नहीं कर पाया था, आज पूरा हुआ और पोस्ट कर रहा हूं।

शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

ग़ज़ल - यूं ही सबके सामने!


राज़-ए-दिल क्यूं पूछते हो यूं ही सबके सामने
दिल की बातें क्या बताएं यूं ही सबके सामने
तुम अनाड़ी ही रह गए गुफ़्तगू के मामले में
दिल की बातें नहीं पूछते यूं ही सबके सामने
बिना किसी ज़ुर्म के हम तो बदनाम हो गए
इस तरह इशारे ना करो यूं ही सबके सामने
मन बहुत उदास है दुनियावालों की बातों से
लगता है रो ही देंगे अब यूं ही सबके सामने
किसी को क्या गिला मेरे किसी से बोलने से
पर बाज आते नहीं लोग यूं ही सबके सामने

हरिगोविंद विश्वकर्मा

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

रोहिंग्या मुसलमान सहानुभूति के कितने हक़दार?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने पिछले हफ़्ते रोहिंग्या मुस्लिम शरणार्थियों के बारे में सुप्रीम कोर्ट में जो हलफ़नामा पेश किया है, उसकी भाषा असाधारण रूप से बेहद कठोर है। भाषा से ही पता चल जाता है कि भारत सरकार जेहादी प्रवृत्ति वाले इन उपद्रवी तत्वों के साथ भविष्य में कोई भी  रियायत बरतने नहीं जा रही है। मानवाधिकार से जुड़े लोग भले इसे मानवता विरोधी क़दम क़रार दें, लेकिन राष्ट्र हित में यह उचित, दूरदर्शी एवं प्रशंसनीय क़दम है। केंद्र सरकार के हलफ़नामे में सुप्रीम कोर्ट को इस मसले से दूर रहने की ‘सलाह’ देते हुए दो टूक शब्दों में कहा गया है कि रोहिंग्या का मसला केवल और केवल भारत सरकार का मामला है, लिहाज़ा इस मसले पर किसी जनहित याचिका को बहुत ज़्यादा तवज्जो नहीं दी जानी चाहिए। राजनीतिक हलक़ों में माना जा रहा है कि अब तक किसी भी सरकार ने देश की सबसे बड़ी अदालत में इतना कठोर हलफ़नामा पेश करने की हिमाकत नहीं की है।

कथित तौर पर छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुस्लिम तुष्टीकरण की पैरवी करने वाले वामपंथी विचारक भले ही सरकार के क़दम से सहमत न हों, लेकिन देशहित के लिए सकारात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति सरकार के क़दम से बिल्कुल असहमत नहीं होगा। भविष्य को ध्यान में रखा जाए तो केंद्र का क़दम बहुत सही जान पड़ता है। हलफ़नामे में कहा गया है कि फिलहाल देश में40 हज़ार से ज़्यादा रोहिंग्या मुस्लिम अवैध शरणार्थी हैं। इनसे देश की सुरक्षा को बहुत गंभीर ख़तरा है, क्योंकि इनमें से ढेर सारे लोगों का ताल्लुकात पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द और अमन के दुश्मन आईएसआई, इस्लामिक स्टेट, अलक़ायदा, तालिबान, लश्कर, जैश, हिजबुल जैसे आतंकी संगठनों से हैं। इसमें दो राय नहीं कि अपने उपद्रवी और जेहादी स्वभाव के कारण ही रोहिंग्या मुस्लिम म्यांमार (बर्मा) से निकाले गए हैं। इन शरणार्थियों के बारे में अगर दिल्ली में दूसरी सरकार होती तो इतना सख़्त स्टैंड कभी न ले पाती।

दुनिया के सामने खड़े इस्लामिक आतंकवादी ख़तरे को नज़रअंदाज़ करने वाले लोग रोहिंग्या मुसलमान को अल्पसंख्यक समुदाय का मानते हैं। उनके अनुसार रोहिंग्या पर सबसे ज़्यादा ज़ुल्म हो रहा है। सवाल यह उठता है कि आख़िर रोहिंग्या मुसलमानों से म्यांमार को क्या परेशानी है? जो उन्हें वहां से निकाला जा रहा है। यह सब म्यांमार में तब हो रहा है जब वहां शांति नोबेल सम्मान पाने वाली अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कार्यकर्ता आंग सान सू ची का दल नेशनल लीग फ़ॉर डेमोक्रेसी सत्ता में है। रोहिंग्या मसले पर अपनी महीने भर पुरानी चुप्पी तोड़ते हुए सू ची ने कहा है कि बड़ी संख्या में रोहिंग्या मुसलमानों के जेहाद में शामिल होने के चलते ही सेना को उनके खिलाफ ऑपरेशन शुरू करना पड़ा।

दरअसल, म्यांमार में इस समय फेथ मूवमेंट ऑफ़ अराकान (एफएमए), अक़ा मुल मुजाहिदीन (एएमएम), हरकत ओल-यक़ीन (एचओवाई) और केबंगकितन मुजाहिद रोहिंग्या (केएमआर) जैसे आतंकवादी संगठन सक्रिय हैं। इस साल अगस्त में म्यांमार के रखाइन में मौंगडोव सीमा पर रोहिंग्या आतंकियों ने सुरक्षा दस्ते पर हमला करके 9 पुलिस अफसरों की हत्या कर दी। जांच में पता चला कि यह हमला रोहिंग्या आतंकियों ने किया। इसके बाद सेना ने बड़े पैमाने पर ऑपरेशन शुरू किया और मौंगडोव जिले की सीमा सील कर दी। दुनिया में कहीं भी किसी समुदाय के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई होती है तो इंपैक्ट बदमाशों पर तो बहुत कम, मासूम लोगों पर ज़्यादा होता है। यही म्यांमार में हो रहा है। बेशक, एक तरफ़ से सारे के सारे रोहिंग्या मुसलमान आतंकवादी नहीं हैं, लेकिन यह भी सच है कि रोहिंग्या आतंकियों के बौद्धों और हिंदुओं के ख़िलाफ़ जेहाद का विरोध करने की बजाय उस पर मौन धारण करना इनके लिए अब भारी पड़ रहा है। रोहिंग्या सेना पर मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाते हैं। सामूहिक मारकाट के अलावा प्रताड़ना और रेप के भी आरोप हैं। हालांकि सरकार ने इसे सिरे से खारिज कर दिया है।

म्यांमार की बहुसंख्यक आबादी बौद्ध है। वहां रोहिंग्या मुसलमानों की जनस्ख्या 10 लाख से भी ज़्यादा है। रोहिंग्या मुसलमान मुख्य रूप से अवैध बांग्लादेशी प्रवासी हैं। रोहिंग्या सुन्नी मुस्लिम हैं, जो बांग्लादेश के चटगांव में प्रचलित बांग्ला बोलते हैं। हालांकि वे कई पीढ़ियों से रखाइन में रह रहे हैं, इसके बावजूद  म्यांमार सरकार इन्हें नागरिकता देने से मना करती है। सरकार इन्हें प्रॉब्लम क्रिएटर मानती है। जहां तक रोहिंग्या और बौद्धों के बीच विवाद की बात है तो झगड़ा 100 साल पुराना है। यह विवाद सन् 1948 में म्यांमार के ब्रिटिश से आज़ाद होने के बाद समय के साथ गहराती गई। इसी के चलते रखाइन राज्य अशांत है, जबकि म्यांमार में हर जगह शांति है। इसके लिए सरकार रोहिंग्या को ज़िम्मेदार मानती है। सन् 1982 में म्यांमार ने राष्ट्रीयता क़ानून बनाकर रोहिंग्या का नागरिक दर्जा ख़त्म कर दिया और उन्हें देश छोड़ने का आदेश दिया। रखाइन में सन् 2012 से सांप्रदायिक हिंसा हो रही है, जिसमें बड़ी संख्या में जानें गई हैं और लाखों रोहिंग्या विस्थापित हुए। बड़ी संख्या में रोहिंग्या आज भी ख़स्ताहाल शिविरों में रह रहे हैं।

रोहिंग्या मुसलमान मूलतः खानाबदोश प्रजाति के हैं। मुसलमानों के भारत आगमन के बाद धर्मपरिवर्तन का सिलसिला शुरू होने पर इनका धर्म परिवर्तन करवा दिया गया। ये लोग 14 वीं शताब्दी में विस्थापित होकर चटगांव से अराकान योमा में आकर बस गए। इसीलिए इन्हें अराकांस इंडियन भी कहा जाता है। अराकान योमा को अराकान और रखाइन पर्वतमाला भी कहते हैं। यह भारत (असम, नगालैंड व मिज़ोरम) और म्यांमार (रखाइन व अराकान) की सीमा निर्धारित करने वाली पर्वतमाला है, जो अंडमान निकोबार द्वीप समूह तक जाती है। यह रखाइन और इरावदी नदियों के दोआब के बीच है। इतिहासकार मानते हैं कि रोहिंग्या इस्लाम को मानते हैं। इनमें से बहुत से लोग सन् 1430 में अराकान पर शासन करने वाले बौद्ध राजा नारामीखला (जिसका बर्मा में नाम मिन सा मुन था) के राज दरबार में नौकर थे। इस राजा ने मुस्लिम सलाहकारों और दरबारियों को अपनी राजधानी में पनाह दी थी।

म्यांमार में 25 साल बाद पिछले साल चुनाव हुए थे। चुनाव में आंग सान सू ची की पार्टी को अभूतपूर्व जीत मिली थी. हालांकि संवैधानिक नियमों के कारण वह चुनाव जीतने के बाद भी राष्ट्रपति नहीं बन पाई थीं. सू ची स्टेट काउंसलर की भूमिका में हैं। अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता उन्हीं के हाथ में है। म्यांमार के राष्ट्रपति के प्रवक्ता ज़ाव हती कहते हैं कि म्यांमार की दुनिया में ग़लत रिपोर्टिंग हो रही है। दरअसल, सू ची भले अपने मुल्क की नेता हैं, लेकिन देश की सुरक्षा सेना के हाथ में है। अगर सू ची अंतराष्ट्रीय दवाब के आगे झुकती हैं तो आर्मी से उऩका टकराव हो सकता है जो जोख़िम भरा है। इससे उनकी सरकार ख़तरे में आ सकती है, क्योंकि म्यांमार में रोहिंग्या के प्रति सहानुभूति नहीं के बराबर है। वहां की आम जनता भी रोहिंग्या को उपद्रवी और समस्या पैदा करने वाली कौम मानती है।

भारत कहता है, रोहिंग्या दलालों के ज़रिए संगठित रूप से म्यांमार से पश्चिम बंगाल के बेनापोल-हरिदासपुर और हिल्ली एवं त्रिपुरा के सोनामोरा के अलावा कोलकाता और गुवाहाटी से भारत में घुसपैठ करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत इन्हें देश में कहीं भी आने-जाने या बसने के मूलभूत अधिकार नहीं दिए जा सकते। ये अधिकार सिर्फ़ अपने नागरिकों के लिए ही हैं। 2012 से देश में उन्होंने अवैध तरीक़ों से प्रवेश किया। कई लोगों ने पैन कार्ड और वोटर आईडी भी बनवा लिए हैं। रोहिंग्या को अकेले भारत डिपोर्ट नहीं कर रहा है। बांग्लादेश भी इन्हें म्यांमार वापस भेज रहा है। हालांकि एमनेस्टी इंटरनेशनल ने बांग्लादेश के क़दम की निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन बताया है। सच पूछिए तो रोहिंग्या किसी सिरदर्द से कम नहीं हैं। इन्हें जो देश अपने यहां शरण देगा, कल उसी के लिए यहां समस्या पैदा करेंगे। इसीलिए केंद्र चौकन्ना है, वह कोई ऐसा काम नहीं करना चाहता, जिसे भविष्य में‘ऐतिहासिक भूल’ या हिस्टोरिक ब्लंडर कहा जाए। इस सूरते हाल में रोहिंग्या सहानुभूति के पात्र कतई नहीं हैं।

बुधवार, 6 सितंबर 2017

गौरी लंकेश की हत्या और वामपंथी मीडिया

हरिगोविंद विश्वकर्मा मानव हत्या बेशक अमानवीय, दुखद और निंदनीय वारदात है। हत्या किसी अच्छे नागरिक की हो या फिर बुरे आदमी की, हत्या की भर्त्सना होनी ही चाहिए। दरअसल, हत्या की वारदात में क़ुदरत द्वारा दी हुई बेशकीमती जान चली जाती है। एक इंसान का शरीर ही नष्ट हो जाता है। मानव हत्या को इंसान के जीने के अधिकार का गंभीर और क्रूरतम हनन भी माना जाता है, इसीलिए दुनिया भर के मानवाधिकार समर्थक इसी फिलॉसफी के तहत मानव हत्याओं को ग़लत मानते हैं और उनका विरोध करते हैं। हत्या कमोबेश हर संवेदनशील को विचलित करती है। कोई सभ्य आदमी हत्या के बारे में सोच कर ही दहल उठता है। यही मानसिकता मानव को हत्या की वारदात को लेकर संवेदनशील बनाती है। इसीलिए जो लोग हत्याओं को अंजाम देते हैं यानी अपने जैसे ही किसी इंसान की हत्या करते हैं, वे मानव समाज से ख़ुद ब ख़ुद बाहर हो जाते हैं। हत्यारों को जानवर कहा जाता है, क्योंकि कोई जानवर ही कीसी की हत्या कर सकता है। हर प्राणी की हत्या तो नहीं, हां मानव हत्या को लेकर हर अच्छे नागरिक को संवेदनशील होना ही चाहिए। मीडिया को, ख़ासकर हत्या की वारदात, मारे गए व्यक्ति और हत्यारों की कवरेज करते समय ज़्यादा संवेदनशील होना चाहिए। मानव हत्या पर कोई तर्क-वितर्क नहीं होनी चाहि। एक स्वर से हत्या की भर्त्सना करनी चाहिए। इसी तरह में कन्नड़ पत्रकार और ऐक्टिविस्ट सुश्री गौरी लंकेश की हत्या की भी निंदा की जानी चाहिए। इस दुखद घटना पर विरोध दर्ज कराया जाना चाहिए। गौरी लंकोश कन्नड़ पत्रकार थीं, फिर भी लोग उनकी हत्या पर विरोध दर्ज करवा रहे हैं। वैसे गौरी लंकेश की हत्या की ख़बर जिसने सुनी उसने ही उसकी भर्त्सना की । गौरी लंकेश की हत्या निःसंदेह एक कायराना हरकत है। इस हत्या का हर भारतीय ही नहीं, थोड़ा भी संवेदनशील व्यक्ति समर्थन नहीं कर सकता। कैसे कोई किसी की हत्या का समर्थन कर सकता है। इसलिए जो लोग गौरी की हत्या पर आपत्तिजनक और गैरज़िम्मेदार कमेंट कर रहे हैं, वे लोग भी उतने ही निंदनीय हैं, जितने गौरी के हत्यारे। गौरी को इन पंक्तियों का लेखक भी उनकी हत्या से पहले नहीं जानता था। हो सकता है यह लेखक की अज्ञानता हो। लेकिन एक पत्रकार वह भी महिला पत्रकार की हत्या मन को व्यथित करने वाली बात है और लेखक इस हत्या से ख़ुद भी विचलित है। गौरी लंकेश या किसी व्यक्ति की हत्या पर हो हल्ला मचना स्वाभाविक है, लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। लिहाज़ा, गौरी लंकेश की हत्या की कवरेज करते समय या रिएक्शन देते ऐसा कुछ नहीं किया जाना चाहिए जिससे आम आदमी को लगे कि एक ख़ास वर्ग के लोगों की हत्या को लोकर मीडिया कुछ ज़्यादा ही मुखर हो जाती है। पिछले कुछ लाल के दौरान दुनिया में अनगिनत पत्रकार मारे गए हैं। भारत भी अपवाद नहीं है, यहां भी कलमकारों की आए दिन हत्या होती रहती है। ख़ुद कर्नाटक में भी कई पत्रकारों की हत्या हो चुकी है। सवाल उठता है कि क्या सरकार ने हत्या के बाद किसी पत्रकार का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ कराया गया है? अगर बड़े और मेनस्ट्रीम पत्रकारों की बात करें तो मुंबई में ही बहुत बड़े पत्रकार ज्योतिर्मय डे (जे डे) की हत्या कर दी गई थी, लेकिन उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ नहीं कराया गया। संयोग से उस समय महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी, जैसे आजकल कर्नाटक में कांग्रेस सरकार की है। फिर गौरी लंकेश का अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ क्यों? जे डे की हत्या की मीडिया कवरेज हुई थी, परंतु इतनी नहीं जितनी गौरी लंकेश की हत्या की हो रही है। यह भेदभाव क्यों? कर्नाटक की काग्रेस सरकार ने गौरी का अंतिम संस्कार जिस तरह राजकीय सम्मान के साथ करवाया, उसमें हर किसी को राजनीति की बू आ रही है। सुश्री गौरी लंकेश की हत्या के प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मीडिया, जिसे कई लोग वामपंथी मीडिया करार दे रहे हैं, (यह संकटपूर्ण है कि मीडिया अब मीडिया न रहकर वामपंथी और दक्षिणपंथी मीडिया हो गई है) जिस तरह से गौरी लंकेश की हत्या के लिए बीजेपी और केंद्र सरकार को ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं, उससे यह साफ़ लगता है कि इन लोगों ने गौरी के हत्यारों की शिनाख़्त कर ली है कि वे निश्चित रूप से बीजेपी के ही कार्यकर्ता थे। ऐसे में तो कथित वामपंथी मीडिया को सबूत पेश करना चाहिए, ताकि हत्यारों को कठोर सज़ा दिलाई जा सके। इस बात में दो राय नहीं कि बिना सबूत के किसी हत्या के लिए किसी को ज़िम्मेदार ठहराना भी एक तरह का आतंकवाद और गुंडागर्दी है। जो लोग यह कार्य कर रहे हैं, वे भी मानव हत्या जैसा ही काम कर रहे हैं। इस देश में पिछले कुछ साल से अनगिनत पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की हत्या हुई है, लेकिन गौरी की हत्या करते समय केवल और केवल दाभोलकर, पानसरे और कुलबर्गी का ज़िक्र किया जा रहा है, क्योंकि ये लोग वामपंथी विचारधारा के लोग थे। किसी बहस में किसी पैनलिस्ट ने जेडे का नाम नहीं लिया। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गौरी की हत्या उस राज्य में हुई है, जहां कांग्रेस का शासन है। लिहाज़ा, सबसे पहले कांग्रेस को कठघर में खड़ा किया जाना चाहिए था, लेकिन यह नहीं किया गया। बीजेपी विरोधी वामपंथी मीडिया गोरी की हत्या के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी पर दोषारोपण कर रही है। कई लोगों ने दमदार तर्क दिया है, कि गौरी लंकेश की हत्या बीजेपी क्यों करवाएगी। कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी सत्ता की प्रबल दावेदार है। ऐसे में वह उस पत्रकार की हत्या क्यों करवाएगी जो उसके ख़िलाफ़ लिख रही थी, क्योंकि कोई भी व्यक्ति उन्हें ही हत्या के लिए ज़िम्मेदार ठाहरा देगा। जिसका निश्चित तौर पर चुनाव में नुकसान हो सकता है। ऐसे में कम से कम बीजेपी गौरी की हत्या करवाने के बारे में सोच ही नहीं सकती। यह भी नहीं कहा जा सकता कि गौरी लंकेश की हत्या कांग्रेस ने करवाई, क्योंकि हत्यारे अज्ञात हैं। हां, अगर कांग्रेस के अतीत पर नज़र डाले तो वह इस तरह की हत्याएं करवाने में पटु रही है। ऐसे में इस आशंका से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि गौरी की हत्या के लिए कहीं न कहीं कांग्रेस ज़िम्मेदार तो है। गौरी लंकेश भाजपा और केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ लिख रही थीं, इसलिए उनकी सुरक्षा बढ़ाने की ज़रूरत थी, यह काम कांग्रेस ने नहीं किया। बहरहाल, हत्या की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की ज़रूरत है। हालांकि सभी वामपंथी पत्रकार और अफ़ज़ल गुरु की बरसी मनाने वाले खालिद उमर को अपना बेटा मानने वाले अपूर्वानंद जैसे कथित बुद्धिजीवी हत्या के लिए बीजेपी को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं। अरे भाई, अगर गौरी लंकेश की हत्या बीजेपी द्वारा करवाने के कोई सबूत नहीं है तो कम से कम सबूत आने तक बीजेपी को बख़्श देना चाहिए था। कल को हत्यारे अगर बीजेपी से जुड़े नहीं मिले तो क्या करेंगे? दो तीन साल पहले उत्तर प्रदेश में एक पत्रकार को समाजवादी पार्टी के मंत्री के गुंडों नेता ने ज़िंदा जला दिया था, तब वामपंथी मीडिया इतनी मुखर नहीं हुई थी। गौरी की हत्या पर मीडिया के मुखर होने का स्वागत करना चाहिए, लेकिन मुखर होने में भी अवसरवाद दिखे तो संदेह होता है। पिछले तीन साल से आम आदमी को कम से कम यह साफ़ लग रहा है कि प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ख़िलाफ़ बोलने वाले व्यक्ति के साथ कुछ होता है या केंद्र सरकार की नीति के ख़िलाफ़ कोई कुछ बोलता है या कोई क़दम उठाता है तो तो मीडिया का एक तबका उसे लपक लेता है। अवार्ड वापसी की मुद्दा या आमिर ख़ान के बयान को मीडिया ने खूब उछाला। उपराष्ट्रपति पद से रिटायर होने के बाद हामिद अंसारी ने जो बयान दिया उसे भी खूब उछाला गया। तो क्या यह कहा जाए कि मीडिया के एक तबके में ऐसे लोग बैठे हैं, जो प्रधानंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पसंद नहीं करते और कोई भी मुद्दा इनके ख़िलाफ़ आता है तो उसे ख़ूब हवा देते हैं। क्या यही निष्पक्ष पत्रकारिता है?

सोमवार, 14 अगस्त 2017

क्या है आखिर पाकिस्तान का बाबरी मस्जिद कनेक्शन ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आज पड़ोसी देश पाकिस्तान में स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है। मतलब पाकिस्तान अपने जन्मदाता भारत के आज़ाद होने से एक दिन पहले ही अस्तित्व में आ गया था। ऐसे में भारत के लोगों लिए यह जानना बेहद ज़रूरी है कि पाकिस्तान बनने की पृष्टिभूमि क्या थी? दरअसल, गहराई से रिसर्च करने पर पता चलता है कि पाकिस्तान के जन्म का संबंध अयोध्या की बाबरी मस्जिद से है। सन् 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने अयोध्या में श्री राम मंदिर को लेकर एक रणनीति के तहत एक बहुत भयानक और दीर्घकालीन साज़िश रची, जिसका नतीजा पाकिस्तान है।

दरअसल, सन् 1857 के विद्रोह के पहले सन् 1856 में लॉर्ड पॉमर्स्टन सरकार ने लॉर्ड कैनिंग यानी चार्ल्स जॉन कैनिंग को भारत का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया था। सन् 1857 के गदर के बाद कैनिंग ने ब्रिटिश प्रधानमंत्री लॉर्ड विस्काउंट पॉमर्स्टन को भेजी रिपोर्ट में कहा था कि अगर इंडिया में लंबे समय तक शासन करना है तो यहां की जनता के बीच धर्म के आधार पर मतभेद पैदा करना ही पड़ेगा और इसके लिए हिंदुओं के प्रमुख देवता राम की जन्मस्थली को विवाद में ला दिया जाए।

इतिहास की कई चर्चित किताबों के मुताबिक 1857 के विद्रोह के बाद अयोध्या विवाद की साज़िश रची गई। इसके लिए इंतिहास से छेड़छाड़ भी की गई और इब्राहिम लोदी की बनाई गई मस्जिद को बाबरी मस्जिद का नाम दे दिया गया। कालजयी लेखक कमलेश्वर के भारतीय और विश्व इतिहास पर आधारित चर्चित उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में बाबरी मस्जिद पर इतिहास के हवाले से बहुत महत्वपूर्ण तथ्य दिए गए हैं। लेखक ने कई अध्याय अयोध्या मुद्दे को समर्पित किया है। सन 2000 में प्रकाशित ‘कितने पाकिस्तान’ को अटलबिहारी सरकार ने बेहतरीन रचना करार देते हुए 2003 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार दिया था। किताब को नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, अमृता प्रीतम, राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, हिमांशु जोशी और अभिमन्यु अनंत जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने विश्व-उपन्यास की संज्ञा देते हुए इसकी दिल खोलकर प्रशंसा की है।

‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक, दरअसल, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं) में एक शिलालेख भी लगा था, जिसका जिक्र एक ईमानदार अंग्रेज़ अफ़सर ए फ़्यूहरर ने कई जगह अपनी रिपोर्ट्स में किया है। फ़्यूहरर ने 1889 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा, जिसे बाद में एक साज़िश के तहत अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के आदेश पर सन् 1523 में शुरू हुआ और सन् 1524 में मस्जिद बनकर तैयार हो गई। इतना ही नहीं, शिलालेख के मुताबिक, अयोध्या की मस्जिद का नाम बाबरी मस्जिद था ही नहीं।

दरअसल, ‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक मस्जिद में इब्राहिम लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में ख़ास तौर पर फैजाबाद भेजे गए अंग्रेज़ अफ़सर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। सारी ख़ुराफ़ात और साज़िश का सूत्रधार नेविल ही था। नेविल ने ही आधिकारिक तौर पर फ़ैज़ाबाद का गजेटियर तैयार किया था। नेविल की साज़िश में दूसरा फ़िरंगी अफ़सर कनिंघम भी शामिल था, जिसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने हिंदुस्तान की तवारिख़ और पुरानी इमारतों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। दरअसल, इंडियन सबकॉन्टिनेंट पर एक मुस्लिम देश बनाने की आधारशिला नेविल और कनिंघम ने रख दी थी। यह मुस्लिम देश 14 अगस्त 1947 को अस्तित्व में भी आ गया।

किताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने बड़ी साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद की नींव रखी थी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमला करके बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हज़ार हिंदुओं की हत्या कर दी, जबकि फ़ैज़ाबाद के गजेटियर में आज भी लिखा है कि1869 में, उस लड़ाई के क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद,अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की कुल आबादी महज़ दस हज़ार थी जो 1881 में बढ़कर साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। सवाल उठता है कि जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों को हलाक़ कैसे किया या फिर इतने मरने वाले कहां से आ गए? यहीं, बाबरी मस्जिद के बारे में देश में बनी मौजूदा धारणा पर गंभीर सवाल उठता है।

बहरहाल, हैरान करने वाली बात यह है कि दोनों अफ़सरों नेविल और कनिंघम ने सोची-समझी नीति के तहत बाबर की डायरी बाबरनामा, जिसमें वह रोज़ाना अपनी गतिविधियां दर्ज करता था, के 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच लिखे गए 20 से ज़्यादा पन्ने ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी ‘औध’ को‘अयोध्या’ कर दिया। मज़ेदार बात यह है कि मस्जिद के शिलालेख का फ़्यूहरर द्वारा किए गए अनुवाद को ग़ायब करना अंग्रेज़ अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी आर्कियोल़जिकल इंडिया की फ़ाइल में महफ़ूज़ है और ब्रिटिश अफ़सरों की साज़िश से परदा हटाता है।

दरअसल, बाबर की गतिविधियों की जानकारी बाबरनामा की तरह हुमायूंनामा में भी दर्ज है। लिहाज़ा, बाबरनामा के ग़ायब पन्ने से नष्ट सूचना हुमायूंनामा से ली जा सकती है। हुमायूंनामा के मुताबिक 1528 में बाबर अफ़गान हमलावरों का पीछा करता हुआ घाघरा (सरयू) नदी तक अवश्य गया था, लेकिन उसी समय उसे अपनी बीवी बेग़म मेहम और अन्य रानियों व बेटी बेग़म ग़ुलबदन समेत पूरे परिवार के काबुल से अलीगढ़ आने की इत्तिला मिली। बाबर लंबे समय से युद्ध में उलझने की वजह से परिवार से मिल नहीं पाया था इसलिए वह तुरंत अलीगढ़ रवाना हो गया। पत्नी-बेटी और परिवार के बाक़ी सदस्यों को लेकर वह अपनी राजधानी आगरा आया और 10 जुलाई तक उनके साथ आगरा में ही रहा। उसके बाद बाबर परिवार के साथ पिकनिक मनाने धौलपुर चला गया। वहां से सिकरी पहुंचा, जहां सितंबर के दूसरे हफ़्ते तक रहा।

उपन्यास के मुताबिक अयोध्या की मस्जिद बाबर के आक्रमण और उसके भारत आने से पहले ही मौजूद थी। बाबर आगरा की सल्तनत पर 20 अप्रैल 1526 को क़ाबिज़ हुआ जब उसकी सेना ने इब्राहिम लोदी को हराकर उसका सिर क़लम कर दिया। एक हफ़्ते बाद 27 अप्रैल 1526 को आगरा में बाबर के नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया। मज़ेदार बात यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना है कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाक़ी ने 1528 में मिसमार करके वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी का पूरा नाम मीरबाक़ी ताशकंदी था और वह अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था।

बहरहाल, अयोध्या के राम मंदिर को बाबरी मस्जिद बनाकर अंग्रज़ों ने हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत का जो बीज बोया वह दिनों-दिन बढ़ता ही गया। इसके बाद मंदिर मस्जिद या दूसरे धार्मिक मुद्दों पर हिंदू-मुसलमान के बीच संघर्ष होने लगे। इस बीच एक साज़िश के तहत भारी विरोध के बावजूद 20 जुलाई 1905 को बंग भंग के प्रस्ताव पर इंडिया सेक्रेटरी का ठप्पा लग गया। राजशाही, ढाका तथा चटगांव कमिश्नरीज़ को आसाम के साथ मिलाकर एक प्रांत नया बनाया गया, जिसका नाम पूर्ववंग और आसाम रखा गया। अंग्रेज़ यहीं नहीं रुके, उन्होंने कांग्रेस को हिंदुओं की पार्टी करार देकर मुसलमानों के लिए अलग राजनीतिक पार्टी बनवाई इसके लिए अंग्रज़ों ने ढाका के चौथे नवाब सर ख्वाजा सलीमुल्लाह बहादुर और अलीगढ़ के नवाब मुहसिनुल मुल्क का इस्तेमाल किया। अंग्रज़ों की शह पर 30 दिसंबर 1906 को औपचारिक रूप से ब्रिटिश इंडिया के बंगाल स्टेट के ढाका शहर (अब बांग्लादेश) में अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना की गई।

1909 के बाद से कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच मतभेद गंभीर होने लगे। ख़ुद मोहम्मद अली जिन्ना पहले मुस्लिम लीग के नेतओं से नफरत करते थे। जिन्ना को न तो उर्दू आती थी और न ही वह नमाज पढ़ते थे। वह सूअर का मांस खाने से परहेज नहीं करते थे। कुछ साल पहले लालकृष्ण आडवाणी ने सही कहा था कि जिन्ना वाक़ई सेक्यूलर मुसलमान थे। उन्होंने 1913 में मुस्लिम लीग की सदस्यता स्वीकार की। महात्मा गांधी के ख़िलाफ़त आंदोलन का जिन्ना ने पुरजोर विरोध किया था। जिन्ना उदारवादी नेता थे। वह अली बंधुओं (जिनमें से एक लियाकत अली पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री बने) से भी नफरत करते थे। 1913 से 1920 तक जिन्ना कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों से जुड़े रहे, लेकिन खिलाफत आंदोलन के बाद उनका गांधी से मतभेद बढ़ गया और वह पूरी तरह लीगी हो गए। बहरहाल, गांधी ने मुस्लिम नेताओं के जितना अपनाने की कोशिश की वे उतने ही दूर होते गए। गांधी के ख़िलाफ़त आंदोलन का ज़रूरत से ज़्यादा समर्थन करने के बाद भी हिंदू मुसलमान नेताओं के बीच दूरी बढ़ती रही। सन् 1930 में सबसे पहले शायर मुहम्मद इक़बाल ने सिंध, बलूचिस्तान, पंजाब तथा अफ़गान (सूबा-ए-सरहद) जैसे भारत के उत्तर-पश्चिमी चार प्रांतों को मिलाकर एक अलग राष्ट्र की मांग की थी।

सेक्यूलर जिन्ना धीरे धीरे कट्टर मुसलमान होते गए। 1940 में उन्होंने कह दिया कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग अलग धर्म के अनुयायी हैं, दोनों का धर्म ही अलग नहीं है बल्कि दोनों का दर्शन, सामाजिक परंपराएं और साहित्य भी अलग-अलग है। लिहाज़ा, मुसलमानों के लिए पृथक देश बनाया जाए। 1946 में यह तय हो गया कि अंग्रेज़ भारतीय उपमहाद्वीप को अगले तीन-चार साल में छोड़ देंगे। मुसलमानों के लिए पृथक पाकिस्तान की मांग को लेकर जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट ऐक्शन डे की घोषणा कर दी, जिसके बाद हिंदू मुसलमानों में भीषण दंगे शुरू हो गए।

कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेताओं के बढ़ते झगड़े ने भारत को बांटने के अंग्रेज़ों के मिशन को आसान बना दिया। 30 जून को उन्होंने भारत का विभाजन करने के लिए लॉर्ड माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भारत भेजा। मुहिम नेविल ने शुरू की थी, उसे अमली जामा पहनाते हुए माउंटबेटन ने 3 जून 1947 को भारत भूमि पर भारत और पाकिस्तान नाम के दो राष्ट्र बनाने की घोषणा कर दी और 14 अगस्त यानी आज के दिन पाकिस्तान विश्व के मानचित्र पर अवतरित हुआ।

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

क्या है धारा 35 ए और क्यों चाहिए कश्मीरी नेताओं को विशेष दर्जा?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
यह सुखद संयोग है कि जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370  और 35 ए के औचित्य पर सुप्रीम कोर्ट में पहल हुई है। देश की सबसे बड़ी अदालत में भारतीय संविधान से इन अनुच्छेदों को हटाने के लिए दो याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को चार हफ़्ते के भीतर इन पर जवाब देने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश जगदीशसिंह केहर की तीन सदस्यीय खंडपीठ कुमारी विजयलक्ष्मी झा की याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में अनुच्छा 370 के तहत राज्य को मिल रहे स्पेशल ग्रांट को चैलेंज किया गया है। यह अनुच्छेद उनके बच्चों को बेदख़ल करता है। 35 ए को चुनौती देने वाली सुप्रीम कोर्ट की वकील और कश्मीरी नागरिक एडवोकेट चारू वालीखन्ना ने कहा है कि धारा 35 ए गैरकश्मीरी युवक से शादी करने वाली कश्मीरी लड़की को नागरिकता से वंचित कर देता है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हैं। इसलिए 35 ए को रद किया जाए।

35 ए के चलते राज्य में बेटियों के साथ घोर पक्षपात होता है। कुपवाड़ा की अमरजीतकौर इस अमानवीय पक्ष की मिसाल हैं। गैरकश्मीरी से शादी के बाद उन्हें नागरिकता साबित करने व पैत्रृक संपति पर अधिकार पाने में 24 साल लग गए। गैरकश्मीरी से शादी के बाद बेटियां नागरिक बनी रहेंगी या नहीं, इस पर आज भी साफ़ गाइडलाइन नहीं है। जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के 2002 के फ़ैसले के बाद धारा 35 ए व 370 की विसंगतियां सामने आईं। 2004 में एसेंबली में परमानेंट रेज़िडेंट्स डिसक्वालिफ़िकेशन बिल पेश किया था। मकसद हाईकोर्ट का फैसला निरस्त करना था। यह बिल क़ानून नहीं बन सका तो इसका श्रेय विधान परिषद को जाता है जिसने इसे ख़ारिज़ कर दिया। देश के विभाजन के समय 20 लाख हिंदू शरणार्थी जम्मू-कश्मीर में आए थे, लेकिन धारा 35 ए के चलते ही उन्हें स्टेट सब्जेक्ट नहीं माना गया। वे नागरिकता से वंचित कर दिए गए। इनमें 85 फीसदी पिछड़े और दलित समुदाय से हैं।

अदालत के क़दम से सबसे ज्यादा आगबबुला धारा 35 ए  और 370 का चार पीढ़ी से लाभ लेने वाले डॉ. फारुक अब्दुल्ला हुए हैं। उन्होंने धमकी दी है कि विशेष दर्जे से कोई छेड़छाड़ हुई तो कश्मीरी जनता विद्रोह कर देगी, जिसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने सन् 2008 के आंदोलन का हवाला दिया है, जब श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को श्रद्धालुओं के लिए अस्थाई शेड बनाने के लिए ज़मीन देने के राज्य सरकार के फ़ैसले पर बड़ा आंदोलन हुआ था। अलगाववादी नेताओं ने इस मुद्दे पर 12 अगस्त को बंद का एलान किया है। मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ़्ती भी डॉ. अब्दुल्ला के सुर में सुर मिला रही हैं। महबूबा ने कहा था कि धारा 35ए के साथ छेड़छाड़ किया जाता है तो कश्मीर में कोई तिरंगा थामनेवाला नहीं होगा।

डॉ. फारुक की धमकी महज़ भ्रांति है। राज्य में जितने लोग इसके समर्थक हैं, उससे ज़्यादा इसके विरोधी। इसलिए, अगर इसे ख़त्म किया जाता है, तो बहुत होगा, मुट्ठी भर लोग श्रीनगर की सड़कों पर निकलेंगे। ऐसे विरोध-प्रदर्शन घाटी में पिछले तीन दशक से रोज़ ही हो रहे हैं। एक और विरोध प्रशासन झेल लेगा। वैसे 8 अगस्त 1953 को शेख अब्दुल्ला को कश्मीर को भारत से अलग करने की साज़िश रचने के आरोप में डिसमिस करके जेल में डालने पर भी विरोध हुआ था परंतु धीरे-धीरे शांत हो गया। ठीक इसी तरह अनुच्छेद 35 ए या 370 को ख़त्म करने पर विरोध होगा, लेकिन धीरे-धीरे शांत हो जाएगा। दरअसल, पिछले क़रीब सात दशक से सत्तासुख भोगने वाले मेहबूबा-अब्लुल्ला जैसे लोग इसे ख़त्म करना तो दूर इस पर चर्चा से भी डरते हैं। बहस या समीक्षा की मांग सिरे से ख़ारिज़ कर देते हैं। इसमें दो राय नहीं कि 35ए व 370 जैसे विकास-विरोधी प्रावधान को अब्दुल्ला-मुफ्ती जैसे सियासतदां और नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी जैसी पार्टियां अपने स्वार्थ के लिए बनाए रखना चाहती हैं, क्योंकि यह धारा उनकी सियासत को बनाए रखने का कारगर टूल बन गया है।

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय के बाद शेख अब्दुल्ला राज्य के प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से सांठगांठ करके राज्य के लिए विशेष दर्जा हासिल कर लिया। लिहाजा, संविधान में अनुच्छेद 370 शामिल किया गया। 1952 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के आध्यादेश जारी करके राज्य के हित में संविधान में धारा 35-A का प्रावधान किया। यह धारा 370 का ही हिस्सा है। धारा 35-A राज्य के बाहर से आए लोगों को नागरिकता नहीं देता। उन्हें यहां ज़मीन ख़रीदने, सरकारी नौकरी करने वजीफ़ा या अन्य रियायत पाने का अधिकार भी नहीं है। बहरहाल, जम्मू कश्मीर के कथित राष्ट्रवादी और अलगाववादी नेता भली-भांति यह तथ्य जानते हैं कि राज्य का स्वतंत्र अस्तित्व मुमकिन नहीं। यानी जम्मू कश्मीर कभी भी भारत से अलग नहीं हो सकता। लिहाज़ा, अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए आज़ादी का राग आलापते रहते हैं। देश के पैसे पर पल रहे ये लोग इतने भारत को अपना देश मानते ही नहीं और दुष्प्रचार करते रहते हैं। इनकी पूरी कवायद धारा 370 अक्षुण्ण रखने के लिए होती है।

जम्मू कश्मीर जैसे सीमावर्ती राज्य की समस्या के लिए अगर केवल पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराया जाए,  तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। नेहरू की अदूरदर्शिता नतीजा पूरा मुल्क़ भुगत रहा है। धारा 370 का सभी ने कड़ा विरोध किया था, पर नेहरू अड़े रहे। ’अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता और मज़बूरी’ का हवाला देकर इसे लागू कराने में सफल रहे। इसका पुरज़ोर विरोध करते हुए डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1952 में नेहरू से कहा, “आप जो करने जा रहे हैं, वह नासूर बन जाएगा और किसी दिन देश को विखंडित कर देगा। यह प्रावधान भारत देश नहीं,कई राष्ट्रों का समूह मानने वालों को मज़बूत करेगा।

आज घाटी में जो हालात हैं, उन्हें देखकर लगता है कि मुखर्जी की आशंका ग़लत नहीं थी?  धारा 370 के कारण ही राज्य मुख्यधारा से जुडऩे की बजाय अलगाववाद की ओर मुड़ गया। यानी देश के अंदर ही एक मिनी पाकिस्तान बन गया, जहां तिरंगे का अपमान होता है, देशविरोधी नारे लगाए जाते हैं और भारतीयों की मौत की कामना की जाती है। डॉ. भीमराव आंबेडकर भी कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने के पक्ष में नहीं थे। शेख़ को लताड़ते हुए उन्होंने ने साफ़ शब्दों में कहा था, “आप चाहते हैं, भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, वह आपके यहां सड़कें बनाए, आपको राशन दे और कश्मीर का वही दर्ज़ा हो जो भारत का है! लेकिन भारत के पास सीमित अधिकार हों और जनता का कश्मीर पर कोई अधिकार नहीं हो। ऐसे प्रस्ताव को मंज़ूरी देना देश के हितों से दग़ाबाज़ी करने जैसा है। मैं क़ानून मंत्री होते हुए ऐसा कभी नहीं करूंगा।“

एक सच यह भी है कि केंद्र इस राज्य को आंख मूंदकर पैसे देता है, फिर भी राज्य में उद्योग–धंधा खड़ा नहीं हो सका। यहां पूंजी लगाने के लिए कोई तैयार नहीं, क्योंकि यह धारा आड़े आती हैं। उद्योग का रोज़गार से सीधा संबंध है। उद्योग नहीं होगा तो रोज़गार के अवसर नहीं होंगे। राज्य सरकार की रोज़गार देने की क्षमता कम हो रही है। क़ुदरती तौर पर इतना समृद्ध होने के बावजूद इसे शासकों ने दीन-हीन राज्य बना दिया है। यह केंद्र के दान पर बुरी तरह निर्भर है। इसकी माली हालत इतनी ख़राब है कि सरकारी कर्मचारियों के वेतन का 86 फ़ीसदी हिस्सा केंद्र देता है। इतना ही नहीं इस राज्य के लोग पूरे देश के पैसे पर ऐश करते हैं।

रविवार, 6 अगस्त 2017

रक्षाबंधन: स्त्री को ‘इज़्ज़त’ के बोझ से मुक्त करने की ज़रूरत!

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आज रक्षा बंधन का त्यौहार है। आज के दिन हर लड़की या स्त्री अपने भाई के पास जाती है और आरती उतारने के बाद उसकी कलाई में रक्षा का धागा बांधती है। जिनके भाई दूर हैं, वे स्त्रियां कोरियर या दूसरे माध्यम से अपने भाई तक राखी पहुंचाती हैं। जिन स्त्रियों के भाई नहीं होते, वे स्त्रियां आज के दिन थोड़ी उदासी महसूस करती हैं। भाई की कमी महसूस करती हैं। मन को दिलासा देने के लिए किसी मुंहबोले भाई को राखी बांध कर इस परंपरा का निर्वहन करती हैं। कुल मिलाकर पता नहीं कब से यह परंपरा यूं ही चली आ रही है। पहले यह त्योहार इतना प्रचलित नहीं था। परंतु संचार माध्यम, बाज़ारवाद और बेहतर ट्रांसपोर्ट मोड ने इसे जन-जन में लोकप्रिय बना दिया।

बहुत गहन विचार और चिंतन करने पर यही लगता है कि निश्चित रूप से रक्षाबंधन नाम के इस त्योहार की शुरुआत असुरक्षा के माहौल में हुई है। यानी पहले समाज को स्त्री के लिए एकदम असुरक्षित बना दिया गया, फिर स्त्री की रक्षा की कॉन्सेप्ट विकसित किया गया। मतलब, धीरे धीरे समाज ऐसा हो होता गया होगा, जहां लड़कियां या महिलाएं असुरक्षित हो गई होती गई होंगी। तब उनकी रक्षा की नौबत आई गई होगी। दरअसल, आज से दस हज़ार साल पहले, जब झुंड की मुखिया स्त्री हुआ करती थी, तब न तो स्त्री न ही पुरुष को किसी रक्षा की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, क्योंकि तब सब लोग नैसर्गिक जीवन जीते थे और अपनी रक्षा स्वतः कर लेते थे।

मानव सभ्यता के विकास क्रम में जैसे जैसे समाज विकसित होता गया और झुंड के मुखिया का पद पुरुष ने स्त्री से छीन लिया और स्त्री को भोग की वस्तु बना दिया, तब से स्त्री असुरक्षित हो गई। कालांतर में पुरुष ने स्त्री पर एकाधिकार जताने के लिए उसके साथ साज़िश की। कह दिया स्त्री इज़्जत की प्रतीक है। अगर उसे कोई छू देगा तो वह इज़्ज़त गंवा बैठेगी। दरअसल, यह इज़्ज़त, जिसकी रक्षा स्त्री जीवन भर करती है और समाज में दयनीय हो जाती है, पूरी तरह मनोवैज्ञानिक सोच है। इस इज़्ज़त की रक्षा करने के चक्कर में वह हमेशा असुरक्षित महसूस करती है। कह सकते हैं कि वह बिंदास जीवन ही नहीं जी पाती, जबकि पुरुष इस इज़्ज़त नाम की वैज्ञानिक सोच से परे रहता है और मस्ती से जीवन जीता है। इस इज़्ज़त की रक्षा के चक्कर में स्त्री पुरुष से पिछड़ जाती है। उस अपनी इज़्ज़त की रक्षा के लिए पुरुष की ज़रूरत पड़ती है।

चूंकि आरंभ में स्त्री की मां के गर्भ से पैदा होने वाला पुरुष, जिसे वह भाई कहती है, ही उसकी इज़्ज़त की रक्षा करता है। बाद में यह काम दूसरा पुरुष जो उसका पति कहलाता है। वह पुरुष केवल स्त्री की मांग में सिंदूर भर कर या मंगलसूत्र पहनाकर या निकाह क़ुबूल है, कह कर स्त्री का स्वामी बन जाता है। वह पुरुष अपनी स्त्री की रक्षा करने के नाम पर उसका भयानक शोषण करता है। उसका मन चाहा इस्तेमाल करता है। उससे बलात्कार (इच्छा के विरुद्ध सेक्स) करता है और एक तरह से उस घर में ग़ुलाम बनाकर रखता है। यह ट्रिपल तलाक़ की समस्या भी इसी तरह के माइंडसेट का नतीजा है। पुरुष ख़ुद तो बिंदास जीवन जीता है, लेकिन इज़्ज़त की रखवाली की ज़िम्मेदारी स्त्री पर छोड़ देता है।

यह तो स्त्री की रक्षा नहीं हुई। पतिरूपी इस पुरुष से स्त्री की रक्षा का कोई प्रावधान नहीं है। ज़रूरत है, ऐसे प्रावधान किए जाएं, कि स्त्री को रक्षा की ज़रूरत ही न पड़े। समाज ऐसा हो कि पुरुष की तरह स्त्री भी उसमें बिंदास सांस ले सके। इसके लिए स्त्री को बताना होगा, कि उसके लिए जीवन महत्वपूर्ण है।  लिहाज़ा, उसे स्वतंत्र माहौल की ज़रूरत है। जहां वह इज़्ज़त के बोझ से परे होकर अपने बारे में सोचे और अपने बारे में हर फ़ैसले वह ख़ुद करे, न कि पिता, भाई या पति के रूप में उसके जीवन में आने वाला पुरुष उसके बारे में हर फ़ैसला ले। यानी स्त्री को करीयर ओरिएंटेड बनाने की ज़रूरत है। उसे बताया जाए कि उसके लिए लिए पति यानी हसबैंड से ज़्यादा ज़रूरी उसका अपना करियर है। कहने का मतलब स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने की ज़रूरत है।

आज स्त्री-पुरुष संबंधों को फिर से परिभाषित करने की ज़रूरत है। जब इस संबंध की शुरुआत हुई थी, तब समाज आज जैसा विकसित नहीं था। तब सूचना क्रांति नहीं हुई थी। आज की तरह दुनिया एक बस्ती में तब्दील नहीं हुई थी, जैसी कि दुनिया आज है। ऐसे में आज जब हर चीज़ नए सिरे से परिभाषित हो रही है, तो स्त्री-पुरुष संबंध भी क्यों न फिर से विज्ञान और प्रौद्योगिकी में हुए विकास के मुताबिक परिभाषित किए जाएं। अगर ऐसा किया जाता है, तो स्त्री अपने आप सुरक्षित हो जाएगी।

स्त्री को पूरी आज़ादी देने की ज़रूरत है। जितना आजाद पुरुष है, उतनी ही आज़ादी स्त्री को भी होनी चाहिए। स्त्री चाहे तो अकेले रहे या किसी पुरुष के साथ, ऐसे पुरुष के साथ जिसके साथ वह सहज महसूस करे। यानी स्त्री अपने लिए पति नहीं, बल्कि जीवनसाथी चुने और ख़ुद चुने और स्वीकार करे, न कि उसके जीवनसाथी का चयन उसका पिता या भाई करें। ख़ुद जीवनसाथी के चयन में अगर लगे कि उसने ग़लत पुरुष चुना है, तो वह उसका त्याग कर दे और अगर उसके जीवन में उसे समझने वाला कोई पुरुष आता है तो उसके साथ रहने के लिए वह स्वतंत्र हो। इसके लिए स्त्री को उसकी आबादी के अनुसार नौकरी देने के ज़रूरत है। ज़ाहिर है, पुरुष यह सब नहीं करेगा।

बहरहाल, रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसीलिए इसे श्रावणी या सलूनो भी कहते हैं। गहन रिसर्च के बावजूद राखी का त्यौहार कब शुरू हुआ, इसकी एकदम सटिक प्रमाणिक जानकारी नहीं मिल सकी। इसके बावजूद लगता तो यही है कि मानव सभ्यता के विकसित होने के बाद जब समाज पर पुरुषों का वर्चस्व हुआ, तब स्त्री की रक्षा के उद्देश्य को पूरा करने के लिए ही इस त्यौहार की परिकल्पना की गई होगी। मकसद यह रहा होगा कि समाज में पति-पत्नी के अलावा स्त्री-पुरुष में भाई-बहन का पवित्र रिश्ता कायम हो। बहरहाल, हो सकता है इन पंक्तियों के लेखक का आकलन शत-प्रतिशत सही न हो। लेकिन स्वस्थ्य समाज की संरचना के लिए ऐसा ही कुछ हुआ होगा। वैसे, हमारा देश उत्सवों और परंपराओं का देश है। सदियों से पूरे साल अनेक तीज-त्यौहार, पर्व, परंपराएं मनाए जाते रहे हैं। इन्हीं त्योहारों में रक्षा-बंधन यानी राखी भी है। यह त्यौहार भाई-बहन के बीच अटूट-बंधन और पवित्र-प्रेम को दर्शाता है। भारत के कुछ हिस्सों में इसे 'राखी-पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है।

स्कंध पुराण, पद्म पुराण भविष्य पुराण और श्रीमद्भागवत गीता में वामनावतार नामक कथा में राखी का प्रसंग मिलता है। मसलन, दानवेंद्र राजा बलि ने जब 100 यज्ञ पूर्ण कर स्वर्ग का राज्य छीनने का प्रयत्न किया तो इंद्र ने विष्णु से प्रार्थना की। तब विष्णु वामन अवतार लेकर बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। विष्णु ने तीन पग में आकाश पाताल और धरती नापकर बलि को रसातल में भेज दिया। इस प्रकार विष्णु द्वारा बलि के अभिमान को चकनाचूर कर देने से ही यह त्योहार बलेव नाम से भी मशहूर है। विष्णु पुराण के मुताबिक श्रावण की पूर्णिमा के दिन विष्णु ने हयग्रीव के रूप में अवतार लेकर वेदों को ब्रह्मा के लिए फिर से प्राप्त किया था। हयग्रीव को विद्या और बुद्धि का प्रतीक माना जाता है।

भविष्य पुराण के मुताबिक सुर-असुर संग्राम में जब दानव हावी होने लगे तब इंद्र घबराकर बृहस्पति के पास गये। इंद्र की पत्नी इंद्राणी ने रेशम का धागा मंत्रों की शक्ति से पवित्र करके पति के हाथ पर बांध दिया। संयोग से वह श्रावण पूर्णिमा का दिन था। मान्यता है कि लड़ाई में इसी धागे की मंत्र शक्ति से ही इंद्र विजयी हुए। उसी दिन से श्रावण पूर्णिमा के दिन धागा बांधने की प्रथा शुरू हो गई।

महाभारत में भी इस बात का उल्लेख है कि जब ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से पूछा, मैं सभी संकटों को कैसे पार कर सकता हूं तब भगवान कृष्ण ने उनकी और उनकी सेना की रक्षा के लिए राखी का त्यौहार मनाने की सलाह दी थी। उनका कहना था कि राखी के धागे में वह शक्ति है जिससे आप हर आपत्ति से मुक्ति पा सकते हैं। जब कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से शिशुपाल का वध किया तब उनकी तर्जनी में चोट आ गई। द्रौपदी ने उस समय अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांध दी। यह श्रावण मास की पूर्णिमा का दिन था। कृष्ण ने इस उपकार का बदला बाद में चीरहरण के समय उनकी साड़ी को बढ़ाकर चुकाया।

राजपूत जब लड़ाई पर जाते थे तब महिलाएं उन्हों माथे पर तिलक के साथ साथ हाथ में धागा बांधती थी। इस भरोसे के साथ कि धागा विजयश्री ले आएगा। मेवाड़ की रानी कर्मावती को बहादुरशाह द्वारा मेवाड़ पर हमला करने की सूचना मिली। रानी ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेज कर रक्षा याचना की। हुमायूं ने मुसलमान होते हुए भी राखी की लाज रखी और मेवाड़ पहुंचकर कर्मावती और उसके राज्य की रक्षा की। एक अन्य प्रसंगानुसार सिकंदर की पत्नी ने पति के हिंदू शत्रु पुरूवास को राखी बांधकर मुंहबोला भाई बनाया और युद्ध के समय सिकंदर को न मारने का वचन लिया। पुरूवास ने युद्ध के दौरान हाथ में बंधी राखी और अपनी बहन को दिए हुए वचन का सम्मान करते हुए सिकंदर को जीवन-दान दिया।

राखी सामान्यतः बहनें भाई को ही बांधती हैं, परंतु कई समाज में छोटी लड़कियां संबंधियों को भी राखी बांधती हैं। कभी-कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित व्यक्ति को भी राखी बांधी जाती है। अब तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को राखी बांधने की परंपरा भी शुरू हो गई है जो प्रकृति को बचाने के एक प्रयास है। ज़ाहिर है, इस तरह के प्रयास को बढ़ावा देना चाहिए।

राखी पर सभी को शुभकामनाएं।