शनिवार, 28 नवंबर 2009

क़साब के बारे में मीडिया की तालिबानी सोच

क़साब के बारे में मीडिया की तालिबानी सोच
हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई पर आतंकवादी हमले का मुख्य आरोपी मोहम्मद आमिर अजमल क़साब जब से पकड़ा गया है, तभी से हर आदमी उसे फ़ौरन फ़ांसी पर लटका देने की बात कर रहा है। शहीद पुलिस अफ़सरों हेमंत करकरे, अशोक कामटे, विजय सालास्कर या शशांक शिंदे की पत्नियां और बच्चे अगर पाकिस्तानी आतंकवादी को फ़ौरन मृत्युदंड देने की मांग करें तो समझ में आती है कि भावुकता में वे ऐसी मांग कर रहे हैं। सच पूछा जाए तो, इस तरह की भावनात्मक, बेतुकी और बेवकूफीभरी मांग अकसर वह लोग करते हैं जिन्हें क़ानून की समझ नहीं। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस बार मुंबई आतंकी हमले की पहली बरसी पर पीड़ितों के परिजनों और आम आदमी के साथ मीडिया के बड़े नाम भी इस बात का रोना रोते देखे गए कि मुंबई पर आतंकी हमले को साल भर हो गए लेकिन हत्यारे क़साब को फ़ांसी नहीं हुई। तक़रीबन हर टीवी चैनल, चाहे वो राष्ट्रीय हो या क्षेत्रिय या फिर भाषाई, पर एंकर (कई नामचीन पत्रकार भी) इस बात का बार-बार जिक्र करते रहे या मेहमान से सवाल पूछते रहे कि साल भर हो गया 164 मासूमों की हत्या करने वाला क़साब अभी तक ज़िंदा है। इस पर आपका रिएक्शन... अब तक प्रिंट के लोग इस बात पर हंसते रहे हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लोग कैमरे का सामने अकसर अतिरंजनापूर्ण, भावुकताभरी और अव्यवहारिक बातें करते हैं लेकिन इस बार प्रिंट के कई धाकड़ पत्रकार भी यह शिकायत करते देखे गए कि क़साब को फ़ांसी देने में क्यों विलंब हो रहा है या उसे ज़िंदा क्या रखा जा रहा है। और तो और, सदी के महानायक अमिताभ बच्चन इस बात को लेकर दुखी हो गए हैं कि आतंकी हमले के साल भर में कुछ नहीं बदला और क़साब देश में सबसे सुरक्षित व्यक्ति है। अमिताभ से कौन पूछे कि क़साब को जेल के सुरक्षित सेल में नहीं तो कहां रखा जाए। क्या धारावी के स्लम में रख दिया जाए या जेल में ही ऐसी जगह रख दिया जाए ताकि कोई उसकी हत्या कर दे और भारत में आतंकवादी हमले में पाकिस्तान की संलिप्तता का एकमात्र ज़िंदा सबूत भी ख़त्म हो जाए।

दरअसल, आतंकवाद ज़हर भारत अस्सी के दशक से ही पी रहा है। पहले पंजाब में आतंकवाद और उसके बाद जम्मू-कश्मीर में दहशतगर्दी। यानी ख़ून-ख़राबे का सिलसिला शुरू होने के बाद से ही नई दिल्ली पूरी दुनिया से कहती आ रही है कि भारत में हो रही मानवनिर्मित विनाश के लिए पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान ज़िम्मेदार है। लेकिन पाकिस्तान भारत के आरोप को सिरे से खारिज़ करता रहा है और सीधा सबूत मांगता रहा है। यहां तक कि अब तक आतंकवादी के रूप में भारत की सरज़मीन पर मारे गए अपने नागरिकों के शव भी पाकिस्तान नहीं लेता। इसलिए क़साब भारत के लिए अहम है क्योंकि मुंबई पर आतंकी हमले के दौरान तुकाराम ओंबले द्वारा पकड़ा गया यह आतंकवादी वह ज़िंदा सबूत है जिसे पाकिस्तानी हुक़्मरान झुठला नहीं सके। इसीलिए क़साब देश का सबसे महंगा क़ैदी है और मुंबई के आर्थर रोड जेल में उसकी सुरक्षा पर हर रोज़ क़रीब 85 लाख रुपए ख़र्च हो रहे हैं। वस्तुतः पाकिस्तानी नागरिक के रूप में क़साब की पहचान होने के बाद ही भारत पड़ोसी मुल्क़ पर दबाव बनाने में क़ामयाब रहा। इतना ही नहीं, भारत में किसी भी आतंकवादी हमले में अपना हाथ होने की बात पहली बार पाकिस्तान ने क़बूल की है। चाहे वह ख़ानापूर्ति ही कर रहा है लेकिन दुनिया भर को बता तो रहा है कि मुंबई पर आतंकी हमले की साज़िश के सूत्राधार जकीउर रहमान लखवी समेत लश्कर-ए-तैयबा के सात लोगों के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के आतंकवाद निरोधक न्यायालय में आरोप पत्र दायर किया जा चुका है। अगर भारत ने कूटनीतिक प्रयास इसी तरह जारी रखा तो इस्लामाबाद देर-सबेर लश्कर चीफ़ हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए मज़बूर हो जाएगा।

मज़ेदार बात यह है कि क़साब को फ़ौरन फ़ांसी देने की मांग करने वाले तमाम लोग तालिबान और उसकी संस्कृति की भर्त्सना करते हैं लेकिन दंड देने की तालिबानी तरीके का समर्थन कर रहे हैं। सीधी सी बात है, हम एक सभ्य समाज में रहते हैं। हमारे देश में लोकतंत्र है जिसके तीन स्तंभों में एक न्यायपालिका भी है। देश में अपराधियों को दंडित करने के लिए कुछ क़ायदे क़ानून बनाए हैं। किसी को सज़ा उसी के अनुसार दी जाती है। क़साब को भी दंडित करने की प्रक्रिया चल रही है। 26 नवंबर 2008 की रात गिरफ़्तारी के बाद आतंकी हमले की पूरे मामले की जांच हुई। क़साब को जल्द से जल्द सज़ा देने के लिए ही महाराष्ट्र सरकार ने विशेष अदालत का गठन किया। जहां क़साब के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दायर किया जा चुका है और मुकदमा भी मई से मुकदमा शुरू है। क़साब को ग़ुनाहगार साबित करने के लिए क़रीब तीन सौ गवाहों के साक्ष्य लिए जा रहे हैं। जिनमें अब तक 265 लोगों की गवाही हो चुकी है और एक दर्जन गवाह बाक़ी हैं। इसके अलावा अभियोजन पक्ष 300 उन गवाहों का हलफ़नामा भी पेश करने वाला है जिनकी व्यक्तिगत रूप से गवाही की ज़रूरत नहीं है। इनमें वे लोग शामिल हैं, जिन्होंने मरने वालों के शव अस्पताल पहुंचाए, अस्पताल स्टॉफ़, इलाज करने वाले डॉक्टर और वे लोग जिनकी संपत्तियों को क्षति पहुंची। यह सब इसलिए किया जा रहा है कि ताकि दुनिया को लगे कि एक विदेशी नागरिक को भी सज़ा सुनाने से पहले भारत उसे अपना बचाव करने का पूरा मौका दिया क्योंकि इस देश में गहरी जड़ों वाला लोकतंत्र ही नहीं है बल्कि यहां निश्पक्ष और पारदर्शी न्यायपालिका भी है। तभी तो क़साब के लिए पहले अंजलि वाघमारे को वकील बनाया गया और अब अब्बास क़ाज़मी उसकी पैरवी कर रहे हैं।

जो लोग क़साब को फ़ांसी पर लटकता (हालांकि इन पंक्तियों का लेखक भी अदालत का फ़ैसला आने का बाद उसे सज़ा देने का समर्थन करता है) देखना चाहते हैं, उन्हें अभी लंबा इंतज़ार करना होगा। क्योंकि अभी अभियोजन पक्ष की जिरह पूरी होने के बाद बचाव पक्ष के वकील गवाहों से जिरह करेंगे और इसके बाद तीनों आरोपियों क़साब, फ़हीम अंसारी और सबाउद्दीन के अपने बयान होंगे। आरोपियों के बयानों के बाद दोनों पक्षों में फिर जिरह होगी, इसके बाद ही अदालत फ़ैसला सुनाएगी। क़ाज़मी के मुताबिक इसमें तीन-चार महीने लग सकता है। उसके बाद कसाब विशेष अदालत के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगा। हवा भी इस पर लंबी बहस चलेगी। और अगर देश की सबसे बड़ी अदालत में भी क़साब को कोई राहत नहीं मिली तो सर्वोच्च न्यायालय में ही पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है। और अदालत से पूरी तरह निराश होने का बाद आख़िर में क़साब राष्ट्रपति के यहां दया अपील कर सकता है। जहां 2001 में संसद पर हमला करने की साज़िश रचने वाले मोहम्मद अफजल उर्फ अफ़ज़ल गुरू की अपील पहले से ही विचाराधीन हैं। राष्ट्रपति के यहां तीन दर्जन से ज़्यादा दया याचिकाएं विचाराधीन हैं। उनमें अफ़ज़ल गुरू की याचिका का 27 वां नंबर है। और यह नहीं भूलना चाहिए कि अफ़ज़ल की तमाम अपील को खारिज़ करते हुए सुप्रीम कोर्ट 2004 में ही उसे फ़ांसी की सज़ा सुना चुका है। और इस लश्कर आतंकी को 20 अक्टूबर 2006 को फ़ांसी पर लटकाया भी जाना था। लेकिन राष्ट्रपति के दरबार में गुहार लगाने से उसकी फ़ांसी फ़िलहाल टल गई है। यानी अफ़ज़ल गुरू को सज़ा सुनाने के पांच साल बाद भी दंडित नहीं किया जा सका है तो क़साब को बिना सुनवाई के कैसे फ़ांसी पर चढ़ा दिया जाए। अब क़साब के लिए देश की ज्यूडिशियरी सिस्टेम बदली तो नहीं जा सकती। इसलिए क़साब को फ़ांसी पर चढ़ाने की मांग करते हुए थोड़ा संयम बरतें।
(लेखक फ़ोकस टीवी, हमार टीवी के मुंबई ब्यूरोचीफ़ हैं)