मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कहानी - बदचलन

हरिगोविंद विश्वकर्मा

उसे लेकर मैं बुरी तरह उलझा था। ऐसा क्यों हुआ... उसने ऐसा क्यों किया... पूरे मामले को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रहा था। मैं अभी तक सकते में था। कह लीजिए, मेरे अंदर घमासान-सा मचा था। हालांकि, पछतावा भी हो रहा था और ग़ुस्सा भी आ रहा था मुझे अपने ऊपर। उसका रिऐक्शन मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था। हां, आख़िर उसका वीहैवियर उसके स्वभाव के एकदम विपरीत क्यों रहा। कहीं उसके बारे में मेरा पूरा का पूरा आकलन ग़लत तो नहीं था, उसकी प्रतिक्रिया तो कुछ ऐसी ही थी। ओ माई गॉड...! तब तो बहुत बड़ा अनर्थ हो गया। कैसे हुई मुझसे यह चूक...।

दरअसल, पिछले कई साल से वह इसी मोहल्ले में रह रही थी। पहले उसकी मां भी साथ रहती थी। दो साल पहले मां का स्वर्गवास हो गया और वह अकेली रह गई। तब से वह अकेली ही रह रही थी। कभी-कभार घर में एक वृद्ध महिला आ जाती थी, दो चार दिन के लिए। वह उसकी मौसी है। मौसी के वापस जाने के बाद वह फिर से अकेली। पास-पड़ोस के लोगों से वह ज़्यादा घुली-मिली नहीं थी।

नौकरी मिलने से पहले मैं घर पर ही रहता था। सो, उसे रोज़ सुबह घर से जाते और शाम को वापस लौटते देखता था। कभी-कभार रात भी हो जाती थी। पर जब से मैं ड्यूटी पर जाने लगा, उसकी दिनचर्या से अनजान हो गया। हालांकि लोग कहते थे कि वह देर रात रिक्शे से उतरती देखी जाती है। और महीने में चार-पांच बार तो रात भर बाहर ही रहती है और एकदम सुबह घर लौटती है।

यह भी पता नहीं कि वह क्या काम करती है या कहां काम करती है। हालांकि लोग कहते हैं कि वह यहीं पास में किसी ऑफ़िस में काम करती है जहां हफ़्ते में दो दिन शनिवार और रविवार अवकाश रहता है। कुछ लोग कहते हैं कि वह टीचर है। लेकिन सच क्या है भगवान ही जाने...

यह भी कहा जाता था कि उसकी शादी को कोई पांचेक साल गुज़र चुके हैं। उसकी शादी में मेरे घर वाले भी शामिल हुए थे। शादी के दौरान ही लेनदेन को लेकर विवाद हो गया और पर्याप्त दहेज की व्यवस्था न होने से उसकी विदाई नहीं हुई, वह ससुराल ही न जा सकी। कई लोग कानाफूसी करते हैं कि वह छूट गई है। जब तक उसकी मां जीवित थी, साथ रही। अब वह बिलकुल अकेली है। मां के निधन के कुछ महीने बाद एक दिन अचानक वह बहुत बीमार हो गई। उसे पास के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह काफी सीरियस थी।

उन दिनों मैं पढ़ाई पूरी करके मुंबई में नया-नया आया था। घर वालों के कहने पर मुझे भी उसे देखने के लिए अस्पताल जाना पड़ा। पड़ोसी होने के नाते मेरा फ़र्ज़ भी था। उस दिन, जब मैं अस्पताल पहुंचा तो अचानक उसकी तबीयत और बिगड़ गई। उसकी मौसी रो रही थी, मैंने उन्हें ढांढ़स बंधाया। उसके लीवर में कुछ शायद सूजन आ गई थी। शरीर ज्वर से तप रहा था। वह बेहाश थी। उसका ऑपरेशन होने वाला था। ख़ून की तत्काल सख़्त ज़रूरत थी लेकिन आसपास के ब्लडबैंकों में उसके ग्रुप का ख़ून ही न था। उसके कई रिश्तेदार आए थे। ख़ून देने की पहल कई लोगों ने की, पर किसी का ग्रुप भी उससे ना मिला जिससे कोई उसे ख़ून न दे सका। ब्लड डोनेशन की औपचारिक पहल मैंने भी की, हालांकि डर रहा था क्योंकि घर में किसी से पूछा नहीं था और मामला ख़ून एक अनजान लड़की को देने का है। मेरा संकट उस समय और बढ़ गया जब मेरा ग्रुप उसके ग्रुप का ही निकला और न चाहते हुए भी मुझे ख़ून देना पड़ा।

लेकिन उतने से ही काम नहीं होने वाला था, ख़ून की और ज़रूरत थी। इलाज कर रहे डॉ. बत्रा परेशान थे। ख़ून के अभाव में ऑपरेशन नहीं हो पा रहा था। और, उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।

आख़िरकार डॉ. बत्रा ख़ुद बेड पर लेट गए और अपने असिस्टेंट से ख़ून निकालने को कहा। मेरी ज़िंदगी में पहली घटना थी जब किसी डॉक्टर ने अपने मरीज को अपना ही ख़ून देने का फ़ैसला किया हो। मेरी ही नहीं, वहां मौजूद हर किसी की नज़र में डॉ. बत्रा का सम्मान अचानक बहुत बढ़ गया। वह महामानव का दर्जा पा गए। श्रद्धेय हो गए। उन्होंने जता दिया कि डॉक्टरों के लिए डॉक्टरी भले पैसा बनाने का ख़ालिस पेशा हो लेकिन उनके लिए पूजा है, सच्ची समाजसेवा है।

उस दिन ख़ून देने के बाद मैं कई घंटे अस्पताल में ही रहा। मन ही मन मना रहा था कि ख़ून देने की ख़बर घर वालों को न हो। पूरे समय तनाव में था कि क्या जवाब दूंगा। एक अनजान लड़की को ख़ून देने के अपने फ़ैसले को कैसे जस्टीफ़ाई करूंगा। निश्चित तौर पर लोग नाराज़ होंगे। हालांकि मेरे ख़ून देने की ख़बर मुझसे पहले ही मेरे घर पहुंच गई, मेरे भैया ख़ुद अस्पताल आ गए मुझे लेने के लिए। वह किसी ज़रूरतमंद को ख़ून देने के मेरे फ़ैसले से बहुत ख़ुश थे। मुझे बड़ी तसल्ली हुई। मैं हलका महसूस करने लगा।

बहरहाल, ऑपरेशन के बाद उसकी तबीयत सुधरने लगी। चार-पांच दिन में ठीक भी हो गई और अस्पताल से डिसचार्ज कर दी गई। उसकी मौसी साथ ही रही। दो महीने में वह एकदम भली-चंगी हो गई और मौसी वापस चली गई। बीमारी के बाद उसका रूप और भी निखर आया। तक़रीबन तीस साल की उम्र में कह लीजिए कि उसका यौवन ग़ज़ब का गदराया हुआ था। सुंदर तो थी ही, देखने वाला पहली नज़र में ही मंत्रमुग्ध हो जाए। हां, उसकी मुस्कुराहट भी बड़ी क़ातिल थी। स्वभाव से भी बहुत चंचल। हर किसी से बिंदास बातचीत करती और बिना किसी प्रसंग के हंस भी देती। छोटी-मोटी बातों का कभी बुरा नहीं मानती थी।

एक बार जब मैं घर में अकेला था तभी वह आ गई और मेरे बहुत क़रीब आकर धीरे से ‘थैक्स’ बोली। शायद ख़ून देने के लिए मेरा शुक्रिया अदा किया।

इस बीच एक कंपनी में मुझे नौकरी मिल गई। कंपनी बहुत दूर थी। मेरी दिनचर्या घर और कंपनी के बीच सिमट कर रह गई। आठ घंटे की नौकरी के लिए मुझे पांच-छह घंटे यात्रा में ख़र्च करने पड़ते थे। कुल 13 से 14 घंटे। मैं सुबह घर से निकलता और रात को ही लौट पाता। बस और लोकल गाड़ी की भीड़ में यात्रा करता हुआ मैं बुरी तरह थक जाता। इसीलिए बिस्तर पर पड़ते ही गहरी नींद की आगोश में चला जाता। और अगली सुबह सात बजे जगा दिया जाता। इस दौरान मेरे मोहल्ले में क्या कुछ होता रहा, मुझे पता ही न चला।

बहरहाल, शाम को आवारा लड़के धीरे-धीरे हमारे पड़ोस में जमा होने लगे। वह घर में होती तो दरवाज़े के सामने ही खड़े रहते। बाहर निकलती तो छींटाकशी करते, फब्तियां कसते। सड़कछाप मजनुंओं की तादाद दिनोंदिन बढ़ने लगी। हां, जिस दिन वह घर पर न होती तो वहां पूरी शांति रहती।

अलबत्ता, मुझे तो तब पता चला था जब पानी सिर से काफी ऊपर निकल गया। वह मोहल्ले की नंबर एक बदमाश लड़की मानी जाने लगी। यह चर्चा आम हो गई कि दरवाज़े के सामने खड़े होने वाले आवारा लड़को के साथ उसका चक्कर है।

एक बार मेरे अवकाश वाले दिन पड़ोस के भाजीवाले मास्टर घर आ गए। बात-बात में उन्होंने कहा –वह बहुत बदमाश लड़की है। एक बार मैंने ख़ुद आधी रात को नल के पास एक लड़के का साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ा था। अरे भाई, पक्की हरामी औरत है वह। रात में लड़कों के साथ स्कूल के अहाते में भी चली जाती है शरीर की प्यास बुझाने के लिए।

उनकी बात सुनकर मैं सकते में आ गया। क्योंकि वह मोहल्ले में बेहद सम्मानित व्यक्ति थे। उनकी देखी घटना झूठ तो हो ही नहीं सकती। लिहाजा, उसके बारे में मेरे ख़यालात बदलने लगे। मुझे लगा, ज़रूर उसमें खोट है। तभी तो पता नहीं कहां-कहां के आवारा लड़के उसके दरवाज़े पर हा-हा, हू हू करते रहते हैं। अगर वह सही होती तो विरोध तो करती।

ऐसी ही बातें बाद में मोहल्ले के कई और लोगों ने मुझे बताई। अब मेरे मन में यह बात घर कर गई कि वह सचमुच महाचालू और चरित्रहीन है, उसका नैतिक पतन हो चुका है। हालांकि, मैंने कभी उसे किसी लड़के से बात करते नहीं देखा था। हां, उसके घर के सामने आवारा किस्म के लड़कों का हुजूम ज़रूर मेरी नज़र में था।

धीरे-धीरे कानाफूसी होने लगी कि वह धंधा भी करती है। पैसे के लिए तन बेचती है। बड़े-बड़े हॉटेलों में क्लाइंट्स के पास जाती है। रात भर वहीं रहती है। लड़के भी अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए बिंदास उसके घर में घुस जाते हैं। और ना मालूम क्या क्या...

काफी अरसे बाद एक दिन वह घर आई। मेरा साप्ताहिक अवकाश था। मुझे देखकर मुस्करा दी और ‘हैलो’ बोली। औपचारिक अभिवादन के बाद मैं चुप हो गया। वह सामने कुर्सी पर बैठ गई और अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ने लगी। उसके बाद तो हर अवकाश पर मैं उसे अपने घर में अख़बार पढ़ते हुए देखने लगा। ऐसे समय आती जब मैं घर पर ही होता। मुझसे बात भी करती थी। इसके बाद तो हमारी खूब बात होने लगी। कुछ दिन बाद कई-कई घंटे बैठने लगी। कई मसलों पर बात भी करती। बातचीत में काफी मैच्यौर्ड लगती थी। पहुंचते ही पूछती, ‘खाना हो गया’। मैं भी झट से ‘हां’ कह देता था। हमारे बीच व्यक्तिगत बात बिलकुल न होती थी। इसलिए हम एक दूसरे से अनजान ही रहे।

कोई साल भर पहले, एक दिन उसके घर के सामने जुटने वाले लड़कों में आपस में ही मारपीट हो गई। चाकूबाज़ी में एक लड़का घायल हो गया। चर्चा थी कि लड़ने वाले दोनों लड़के उसके प्रेमी हैं और मारपीट की जड़ भी वही थी। उसी के लिए दोनों में ख़ूनी तक़रार हुई।

दो दिन बाद भाजीवाले मास्टर ने बताया कि दोनों युवकों के साथ उसे रात में कई बार स्कूल के अहाते में आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ चुके हैं। उन्होंने कहा –कार्तिक की कुतिया हो गई है साली। एक से मन नहीं भरता।

चाकूबाज़ी की घटना के बाद पुलिस आ गई और पूछताछ के लिए उसे थाने ले गई। रात को मैं घर आया तो पता चला कि कई घंटे से वह थाने में ही है। उसकी मौसी और घर वालों के आग्रह पर मैं एक स्थानीय नेता के साथ थाने गया और देर रात उसे वापस लिवा आया। घर आते समय वह फूट-फूट कर रो रही थी। लेकिन मुझे लगा कि नाटक कर रही है। चरित्रवान होने का ढोंग। मुझ पर इंप्रेशन बना रही है।

उस वारदात के बाद वह थाने में भी बदनाम औरत के रूप में दर्ज हो गई। उसके घर पुलिस वाले भी आने लगे। छोटी-मोटी बात पर उसे थाने बुलाया जाने लगा। कुल मिलाकर वह मोहल्ले की सीमा लांघकर आसपास के इलाके में कुख्यात हो गई। इस प्रकरण के बाद उसकी नौकरी भी छूट गई। वह घर पर ही रहने लगी। हां महीने में कई बार मैं उसे काम से लौटते देखता था। शायद उसे कैज़ुअल या पार्टटाइम जॉब मिल गया था। कई बार मैंने भी उसे सुबह-सुबह घर लौटते देखा। मगर कभी नहीं पूछा कि वह क्या काम करती है।

अब वह साप्ताहिक अवकाश के दिन मेरे पास और ज़्यादा वक़्त गुज़ारने लगी। कह लीजिए कि सुबह से शाम मेरे घर में बैठी रहती। मैं संकोचवश कुछ बोल नहीं पाता था। इस दौरान या तो मुझसे बात करती या अख़बार, पत्रिका या किसी पुस्तक पढ़ती रहती। वह कई चर्चित किताबों और उपन्यासों और उनके किरदारों के बारे में बात करती थी। कभी-कभार तो नामचीन विदेशी लेखकों की बात कर मुझे भी चौंका देती। विश्व-साहित्य में इतना अपडेटेड होने की उसकी क़ाबिलियत का मैं कायल था। उसके चरित्र और रुचि में भारी विरोधाभास पर अकसर हैरान होता। और तो और कई बार तिपाई पर ही सो जाती।

एक दिन दूसरे पड़ोसी रामू मास्टर मेरे घर आ गए। वह भी उसके बारे में भाजीवाले मास्टर की ही तरह विचार रखते थे।

बात-बात में उन्होंने कहा –पटा लिया आपने भी तितली... मैं चौंककर उकी ओर देखा।

–आजकल, उन्होंने कहा, वह आपके घर में खूब आती है। बहती गंगा में आप भी हाथ धो रहे हैं... अच्छा है! माल अच्छा है! मोहल्ले और आसपास के छोकरे ही नहीं पुलिस वाले तर रहे हैं, आप भी तर जाइए! इतना अच्छा मौक़ा मिलने पर चूकना मूर्खता है!

रामू मास्टर की बात मुझे बहुत बुरी लगी और मैंने उन्हें डांटकर चुप करा दिया। पर उनकी बात से मेरी नींद हराम हो गई। पहली बार मैंने अपने को बेचैन पाया। मेरा ध्यान बार-बार उसी की ओर जा रहा था। देर रात तक मैं न मालूम क्या-क्या सोचता रहा।

मैंने महसूस किया कि रामू मास्टर की बात से मेरे अंदर आग लग गई है। जिसमें मेरा विवेक धू-धू करके जल रहा है। मन में विकृत विचार जन्म लेने लगे। उसी समय मुझे लग गया था कि कुछ न कुछ अनर्थ होने वाला है क्योंकि धीरे-धीरे मेरा अपने मन पर से नियंत्रण ढीला हो रहा था। मेरे अंदर दो व्यक्ति पैदा हो गए। एक उसकी ओर आकर्षित होता, दूसरा मना करता। मेरे अंदर अंतरद्वंद्व का सिलसिला शुरू हो गया।

उसे लेकर हमेशा ही उलझा रहता। एक दिन अचानक मन में ख़याल कौंधा, क्या वह मुझसे पटेगी! अगले पल सिर झटक दिया कि मैं क्या वाहियात सोच रहा हूं। अंतरद्वंद्व चलता रहा। मेरे अंदर का एक व्यक्ति कहता, मैं भी कोशिश करूं, अगले क्षण अंदर का दूसरा व्यक्ति कहता, नहीं कभी नहीं। यह ग़लत है।

मेरे चरित्र और कामदेव के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। फिर मैंने महसूस किया कि कामदेव चरित्र पर भारी पड़ रहे हैं। कुछ बातें न चाहते हुए भी मैं कर रहा था। मसलन, जब भी वह घर आती मैं अपने दरवाज़े पर खड़ा रहता। आते-जाते उसका कोई ना कोई अंग मुझसे ज़रूर छू या टकरा जाता। इससे मुझे सुख मिलता। मैंने महसूस किया कि मैं उसके उरोजों और कूल्हों को भी छूने की भरसक कोशिश करता हूं। मुझे अपने ऊपर दया आने लगी, कि मैं स्पर्श-मनोरोगी होता जा रहा हूं। छू जाने पर उसका विशेष ढंग से हंसना और पलक झपकाना, मेरी धड़कन बढ़ा देता। इन सब हरकतों से मुझे लगता, वह लिफ़्ट दे रही है। वह जब भी मेरे घर आती तो मुझे बहुत अच्छा लगता।

मुझे लगा वह मेरे मनोभाव अच्छी तरह समझती है। इसके बावजूद मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि कुछ कहता। मैं हरदम यही सोचता, काश वह ही पहल करती! लेकिन वह आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेरी व्याकुलता दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी।

मेरी इस हालत के लिए रामू मास्टर ज़िम्मेदार थे। आज सुबह वह मेरे पास बैठे थे। इधर-उधर की बातें हो रही थीं। मुझे पता था जल्द ही वह उसका ही जिक्र करेंगे।

–आख़िरकार तितली आप पर ही मरने लगी। उन्होंने मुस्कराकर धीरे से कहा।

ना मालूम क्यूं इस बार मुझे उनकी बात बुरी नहीं लगी। मैंने मुस्कराकर प्रशंसा-पत्र ग्रहण कर लिया। हालांकि मुझे मेरी ही मुस्कराहट अच्छी नहीं लगी। फिर भी एक कुटिल मुस्कान मेरे चेहरे से चिपक गई। मुझे ख़ुद से घृणा हुई।

–हमें भी दिलवाओ यार! बातचीत में रामू मास्टर और आगे बढ़ गए।

–क्या...? मैं उनका मतलब समझ गया।

–जिसका मज़ा आप लूट रहे हैं। वह बेशर्मी पर उतर आए।

–मास्टर आप ग़लत समझ रहे हैं। अबकी बार मुझे सफ़ाई देनी पड़ी।

–अब हमीं से झूठ मत बोलो यार।

उसी समय वह घर में आ गई। और सोफे पर बैठकर अख़बार देखने लगी। रामू मास्टर के चेहरे पर अर्थ भरी मुस्कान थी। थोड़ी देर बाद वह चले गए। मैं भी एक किताब निकाल कर पन्ने पलटने लगा।

कमरे में नीरवता पसरी थी। मैं सोच रहा था, हमारे बीच अब तो कुछ होना ही चाहिए।

–यह आदमी आपके यहां बहुत ज़्यादा आता है क्या...? अचानक वह बिना किसी भूमिका के बोली।

–कौन...? रामू मास्टर...?

–हां...!

–हां, आ जाते हैं कभी-कभार। नेक इंसान हैं। मैंने अपनी तरफ़ से सफ़ाई दी –मैं नहीं जाता इन लोगों के पास। ये ही आ जाते हैं।

वह बग़ौर मुझे ही देख रही थी। देखे जा रही थी। शायद मेरी रामू मास्टर से मेलजोल के बारे में सोच रही थी।

–आपको पता है... उसका स्वर तेज़ था।

–क्या...?

–यही कि हमारे बारे में ये लोग क्या चर्चा करते हैं।

–तुम्हीं बताओ न...! क्या चर्चा करते हैं...? मैं जानने को उत्सुक हो गया।

–फिलहाल तो यह चर्चा है कि... वह रुक गई। थोड़ा विराम लेकर बोली... कि मैं आपसे भी फंस गई हूं। वह उसी तरह बग़ौर देख भी रही थी। मुझे पढ़ने की कोशिश कर रही थी शायद... बाद में शायद हलके से मुस्करा दी थी।

उसकी बात सुनकर रोमांच से मेरे रोंगटे खड़े हो गए। शरीर में सनसनी हुई। दिल की धड़कनें असामान्य। पक्का यक़ीन हो गया कि वह मुझे खुला लिफ़्ट दे रही है। अचानक, पता नहीं कैसे, मेरा हाथ उसकी ओर बढ़ गया और उसके हाथ को नरमी के साथ पकड़ लिया। उसने भी विरोध नहीं किया उस समय। मुझे यही लगा, शायद मेरी सांसे गरम हो रही हैं।

–क्या सचमुच ऐसी अफवाह है...? मैंने उसका हाथ धीरे से दबा दिया। हालांकि अंदर ही अंदर डर रहा था और कांप भी रहा था।

वह हंस दी। पर इस बार उसकी हंसी फीकी-सी थी। पहली बार मुझे उसकी हंसी में व्यंग्य की गंध आई।

–तुम हंसी क्यों...? अबकी बार मैंने उसका हाथ सहलाते हुए पूछा।

–यही कि आपको लेकर भी मैं गच्चा खा गई। उसकी आवाज़ बहुत कठोर थी, बेहद निर्मम।

–मतलब...? मुझे उसकी हरकत से धक्का-सा लगा।

जवाब देने की जगह उसने अपना हाथ तेज़ी से खींच लिया।

–मतलब कि आप भी ठहरे एक साधारण पुरुष, जिसे औरत चाहिए! है ना! आपके अंदर भी वासना की आग में जलता मर्द देख रही हूं जो मुझे पाने की जुगत में है। सोचा था, मोहल्ले में तमाम हवसियों के बीच कोई ऐसा भी है जिसे अपना मान सकती हूं, दोस्त कह सकती हूं। उसके पास सुरक्षित महसूस कर सकती हूं। लेकिन साफ़ दिख रहा है कि आपकी भी नज़र मेरे जिस्म, मेरी जवानी, मेरे उरोजों पर है। आज यक़ीन हो गया कि दुनिया के सारे मर्द एक जैसे होते हैं। औरत के भूखे, विवेकहीन, असामाजिक। सामाजिक प्राणी की जगह केवल प्राणी। पशु। जिसकी केवल दो ही ज़रूरतें होती हैं, संभोग और भोजन। इसीलिए इनकी निग़ाह स्त्री के तन पर होती है। स्त्री की लाचारी का बेज़ा फायदा उठाना चाहते हैं। मौक़े की तलाश में रहते हैं। दोस्ती और हमदर्दी को ढोंग रचते हैं। जबकि होते हैं सब के सब बलात्कारी। भाजीवाले मास्टर ने भी मुझे पाने की कोशिश की। छी...! सफल न हुआ तो मैं चरित्रहीन हो गई। बदनाम कर दिया साले ने। उस कृतघ्न के कारण ही आज मेरी यह हालत है। हे भगवान मैं क्या करूं? वह फूट-फूटकर रोने लगी। मुझे तो काटो तो ख़ून नहीं। जैसे किसी ने आसमान से खींचकर ज़मीन पर ला पटक दिया हो।

वह तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गई।

मैं एकदम जड़वत्। कोई जवाब ही नहीं सूझा। किंकर्तव्यविमूढ़। चेतनाशून्य।

हादसा कहूं या और कुछ और... उसे गुज़रे कई घंटे बीत चुके हैं मगर मैं उसी तरह स्तंभित हूं...

–ऐसा क्यों किया उसने। मैं तब से लगातार सोच ही रहा था –क्या मैं उसे बहुत बुरा आदमी लगा। या मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर ग़लती की। उसका रिऐक्शन इस तरह नहीं होना चाहिए था।

मैं लगातार सोचे जा रहा था। कभी अपने ऊपर ग़ुस्सा आता तो कभी उस पर।

–जब मुझसे इतना ही परहेज था, मैं इतना ही बुरा था तो क्यों आती थी मेरे पास... क्यों बैठती थी दिन-दिन भर... मैं फिर से बड़बड़ाने लगा –जो भी हो, वह मेरे बारे में ग़लत धारणा बना कर गई है।

शाम हो गई। हादसे को पूरे सात घंटे।

–ग़लती तो मेरी ही थी। मेरे अंतःकरण से आवाज आई। हां, किस हक़ से मैंने उसका हाथ पकड़ा। आख़िर मेरी भी मंशा तो ग़लत ही थी। मुझे उसके घर जाकर माफी मांगनी चाहिए।

मैं सोचता रहा। उसके घर जाऊं या नहीं। फिर महसूस किया कि मेरे पांव ख़ुद उसके घर की ओर बढ़ रहे हैं। मैं बुदुबदाया –मुझे उसके सामने ग़लती मान लेनी चाहिए और सॉरी बोलना चाहिए।

मैंने उसके दरवाज़े पर दस्तक दी।

क़रीब पांच मिनट तक खड़ा रहा। मुझे लगा कि दरवाज़ा नहीं खोलेगी। लौट रहा था कि दरवाज़ा खुल गया।

उसका चेहरा बुझा था। मुझे देख रही थी। मैं उसके बग़ल से घर में दाख़िल हो गया। उसने दरवाज़ा बंद किया और मेरे पास आ गई।

अचानक फिर लरज पड़ी, –प्लीज़... मुझे पाने की कोशिश न करो...! दहेजलोभी पति ने तलाक़ दे दिया। अब मेरे पास कोई और ठौर नहीं। सो मुझे अपनी ही नज़र में मत गिराओ। दुनिया की नज़र में पहले ही गिर चुकी हूं। अब अपनी ही नज़र में नहीं गिरना चाहती। जब लोग मेरे बारे में ऊलजलूल बकते हैं तो मेरी आत्मा, मेरा चरित्र मुझे दिलासा देते हैं कि लोग झूठ बोल रहे हैं। यही मेरा आत्मबल है जो मुझे तमाम अपमान और जिल्लत झेलने की ताक़त देता है। इसीलिए दुनिया की परवाह नहीं करती। किसी को सफ़ाई नहीं देती। मुझे लोगों से चरित्र प्रमाण-पत्र नहीं चाहिए। जिनका चरित्र ख़ुद संदिग्ध है वे क्या दूसरों को चरित्र प्रमाण-पत्र देंगे। चूंकि लोग ग़लत हैं सो मैंने कभी किसी की परवाह नहीं की। आपके घर में मुझे ज़्यादा सुरक्षा का अहसास होता रहा है। तभी तो पढ़ते-पढ़ते बिंदास सो भी जाती थी। आपसे एक अटूट रिश्ता सा बन गया था। हमारी रुचि भी मेल खाती थी। आपका स्वभाव मुझे आकर्षित करता था। भावनात्मक संबल मिलता था आपसे। ओह... कितना पाक था हमारा रिश्ता। स्त्री-पुरुष संबंधों से बहुत ऊपर। मुझे लगा था इस बस्ती में एक इंसान भी है जिसकी आत्मा निष्पाप है, अकलुष है। पर मैं यहां भी छली गई। आपसे दोस्ती का भ्रम पाल बैठी। पता नहीं इस शरीर में ऐसा क्या है कि हर पुरुष ललचाई नज़र से देखता है। हर जगह वासना की भूखी निग़ाहे घूरती हैं। सोचती हूं, इस चेहरे, इस यौवन को नष्ट कर दूं लेकिन मुझसे यह भी नहीं हो पाता। लड़की हालात से कितनी लाचार होती है, आप नहीं समझ सकते। मेरी पीड़ा, मेरी व्यथा भी आपके गले नहीं उतरेगी क्योंकि आप एक पुरुष हैं। आप क्या कोई भी पुरुष किसी नारी का दर्द नहीं समझ सकता। आज लग रहा है, दुनिया में अकेली हूं। विलकुल तन्हा। पता नहीं अब हवसियों से लड़ पाऊंगी भी या नहीं। कितनी बदनसीब हूं मैं। हे प्रभु। मेरी रक्षा करना। अब मैं कहां जाऊं। कहां मिलेगा सहारा और संरक्षण।

मुझसे रहा नहीं गया और उसकी ओर बढ़ गया।

सॉरी.. मुझसे ब्लंडर हो गया। तुम्हें समझ ही न पाया। प्लीज़ माफ़ कर दो। मैं तो तुम्हारा दोस्त बनने के भी क़ाबिल नहीं। माफ़ कर दो ना प्लीज... प्लीज़...

कहना चाहा कि आओ जीवन का आगे का सफ़र साथ मिलकर तय करें, अगर तुम्हें मंजूर हो तो तुम्हें सहारा और संरक्षण देने में मुझे गर्व महसूस होगा लेकिन ये वाक्य ज़बान से निकले ही नहीं।

वह चुप हो गई थी। मैं उसे सामान्य होने का मौक़ा देना चाहता था। सो वापस हो लिया। इस बार मैंने ख़ुद को हलका महसूस किया।

॰॰॰॰॰

बुधवार, 14 जुलाई 2010

ग़ज़ल - आ गए क्यों उम्मीदें लेकर

आ गए क्यों उम्मीदें लेकर
करूं तुम्हें विदा क्या देकर...

लाख मना की पर ना माने
क्यों रह गए तुम मेरे होकर...

अपना लेते किसी को तुम भी
आखि‍र क्यों रहे खाते ठोंकर...

जी ना सके इस जीवन को
क्या पाए खुद को जलाकर...

अब तो मेरी तमाम उम्र में
रहोगे चुभते कांटे बनकर...

हरिगोविंद विश्वकर्मा

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

कविता : चित्रकार की बेटी

तुम बहुत अच्छे इंसान हो
धीर-गंभीर और संवेदनशील
दूसरों की भावनाओं का सम्मान करने वाले
बहुत कुछ मेरे पापा की तरह
तुम्हारे पास है बहुत आकर्षक नौकरी
कोई भी युवती सौभाग्य समझेगी अपना
तुम्हारी जीवन-संगिनी बनने में
मैं भी अपवाद नही हूं
तभी तो
अच्छा लगता है मुझे सान्निध्य तुम्हारा
इसे प्यार कह सकते हो तुम
हां तुममें जो पुरूष है
उससे प्यार करने लगी हूं मैं
स्वीकार नहीं कर पा रही हूं
फिर भी परिणय प्रस्ताव तुम्हारा
तुम एक चित्रकार हो
और मैं चित्रकार की बेटी
तुम्हारे अंदर देखती हूं मैं
अपने चित्रकार पापा को
एक ऐसा इंसान
जो पूरी ज़िंदगी रहा
दीन-हीन और पराजित
अपराधबोध से ग्रस्त
अपनी बेटी-पत्नी से डरता हुआ
पैसे-पैसे के लिए संघर्ष करता हुआ
हारता हुआ ज़िंदगी के हर मोर्चे पर
तमाम उम्र जो ओढ़े रहा
स्वाभिमान की एक झीनी चादर
उसके स्वाभिमान ने
उसके सिद्धांत ने
बनाए रखा उसे तमाम उम्र कंगाल
और छीन लिया मुझसे
मेरा अमूल्य बचपन
मेरी मां का यौवन
मेरी मां सहेजती रही
उस चित्रकार को
पत्नी की तरह ही नहीं
एक मां की तरह भी
एक संरक्षक की तरह भी
उसे खींचती रही
मौत के मुंह से
सावित्री की तरह
फिर भी वह चला गया
ख़ून थूकता हुआ
मां को विधवा और मुझे अनाथ करके
बेशक वह था एक महान चित्रकार
एक बेहद प्यार करने वाला पति
एक ख़ूब लाड़-दुलार करने वाला पिता
लेकिन वह चित्रकार था
एक असामाजिक प्राणी भी
समाज से पूरी तरह कटा हुआ
आदर्शों और कल्पनाओं की दुनिया में
जीने वाला चित्रकार
कभी न समझौते न करने वाला ज़िद्दी कलाकार
लेकिन जब वह बिस्तर पर पड़ा
भरभरा कर गिर पड़ीं सभी मान्यताएं
बिखर गए तमाम मूल्य
अंतत दया का पात्र बनकर
गया वह इस दुनिया से
उसके भयावह अंत ने
ख़ून से सनी मौत ने
हिलाकर रख दिया बहुत अंदर से मुझे
नफ़रत सी हो गई मुझे
दुनिया के सभी चित्रकारों से
मेरे अंदर आज भी
जल रही एक आग
जब मैं देखती हूं अपनी मां को
ताकती हूं उसकी आंखों में
तब और तेज़ी से उठती हैं
आग की लपटें
पूरी ताक़त लगाती हूं मैं
ख़ुद को क़ाबू में रखने के लिए
ख़ुद को सहज बनाने में
इसीलिए
तुमसे प्यार करने के बावजूद
तुम्हारे साथ
परिणय-सूत्र में नहीं बंध सकती मैं
जो जीवन जिया है मेरी मां ने
एक महान चित्रकार की पत्नी ने
मैं नहीं करना चाहती उसकी पुनरावृत्ति
तुम्हारी जीवनसंगिनी बनकर
नहीं दे पाऊंगी तुम्हें
एक पत्नी सा प्यार
इसलिए मुझे माफ़ करना
हे अद्वितीय चित्रकार

हरिगोविंद विश्वकर्मा

सोमवार, 12 जुलाई 2010

जिंदगी भर

सौदा घाटे का करते रहे जिंदगी भर
जोड़-घटाने में उलझे रहे जिंदगी भर

एक गुनाह की बड़ी कीमत चुकाई
खुद से ही डरते रहे जिंदगी भर

दुनिया के सामने आखिर आ ही गया
जिस राज को छिपाते रहे जिंदगी भर

कामयाबियों के नाम पर शिफर ही रहे
न मालूम क्या करते रहे जिंदगी भर

दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका
जिस शख्स से चिपके रहे जिंदगी भर

कलियुग का मतलब जान नहीं पाए
सतयुग का भ्रम पाले रहे जिंदगी भर

झूठ बोलने का साहस कभी न हुआ
सच से भी कतराते रहे जिंदगी भर

खुद रोने लगते थे कहीं देखकर आंसू
बस आंसू बहाते रहे जिंदगी भर

दिल को हमेशा दिमाग से ऊपर रखा
भावनाओं में बहते रहे जिंदगी भर

आखिर देखने भी नहीं आया वह शख्स
जिसका इंतजार करते रहे जिंदगी भर

हरिगोविंद विश्वकर्मा

संभल जाऊंगा

ऐसा ना सोचो कि मैं बिखर जाऊंगा
बस संभलते संभलते संभल जाऊंगा

मौसम क्या वह तो बदलता रहता है
फूल की तरह मैं कभी गिर जाऊंगा

वक़्त भर देता है हर तरह के ज़ख्म
मैं भी इस दौर से निकल जाऊंगा

कब पूरी हुई है आरजू हर किसी की
यही सोचकर अपना मन बहलाऊंगा

नसीबवाले रहे जिन्हें मोहब्बत मिली
उनका नाम ना लो बिफर जाऊंगा

हरिगोविंद विश्वकर्मा

शनिवार, 10 जुलाई 2010

जीवन का डिब्बा

डिब्बे में से निकालकर
कर देता हूं खर्च मैं
रोजाना एक दिन
मुझे नहीं है पता
बचे हैं कितने दिन
जीवन के डिब्बे में
लेकिन मुझे मालूम है
इसी तरह
एक-एक करके
खर्च कर डालूंगा मैं
अपने तमाम दिन
एक दिन
आएगा ऐसा भी
जब डिब्बा
हो जाएगा खाली
और उसमें से
निकालना पड़ेगा
खाली हाथ मुझे
बिना दिन के
मुझे खाली हाथ देखकर
पार्थिव कहेंगे लोग मुझे
फिर देंगे जला
या कर देंगे दफन
कोई मुझे
एक दिन तो दूर
अपना एक पल भी
नहीं देगा
दान में या उधार
मेरी पत्नी भी
मेरे बच्चे भी
मेरा परिवार भी
मेरे दोस्त भी…

हरिगोविंद विश्वकर्मा

मेरी उम्मीदें

बेक़ाबू अकसर हो जाती हैं मेरी उम्मीदें
मेरी बात नहीं मानती हैं मेरी उम्मीदें

हर रोज़ सुला देता हूं अपने ही हाथों
पर सुबह जाग जाती हैं मेरी उम्मीदें

जानती हैं तुम हो दरिया के उस किनारे
फिर भी ज़ोर मारती हैं मेरी उम्मीदें

पस्त नहीं होती तेरी उदासीनता से
मुझे मज़बूर करती हैं मेरी उम्मीदें

इन्हें शायद दर्द का अंदाज नहीं होता
तभी तो दर्द बढ़ाती हैं मेरी उम्मीदें

मन को दिखाती हैं ढेर सारे सपने
फिर मुझको रुलाती हैं मेरी उम्मीदें

पैदा हो गईं ये पता नहीं कैसे ये
मुझे लाचार करती हैं मेरी उम्मीदें

ज़हर देना ही पड़ेगा इन्हें एक दिन
मेरे दर्द की सबब हैं मेरी उम्मीदें

माफ करना हे मेरे सपनों की परी
सब मुझसे लिखवाती हैं मेरी उम्मीदें

हरिगोविंद विश्वकर्मा

गुरुवार, 1 जुलाई 2010

गांधीजी की सेक्स लाइफ

गांधीजी की सेक्स लाइफ
Monday, 26 April 2010 16:50

यह लेख मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स की नई किताब “गांधीः नेकेड ऐंबिशन” की समीक्षा भर है॥
हरिगोविंद विश्वकर्मा

क्या राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी असामान्य सेक्स बीहैवियर वाले अर्द्ध-दमित सेक्स मैनियॉक थे? जी हां, महात्मा गांधी के सेक्स-जीवन को केंद्र बनाकर लिखी गई किताब “गांधीः नेकेड ऐंबिशन” में एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री के हवाले से ऐसा ही कहा गया है। महात्मा गांधी पर लिखी किताब आते ही विवाद के केंद्र में आ गई है जिसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में उसकी मांग बढ़ गई है। मशहूर ब्रिटिश इतिहासकार जैड ऐडम्स ने पंद्रह साल के अध्ययन और शोध के बाद “गांधीः नेकेड ऐंबिशन” को किताब का रूप दिया है।
किताब में वैसे तो नया कुछ नहीं है। राष्ट्रपिता के जीवन में आने वाली महिलाओं और लड़कियों के साथ गांधी के आत्मीय और मधुर रिश्तों पर ख़ास प्रकाश डाला गया है। रिश्ते को सनसनीख़ेज़ बनाने की कोशिश की गई है। मसलन, जैड ऐडम्स ने लिखा है कि गांधी नग्न होकर लड़कियों और महिलाओं के साथ सोते ही नहीं थे बल्कि उनके साथ बाथरूम में “नग्न स्नान” भी करते थे।
महात्मा गांधी हत्या के साठ साल गुज़र जाने के बाद भी हमारे मानस-पटल पर किसी संत की तरह उभरते हैं। अब तक बापू की छवि गोल फ्रेम का चश्मा पहने लंगोटधारी बुजुर्ग की रही है जो दो युवा-स्त्रियों को लाठी के रूप में सहारे के लिए इस्तेमाल करता हुआ चलता-फिरता है। आख़िरी क्षण तक गांधी ऐसे ही राजसी माहौल में रहे। मगर किसी ने उन पर उंगली नहीं उठाई। ऐसे में इस किताब में लिखी बाते लोगों ख़ासकर, गांधीभक्तों को शायद ही हजम हों। दुनिया के लिए गांधी भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के आध्यात्मिक नेता हैं। वह अहिंसा के प्रणेता और भारत के राष्ट्रपिता भी हैं। जो दुनिया को सविनय अवज्ञा और अहिंसा की राह पर चलने की प्रेरणा देता है। कहना न होगा कि दुबली काया वाले उस पुतले ने दुनिया के कोने-कोने में मानव अधिकार आंदोलनों को ऊर्जा दी, उन्हें प्रेरित किया।
नई किताब यह खुलासा करती है कि गांधी उन युवा महिलाओं के साथ ख़ुद को संतप्त किया जो उनकी पूजा करती थीं और अकसर उनके साथ बिस्तर शेयर करती थीं। बहरहाल, ऐडम्स का दावा है कि लंदन से क़ानून की पढ़ाई करने के बाद वकील से गुरु बने गांधी की इमैज कठोर नेता की बनी जो अपने अनोखी सेक्सुअल डिमांड से अनुयायियों को वशीभूत कर लेता है। आमतौर पर लोग के लिए यह आचरण असहज हो सकता है पर गांधी के लिए सामान्य था। ऐडम्स ने किताब में लिखा है कि गांधी ने अपने आश्रमों में इतना कठोर अनुशासन बनाया था कि उनकी छवि 20वीं सदी के धर्मवादी नेताओं जैम्स वॉरेन जोन्स और डेविड कोरेश की तरह बन गई जो अपनी सम्मोहक सेक्स अपील से अनुयायियों को क़रीब-क़रीब ज्यों का त्यों वश में कर लेते थे। ब्रिटिश हिस्टोरियन के मुताबिक महात्मा गांधी सेक्स के बारे लिखना या बातें करना बेहद पसंद करते थे। किताब के मुताबिक हालांकि अन्य उच्चाकाक्षी पुरुषों की तरह गांधी कामुक भी थे और सेक्स से जुड़े तत्थों के बारे में आमतौर पर खुल कर लिखते थे। अपनी इच्छा को दमित करने के लिए ही उन्होंने कठोर परिश्रम का अनोखा स्वाभाव अपनाया जो कई लोगों को स्वीकार नहीं हो सकता।
किताब की शुरुआत ही गांधी की उस स्वीकारोक्ति से हुई है जिसमें गांधी ख़ुद लिखा या कहा करते थे कि उनके अंदर सेक्स-ऑब्सेशन का बीजारोपण किशोरावस्था में हुआ और वह बहुत कामुक हो गए थे। 13 साल की उम्र में 12 साल की कस्तूरबा से विवाह होने के बाद गांधी अकसर बेडरूम में होते थे। यहां तक कि उनके पिता कर्मचंद उर्फ कबा गांधी जब मृत्यु-शैया पर पड़े मौत से जूझ रहे थे उस समय किशोर मोहनदास पत्नी कस्तूरबा के साथ अपने बेडरूम में सेक्स का आनंद ले रहे थे।
किताब में कहा गया है कि विभाजन के दौरान नेहरू गांधी को अप्राकृतिक और असामान्य आदत वाला इंसान मानने लगे थे। सीनियर लीडर जेबी कृपलानी और वल्लभभाई पटेल ने गांधी के कामुक व्यवहार के चलते ही उनसे दूरी बना ली। यहां तक कि उनके परिवार के सदस्य और अन्य राजनीतिक साथी भी इससे ख़फ़ा थे। कई लोगों ने गांधी के प्रयोगों के चलते आश्रम छोड़ दिया। ऐडम ने गांधी और उनके क़रीबी लोगों के कथनों का हवाला देकर बापू को अत्यधिक कामुक साबित करने का पूरा प्रयास किया है। किताब में पंचगनी में ब्रह्मचर्य का प्रयोग का भी वर्णन किया है, जहां गांधी की सहयोगी सुशीला नायर गांधी के साथ निर्वस्त्र होकर सोती थीं और उनके साथ निर्वस्त्र होकर नहाती भी थीं। किताब में गांधी के ही वक्तव्य को उद्धरित किया गया है। मसलन इस बारे में गांधी ने ख़ुद लिखा है, “नहाते समय जब सुशीला निर्वस्त्र मेरे सामने होती है तो मेरी आंखें कसकर बंद हो जाती हैं। मुझे कुछ भी नज़र नहीं आता। मुझे बस केवल साबुन लगाने की आहट सुनाई देती है। मुझे कतई पता नहीं चलता कि कब वह पूरी तरह से नग्न हो गई है और कब वह सिर्फ अंतःवस्त्र पहनी होती है।”
किताब के ही मुताबिक जब बंगाल में दंगे हो रहे थे गांधी ने 18 साल की मनु को बुलाया और कहा “अगर तुम साथ नहीं होती तो मुस्लिम चरमपंथी हमारा क़त्ल कर देते। आओ आज से हम दोनों निर्वस्त्र होकर एक दूसरे के साथ सोएं और अपने शुद्ध होने और ब्रह्मचर्य का परीक्षण करें।” ऐडम का दावा है कि गांधी के साथ सोने वाली सुशीला, मनु और आभा ने गांधी के साथ शारीरिक संबंधों के बारे हमेशा अस्पष्ट बात कही। जब भी पूछा गया तब केवल यही कहा कि वह ब्रह्मचर्य के प्रयोग के सिद्धांतों का अभिन्न अंग है।
ऐडम्स के मुताबिक गांधी अपने लिए महात्मा संबोधन पसंद नहीं करते थे और वह अपने आध्यात्मिक कार्य में मशगूल रहे। गांधी की मृत्यु के बाद लंबे समय तक सेक्स को लेकर उनके प्रयोगों पर लीपापोती की जाती रही। हत्या के बाद गांधी को महिमामंडित करने और राष्ट्रपिता बनाने के लिए उन दस्तावेजों, तथ्यों और सबूतों को नष्ट कर दिया, जिनसे साबित किया जा सकता था कि संत गांधी दरअसल सेक्स मैनियैक थे। कांग्रेस भी स्वार्थों के लिए अब तक गांधी और उनके सेक्स-एक्सपेरिमेंट से जुड़े सच को छुपाती रही है। गांधीजी की हत्या के बाद मनु को मुंह बंद रखने की सलाह दी गई। सुशीला भी इस मसले पर हमेशा चुप ही रहीं।
किताब में ऐडम्स दावा करते हैं कि सेक्स के जरिए गांधी अपने को आध्यात्मिक रूप से शुद्ध और परिष्कृत करने की कोशिशों में लगे रहे। नवविवाहित जोड़ों को अलग-अलग सोकर ब्रह्मचर्य का उपदेश देते थे। ऐडम्स के अनुसार सुशीला नायर, मनु और आभा के अलावा बड़ी तादाद में महिलाएं गांधी के क़रीब आईं। कुछ उनकी बेहद ख़ास बन गईं। बंगाली परिवार की विद्वान और ख़ूबसूरत महिला सरलादेवी चौधरी से गांधी का संबंध जगज़ाहिर है। हालांकि गांधी केवल यही कहते रहे कि सरलादेवी उनकी “आध्यात्मिक पत्नी” हैं। गांधी जी डेनमार्क मिशनरी की महिला इस्टर फाइरिंग को प्रेमपत्र लिखते थे। इस्टर जब आश्रम में आती तो बाकी लोगों को जलन होती क्योंकि गांधी उनसे एकांत में बातचीत करते थे। किताब में ब्रिटिश एडमिरल की बेटी मैडलीन स्लैड से गांधी के मधुर रिश्ते का जिक्र किया गया है जो हिंदुस्तान में आकर रहने लगीं और गांधी ने उन्हें मीराबेन का नाम दिया।
ऐडम्स ने कहा है कि नब्बे के दशक में उसे अपनी किताब “द डाइनैस्टी” लिखते समय गांधी और नेहरू के रिश्ते के बारे में काफी कुछ जानने को मिला। इसके बाद लेखक की तमन्ना थी कि वह गांधी के जीवन को अन्य लोगों के नजरिए से किताब के जरिए उकेरे। यह किताब उसी कोशिश का नतीजा है। जैड दावा करते हैं कि उन्होंने ख़ुद गांधी और उन्हें बेहद क़रीब से जानने वालों की महात्मा के बारे में लिखे गए किताबों और अन्य दस्तावेजों का गहन अध्ययन और शोध किया है। उनके विचारों का जानने के लिए कई साल तक शोध किया। उसके बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे।
इस बारे में ऐडम्स ने स्वीकार किया है कि यह किताब विवाद से घिरेगी। उन्होंने कहा, “मैं जानता हूं इस एक किताब को पढ़कर भारत के लोग मुझसे नाराज़ हो सकते हैं लेकिन जब मेरी किताब का लंदन विश्वविद्यालय में विमोचन हुआ तो तमाम भारतीय छात्रों ने मेरे प्रयास की सराहना की, मुझे बधाई दी।” 288 पेज की करीब आठ सौ रुपए मूल्य की यह किताब जल्द ही भारतीय बाज़ार में उपलब्ध होगी। “गांधीः नेकेड ऐंबिशन” का लंदन यूनिवर्सिटी में विमोचन हो चुका है। किताब में गांधी की जीवन की तक़रीबन हर अहम घटना को समाहित करने की कोशिश की गई है। जैड ऐडम्स ने गांधी के महाव्यक्तित्व को महिमामंडित करने की पूरी कोशिश की है। हालांकि उनके सेक्स-जीवन की इस तरह व्याख्या की है कि गांधीवादियों और कांग्रेसियों को इस पर सख़्त ऐतराज़ हो सकता है।

गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

वे कहते हैं मैं अच्छा पाकिस्तानी नहीं : हामिद मीर

वे कहते हैं मैं अच्छा पाकिस्तानी नहीं : हामिद मीर
Friday, 02 April 2010 19:01 हरिगोविंद विश्वकर्मा भड़ास4मीडिया - कहिन

अपने खिलाफ मुहिम चलाने वाले पाकिस्तानियों को करारा जवाब दिया चर्चित पत्रकार हामिद मीर ने : दक्षिण एशियाई देशों के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और लेखकों की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था 'फ़ाउंडेशन ऑफ़ सार्क राइटर्स ऐंड लिटरेचर' ने पिछले दिनों पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर को लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाज़ा। मीर पाकिस्तान के शीर्ष पत्रकारों में हैं।
हामिद मीर फलीस्तीन, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, लेबनान, चेचन्या, बोस्निया और श्रीलंका में युद्ध की कवरेज कर चुके हैं। इसके अलावा मीर अमेरिका पर आतंकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन का इंटरव्यू भी ले चुके हैं। हामिद मीर को पुरस्कृत करने का दुनिया भर के पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने स्वागत किया लेकिन पाकिस्तान में प्रेस के एक तबके द्वारा मीर की जमकर आलोचना हो रही है और उनके ख़िलाफ़ इंटरनेट पर मुहिम चल रही है। मीर को पाकिस्तान का दुश्मन बताया जा रहा है।
इसी के जवाब में मीर साहिब ने 26 मार्च को एक लेख लिखा। लेख तो केंद्रित है बांग्लादेश पर लेकिन इसी बहाने हामिद मीर ने अपने दुश्मनों के चरित्र का भी खुलासा कर दिया है। हामिद मीर के इस जबर्दस्त लेख को भारत के पत्रकार ख़ासकर हिंदी ख़बरनवीस भी पढ़ सकें, इसलिए हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद किया है फोकस टीवी और हमार टीवी के मुंबई ब्यूरो चीफ हरिगोविंद विश्वकर्मा ने। -एडिटर
पाकिस्तान का क्षमादिन
हामिद मीर, पाकिस्तान
पाकिस्तान में कुछ लोग मुझसे बहुत नफ़रत करते हैं। ये लोग मुझसे इसलिए नफ़रत करते हैं क्योंकि 1971 में पाकिस्तानी सेना द्वारा बांग्लादेश में किए गए ज़ुल्म के लिए, मैंने दो साल पहले, इस्लामाबाद प्रेस क्लब में बंगाली समुदाय से माफ़ी मांग ली थी। ये लोग मुझसे इसलिए भी नफ़रत करते हैं क्योंकि मार्च 1971 में बंगालियों के संहार के लिए मैं पाकिस्तानी सरकार से आधिकारिक रूप से बंगाल की जनता से माफ़ी मांगने की मांग कर चुका हूं। वे कहते हैं कि बांग्लादेश के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। वे तो यह भी कहते हैं कि मैं एक अच्छा पाकिस्तानी नहीं हूं।
वे लोग यह भी कहते हैं कि 1971 में मैं बालक था और इसीलिए मैं उस समय की हक़ीक़त से अनजान हूं। जबकि मैं कहता हूं; हां, मैं 1971 में केवल स्कूल जाने वाला बालक था लेकिन बांग्लादेश में हुए जनसंहार के बारे में मैंने बहुत कुछ सुना और पढ़ा है। अपने स्वर्गीय पिता, प्रोफेसर वारिस मीर, की बात को मैं कैसे झुठला सकता हूं जिन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों के प्रतिनिधिमंडल के साथ अक्टूबर 1971 में ढाका का दौरा किया। मेरे पिता पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर में पत्रकारिता के प्राध्यापक थे। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनसे छात्रसंघ के पदाधिकारियों की तुर्की यात्रा आयोजित करने का निर्देश दिया लेकिन मेरे पिता छात्रों की सहमति से उन्हें ढाका लेकर गए। दरअसल, लोग जानना चाहते थे कि ढाका में क्या कुछ हो रहा है।
मुझे आज भी याद है कि ढाका से वापस लौटने के बाद मेरे पिता जी बेहद दुखी थे और कई दिन तक रोते रहे। उन्होंने हम लोगों को वहां हो रहे ख़ून-ख़राबे के बारे में बताया। ये कहानियां मेरी मां की दारुण कथा की ही तरह थीं। जी हां, मेरी मां ने 1947 में जम्मू से पाकिस्तान विस्थापित होते समय अपना पूरा परिवार खो दिया। उनके भाइयों की उनकी आंखों के सामने जम्मू में हिंदुओं और सिखों ने हत्या कर दी। मेरी नानी का अपहरण कर लिया गया। मेरी मां ने अपने ही परिजनों की लाश के नीचे छिपकर किसी तरह अपनी जान बचाई। मुझे याद है, जब मेरे पिता ने बताया कि पाकिस्तानी सैन्य अफ़सरों ने बंगाली महिलाओं के साथ बलात्कार किया तो मेरी मां ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। मेरी मां ने कहा, “हमने अपने सम्मान की रक्षा के लिए बलिदान दिया लेकिन आज हम एक दूसरे को बेइज़्ज़्त क्यों कर रहे हैं।”
मेरे पिताजी हमेशा कहते रहे कि पाकिस्तान को बंगालियों ने बनाया और हम पंजाबियों ने पाकिस्तान को विभाजित कर दिया। एक बार तो उन्होंने कहा कि 23 मार्च पाकिस्तान दिवस है, 26 मार्च क्षमा दिवस होना चाहिए और 16 दिसंबर जवाबदेही दिवस होनी चाहिए। 1987 में पत्रकार बनने के बाद मैं अपने स्वर्गीय पिताजी के विचारों को समझने लगा।
जब मैंने हमुद-उर-रहमान आयोग की रिपोर्ट पहली बार पढ़ी तो मुझे बेहद शर्मिंदगी महसूस हुई। पाकिस्तानी आयोग की इस रिपोर्ट में बांग्लादेश में हत्या और बलात्कार की घटनाओं को स्वीकार किया गया है। इस दस्तावेजीय साक्ष्य के बावजूद आज भी ढेर सारे लोग हक़ीक़त से इनकार करते हैं। वे कहते हैं कि शेख़ मुजीब देशद्रोही था जिसने भारत की मदद से मुक्तिवाहिनी संगठन को बनाया और कई निर्दोष पंजाबियों और बिहारियों की हत्या की। मैं कहता हैं कि शेख़ मुजीब पाकिस्तान मूवमेंट के एक कार्यकर्ता थे। 1966 तक वह फ़ातिमा जिन्ना (मौहम्मद अली जिन्ना की बहन) के समर्थक रहे। उन्होंने केवल प्रांतीय स्वायत्तता की मांग की थी लेकिन सेना के शासकों ने उन्हें देशद्रोही घोषित कर दिया। वास्तव में, पाकिस्तानी सेना के अधिकारी ही असली देशद्रोही रहे जिन्होंने अपनी ही माताओं और बहनों की अस्मत लूटी। यही लोग कहते हैं कि मैं झूठा और पाकिस्तान का दुश्मन हूं। आख़िर मैं पाकिस्तान का दुश्मन कैसे हो सकता हूं। मेरी मां ने पाकिस्तान के लिए अपने पूरे परिवार की आहुति दे दी। मेरी समस्या यह है कि मैं हक़ीक़त से मुंह नहीं मोड़ सकता। मैं सच्चाई से इनकार नहीं कर सकता।
मेरे वरिष्ठ सहयोगी जनाब अफ़ज़ल ख़ान अभी ज़िंदा हैं। वह 73 साल के हैं। उन्होंने एसोसिएटेड प्रेस ऑफ़ पाकिस्तान (एपीपी) में काम किया और वह 1980 से 1985 के दौरान पाकिस्तान फ़ेडरल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (पीएफ़यूजे) के महासचिव भी रहे। 28 मार्च 1971 को उन्हें सैन्य अभियान (आर्मी ऑपरेशन) की कवरेज के लिए ढाका भेजा गया। उन्होंने मुझसे बातचीत के दौरान कई बार स्वीकार किया कि हां, मुक्तिवाहिनी ने ढेर सारे निर्दोष लोगों की जान ली लेकिन पाकिस्तानी सेना ने जो कुछ किया ऐसा कार्य किसी भी मुल्क की राष्ट्रीय सेना नहीं करती। एक बार अफ़ज़ल ख़ान खुलना में इस्पाहनी हॉउस में ठहरे थे तो सेना के एक मेजर ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वह चाहें तो लड़की के साथ रात गुज़ार सकते हैं। जब अफ़ज़ल ख़ान ने पूछा कि लड़की कौन है तो मेजर ने बताया कि स्थानीय पुलिस अफ़सर की बेटी है और उसे बंदूक दिखाकर इस्पाहनी हॉउस लाया जा सकता है। इस घटना के बाद मई 1971 में अफ़ज़ल ख़ान लाहौर वापस आ गए। वह कहते हैं कि बंगालियों की हत्या और बलात्कार के लिए जो भी कसूरवार हैं उन्हें पाकिस्तान में कभी सम्मान नहीं मिला।
जनरल याह्या ख़ान का नाम पाकिस्तान में आज भी गाली माना जाता है। उनके बेटे अली याह्या लोगों से छिपने की कोशिश करते हैं। जनरल टिक्का ख़ान को आज भी “बंगालियों का हत्यारा” माना जाता है। जनरल एएके नियाज़ी बंगाल के शेर बनना चाहते थे लेकिन उन्हें “बंगाल का सियार” के रूप में याद किया जाता है। आज भी अपने बंगाली भाइयों का ख़ून बहाने के लिए ज़िम्मेदार लोगों से पाकिस्तान में बहुमत में लोग नफ़रत करते हैं। यही वजह है कि उन सैन्य अफ़सरों के परिजन आज भी सार्वजनिक तौर पर इस बात का ज़िक्र नहीं करते कि उनके पिता कौन थे।
लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान में ऐसे लोग भी हैं जो अपनी उस भयानक भूल को आज भी स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। हालांकि इन लोगों की तादाद मुट्ठी भर है लेकिन ये लोग हैं बेहद ताक़तवर। मैं इन लोगों को पाकिस्तान का शत्रु मानता हूं जिसके लिए मेरी मां ने अपने परिवार का बलिदान दे दिया। आख़िर हम इन दुश्मनों का बचाव क्यों करते हैं? आख़िर लोकतांत्रिक सरकार आधिकारिक तौर पर बंगाली समाज से माफ़ी क्यों नहीं मांग लेती। यह माफ़ी पाकिस्तान को कतई कमज़ोर नहीं करेगी बल्कि यह माफ़ी पाकिस्तान को और मज़बूत करेगी।
मुझे पूरा विश्वास है कि पाकिस्तान बड़ी तेज़ी से बदल रहा है। बहुत जल्द ही वह दिन आने वाला है जब पाकिस्तानी सरकार आधिकारिक तौर पर बंगालियों से माफ़ी मांगेगी और देशभक्त पाकिस्तानियों के लिए 26 मार्च क्षमा दिवस होगा। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि बंगालियों ने ही पाकिस्तान का निर्माण किया। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि जनरल अयूब ख़ान का विरोध करने वाली जिन्ना की बहन फ़ातिमा का बंगालियों ने समर्थन किया। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि बांग्लादेश की जनता के साथ नया रिश्ता बनाना चाहता हूं। मैं अपने गंदे अतीत के साथ नहीं जीना चाहता। मैं तो साफ़-सुथरे भविष्य के साथ जीना चाहता हूं। मैं चाहता हूं केवल पाकिस्तान का ही उज्ज्वल भविष्य नहीं बल्कि बांग्लादेश का भी भविष्य उज्ज्वल हो। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि मैं पाकिस्तान से प्यार करता हूं और मैं बाग्लादेश से भी प्यार करता हूं। मेरे बांग्लादेश के भाई-बहनों को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं।

'सखी' : स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर

'सखी' : स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर
Tuesday, 13 April 2010 16:48 हरिगोविंद विश्वकर्मा

कहा जाता है कि संगीत वह खजाना है जहां इंसान को भावनात्मक संतुष्टि मिलती है। तभी तो जब कभी कोई ख़ूबसूरत गाना हमारे कर्ण-पटल से टकराता है तो सब कुछ थम-सा जाता है और हम उस गीत में खो से जाते हैं। आंखें बंद करके उस गीत को अपने अंदर समाने देते हैं। नवोदित गायिका-गीतकार-संगीतकार रिमि बसु सिन्हा की 'सखी' एक ऐसी ही पेशकश है। एलबम में कुल नौ भावना-प्रधान गीत समाहित हैं। सभी गीतों के बोल जितने खूबसूरत हैं, गायिकाओं ने अंतरमन की छूने वाली आवाज़ से उसी तरह सराबोर किया।
सही मायने में अगर इस एलबम को उपन्यास कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसकी परिकल्पना, लेखन और संगीत रिमि ने ख़ुद तैयार किया है। यह अनोखा प्रयास नारीत्व को ख़ास तरीक़े से सेलिब्रेट करने की कोशिश है और नारी-रचनाधर्मिता का उत्सव भी। यह केवल स्त्रियों के जरिए ही मूर्त रूप देने का कॉन्सेप्ट है। भारतीय संगीत-जगत में इस तरह की यह पहली कोशिश है। इसमें शामिल हर गाने स्त्री की ही सोच हैं, स्त्री के ही अल्फ़ाज़ हैं और स्त्री द्वारा ही सुर में पिरोये गए हैं। चार पीढ़ी की नामचीन और समर्थ नायिकाओं ऊषा मंगेशकर, कविता कृष्णमूर्ति, केएस चित्रा, सुनिधि चौहान, रिचा शर्मा, महालक्ष्मी अय्यर, ऐश्वर्या मजुमदार और खुद रिमि बसु सिन्हा ने इन भावना-प्रधान कर्णप्रिय नग़मों को अपनी जादुई आवाज़ से सराबोर किया हैं।
मसलन, इस मनोहारी संगीत के सफ़र का आग़ाज़ ‘सुन सखी...’ गीत से होता है। इसमें स्त्री ने बताने की कोशिश की है कि वो कितना कुछ कहना चाहती है, सुनना और बांटना चाहती है। तभी तो ईश्वर ने उसे भावना-प्रधान बनाया है और ये कोमल भावनाएं सबको जोड़कर रखती हैं। चित्रा की गायिकी और भाव में सच्ची सखी दिख ही जाती है। अगला पड़ाव ‘दिम तान ना...’ गीत है जिसमें स्त्री आशा का दूत के किरदार में है। वह हर तरफ़ ख़ुशी और उल्लास फैलाना चाहती है। ताकि दुनिया के हर कोने से मोहब्बत की धुन सुनाई पड़े। सुनिधि की सम्मोहित करने वाली आवाज़ इस गीत के साथ हमें उसी दुनिया में ले जाती है।

रिमि बसु सिन्हाइस सुहाने सफ़र का तीसरे ठहराव पर ‘दिल के अरमानों की बात...’ है जिसमें स्त्री के बचपन से तरुणाई तक का अंतरद्वंद्व है। दरअसल, कभी-कभी कितना वक़्त गुज़र जाता है ,स्त्री कितनी चाहत बटोर के रखती है, कितना कुछ करना चाहती है मगर उलझनों की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाती। उसके अरमान जस के तस रह जाते हैं। वक्त बहुत पीछे छूट जाता है। खुद को खोजने वाले इस गाने को बेहद ही अलग तरह से तैयार किया गया है। अलग तरीके का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि यह आमतौर पर बहुत कम प्रयोग किया जाने वाले नौ मात्रे के ठेके राग अहीर भैरव पर आधारित है। इस गीत को कविता कृष्णमूर्ति की खनकती आवाज़ ने यादगार बना दिया है।
सफ़र के अगर चौथे गीत ‘नैना जागे...’ की बात करें तो सूफ़ियाना अंदाज़ में पिरोए गए इस नग़मे में स्त्री के सुंदर नयन अपने प्रेरणास्वरूप इष्ट की बात करते हैं। संगीत के कद्रदान बस अपनी आंखें बंद करें और गायिका रिचा के साथ स्त्री के हसीन नयनों की महत्ता, बंद-खुले नयन के सौंदर्य का ख़ूबसूरत दीदार करें। संगीतमय सफ़र का अगला गाना ‘कुछ ना सामझ पाए...’ स्त्री के कमसिन मन की दुविधा, नासमझी, नादानी और भावनाओं के तानेबाने को उकेरता है। नए रिश्ते तलाशती स्त्री का अल्हड़पन में किसी से रिश्ता जुड़ जाना बेहद सहज है। यही थीम है इस संवेदना से छलकते गाने की जो राग खमाज पर आधारित है। महालक्ष्मी की जादुई आवाज़ ने तो इसमें चार चांद लगा दिया है।
अगले मुकाम गीत ‘बोले क्या...’ पर संगीतप्रेमी स्त्री के श्रृंगार पक्ष से रूबरू होते हैं। स्त्री और श्रृंगार एक दूसरे के पूरक हैं। मगर भावनाओं के साथ श्रृंगार का अर्थ भी बदलता रहता है। किसी अपने के लिए श्रृंगार करने में अधिक आनंद आता है। संबंधों के खोने या छूटने से मन तड़पता है, आत्मसम्मान के टूटने से डर लगता है। इसी भावना को संगीतमय बनाया है ऊषा मंगेशकर की सुरीली आवाज़ ने।
अगले गीत का शीर्षक है ‘जो ज़िंदगी की जंग हार रहा है...’ दरअसल, जीवन में गाहे-बगाहे कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती है जो विचलित कर देती है। इस गीत में बालिका के रूप में स्त्री ख़ुद कुछ सवाल करती है अपने सपने का साकार करने की बात करती है। बालिका की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है बाल गायिका ऐश्वर्या ने संगीत के सफ़र का आठवें पायदान पर है ‘मेरे मन का पंछी...’ यह स्त्री की प्रेरणा को अभिव्यक्ति देता है। हिंदुस्तानी राग भीम पलासी पर आधारित यह इस गीत को ख़ुस रिमि की मीठी आवाज ने इतना ख़ूबसूरत बना दिया है कि बार बार सुनने का मन करता है। एलबम को अंजाम तक पहुंचाया है ‘नए सपने...’ ने। न जाने कितने बरस का बहुप्रतीक्षित सपना जब साकार होता है तो स्त्री कितनी आत्मविभोर हो जाती है। यह गाना सुनकर पता चलता है। यह गीत सभी गायिकाओं से सम्मिलित स्वर में तैयार किया गया है।
सांस्कृतिक नगरी इलाहाबाद के अति-प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में जन्मी रिमि संगीत और नाटक के माहौल में ही पली-बढ़ी। आठ साल की कोमल उम्र से ही संगीत सिखना शुरू किया और जल्द ही शहर के सांस्कृतिक समारोहों का हिस्सा बन गईं। शहर ही नहीं राज्य के अनगिनत संगीत जलसों में स्कूल का प्रतिनिधित्व किया और कई पुरस्कार जीते। 15 साल की उम्र में आकाशवाणी कलाकार बन गईं। फ़िलहाल, वह आकाशवाणी और दूरदर्शन की शीर्ष कलाकारों की फ़ेहरिस्त में हैं।
हिंदुस्तानी संगीत रिमि का हमेशा से पैशन-सा रहा है। इसीलिए दसवीं में इसे एक विषय के रूप में लिया। नामचीन संगीतकार स्वर्गीय बीएन बिस्वास से संगीत की बारीकियां सीखीं। गायन-संगीत में उनकी दीवानगी देखकर उनके माता-पिता ने उन्हें स्नातक में भी संगीत लेने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह रही कि रिमि ने गुरु पं. रामाश्रय झा और कमला बोस के मार्गदर्शन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी संगीत में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय सांस्कृतिक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार भी जीता। वह प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से संगीत प्रभाकर और सीनियर डिप्लोमा भी हासिल करने में सफल रहीं।
1992 में दिल्ली में शिफ़्ट होने के बाद रिमि टीवी सीरियल्स और फ़िल्मी दुनिया में सक्रिय हो गईं। कई मशहूर ब्रैंड के लिए खनकती आवाज़ में अनेक भाषाओं में कई टाइटल ट्रैक्स, गाने और जिंगल्स रिकॉर्ड कराए और सीरियल्स, शॉर्ट फ़िल्म्स, डॉक्यूमेंटरी के लिए टाइटल गानों को स्वर दिया। वॉइस-ओवर शुरू से उनकी हॉबी रही और डिस्कवरी चैनल्स और कई सरकारी परियोजनाओं के नामचीन वृत्तचित्रों में अपनी आवाज़ से चार चांद लगाया। इसके अलावा वह कई मशहूर म्यूज़िकल शोज़ में हिस्सा लेने लगीं।
1999 में एचएमवी ने रिमि की आवाज़ को अपने नए भोजपुरी प्रॉजेक्ट के लिए चुना जिसे बेहद लंबे इंतज़ार के बाद लॉन्च किया गया। बहरहाल, ‘जाने हमरी बिंदिया’ टाइटल वाला सोलो-एलबम बेहद लोकप्रिय हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज मिली। नतीजतन एचएमवी ने अगले प्रॉजेक्ट में उन्हें साइन करने में रुचि दिखाई मगर पति की कीनिया की राजधानी नैरोबी में पोस्टिंग हो जाने से उन्हें देश से बाहर जाना पड़ा।
रिमि 2000 में नैरोबी गईं और चार साल तक वहां रहीं। कहते हैं चांद जहां भी रहेगा अपनी चांदनी तो बिखेरेगा ही। रिमि नैरोबी की संगीत दुनिया में भी सक्रिय हो गईं। वहां हिंदुस्तानी संगीत और सांस्कृतिक समारोह का बढ़ावा दिया और कई कद्रदान बनाए। जल्द ही इस अफ्रीकी शहर के संगीत फ़लक पर अपने लिए अहम मुकाम बना लिया। नैरोबी लोकल एफ़एम चैनल की बेहद जानी-पहचानी उदघोषिका बन गईं। गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भारतीय दूतावास की ओर से हिंदी भाषा में आयोजित स्टेज शोज़ और लाइव रेडियो प्रोग्रोम्स प्रस्तुत किए और उनका निर्देशन किया। वहां रिमी ने संगीत ही नहीं हिंदी में अपनी ज़बरदस्त रचनाशीलता का लोहा मनवाया। वसंत उत्सव और महिषासुर मर्दिनी जैसे प्रोग्राम्स की रूपरेखा बनाई, उन्हें लिखा और निर्देशन करते हुए सफलतापूर्वक पेश भी किया जिसे भारतीय दूतावास ने प्रायोजित किया। वहां रिमि ने लाइव प्रोग्राम्स पेश करने का नया ट्रेंड भी सेट किया। होली, रामनवमी, वैसाखी, महावीर जयंती, रमज़ान आदि के मौक़े पर पेश किए जाने वाले गीत के साथ ख़ूबसूरत काव्यमय स्क्रिप्ट और शेरो-शायरी जोड़कर उसमें जादू भर दिया। कुल मिलाकर उन्होंने विदेश में भारत की समृद्ध धर्मनिरपेक्ष परंपरा को आगे बढ़ाया जिसे समूचे अफ्रीका में एशियाई समुदाय के लोगों ने सराहा। रिमि ने भारतीय दूतावास की ओर से संगीत मर्मज्ञ पं. जसराज का मैराथन इंटरव्यू लिया जो नैरोबी के लोकप्रिय लोकल रेडियो पर प्रसारित भी हुआ। इसके अलावा वह कीनिया की चिन्माया मिशन सेवा ट्रस्ट से जुड़ीं और नैरोबी में अंतरराष्ट्रीय समागम पर उनका एलबम ‘भक्ति’ कंपोज़ किया जिसकी मांग जो आज भी उसी तरह है।
कीनिया में भारतीय संस्कृति और संगीत को बढ़ावा देने के अभियान में रिमि के अद्भुत योगदान को देखते हुए ही भारतीय दूतावास ने उन्हें गांधी जयंती पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के नैरोबी स्थित अफ्रीकी मुख्यालय में संगीत उत्सव आयोजित करने की दावत दी जो बेहद सफल रहा। किसी प्रवासी का यह दुर्लभ करतब है जिसके चलते कीनिया में भारतीय दूतावास की ओर से रिमि का सम्मान किया गया। बेशक, रिमि की विविधता ही उनकी ख़ासियत है। ‘सखी’ से पहले टाइम्स म्यूज़िक ने कुमार शानू के साथ एलबम ‘मैया का दरबार’ रिलीज़ किया। फ़िलहाल रिमी मुंबई में हैं और देश की आर्थिक राजधानी में अपनी गायन और कॉम्पोज़िशन क्षमता के बल पर ख़ुद को पूर्ण संगीतकार के रूप स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।
लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा फोकस टीवी, हमार टीवी के मुंबई ब्यूरो के चीफ हैं.

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2010

शुभकामनाएं...

वेलेंटाइन्स डे
हर साल की तरह इस बार भी आज
भावनाएं फिर से उफान मार रही हैं
तुम्हें प्यार करने का बड़ा मन हो रहा है
हा.. यार दिल कर रहा है...
ले लूं तुम्हारा हाथ अपने हाथों में
और चल पड़ू तुम्हारे साथ
मोहब्बत की राह पर
होकर दुनिया से बेखबर
तुम्हे इतना प्यार करूं
इतना चाहूं कि सारी कायनात
हो जाए नतमस्तक
और हो जाए हमारी मुरीद
देखो ना...
नहीं है कोई दीवार हमारे बीच
न ही है कोई बंधन
और आज वेलेंटाइन्स डे भी है।
लेकिन मैं तुमसे मिल नहीं सकता
नहीं कर सकता तुमसे प्रेम-संवाद
क्योंकि तुम तो हो ही नहीं
कहीं भी नहीं...
धरती के किसी कोने में भी नहीं
होगी भी कैसे
तुम तो अमूर्त हो
काया से परे
लोग कहते हैं
तुम तो पैदा ही नहीं हुई
सचमुच मेरी कल्पना
अगर तुम सचमुच की हुई होती
स्त्री की काया में
तो तुम्हें करता जी भरकर प्यार
तब ये दर्द इस हद तक न बढ़ता...
जीवन का फसाना इतना त्रासद ना होता
तभी को इस खूबसूरत और मुबारक दिन भी मैं
हूं भीड़ से घिरा लेकिन बिलकुल अकेला हूं
ये जीवन घाटे का सौदा ना होता
बस एक कतरा गर मोहब्बत का होता...
इसलिए
जिनके पास हो तुम प्रेयसी के रूप में
वो हैं बड़े भाग्यशाली
उन्हें वेलेंटाइन्स डे की शुभकामनाएं...