गुरुवार, 15 अप्रैल 2010

वे कहते हैं मैं अच्छा पाकिस्तानी नहीं : हामिद मीर

वे कहते हैं मैं अच्छा पाकिस्तानी नहीं : हामिद मीर
Friday, 02 April 2010 19:01 हरिगोविंद विश्वकर्मा भड़ास4मीडिया - कहिन

अपने खिलाफ मुहिम चलाने वाले पाकिस्तानियों को करारा जवाब दिया चर्चित पत्रकार हामिद मीर ने : दक्षिण एशियाई देशों के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और लेखकों की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था 'फ़ाउंडेशन ऑफ़ सार्क राइटर्स ऐंड लिटरेचर' ने पिछले दिनों पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर को लाइफ़ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाज़ा। मीर पाकिस्तान के शीर्ष पत्रकारों में हैं।
हामिद मीर फलीस्तीन, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, लेबनान, चेचन्या, बोस्निया और श्रीलंका में युद्ध की कवरेज कर चुके हैं। इसके अलावा मीर अमेरिका पर आतंकी हमले के बाद ओसामा बिन लादेन का इंटरव्यू भी ले चुके हैं। हामिद मीर को पुरस्कृत करने का दुनिया भर के पत्रकारों, लेखकों और बुद्धिजीवियों ने स्वागत किया लेकिन पाकिस्तान में प्रेस के एक तबके द्वारा मीर की जमकर आलोचना हो रही है और उनके ख़िलाफ़ इंटरनेट पर मुहिम चल रही है। मीर को पाकिस्तान का दुश्मन बताया जा रहा है।
इसी के जवाब में मीर साहिब ने 26 मार्च को एक लेख लिखा। लेख तो केंद्रित है बांग्लादेश पर लेकिन इसी बहाने हामिद मीर ने अपने दुश्मनों के चरित्र का भी खुलासा कर दिया है। हामिद मीर के इस जबर्दस्त लेख को भारत के पत्रकार ख़ासकर हिंदी ख़बरनवीस भी पढ़ सकें, इसलिए हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया जा रहा है। अनुवाद किया है फोकस टीवी और हमार टीवी के मुंबई ब्यूरो चीफ हरिगोविंद विश्वकर्मा ने। -एडिटर
पाकिस्तान का क्षमादिन
हामिद मीर, पाकिस्तान
पाकिस्तान में कुछ लोग मुझसे बहुत नफ़रत करते हैं। ये लोग मुझसे इसलिए नफ़रत करते हैं क्योंकि 1971 में पाकिस्तानी सेना द्वारा बांग्लादेश में किए गए ज़ुल्म के लिए, मैंने दो साल पहले, इस्लामाबाद प्रेस क्लब में बंगाली समुदाय से माफ़ी मांग ली थी। ये लोग मुझसे इसलिए भी नफ़रत करते हैं क्योंकि मार्च 1971 में बंगालियों के संहार के लिए मैं पाकिस्तानी सरकार से आधिकारिक रूप से बंगाल की जनता से माफ़ी मांगने की मांग कर चुका हूं। वे कहते हैं कि बांग्लादेश के बारे में मैं कुछ नहीं जानता। वे तो यह भी कहते हैं कि मैं एक अच्छा पाकिस्तानी नहीं हूं।
वे लोग यह भी कहते हैं कि 1971 में मैं बालक था और इसीलिए मैं उस समय की हक़ीक़त से अनजान हूं। जबकि मैं कहता हूं; हां, मैं 1971 में केवल स्कूल जाने वाला बालक था लेकिन बांग्लादेश में हुए जनसंहार के बारे में मैंने बहुत कुछ सुना और पढ़ा है। अपने स्वर्गीय पिता, प्रोफेसर वारिस मीर, की बात को मैं कैसे झुठला सकता हूं जिन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों के प्रतिनिधिमंडल के साथ अक्टूबर 1971 में ढाका का दौरा किया। मेरे पिता पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर में पत्रकारिता के प्राध्यापक थे। विश्वविद्यालय प्रशासन ने उनसे छात्रसंघ के पदाधिकारियों की तुर्की यात्रा आयोजित करने का निर्देश दिया लेकिन मेरे पिता छात्रों की सहमति से उन्हें ढाका लेकर गए। दरअसल, लोग जानना चाहते थे कि ढाका में क्या कुछ हो रहा है।
मुझे आज भी याद है कि ढाका से वापस लौटने के बाद मेरे पिता जी बेहद दुखी थे और कई दिन तक रोते रहे। उन्होंने हम लोगों को वहां हो रहे ख़ून-ख़राबे के बारे में बताया। ये कहानियां मेरी मां की दारुण कथा की ही तरह थीं। जी हां, मेरी मां ने 1947 में जम्मू से पाकिस्तान विस्थापित होते समय अपना पूरा परिवार खो दिया। उनके भाइयों की उनकी आंखों के सामने जम्मू में हिंदुओं और सिखों ने हत्या कर दी। मेरी नानी का अपहरण कर लिया गया। मेरी मां ने अपने ही परिजनों की लाश के नीचे छिपकर किसी तरह अपनी जान बचाई। मुझे याद है, जब मेरे पिता ने बताया कि पाकिस्तानी सैन्य अफ़सरों ने बंगाली महिलाओं के साथ बलात्कार किया तो मेरी मां ज़ोर-ज़ोर से रोने लगीं। मेरी मां ने कहा, “हमने अपने सम्मान की रक्षा के लिए बलिदान दिया लेकिन आज हम एक दूसरे को बेइज़्ज़्त क्यों कर रहे हैं।”
मेरे पिताजी हमेशा कहते रहे कि पाकिस्तान को बंगालियों ने बनाया और हम पंजाबियों ने पाकिस्तान को विभाजित कर दिया। एक बार तो उन्होंने कहा कि 23 मार्च पाकिस्तान दिवस है, 26 मार्च क्षमा दिवस होना चाहिए और 16 दिसंबर जवाबदेही दिवस होनी चाहिए। 1987 में पत्रकार बनने के बाद मैं अपने स्वर्गीय पिताजी के विचारों को समझने लगा।
जब मैंने हमुद-उर-रहमान आयोग की रिपोर्ट पहली बार पढ़ी तो मुझे बेहद शर्मिंदगी महसूस हुई। पाकिस्तानी आयोग की इस रिपोर्ट में बांग्लादेश में हत्या और बलात्कार की घटनाओं को स्वीकार किया गया है। इस दस्तावेजीय साक्ष्य के बावजूद आज भी ढेर सारे लोग हक़ीक़त से इनकार करते हैं। वे कहते हैं कि शेख़ मुजीब देशद्रोही था जिसने भारत की मदद से मुक्तिवाहिनी संगठन को बनाया और कई निर्दोष पंजाबियों और बिहारियों की हत्या की। मैं कहता हैं कि शेख़ मुजीब पाकिस्तान मूवमेंट के एक कार्यकर्ता थे। 1966 तक वह फ़ातिमा जिन्ना (मौहम्मद अली जिन्ना की बहन) के समर्थक रहे। उन्होंने केवल प्रांतीय स्वायत्तता की मांग की थी लेकिन सेना के शासकों ने उन्हें देशद्रोही घोषित कर दिया। वास्तव में, पाकिस्तानी सेना के अधिकारी ही असली देशद्रोही रहे जिन्होंने अपनी ही माताओं और बहनों की अस्मत लूटी। यही लोग कहते हैं कि मैं झूठा और पाकिस्तान का दुश्मन हूं। आख़िर मैं पाकिस्तान का दुश्मन कैसे हो सकता हूं। मेरी मां ने पाकिस्तान के लिए अपने पूरे परिवार की आहुति दे दी। मेरी समस्या यह है कि मैं हक़ीक़त से मुंह नहीं मोड़ सकता। मैं सच्चाई से इनकार नहीं कर सकता।
मेरे वरिष्ठ सहयोगी जनाब अफ़ज़ल ख़ान अभी ज़िंदा हैं। वह 73 साल के हैं। उन्होंने एसोसिएटेड प्रेस ऑफ़ पाकिस्तान (एपीपी) में काम किया और वह 1980 से 1985 के दौरान पाकिस्तान फ़ेडरल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (पीएफ़यूजे) के महासचिव भी रहे। 28 मार्च 1971 को उन्हें सैन्य अभियान (आर्मी ऑपरेशन) की कवरेज के लिए ढाका भेजा गया। उन्होंने मुझसे बातचीत के दौरान कई बार स्वीकार किया कि हां, मुक्तिवाहिनी ने ढेर सारे निर्दोष लोगों की जान ली लेकिन पाकिस्तानी सेना ने जो कुछ किया ऐसा कार्य किसी भी मुल्क की राष्ट्रीय सेना नहीं करती। एक बार अफ़ज़ल ख़ान खुलना में इस्पाहनी हॉउस में ठहरे थे तो सेना के एक मेजर ने उनके सामने प्रस्ताव रखा कि वह चाहें तो लड़की के साथ रात गुज़ार सकते हैं। जब अफ़ज़ल ख़ान ने पूछा कि लड़की कौन है तो मेजर ने बताया कि स्थानीय पुलिस अफ़सर की बेटी है और उसे बंदूक दिखाकर इस्पाहनी हॉउस लाया जा सकता है। इस घटना के बाद मई 1971 में अफ़ज़ल ख़ान लाहौर वापस आ गए। वह कहते हैं कि बंगालियों की हत्या और बलात्कार के लिए जो भी कसूरवार हैं उन्हें पाकिस्तान में कभी सम्मान नहीं मिला।
जनरल याह्या ख़ान का नाम पाकिस्तान में आज भी गाली माना जाता है। उनके बेटे अली याह्या लोगों से छिपने की कोशिश करते हैं। जनरल टिक्का ख़ान को आज भी “बंगालियों का हत्यारा” माना जाता है। जनरल एएके नियाज़ी बंगाल के शेर बनना चाहते थे लेकिन उन्हें “बंगाल का सियार” के रूप में याद किया जाता है। आज भी अपने बंगाली भाइयों का ख़ून बहाने के लिए ज़िम्मेदार लोगों से पाकिस्तान में बहुमत में लोग नफ़रत करते हैं। यही वजह है कि उन सैन्य अफ़सरों के परिजन आज भी सार्वजनिक तौर पर इस बात का ज़िक्र नहीं करते कि उनके पिता कौन थे।
लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान में ऐसे लोग भी हैं जो अपनी उस भयानक भूल को आज भी स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। हालांकि इन लोगों की तादाद मुट्ठी भर है लेकिन ये लोग हैं बेहद ताक़तवर। मैं इन लोगों को पाकिस्तान का शत्रु मानता हूं जिसके लिए मेरी मां ने अपने परिवार का बलिदान दे दिया। आख़िर हम इन दुश्मनों का बचाव क्यों करते हैं? आख़िर लोकतांत्रिक सरकार आधिकारिक तौर पर बंगाली समाज से माफ़ी क्यों नहीं मांग लेती। यह माफ़ी पाकिस्तान को कतई कमज़ोर नहीं करेगी बल्कि यह माफ़ी पाकिस्तान को और मज़बूत करेगी।
मुझे पूरा विश्वास है कि पाकिस्तान बड़ी तेज़ी से बदल रहा है। बहुत जल्द ही वह दिन आने वाला है जब पाकिस्तानी सरकार आधिकारिक तौर पर बंगालियों से माफ़ी मांगेगी और देशभक्त पाकिस्तानियों के लिए 26 मार्च क्षमा दिवस होगा। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि बंगालियों ने ही पाकिस्तान का निर्माण किया। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि जनरल अयूब ख़ान का विरोध करने वाली जिन्ना की बहन फ़ातिमा का बंगालियों ने समर्थन किया। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि बांग्लादेश की जनता के साथ नया रिश्ता बनाना चाहता हूं। मैं अपने गंदे अतीत के साथ नहीं जीना चाहता। मैं तो साफ़-सुथरे भविष्य के साथ जीना चाहता हूं। मैं चाहता हूं केवल पाकिस्तान का ही उज्ज्वल भविष्य नहीं बल्कि बांग्लादेश का भी भविष्य उज्ज्वल हो। मैं यह माफ़ी इसलिए भी चाहता हूं क्योंकि मैं पाकिस्तान से प्यार करता हूं और मैं बाग्लादेश से भी प्यार करता हूं। मेरे बांग्लादेश के भाई-बहनों को स्वाधीनता दिवस की शुभकामनाएं।

'सखी' : स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर

'सखी' : स्त्री की कोमल भावनाओं का सफर
Tuesday, 13 April 2010 16:48 हरिगोविंद विश्वकर्मा

कहा जाता है कि संगीत वह खजाना है जहां इंसान को भावनात्मक संतुष्टि मिलती है। तभी तो जब कभी कोई ख़ूबसूरत गाना हमारे कर्ण-पटल से टकराता है तो सब कुछ थम-सा जाता है और हम उस गीत में खो से जाते हैं। आंखें बंद करके उस गीत को अपने अंदर समाने देते हैं। नवोदित गायिका-गीतकार-संगीतकार रिमि बसु सिन्हा की 'सखी' एक ऐसी ही पेशकश है। एलबम में कुल नौ भावना-प्रधान गीत समाहित हैं। सभी गीतों के बोल जितने खूबसूरत हैं, गायिकाओं ने अंतरमन की छूने वाली आवाज़ से उसी तरह सराबोर किया।
सही मायने में अगर इस एलबम को उपन्यास कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसकी परिकल्पना, लेखन और संगीत रिमि ने ख़ुद तैयार किया है। यह अनोखा प्रयास नारीत्व को ख़ास तरीक़े से सेलिब्रेट करने की कोशिश है और नारी-रचनाधर्मिता का उत्सव भी। यह केवल स्त्रियों के जरिए ही मूर्त रूप देने का कॉन्सेप्ट है। भारतीय संगीत-जगत में इस तरह की यह पहली कोशिश है। इसमें शामिल हर गाने स्त्री की ही सोच हैं, स्त्री के ही अल्फ़ाज़ हैं और स्त्री द्वारा ही सुर में पिरोये गए हैं। चार पीढ़ी की नामचीन और समर्थ नायिकाओं ऊषा मंगेशकर, कविता कृष्णमूर्ति, केएस चित्रा, सुनिधि चौहान, रिचा शर्मा, महालक्ष्मी अय्यर, ऐश्वर्या मजुमदार और खुद रिमि बसु सिन्हा ने इन भावना-प्रधान कर्णप्रिय नग़मों को अपनी जादुई आवाज़ से सराबोर किया हैं।
मसलन, इस मनोहारी संगीत के सफ़र का आग़ाज़ ‘सुन सखी...’ गीत से होता है। इसमें स्त्री ने बताने की कोशिश की है कि वो कितना कुछ कहना चाहती है, सुनना और बांटना चाहती है। तभी तो ईश्वर ने उसे भावना-प्रधान बनाया है और ये कोमल भावनाएं सबको जोड़कर रखती हैं। चित्रा की गायिकी और भाव में सच्ची सखी दिख ही जाती है। अगला पड़ाव ‘दिम तान ना...’ गीत है जिसमें स्त्री आशा का दूत के किरदार में है। वह हर तरफ़ ख़ुशी और उल्लास फैलाना चाहती है। ताकि दुनिया के हर कोने से मोहब्बत की धुन सुनाई पड़े। सुनिधि की सम्मोहित करने वाली आवाज़ इस गीत के साथ हमें उसी दुनिया में ले जाती है।

रिमि बसु सिन्हाइस सुहाने सफ़र का तीसरे ठहराव पर ‘दिल के अरमानों की बात...’ है जिसमें स्त्री के बचपन से तरुणाई तक का अंतरद्वंद्व है। दरअसल, कभी-कभी कितना वक़्त गुज़र जाता है ,स्त्री कितनी चाहत बटोर के रखती है, कितना कुछ करना चाहती है मगर उलझनों की बेड़ियों से मुक्त नहीं हो पाती। उसके अरमान जस के तस रह जाते हैं। वक्त बहुत पीछे छूट जाता है। खुद को खोजने वाले इस गाने को बेहद ही अलग तरह से तैयार किया गया है। अलग तरीके का इस्तेमाल इसलिए किया गया है क्योंकि यह आमतौर पर बहुत कम प्रयोग किया जाने वाले नौ मात्रे के ठेके राग अहीर भैरव पर आधारित है। इस गीत को कविता कृष्णमूर्ति की खनकती आवाज़ ने यादगार बना दिया है।
सफ़र के अगर चौथे गीत ‘नैना जागे...’ की बात करें तो सूफ़ियाना अंदाज़ में पिरोए गए इस नग़मे में स्त्री के सुंदर नयन अपने प्रेरणास्वरूप इष्ट की बात करते हैं। संगीत के कद्रदान बस अपनी आंखें बंद करें और गायिका रिचा के साथ स्त्री के हसीन नयनों की महत्ता, बंद-खुले नयन के सौंदर्य का ख़ूबसूरत दीदार करें। संगीतमय सफ़र का अगला गाना ‘कुछ ना सामझ पाए...’ स्त्री के कमसिन मन की दुविधा, नासमझी, नादानी और भावनाओं के तानेबाने को उकेरता है। नए रिश्ते तलाशती स्त्री का अल्हड़पन में किसी से रिश्ता जुड़ जाना बेहद सहज है। यही थीम है इस संवेदना से छलकते गाने की जो राग खमाज पर आधारित है। महालक्ष्मी की जादुई आवाज़ ने तो इसमें चार चांद लगा दिया है।
अगले मुकाम गीत ‘बोले क्या...’ पर संगीतप्रेमी स्त्री के श्रृंगार पक्ष से रूबरू होते हैं। स्त्री और श्रृंगार एक दूसरे के पूरक हैं। मगर भावनाओं के साथ श्रृंगार का अर्थ भी बदलता रहता है। किसी अपने के लिए श्रृंगार करने में अधिक आनंद आता है। संबंधों के खोने या छूटने से मन तड़पता है, आत्मसम्मान के टूटने से डर लगता है। इसी भावना को संगीतमय बनाया है ऊषा मंगेशकर की सुरीली आवाज़ ने।
अगले गीत का शीर्षक है ‘जो ज़िंदगी की जंग हार रहा है...’ दरअसल, जीवन में गाहे-बगाहे कुछ ऐसी घटनाएं हो जाती है जो विचलित कर देती है। इस गीत में बालिका के रूप में स्त्री ख़ुद कुछ सवाल करती है अपने सपने का साकार करने की बात करती है। बालिका की भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है बाल गायिका ऐश्वर्या ने संगीत के सफ़र का आठवें पायदान पर है ‘मेरे मन का पंछी...’ यह स्त्री की प्रेरणा को अभिव्यक्ति देता है। हिंदुस्तानी राग भीम पलासी पर आधारित यह इस गीत को ख़ुस रिमि की मीठी आवाज ने इतना ख़ूबसूरत बना दिया है कि बार बार सुनने का मन करता है। एलबम को अंजाम तक पहुंचाया है ‘नए सपने...’ ने। न जाने कितने बरस का बहुप्रतीक्षित सपना जब साकार होता है तो स्त्री कितनी आत्मविभोर हो जाती है। यह गाना सुनकर पता चलता है। यह गीत सभी गायिकाओं से सम्मिलित स्वर में तैयार किया गया है।
सांस्कृतिक नगरी इलाहाबाद के अति-प्रतिष्ठित बंगाली परिवार में जन्मी रिमि संगीत और नाटक के माहौल में ही पली-बढ़ी। आठ साल की कोमल उम्र से ही संगीत सिखना शुरू किया और जल्द ही शहर के सांस्कृतिक समारोहों का हिस्सा बन गईं। शहर ही नहीं राज्य के अनगिनत संगीत जलसों में स्कूल का प्रतिनिधित्व किया और कई पुरस्कार जीते। 15 साल की उम्र में आकाशवाणी कलाकार बन गईं। फ़िलहाल, वह आकाशवाणी और दूरदर्शन की शीर्ष कलाकारों की फ़ेहरिस्त में हैं।
हिंदुस्तानी संगीत रिमि का हमेशा से पैशन-सा रहा है। इसीलिए दसवीं में इसे एक विषय के रूप में लिया। नामचीन संगीतकार स्वर्गीय बीएन बिस्वास से संगीत की बारीकियां सीखीं। गायन-संगीत में उनकी दीवानगी देखकर उनके माता-पिता ने उन्हें स्नातक में भी संगीत लेने के लिए प्रोत्साहित किया। यही वजह रही कि रिमि ने गुरु पं. रामाश्रय झा और कमला बोस के मार्गदर्शन में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदुस्तानी संगीत में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय सांस्कृतिक प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार भी जीता। वह प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से संगीत प्रभाकर और सीनियर डिप्लोमा भी हासिल करने में सफल रहीं।
1992 में दिल्ली में शिफ़्ट होने के बाद रिमि टीवी सीरियल्स और फ़िल्मी दुनिया में सक्रिय हो गईं। कई मशहूर ब्रैंड के लिए खनकती आवाज़ में अनेक भाषाओं में कई टाइटल ट्रैक्स, गाने और जिंगल्स रिकॉर्ड कराए और सीरियल्स, शॉर्ट फ़िल्म्स, डॉक्यूमेंटरी के लिए टाइटल गानों को स्वर दिया। वॉइस-ओवर शुरू से उनकी हॉबी रही और डिस्कवरी चैनल्स और कई सरकारी परियोजनाओं के नामचीन वृत्तचित्रों में अपनी आवाज़ से चार चांद लगाया। इसके अलावा वह कई मशहूर म्यूज़िकल शोज़ में हिस्सा लेने लगीं।
1999 में एचएमवी ने रिमि की आवाज़ को अपने नए भोजपुरी प्रॉजेक्ट के लिए चुना जिसे बेहद लंबे इंतज़ार के बाद लॉन्च किया गया। बहरहाल, ‘जाने हमरी बिंदिया’ टाइटल वाला सोलो-एलबम बेहद लोकप्रिय हुआ और राष्ट्रीय स्तर पर कवरेज मिली। नतीजतन एचएमवी ने अगले प्रॉजेक्ट में उन्हें साइन करने में रुचि दिखाई मगर पति की कीनिया की राजधानी नैरोबी में पोस्टिंग हो जाने से उन्हें देश से बाहर जाना पड़ा।
रिमि 2000 में नैरोबी गईं और चार साल तक वहां रहीं। कहते हैं चांद जहां भी रहेगा अपनी चांदनी तो बिखेरेगा ही। रिमि नैरोबी की संगीत दुनिया में भी सक्रिय हो गईं। वहां हिंदुस्तानी संगीत और सांस्कृतिक समारोह का बढ़ावा दिया और कई कद्रदान बनाए। जल्द ही इस अफ्रीकी शहर के संगीत फ़लक पर अपने लिए अहम मुकाम बना लिया। नैरोबी लोकल एफ़एम चैनल की बेहद जानी-पहचानी उदघोषिका बन गईं। गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर भारतीय दूतावास की ओर से हिंदी भाषा में आयोजित स्टेज शोज़ और लाइव रेडियो प्रोग्रोम्स प्रस्तुत किए और उनका निर्देशन किया। वहां रिमी ने संगीत ही नहीं हिंदी में अपनी ज़बरदस्त रचनाशीलता का लोहा मनवाया। वसंत उत्सव और महिषासुर मर्दिनी जैसे प्रोग्राम्स की रूपरेखा बनाई, उन्हें लिखा और निर्देशन करते हुए सफलतापूर्वक पेश भी किया जिसे भारतीय दूतावास ने प्रायोजित किया। वहां रिमि ने लाइव प्रोग्राम्स पेश करने का नया ट्रेंड भी सेट किया। होली, रामनवमी, वैसाखी, महावीर जयंती, रमज़ान आदि के मौक़े पर पेश किए जाने वाले गीत के साथ ख़ूबसूरत काव्यमय स्क्रिप्ट और शेरो-शायरी जोड़कर उसमें जादू भर दिया। कुल मिलाकर उन्होंने विदेश में भारत की समृद्ध धर्मनिरपेक्ष परंपरा को आगे बढ़ाया जिसे समूचे अफ्रीका में एशियाई समुदाय के लोगों ने सराहा। रिमि ने भारतीय दूतावास की ओर से संगीत मर्मज्ञ पं. जसराज का मैराथन इंटरव्यू लिया जो नैरोबी के लोकप्रिय लोकल रेडियो पर प्रसारित भी हुआ। इसके अलावा वह कीनिया की चिन्माया मिशन सेवा ट्रस्ट से जुड़ीं और नैरोबी में अंतरराष्ट्रीय समागम पर उनका एलबम ‘भक्ति’ कंपोज़ किया जिसकी मांग जो आज भी उसी तरह है।
कीनिया में भारतीय संस्कृति और संगीत को बढ़ावा देने के अभियान में रिमि के अद्भुत योगदान को देखते हुए ही भारतीय दूतावास ने उन्हें गांधी जयंती पर संयुक्त राष्ट्रसंघ के नैरोबी स्थित अफ्रीकी मुख्यालय में संगीत उत्सव आयोजित करने की दावत दी जो बेहद सफल रहा। किसी प्रवासी का यह दुर्लभ करतब है जिसके चलते कीनिया में भारतीय दूतावास की ओर से रिमि का सम्मान किया गया। बेशक, रिमि की विविधता ही उनकी ख़ासियत है। ‘सखी’ से पहले टाइम्स म्यूज़िक ने कुमार शानू के साथ एलबम ‘मैया का दरबार’ रिलीज़ किया। फ़िलहाल रिमी मुंबई में हैं और देश की आर्थिक राजधानी में अपनी गायन और कॉम्पोज़िशन क्षमता के बल पर ख़ुद को पूर्ण संगीतकार के रूप स्थापित करने के लिए प्रयासरत हैं।
लेखक हरिगोविंद विश्वकर्मा फोकस टीवी, हमार टीवी के मुंबई ब्यूरो के चीफ हैं.