मंगलवार, 24 अगस्त 2010

कहानी - बदचलन

हरिगोविंद विश्वकर्मा

उसे लेकर मैं बुरी तरह उलझा था। ऐसा क्यों हुआ... उसने ऐसा क्यों किया... पूरे मामले को नए सिरे से समझने की कोशिश कर रहा था। मैं अभी तक सकते में था। कह लीजिए, मेरे अंदर घमासान-सा मचा था। हालांकि, पछतावा भी हो रहा था और ग़ुस्सा भी आ रहा था मुझे अपने ऊपर। उसका रिऐक्शन मेरे लिए एकदम अप्रत्याशित था। हां, आख़िर उसका वीहैवियर उसके स्वभाव के एकदम विपरीत क्यों रहा। कहीं उसके बारे में मेरा पूरा का पूरा आकलन ग़लत तो नहीं था, उसकी प्रतिक्रिया तो कुछ ऐसी ही थी। ओ माई गॉड...! तब तो बहुत बड़ा अनर्थ हो गया। कैसे हुई मुझसे यह चूक...।

दरअसल, पिछले कई साल से वह इसी मोहल्ले में रह रही थी। पहले उसकी मां भी साथ रहती थी। दो साल पहले मां का स्वर्गवास हो गया और वह अकेली रह गई। तब से वह अकेली ही रह रही थी। कभी-कभार घर में एक वृद्ध महिला आ जाती थी, दो चार दिन के लिए। वह उसकी मौसी है। मौसी के वापस जाने के बाद वह फिर से अकेली। पास-पड़ोस के लोगों से वह ज़्यादा घुली-मिली नहीं थी।

नौकरी मिलने से पहले मैं घर पर ही रहता था। सो, उसे रोज़ सुबह घर से जाते और शाम को वापस लौटते देखता था। कभी-कभार रात भी हो जाती थी। पर जब से मैं ड्यूटी पर जाने लगा, उसकी दिनचर्या से अनजान हो गया। हालांकि लोग कहते थे कि वह देर रात रिक्शे से उतरती देखी जाती है। और महीने में चार-पांच बार तो रात भर बाहर ही रहती है और एकदम सुबह घर लौटती है।

यह भी पता नहीं कि वह क्या काम करती है या कहां काम करती है। हालांकि लोग कहते हैं कि वह यहीं पास में किसी ऑफ़िस में काम करती है जहां हफ़्ते में दो दिन शनिवार और रविवार अवकाश रहता है। कुछ लोग कहते हैं कि वह टीचर है। लेकिन सच क्या है भगवान ही जाने...

यह भी कहा जाता था कि उसकी शादी को कोई पांचेक साल गुज़र चुके हैं। उसकी शादी में मेरे घर वाले भी शामिल हुए थे। शादी के दौरान ही लेनदेन को लेकर विवाद हो गया और पर्याप्त दहेज की व्यवस्था न होने से उसकी विदाई नहीं हुई, वह ससुराल ही न जा सकी। कई लोग कानाफूसी करते हैं कि वह छूट गई है। जब तक उसकी मां जीवित थी, साथ रही। अब वह बिलकुल अकेली है। मां के निधन के कुछ महीने बाद एक दिन अचानक वह बहुत बीमार हो गई। उसे पास के अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वह काफी सीरियस थी।

उन दिनों मैं पढ़ाई पूरी करके मुंबई में नया-नया आया था। घर वालों के कहने पर मुझे भी उसे देखने के लिए अस्पताल जाना पड़ा। पड़ोसी होने के नाते मेरा फ़र्ज़ भी था। उस दिन, जब मैं अस्पताल पहुंचा तो अचानक उसकी तबीयत और बिगड़ गई। उसकी मौसी रो रही थी, मैंने उन्हें ढांढ़स बंधाया। उसके लीवर में कुछ शायद सूजन आ गई थी। शरीर ज्वर से तप रहा था। वह बेहाश थी। उसका ऑपरेशन होने वाला था। ख़ून की तत्काल सख़्त ज़रूरत थी लेकिन आसपास के ब्लडबैंकों में उसके ग्रुप का ख़ून ही न था। उसके कई रिश्तेदार आए थे। ख़ून देने की पहल कई लोगों ने की, पर किसी का ग्रुप भी उससे ना मिला जिससे कोई उसे ख़ून न दे सका। ब्लड डोनेशन की औपचारिक पहल मैंने भी की, हालांकि डर रहा था क्योंकि घर में किसी से पूछा नहीं था और मामला ख़ून एक अनजान लड़की को देने का है। मेरा संकट उस समय और बढ़ गया जब मेरा ग्रुप उसके ग्रुप का ही निकला और न चाहते हुए भी मुझे ख़ून देना पड़ा।

लेकिन उतने से ही काम नहीं होने वाला था, ख़ून की और ज़रूरत थी। इलाज कर रहे डॉ. बत्रा परेशान थे। ख़ून के अभाव में ऑपरेशन नहीं हो पा रहा था। और, उसकी हालत लगातार बिगड़ती जा रही थी।

आख़िरकार डॉ. बत्रा ख़ुद बेड पर लेट गए और अपने असिस्टेंट से ख़ून निकालने को कहा। मेरी ज़िंदगी में पहली घटना थी जब किसी डॉक्टर ने अपने मरीज को अपना ही ख़ून देने का फ़ैसला किया हो। मेरी ही नहीं, वहां मौजूद हर किसी की नज़र में डॉ. बत्रा का सम्मान अचानक बहुत बढ़ गया। वह महामानव का दर्जा पा गए। श्रद्धेय हो गए। उन्होंने जता दिया कि डॉक्टरों के लिए डॉक्टरी भले पैसा बनाने का ख़ालिस पेशा हो लेकिन उनके लिए पूजा है, सच्ची समाजसेवा है।

उस दिन ख़ून देने के बाद मैं कई घंटे अस्पताल में ही रहा। मन ही मन मना रहा था कि ख़ून देने की ख़बर घर वालों को न हो। पूरे समय तनाव में था कि क्या जवाब दूंगा। एक अनजान लड़की को ख़ून देने के अपने फ़ैसले को कैसे जस्टीफ़ाई करूंगा। निश्चित तौर पर लोग नाराज़ होंगे। हालांकि मेरे ख़ून देने की ख़बर मुझसे पहले ही मेरे घर पहुंच गई, मेरे भैया ख़ुद अस्पताल आ गए मुझे लेने के लिए। वह किसी ज़रूरतमंद को ख़ून देने के मेरे फ़ैसले से बहुत ख़ुश थे। मुझे बड़ी तसल्ली हुई। मैं हलका महसूस करने लगा।

बहरहाल, ऑपरेशन के बाद उसकी तबीयत सुधरने लगी। चार-पांच दिन में ठीक भी हो गई और अस्पताल से डिसचार्ज कर दी गई। उसकी मौसी साथ ही रही। दो महीने में वह एकदम भली-चंगी हो गई और मौसी वापस चली गई। बीमारी के बाद उसका रूप और भी निखर आया। तक़रीबन तीस साल की उम्र में कह लीजिए कि उसका यौवन ग़ज़ब का गदराया हुआ था। सुंदर तो थी ही, देखने वाला पहली नज़र में ही मंत्रमुग्ध हो जाए। हां, उसकी मुस्कुराहट भी बड़ी क़ातिल थी। स्वभाव से भी बहुत चंचल। हर किसी से बिंदास बातचीत करती और बिना किसी प्रसंग के हंस भी देती। छोटी-मोटी बातों का कभी बुरा नहीं मानती थी।

एक बार जब मैं घर में अकेला था तभी वह आ गई और मेरे बहुत क़रीब आकर धीरे से ‘थैक्स’ बोली। शायद ख़ून देने के लिए मेरा शुक्रिया अदा किया।

इस बीच एक कंपनी में मुझे नौकरी मिल गई। कंपनी बहुत दूर थी। मेरी दिनचर्या घर और कंपनी के बीच सिमट कर रह गई। आठ घंटे की नौकरी के लिए मुझे पांच-छह घंटे यात्रा में ख़र्च करने पड़ते थे। कुल 13 से 14 घंटे। मैं सुबह घर से निकलता और रात को ही लौट पाता। बस और लोकल गाड़ी की भीड़ में यात्रा करता हुआ मैं बुरी तरह थक जाता। इसीलिए बिस्तर पर पड़ते ही गहरी नींद की आगोश में चला जाता। और अगली सुबह सात बजे जगा दिया जाता। इस दौरान मेरे मोहल्ले में क्या कुछ होता रहा, मुझे पता ही न चला।

बहरहाल, शाम को आवारा लड़के धीरे-धीरे हमारे पड़ोस में जमा होने लगे। वह घर में होती तो दरवाज़े के सामने ही खड़े रहते। बाहर निकलती तो छींटाकशी करते, फब्तियां कसते। सड़कछाप मजनुंओं की तादाद दिनोंदिन बढ़ने लगी। हां, जिस दिन वह घर पर न होती तो वहां पूरी शांति रहती।

अलबत्ता, मुझे तो तब पता चला था जब पानी सिर से काफी ऊपर निकल गया। वह मोहल्ले की नंबर एक बदमाश लड़की मानी जाने लगी। यह चर्चा आम हो गई कि दरवाज़े के सामने खड़े होने वाले आवारा लड़को के साथ उसका चक्कर है।

एक बार मेरे अवकाश वाले दिन पड़ोस के भाजीवाले मास्टर घर आ गए। बात-बात में उन्होंने कहा –वह बहुत बदमाश लड़की है। एक बार मैंने ख़ुद आधी रात को नल के पास एक लड़के का साथ आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ा था। अरे भाई, पक्की हरामी औरत है वह। रात में लड़कों के साथ स्कूल के अहाते में भी चली जाती है शरीर की प्यास बुझाने के लिए।

उनकी बात सुनकर मैं सकते में आ गया। क्योंकि वह मोहल्ले में बेहद सम्मानित व्यक्ति थे। उनकी देखी घटना झूठ तो हो ही नहीं सकती। लिहाजा, उसके बारे में मेरे ख़यालात बदलने लगे। मुझे लगा, ज़रूर उसमें खोट है। तभी तो पता नहीं कहां-कहां के आवारा लड़के उसके दरवाज़े पर हा-हा, हू हू करते रहते हैं। अगर वह सही होती तो विरोध तो करती।

ऐसी ही बातें बाद में मोहल्ले के कई और लोगों ने मुझे बताई। अब मेरे मन में यह बात घर कर गई कि वह सचमुच महाचालू और चरित्रहीन है, उसका नैतिक पतन हो चुका है। हालांकि, मैंने कभी उसे किसी लड़के से बात करते नहीं देखा था। हां, उसके घर के सामने आवारा किस्म के लड़कों का हुजूम ज़रूर मेरी नज़र में था।

धीरे-धीरे कानाफूसी होने लगी कि वह धंधा भी करती है। पैसे के लिए तन बेचती है। बड़े-बड़े हॉटेलों में क्लाइंट्स के पास जाती है। रात भर वहीं रहती है। लड़के भी अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए बिंदास उसके घर में घुस जाते हैं। और ना मालूम क्या क्या...

काफी अरसे बाद एक दिन वह घर आई। मेरा साप्ताहिक अवकाश था। मुझे देखकर मुस्करा दी और ‘हैलो’ बोली। औपचारिक अभिवादन के बाद मैं चुप हो गया। वह सामने कुर्सी पर बैठ गई और अंग्रेज़ी अख़बार पढ़ने लगी। उसके बाद तो हर अवकाश पर मैं उसे अपने घर में अख़बार पढ़ते हुए देखने लगा। ऐसे समय आती जब मैं घर पर ही होता। मुझसे बात भी करती थी। इसके बाद तो हमारी खूब बात होने लगी। कुछ दिन बाद कई-कई घंटे बैठने लगी। कई मसलों पर बात भी करती। बातचीत में काफी मैच्यौर्ड लगती थी। पहुंचते ही पूछती, ‘खाना हो गया’। मैं भी झट से ‘हां’ कह देता था। हमारे बीच व्यक्तिगत बात बिलकुल न होती थी। इसलिए हम एक दूसरे से अनजान ही रहे।

कोई साल भर पहले, एक दिन उसके घर के सामने जुटने वाले लड़कों में आपस में ही मारपीट हो गई। चाकूबाज़ी में एक लड़का घायल हो गया। चर्चा थी कि लड़ने वाले दोनों लड़के उसके प्रेमी हैं और मारपीट की जड़ भी वही थी। उसी के लिए दोनों में ख़ूनी तक़रार हुई।

दो दिन बाद भाजीवाले मास्टर ने बताया कि दोनों युवकों के साथ उसे रात में कई बार स्कूल के अहाते में आपत्तिजनक अवस्था में पकड़ चुके हैं। उन्होंने कहा –कार्तिक की कुतिया हो गई है साली। एक से मन नहीं भरता।

चाकूबाज़ी की घटना के बाद पुलिस आ गई और पूछताछ के लिए उसे थाने ले गई। रात को मैं घर आया तो पता चला कि कई घंटे से वह थाने में ही है। उसकी मौसी और घर वालों के आग्रह पर मैं एक स्थानीय नेता के साथ थाने गया और देर रात उसे वापस लिवा आया। घर आते समय वह फूट-फूट कर रो रही थी। लेकिन मुझे लगा कि नाटक कर रही है। चरित्रवान होने का ढोंग। मुझ पर इंप्रेशन बना रही है।

उस वारदात के बाद वह थाने में भी बदनाम औरत के रूप में दर्ज हो गई। उसके घर पुलिस वाले भी आने लगे। छोटी-मोटी बात पर उसे थाने बुलाया जाने लगा। कुल मिलाकर वह मोहल्ले की सीमा लांघकर आसपास के इलाके में कुख्यात हो गई। इस प्रकरण के बाद उसकी नौकरी भी छूट गई। वह घर पर ही रहने लगी। हां महीने में कई बार मैं उसे काम से लौटते देखता था। शायद उसे कैज़ुअल या पार्टटाइम जॉब मिल गया था। कई बार मैंने भी उसे सुबह-सुबह घर लौटते देखा। मगर कभी नहीं पूछा कि वह क्या काम करती है।

अब वह साप्ताहिक अवकाश के दिन मेरे पास और ज़्यादा वक़्त गुज़ारने लगी। कह लीजिए कि सुबह से शाम मेरे घर में बैठी रहती। मैं संकोचवश कुछ बोल नहीं पाता था। इस दौरान या तो मुझसे बात करती या अख़बार, पत्रिका या किसी पुस्तक पढ़ती रहती। वह कई चर्चित किताबों और उपन्यासों और उनके किरदारों के बारे में बात करती थी। कभी-कभार तो नामचीन विदेशी लेखकों की बात कर मुझे भी चौंका देती। विश्व-साहित्य में इतना अपडेटेड होने की उसकी क़ाबिलियत का मैं कायल था। उसके चरित्र और रुचि में भारी विरोधाभास पर अकसर हैरान होता। और तो और कई बार तिपाई पर ही सो जाती।

एक दिन दूसरे पड़ोसी रामू मास्टर मेरे घर आ गए। वह भी उसके बारे में भाजीवाले मास्टर की ही तरह विचार रखते थे।

बात-बात में उन्होंने कहा –पटा लिया आपने भी तितली... मैं चौंककर उकी ओर देखा।

–आजकल, उन्होंने कहा, वह आपके घर में खूब आती है। बहती गंगा में आप भी हाथ धो रहे हैं... अच्छा है! माल अच्छा है! मोहल्ले और आसपास के छोकरे ही नहीं पुलिस वाले तर रहे हैं, आप भी तर जाइए! इतना अच्छा मौक़ा मिलने पर चूकना मूर्खता है!

रामू मास्टर की बात मुझे बहुत बुरी लगी और मैंने उन्हें डांटकर चुप करा दिया। पर उनकी बात से मेरी नींद हराम हो गई। पहली बार मैंने अपने को बेचैन पाया। मेरा ध्यान बार-बार उसी की ओर जा रहा था। देर रात तक मैं न मालूम क्या-क्या सोचता रहा।

मैंने महसूस किया कि रामू मास्टर की बात से मेरे अंदर आग लग गई है। जिसमें मेरा विवेक धू-धू करके जल रहा है। मन में विकृत विचार जन्म लेने लगे। उसी समय मुझे लग गया था कि कुछ न कुछ अनर्थ होने वाला है क्योंकि धीरे-धीरे मेरा अपने मन पर से नियंत्रण ढीला हो रहा था। मेरे अंदर दो व्यक्ति पैदा हो गए। एक उसकी ओर आकर्षित होता, दूसरा मना करता। मेरे अंदर अंतरद्वंद्व का सिलसिला शुरू हो गया।

उसे लेकर हमेशा ही उलझा रहता। एक दिन अचानक मन में ख़याल कौंधा, क्या वह मुझसे पटेगी! अगले पल सिर झटक दिया कि मैं क्या वाहियात सोच रहा हूं। अंतरद्वंद्व चलता रहा। मेरे अंदर का एक व्यक्ति कहता, मैं भी कोशिश करूं, अगले क्षण अंदर का दूसरा व्यक्ति कहता, नहीं कभी नहीं। यह ग़लत है।

मेरे चरित्र और कामदेव के बीच लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। फिर मैंने महसूस किया कि कामदेव चरित्र पर भारी पड़ रहे हैं। कुछ बातें न चाहते हुए भी मैं कर रहा था। मसलन, जब भी वह घर आती मैं अपने दरवाज़े पर खड़ा रहता। आते-जाते उसका कोई ना कोई अंग मुझसे ज़रूर छू या टकरा जाता। इससे मुझे सुख मिलता। मैंने महसूस किया कि मैं उसके उरोजों और कूल्हों को भी छूने की भरसक कोशिश करता हूं। मुझे अपने ऊपर दया आने लगी, कि मैं स्पर्श-मनोरोगी होता जा रहा हूं। छू जाने पर उसका विशेष ढंग से हंसना और पलक झपकाना, मेरी धड़कन बढ़ा देता। इन सब हरकतों से मुझे लगता, वह लिफ़्ट दे रही है। वह जब भी मेरे घर आती तो मुझे बहुत अच्छा लगता।

मुझे लगा वह मेरे मनोभाव अच्छी तरह समझती है। इसके बावजूद मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि कुछ कहता। मैं हरदम यही सोचता, काश वह ही पहल करती! लेकिन वह आगे बढ़ने का नाम ही नहीं ले रही थी। मेरी व्याकुलता दिनोंदिन बढ़ती जा रही थी।

मेरी इस हालत के लिए रामू मास्टर ज़िम्मेदार थे। आज सुबह वह मेरे पास बैठे थे। इधर-उधर की बातें हो रही थीं। मुझे पता था जल्द ही वह उसका ही जिक्र करेंगे।

–आख़िरकार तितली आप पर ही मरने लगी। उन्होंने मुस्कराकर धीरे से कहा।

ना मालूम क्यूं इस बार मुझे उनकी बात बुरी नहीं लगी। मैंने मुस्कराकर प्रशंसा-पत्र ग्रहण कर लिया। हालांकि मुझे मेरी ही मुस्कराहट अच्छी नहीं लगी। फिर भी एक कुटिल मुस्कान मेरे चेहरे से चिपक गई। मुझे ख़ुद से घृणा हुई।

–हमें भी दिलवाओ यार! बातचीत में रामू मास्टर और आगे बढ़ गए।

–क्या...? मैं उनका मतलब समझ गया।

–जिसका मज़ा आप लूट रहे हैं। वह बेशर्मी पर उतर आए।

–मास्टर आप ग़लत समझ रहे हैं। अबकी बार मुझे सफ़ाई देनी पड़ी।

–अब हमीं से झूठ मत बोलो यार।

उसी समय वह घर में आ गई। और सोफे पर बैठकर अख़बार देखने लगी। रामू मास्टर के चेहरे पर अर्थ भरी मुस्कान थी। थोड़ी देर बाद वह चले गए। मैं भी एक किताब निकाल कर पन्ने पलटने लगा।

कमरे में नीरवता पसरी थी। मैं सोच रहा था, हमारे बीच अब तो कुछ होना ही चाहिए।

–यह आदमी आपके यहां बहुत ज़्यादा आता है क्या...? अचानक वह बिना किसी भूमिका के बोली।

–कौन...? रामू मास्टर...?

–हां...!

–हां, आ जाते हैं कभी-कभार। नेक इंसान हैं। मैंने अपनी तरफ़ से सफ़ाई दी –मैं नहीं जाता इन लोगों के पास। ये ही आ जाते हैं।

वह बग़ौर मुझे ही देख रही थी। देखे जा रही थी। शायद मेरी रामू मास्टर से मेलजोल के बारे में सोच रही थी।

–आपको पता है... उसका स्वर तेज़ था।

–क्या...?

–यही कि हमारे बारे में ये लोग क्या चर्चा करते हैं।

–तुम्हीं बताओ न...! क्या चर्चा करते हैं...? मैं जानने को उत्सुक हो गया।

–फिलहाल तो यह चर्चा है कि... वह रुक गई। थोड़ा विराम लेकर बोली... कि मैं आपसे भी फंस गई हूं। वह उसी तरह बग़ौर देख भी रही थी। मुझे पढ़ने की कोशिश कर रही थी शायद... बाद में शायद हलके से मुस्करा दी थी।

उसकी बात सुनकर रोमांच से मेरे रोंगटे खड़े हो गए। शरीर में सनसनी हुई। दिल की धड़कनें असामान्य। पक्का यक़ीन हो गया कि वह मुझे खुला लिफ़्ट दे रही है। अचानक, पता नहीं कैसे, मेरा हाथ उसकी ओर बढ़ गया और उसके हाथ को नरमी के साथ पकड़ लिया। उसने भी विरोध नहीं किया उस समय। मुझे यही लगा, शायद मेरी सांसे गरम हो रही हैं।

–क्या सचमुच ऐसी अफवाह है...? मैंने उसका हाथ धीरे से दबा दिया। हालांकि अंदर ही अंदर डर रहा था और कांप भी रहा था।

वह हंस दी। पर इस बार उसकी हंसी फीकी-सी थी। पहली बार मुझे उसकी हंसी में व्यंग्य की गंध आई।

–तुम हंसी क्यों...? अबकी बार मैंने उसका हाथ सहलाते हुए पूछा।

–यही कि आपको लेकर भी मैं गच्चा खा गई। उसकी आवाज़ बहुत कठोर थी, बेहद निर्मम।

–मतलब...? मुझे उसकी हरकत से धक्का-सा लगा।

जवाब देने की जगह उसने अपना हाथ तेज़ी से खींच लिया।

–मतलब कि आप भी ठहरे एक साधारण पुरुष, जिसे औरत चाहिए! है ना! आपके अंदर भी वासना की आग में जलता मर्द देख रही हूं जो मुझे पाने की जुगत में है। सोचा था, मोहल्ले में तमाम हवसियों के बीच कोई ऐसा भी है जिसे अपना मान सकती हूं, दोस्त कह सकती हूं। उसके पास सुरक्षित महसूस कर सकती हूं। लेकिन साफ़ दिख रहा है कि आपकी भी नज़र मेरे जिस्म, मेरी जवानी, मेरे उरोजों पर है। आज यक़ीन हो गया कि दुनिया के सारे मर्द एक जैसे होते हैं। औरत के भूखे, विवेकहीन, असामाजिक। सामाजिक प्राणी की जगह केवल प्राणी। पशु। जिसकी केवल दो ही ज़रूरतें होती हैं, संभोग और भोजन। इसीलिए इनकी निग़ाह स्त्री के तन पर होती है। स्त्री की लाचारी का बेज़ा फायदा उठाना चाहते हैं। मौक़े की तलाश में रहते हैं। दोस्ती और हमदर्दी को ढोंग रचते हैं। जबकि होते हैं सब के सब बलात्कारी। भाजीवाले मास्टर ने भी मुझे पाने की कोशिश की। छी...! सफल न हुआ तो मैं चरित्रहीन हो गई। बदनाम कर दिया साले ने। उस कृतघ्न के कारण ही आज मेरी यह हालत है। हे भगवान मैं क्या करूं? वह फूट-फूटकर रोने लगी। मुझे तो काटो तो ख़ून नहीं। जैसे किसी ने आसमान से खींचकर ज़मीन पर ला पटक दिया हो।

वह तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गई।

मैं एकदम जड़वत्। कोई जवाब ही नहीं सूझा। किंकर्तव्यविमूढ़। चेतनाशून्य।

हादसा कहूं या और कुछ और... उसे गुज़रे कई घंटे बीत चुके हैं मगर मैं उसी तरह स्तंभित हूं...

–ऐसा क्यों किया उसने। मैं तब से लगातार सोच ही रहा था –क्या मैं उसे बहुत बुरा आदमी लगा। या मैंने उसका हाथ अपने हाथ में लेकर ग़लती की। उसका रिऐक्शन इस तरह नहीं होना चाहिए था।

मैं लगातार सोचे जा रहा था। कभी अपने ऊपर ग़ुस्सा आता तो कभी उस पर।

–जब मुझसे इतना ही परहेज था, मैं इतना ही बुरा था तो क्यों आती थी मेरे पास... क्यों बैठती थी दिन-दिन भर... मैं फिर से बड़बड़ाने लगा –जो भी हो, वह मेरे बारे में ग़लत धारणा बना कर गई है।

शाम हो गई। हादसे को पूरे सात घंटे।

–ग़लती तो मेरी ही थी। मेरे अंतःकरण से आवाज आई। हां, किस हक़ से मैंने उसका हाथ पकड़ा। आख़िर मेरी भी मंशा तो ग़लत ही थी। मुझे उसके घर जाकर माफी मांगनी चाहिए।

मैं सोचता रहा। उसके घर जाऊं या नहीं। फिर महसूस किया कि मेरे पांव ख़ुद उसके घर की ओर बढ़ रहे हैं। मैं बुदुबदाया –मुझे उसके सामने ग़लती मान लेनी चाहिए और सॉरी बोलना चाहिए।

मैंने उसके दरवाज़े पर दस्तक दी।

क़रीब पांच मिनट तक खड़ा रहा। मुझे लगा कि दरवाज़ा नहीं खोलेगी। लौट रहा था कि दरवाज़ा खुल गया।

उसका चेहरा बुझा था। मुझे देख रही थी। मैं उसके बग़ल से घर में दाख़िल हो गया। उसने दरवाज़ा बंद किया और मेरे पास आ गई।

अचानक फिर लरज पड़ी, –प्लीज़... मुझे पाने की कोशिश न करो...! दहेजलोभी पति ने तलाक़ दे दिया। अब मेरे पास कोई और ठौर नहीं। सो मुझे अपनी ही नज़र में मत गिराओ। दुनिया की नज़र में पहले ही गिर चुकी हूं। अब अपनी ही नज़र में नहीं गिरना चाहती। जब लोग मेरे बारे में ऊलजलूल बकते हैं तो मेरी आत्मा, मेरा चरित्र मुझे दिलासा देते हैं कि लोग झूठ बोल रहे हैं। यही मेरा आत्मबल है जो मुझे तमाम अपमान और जिल्लत झेलने की ताक़त देता है। इसीलिए दुनिया की परवाह नहीं करती। किसी को सफ़ाई नहीं देती। मुझे लोगों से चरित्र प्रमाण-पत्र नहीं चाहिए। जिनका चरित्र ख़ुद संदिग्ध है वे क्या दूसरों को चरित्र प्रमाण-पत्र देंगे। चूंकि लोग ग़लत हैं सो मैंने कभी किसी की परवाह नहीं की। आपके घर में मुझे ज़्यादा सुरक्षा का अहसास होता रहा है। तभी तो पढ़ते-पढ़ते बिंदास सो भी जाती थी। आपसे एक अटूट रिश्ता सा बन गया था। हमारी रुचि भी मेल खाती थी। आपका स्वभाव मुझे आकर्षित करता था। भावनात्मक संबल मिलता था आपसे। ओह... कितना पाक था हमारा रिश्ता। स्त्री-पुरुष संबंधों से बहुत ऊपर। मुझे लगा था इस बस्ती में एक इंसान भी है जिसकी आत्मा निष्पाप है, अकलुष है। पर मैं यहां भी छली गई। आपसे दोस्ती का भ्रम पाल बैठी। पता नहीं इस शरीर में ऐसा क्या है कि हर पुरुष ललचाई नज़र से देखता है। हर जगह वासना की भूखी निग़ाहे घूरती हैं। सोचती हूं, इस चेहरे, इस यौवन को नष्ट कर दूं लेकिन मुझसे यह भी नहीं हो पाता। लड़की हालात से कितनी लाचार होती है, आप नहीं समझ सकते। मेरी पीड़ा, मेरी व्यथा भी आपके गले नहीं उतरेगी क्योंकि आप एक पुरुष हैं। आप क्या कोई भी पुरुष किसी नारी का दर्द नहीं समझ सकता। आज लग रहा है, दुनिया में अकेली हूं। विलकुल तन्हा। पता नहीं अब हवसियों से लड़ पाऊंगी भी या नहीं। कितनी बदनसीब हूं मैं। हे प्रभु। मेरी रक्षा करना। अब मैं कहां जाऊं। कहां मिलेगा सहारा और संरक्षण।

मुझसे रहा नहीं गया और उसकी ओर बढ़ गया।

सॉरी.. मुझसे ब्लंडर हो गया। तुम्हें समझ ही न पाया। प्लीज़ माफ़ कर दो। मैं तो तुम्हारा दोस्त बनने के भी क़ाबिल नहीं। माफ़ कर दो ना प्लीज... प्लीज़...

कहना चाहा कि आओ जीवन का आगे का सफ़र साथ मिलकर तय करें, अगर तुम्हें मंजूर हो तो तुम्हें सहारा और संरक्षण देने में मुझे गर्व महसूस होगा लेकिन ये वाक्य ज़बान से निकले ही नहीं।

वह चुप हो गई थी। मैं उसे सामान्य होने का मौक़ा देना चाहता था। सो वापस हो लिया। इस बार मैंने ख़ुद को हलका महसूस किया।

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