मंगलवार, 2 अगस्त 2011

हाउसवाइफ़ स्त्री की नियति

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई से सटे डोंबिवली में सुनील सालन नाम का शख़्स रहता है। पिता से काफी संपत्ति मिली है। अच्छा खाता कमाता है। उम्र चालीस के ऊपर है। 19 साल पहले प्रेम-विवाह किया था। 10 साल में तीन बच्चे हुए। फिर पहली पत्नी से बिना तलाक़ लिए दूसरा प्रेम-विवाह कर लिया। दूसरी से भी दो बच्चे। यानी दो बीवियां और पांच बच्चे। आजकल वह तीसरे प्रेम-विवाह की तैयारी कर रहा है। हैरान करने वाली बात है कि लोकल पुलिस ख़ामोश है। मानपाड़ा पुलिस कहती है, सालन की दोनों बीवियों या रिश्तेदारों को आपत्ति ही नहीं तब पुलिस क्या करे। हां, एक रिश्तेदार को आपत्ति ज़रूर है पर दूसरी बीवी का भाई है जिसे पत्नी का दर्जा ही नहीं हासिल सो आपत्ति बेमानी है। सालन ने जब दूसरी शादी की थी तब भी किसी को आपत्ति न थी। संभव है वह आगे चौथी, पांचवी या उससे अधिक शादियां करे क्योंकि किसी को कोई आपत्ति ही नहीं। यानी अगर आपत्ति नहीं तो करते रहो शादी पर शादी... है न विचित्र वाकया।
सालन तो मिसाल भर है। पुरुष-प्रधान भारतीय समाज में बड़ी तादाद में पुरुषों के पास दो-तीन बीवियां हैं। नारी को बराबरी का दर्जा देने की पैरवी करने वाले कई लोगों ने भी एक से अधिक शादी की है। कुछ बिना तलाक के तो कुछ फ़र्ज़ी तलाक लेकर। यानी कंसेंट के नाम पर बीवी से स्टैंपपेपर पर दस्तख़त करवा लिया। हालांकि दुनिया की कोई अदालत ऐसे तलाक़ मंज़ूर नहीं करती। सच पूछो तो पति-पत्नी के वैधानिक अलगाव को ही सही तलाक़ को माना जाता है जो फ़ैमिली कोर्ट जारी करती है। पति-पत्नी, विधिवत अलग होने के लिए याचिका दाख़िल करते हैं। फिर नोटिस जारी होता है, बयान दर्ज होता हैं। अलग होने की ठोस वजह पूछी जाती है। इसके बाद भी रिश्ता ख़त्म करने से पूर्व सुलह का एक और मौक़ा दिया जाता है। और, सुलह की हर संभावना ख़त्म होने पर ही तलाक़नामा जारी होता है।
हालांकि, चालाक और संपन्न पुरुषों ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। वे वकीलों और कोर्ट-कर्मचारियों की मिली-भगत से वैध तलाक़नामा हासिल कर लेते हैं। वकीलों और कोर्ट-कर्मियों के ख़तरनाक गठजोड़ के चलते वे शादियां भी टूट रही हैं जो कम से कम क़ानून के डर से निभाई तो जा सकती थीं। दरअसल, अनपढ़, लाचार पत्नियों को फुसलाकर अदालत लाया जाता है जहां वकील उसका बयान और दस्तख़त लेकर आधिकारिक तलाक़नामा हासिल कर लेते हैं। सबसे बड़ी बात यह सामाजिक अपराध करने में वकीलों को तनिक भी झिझक या अपराधबोध नहीं होता। पुरुषों, वकीलों और कोर्ट-कर्मियों का ये नापाक गठजोड़ पति को परमेश्वर मानने वाली नारी को पराजित कर देता है। मुंबई या य शहरों में रहने वाले यूपी-बिहार या दूसरे राज्यों के पुरुष इसी तरह दो बीवियां रखते हैं। पहली गांव में दूसरी शहर में। इसमें, दरअसल, समस्या तब आती है जब कोई विवाद होता और मामला पुलिस स्टेशन या कोर्ट पहुंचता है।
वैसे मान्यता है कि शादी-संस्थान का प्रावधान इसलिए किया गया ताकि एक पुरुष एक स्त्री के साथ शांतिपूर्ण जीवन गुजारे और संतान पैदा करे जिससे कुदरत का जीवनचक्र चलता रहे। इसीलिए अगर इस्लाम को छोड़ दें तो हर मजहब में एक ही शादी का प्रावधान है। वैसे कई मुस्लिम देशों में भी एक से ज़्यादा निकाह की रवायत ख़त्म कर दी गई है। भारत में भी एक से अधिक निकाह यानी पहली बीवी के होते दूसरी शादी की वैधता पर बहस चल रही है। बहस तब शुरू हुई जब 1986 में राजस्थान पुलिस ने लियाक़त अली को पहली बीवी के रहते निकाह करने पर नौकरी से निकाल दिया जिसे राजस्थान हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी 2010 में उस फैसले पर मुहर लगा दी। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि कोई कर्मचारी बीवी के होते दूसरा निकाह करेगा तो नौकरी से हाथ धो बैठेगा। यानी धर्म का बहाना लेकर भी कोई दूसरी शादी करेगा तो कोर्ट दख़ल देगी चाहे पुरुष मुस्लिम ही क्यों न हो। टर्की और ट्यूनीशिया में पत्नी के होते निकाह ग़ैरक़ानूनी है। मिस्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक, यमन, मोरक्को और यहां तक कि पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी वैवाहिक मसलों पर फैसला अदालतें सुनाती हैं। लेकिन भारत में तमाम आलोचना के बाद ये आज भी जारी है। इस्लाम के इसी प्रावधान का फायदा उठाकर कई औरतें दूसरी स्त्रियों से पति छीनती रही हैं।
अगर बिगमी क़ानून के ट्रायल पर गौर करें तो उसकी रफ़्तार कछुआ चाल से भी धीमी है। मुकदमे के निपटारे में कई दशक लग जाते हैं। दिल्ली के 41 वर्षीय जगदीश प्रसाद ने पहली पत्नी से तलाक विए बिना 1970 में दूसरी शादी कर ली। पत्नी ने अदालत गई पर तीस हज़ारी कोर्ट में मुक़दमे के निपटारे में 37 साल लग गए। अगस्त 2008 में फ़ैसला आने के समय जगदीश 78 साल का हो चुका था। हालांकि अदालत ने उसे बिगमी को दोषी क़रार दिया गया और सज़ा और ज़ुर्माना हुआ लेकिन इतनी लंबी अदालती लड़ाई तोड़कर रख देती है। इसीलिए स्त्री क़ानून के झमेले में न पड़कर पति की इच्छा को स्वीकार कर लेती है।
पुरुष-महिला के बीच समानता की बढ़-चढ़कर बात हो रही है। मगर सालन जैसे लोगों का बार-बार शादी करके इस दावे को झुठलाता है। स्त्री को मनोरंजन की वस्तु समझने वालों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर क़ानून समय की मांग है। दरअसल, सालन की दोनों बीवियां उसकी तीसरी शादी का विरोध इसलिए भी नहीं कर पा रही हैं क्योंकि वे जीवन-यापन के लिए पति पर बुरी तरह निर्भर हैं। उनके पास किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं है। विरोध मुसीबत को न्यौता देने के समान है। रहने-खाने को मिला है, वही बहुत। विरोध करने पर उससे भी हाथ धोना पड़ सकता है। इसीलिए न चाहते हुए भी पति की ज्यादती क़बूल कर रही हैं। अन्यथा जैसे कोई पुरुष अपनी बीवी के जीवन में किसी दूसरे पुरुष की कल्पना तक नहीं कर पाता। उसी तरह महिला भी पति के जीवन में दूसरी स्त्री कैसे सहन करेंगी। लेकिन सामाजिक असुरक्षा के चलते वे भारी मन से पति की इच्छा को स्वीकार करती हैं। मतलब औरत अगर कमा नहीं रही है, खालिस हाऊसवाइफ़ है तो 21वीं सदी में भी अबला ही है। समय की मांग है कि स्त्री को सही मायने में इम्पॉवर किया जाए। उत्तराधिकार क़ानून पर सख़्ती से अमल हो। इसमें बेटी को पिता की संपत्ति में हिस्सेदार तो बनाया गया है लेकिन इस क़ानून पर अमल परंपरा के ख़िलाफ़ माना जाता हैं। आउटडेटेड परंपराएं बेटी को पराया धन कहती हैं और पिता की संपत्ति में उसका हिस्सा नहीं मानती। तभी तो आज भी बेटियां शादी के बाद मायके से चली जाती हैं और पैतृक-संपत्ति पर उनका दावा ख़त्म हो जाता है। बेटा या बेटे पिता की दौलत पर ऐश करते हैं। सालन की तरह।


लेखक टीवी 9 मुंबई से संबद्ध हैं।

शनिवार, 30 अप्रैल 2011

अजब-गजब : जब मध्य रेलवे ने एलटीटी-गुवाहाटी एक्सप्रेस को बिना चार्ट के रवाना कर दिया।

हरिगोविंद विश्वकर्मा

जी हां, आपको यकीन नहीं होगा मगर बात सही है। मध्य रेलवे ने शनिवार (30 अप्रैल 2011) की सुबह ये कारनामा किया। दरअसल, कुर्ला के लोकमान्य तिलक टर्मिनस पहुंचने वाले यात्रियों को बताया गया कि सुबह 0805 बजे रवाना होने वाली एलटीटी-गुवाहाटी एक्सप्रेस दो से ढाई घंटे लेट है। और दस बजे के बाद ही रवाना होगी। फिर घोषणा की गई कि ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर लगने वाली है। और ट्रेन 0808 बजे प्लेटफ़ॉर्म नंबर चार पर लग भी गई। कुछ लोग रिस्क लेकर चढ़ भी गए। लेकिन अधिकांश लोग चार्ट का इंतजार करने लगे। लेकिन 0835 तक चार्ट नहीं लगा। इसके बाद एक कर्मचारी चार्ट लेकर आया और एस-1 से चार्ट लगाना शुरू किया। वह एस-11 तक पहुंचा था कि ट्रेन रेंगने लगी। उसके बाद के कोचेज़ में चार्ट ही नहीं लगा। लोगों में अफरा-तफरी मच गई, दौड़कर ट्रेन में चढने लगे। किसी समझदार ने चेन पुलिंग करके ट्रोन रोक दी। लेकिन एक मिनट रुककर ट्रेन फिर रवाना हो गई। हालांकि क़रीब सभी यात्री ट्रेन में घुस गए। लेकिन उनमें ज्यादातर यात्री अपनी सीट पर नहीं पहुंच सके। सबसे ज्यादा परेशानी महिलाओं और बच्चों को हुई। बहरहाल, मध्य रेल के जनसंपर्क अधिकारी एके जैन को सूचना दी गई। उन्होंने एलटीटी के ऑन ड्यूटी स्टेशन मास्टर श्री गोयल से बात की तो उन्होंने स्वीकार किया कि गलती हो गई और खेद भी व्यक्त किया। उन्होंने कल्यण के रेल अधिकारियों से आग्रह किया कि वहां ट्रेन को थोड़ा देर रोक कर लोगों को अपने अपने सीट पर जाने में मदद करें। जिस ट्रेन में दो दो हज़ार से ज़्यादा यात्री यात्रा कर रहे हो उसके साथ इतनी लापरवाही के बदले क्या केवल सॉरी कहना काफी है... दरअसल, रेल में भ्रष्टाचार इस कदर घर कर गया है कि हर आदमी पैसे बनाने की ही जुगत में रहता है। जो भी पब्लिक को डिल करता है वह चाहता है किसी न किसी तरह पैसे बनाए। न तो किसी का ध्यान रेल गाड़ियों के आवागमन या उनमें बुनियादी सुविधाओं पर न ही यात्रियों की खोज-खबर परेशानी पर। इन दिनों गर्मियों की छुट्टी आ गई है हर कोई गांव जाना चाहता है लेकिन इन दिनों गांव जाना एक दिवास्वप्न जैसा हो गया है।

सोमवार, 25 अप्रैल 2011

बुरका महिला के लिए पुरुष की खोजी मोबाइल जेल

बुरक़ा पुरुष की महिला के लिए खोजी मोबाइल जेल
डॉ. शाज़िया नवाज़
हिंदी अनुवाद
हरिगोविंद विश्वकर्मा

हम सभी जानते हैं कि बुरक़े का धर्म या मज़हब से कोई लेना देना नहीं। धर्म केवल ये कहता है कि औरते ऐसे कपड़े पहने ताकि उच्चश्रृंखल न दिखें। फिर बुरक़ा या घूंघट आया कहा से? दुनिया भर में महिलाएं अपने चेहरे को ढंकती क्यों हैं? बुरक़ा पुरुष द्वारा खोजी गई वह चलती-फिरती जेल है जिसके अंदर वह उस स्त्री को रखता है जिससे वह प्रेम करता है। अगर इसमें मोहब्बत होती तो मैं इसे शायद मंज़ूर कर लेती। उस सूरतेहाल में यह जेल स्त्री को किसी दूसरे मायने में ज्यादा स्वीकार्य होती। तब किस स्वभाव का पुरुष उस इंसान को जेल में रखेगा जिसे वह मोहब्बत करता है। ऐसे में बुरक़ा उस तरह की जेल अधिक है जिसमें पुरुष ‘अपनी स्त्री’ को रखता है। औरत के ब्रेनवाश की प्रक्रिया बचपन में ही शुरू हो जाता है। बहुत कम उम्र में ही उसे बताया जाता है कि तुम्हें ख़ुद को पुरुषों से छिपाना है। तुम्हारा चेहरा छुपाकर रखना ‘धर्म’ है। औरत को पुरुषों से भयभीत रहना भी सिखाया जाता है। बहुत कम उम्र से औरत को बताया जाता है कि पुरुष ख़तरनाक़ होते हैं उन पर ऐतबार नहीं किया जा सकता। स्त्री से कहा जाता है, तुम केवल अपने पिता और भाई पर ऐतबार कर सकती हो। क्योंकि पुरुष आपको सहजता से फुसला सकता है। पाकिस्तान में तो औरतों को बताया जाता है ‘पुरुष भेड़िया यानी कामुक और क्रूर होता है जबकि औरत भेड़ या सीधी-सादी होती है।‘ इस नसीहत के चलते ही ज्यादतर पुरुष भेड़िये की तरह व्यवहार करने लगते हैं जबकि औरत भेड़ बन जाती है।

हमारे पुरुष कहते हैं कि औरत को परदा करना चाहिए जबकि हम औरतों के पास पुरुष के लिए किसी तरह का विचार या नज़रिया नहीं होता। ये विचार औरत को नुकसान पहुंचाने और उनके साथ ज़ोर-ज़बरदस्ती करने का होता है। इसलिए वे (पुरुष) हमें (औरत) जेल में रखना चाहते हैं ताकि हमें लेकर उनका दिमाग़ साफ़ रहे। यह तो तोड़ा-मरोड़ा हुआ तर्क है। लेकिन क्या यक़ीनन उनका ये विचार यहां रुक जाता है? हक़ीक़त की दुनिया में उन्हें इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता है कि आप बुरक़े में हैं, वे आपको तंग करेंगे ही। मेरा अनुभव बताता है कि चेहरे पर परदा सड़कों-गलियों में होने वाली छेड़छाड़ या छींटाकशी से मेरी कभी हिफ़ाज़त नहीं कर पाता। पाकिस्तान से छोटे शहरों में घर से निकलने पर हमेशा या मेरे फिता या मेरे भाई साथ होते हैं। अन्यथा गलियों से अकेले गुज़रते समय हमारे जिस्म पर चाहे जितने कपड़े हों, पुरुष चिल्लाएंगे, छींटाकशी करेंगे, पीछा करेंगे और हमारे जिस्म को छूने की कोशिश करेंगे।

इसी के चलते औरत अपने घर से अकेली नहीं निकल सकती। और उसके साथ हमेशा घर का कोई पुरुष रहता है। पाकिस्तान और दूसरे मुस्लिम मुल्कों में पुरष अपने घर की औरतों की दूसरों से हिफ़ाज़त करते हैं। हां, लाहौर जैसे पाकिस्तान के बड़े शहरों में माहौल अलग होता है, आप यकीन करें या न करें. यहां औरतों को यौन-शोषण जैसी समस्या से औरत अपेक्षाकृत कम दो चार होती है। यहां हमारे आसपास के पुरुष सिर न ढंकने और परदा न करने वाली औरतों के सानिध्य आदी होते हैं। पुरुष अधिक शिक्षित होते हैं, इतना ही नहीं ख़ुद उनकी बहन और मां ज़्यादा आज़ाद होती हैं। आइए, अब बात करते हैं अमेरिका की, जी हां, यहां तो गलियों में पुरुष का व्यवहार अनुभव करना विस्मयकारी अनुभव रहा है। मैं जो चाहूं पहन कर आसपास जा सकती हूं। किसी की क्या मजाल की बुरी नज़र भी डाले। इससे मेरी समझ में आया कि बुरक़ा ख़तरनाक़ पुरुषों को हमसे दूर नहीं रखती, बल्कि यह समाज का धारण है। ख़ासकर क़ानून पर अमल का नतीजा जो किसी देश में स्त्री को महफ़ूज़ रखती है। हवाई के खूबसूरत बीच पर मस्ती भरी ठंड हवाओं के सुखद स्पर्श का मेरा पहला अनुभव हैरतअंगेज रहा। वरना पुरुष ने बुरक़ा कहे जाने वाले शामियाने में रखकर स्त्री से खुशनुमा मौसम को इंजॉय करने का उसका बुनियादी हक़ ही लूट लिया है। बुरक़े के भीतर अंधेरा होता है, गर्मी होती है, स्त्री को पुरुष ने वहां केवल इसलिए ढकेल दिया है कि स्त्री के बारे में उसके पास कोई विचार नहीं है तो वो बुरके के अंदर घुटती रहे रहे। डॉक्टर्स विचार को खुदा की बनाई स्वस्थ परंपरा मानते हैं। किसी सभ्य मुल्क में अगर सामने वाले की रज़ामंदी के बग़ैर आपने अपने विचार उस पर थोपने की कोशिश की तो आप 10-20 साल के लिए जेल भेज दिए जाएंगे।

दबाए हुए समाज के पुरुष के लिए ये समझना बड़ा मुश्किल है कि खुले समाज के पुरुष वास्तव में अपने विचार पर अंकुश लगाना सीख गए हैं और उसके लिए वे औरतों पर दोषारोपण नहीं करते। जब फ्रांस में बुरक़े पर रोक की बात आती हैं, जहां यह तर्क दिया जाता है कि औरत जो चाहे उसे पहनने की आज़ादी होनी चाहिए और ये आज़ादी काम नहीं करती... हर समाज में ड्रेसकोड और आज़ादी की एक सीमा है। आपकी आज़ादी वहीं ख़त्म हो जाती है जहां से हमारा रास्ता शुरू होता है। नंगेपन के पैरोकार अकसर मांग करते हैं कि सड़क पर बिना कपड़े के घूमना उनका अधिकार और आज़ादी है जो पूरी होनी चाहिए। ज़ाहिर है उन्हें उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी जा सकती ताकि दूसरे समाज में अव्यवस्था न फैले। इसी तरह एक इंसान की उपर से नीचे तक परदे में रहना भी सुरक्षा के लिए ख़तरा हो सकता है। आपको पता ही नहीं परदे में कौन है। ये अब ख़तरनाक दुनिया हो गई है। आप अपने बच्चे को पार्क में खेलने की इजाज़त नही दे सकता जहां सिर से पांव तक बुरके में ढंके लोग बैठे हैं। क्या मुसलमानों को फ्रांस से बुरक़े पर रोक लगाने की मांग करने का अधिकार है ऐसे में जब पश्चिम की औरते कम कपड़े में मुस्लिम देशों नहीं घूम सकती। आप उम्मीद कर रहे हैं कि वे आपकी संस्कृति का सम्मान करें और जब वे आपके देश में आए तब भी और जब आप उनके यहां जाए तब भी।

(नोट.. सुश्री शाज़िया नवाज़ पाकिस्तान की प्रमुख लेखिका और बुद्धिजीवी हैं, फ़्रांस में बुरक़े पर रोक लगाने के फ़ैसले पर पाकिस्तान में बहस चल रही है, उस बहस में शिरकत करते हुए बुरक़े पर उनका यह अंग्रेज़ी आर्टिकल पाकिस्तान की प्रमुख बेवसाइट “लेट अस बिल्ड पाकिस्तान” में प्रकाशित हुआ है। उसी लेख का यह हिंदी अनुवाद है।)

रविवार, 10 अप्रैल 2011

A Letter to Pakistani Friends By Hari Govind Vishwakarma

HARI GOVIND VISHWAKARMA
I fully agree with you, I would like to suggest you, please once go to Jammu & Kashmir and live for at least one year. Believe me; your thinking, perception and mind-set about valley will totally be changed. If we talk about the freedom, it means we should be ruled by our own people. Am I right? So, I will tell you the reality of this so-called freedom.


India and Pakistan got freedom in 1947 and since then two counties have been ruled by their own people, India by politicians and Pakistani by politicians and army rulers (Generals are also our own people). But, if you will compare our rule with British, you will say British rulers were much much better. We will talk about India as this country enjoyed fully democratic system of governance.

It means, if you are ruling by your own people then there should not any discrimination, partiality, injustice with any citizen or violation of human rights of people but I am sorry to say this is not happening in India (I can’t say about your country but firmed that same thing happening in other part of this sub-continent). Why this is happening? Any moment you thought?

I am telling you; actually the entire population in India and Pakistan have divided into ruling class and ruled class. The population of ruling class is less than 10 percent but they possessed more than 90 assets and resources of the nation while the population of ruled class is more than 90 percent but they have only less than 10 percent assets and resources of the country. So the ruled class fights one another for snatching their share in remaining 10 percent assets and resources.

The ruling class is enjoying everything, including VIPs-status while ruled class is facing so hardship even for bread and butter. In Mumbai, Mukesh Ambani, (ruling class person) has constructed 35 story-apartment (which monthly electric bill is Rs 35 laks) as his residence while lakhs of people (ruled class) are living in slum without any facility. It means ruling class never was never bother about the ruled class. So ruling class must boost on freedom, self-sules etc.

Now come to Jammu and Kashmir. This state is also ruling by their-own people since 1948 when Raja Hari Singh and Lord Mountbatten signed the letter after accession to India. The state was ruled by RC Kak, Mehr Chand Mahajan, Sheikh Abdullah, Bakshi Ghulam Mohammad, Khwaja Shamsuddin, Ghulam Mohammed Sadiq, Syed Mir Qasim, Farooq Abdullah, Ghulam Mohammad Shah, Mufti Mohammad Sayeed, Ghulam Nabi Azad and Omar Abdullah who are Kashmiri.

Despite so huge amount of help from centre state is not self-dependent. This state is the second most corrupt state in the country. I visited everywhere but more than 30 percent areas are still deprived by road connectivity. There are only two hospitals one each at Jammu and Srinagar. So most of injured or patients lose their lives during on the way. Student from Punchh, Rajouri, Doda, Ramban, Kishtwar, Baramula, Kupwada and Bodinpura come to Jammu or Srinagar for higher education.

Means all facilities, entertainment, health service, education, sports and administration are centralized to Jammu and Srinagar. Ruled class is deprived and ruling class is enjoying the life. In remote areas youth don’t have job or employment, people don’t have source of income. They need food, cloth, house, education, employment first later power or freedom.

One more point, this is big conspiracy of ruling class that ruled class people, army soldiers and militants (according to you freedom fighter), are killing each other while people from ruling class, politicians, are busy in dialogues in air-conditioned rooms in New Delhi.

Just tell me who is enjoying more freedom, people in India or in Pakistan? I think the democratic government is more liberal so Indian are enjoying more freedom than Pakistan as your country has been ruling by Generals most of time. The geography and topography of Jammu and Kashmir do not allow the freedom. It will be with India or Pakistan otherwise it will be captured by China as China captured Tibet in 1949.

I think our object must be better governance and equal opportunities for everyone. This is much better than freedom. I think you will be agreed with me.

रविवार, 20 फ़रवरी 2011

कसाब शायद दस साल तक ज़िंदा रहे...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई पर आतंकवादी हमले में शामिल रहे एकमात्र ज़िंदा हमलावर मोहम्मद आमिर अजमल क़साब को फ़ांसी देने की पुष्टि बॉम्बे हाईकोर्ट ने अभी कुछ देर पहले (22 फरवरी) कर दी, लेकिन देश की जटिल न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के चलते क़साब अगर आने वाले दस साल तक ज़िदा रहे तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए।

फिलहाल, न्यायिक प्रक्रिया दूसरा दौर अभी-अभी खत्म हुआ है। क़साब ने विशेष अदालत के मौत की सज़ा के फ़ैसले को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जहां 292 दिन बाद निचली अदालत के फ़ैसले पर महाराष्ट्र की सबसे बड़ी अदालत ने भी अपनी मुहर लगा दी। हालांकि अब भी क़साब को फांसी पर लटकाना संभव नहीं।

क़साब को फ़ौरन फ़ांसी देने की मांग करने से पहले यह नहीं भूलना चाहिए कि हम एक सभ्य समाज में रहते हैं। हमारे देश में लोकतंत्र है जिसके तीन स्तंभों में से एक न्यायपालिका भी है। देश में अपराधियों को दंडित करने के लिए क़ायदे-क़ानून बनाए हैं। आरोपी को सज़ा उसी के अनुसार दी जाती है। क़साब को भी दंडित करने की प्रक्रिया चल रही है। मसलन, 26 नवंबर 2008 को क़साब की गिरफ़्तारी के बाद हमले से जुड़े हर पहलू की जांच हुई। जल्दी सज़ा देने के लिए ही विशेष अदालत का गठन किया गया। जहां छह मई 2010 को क़साब को मृत्युदंड का फ़रमान सुनाया जा चुका है और उस सज़ा को 22 फरवरी 2011 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी अप्रूव्ड कर दिया है। विदेशी नागरिक को सज़ा सुनाने से पहले भारत में उसे बचाव का पूरा मौक़ा दिया जा रहा है क्योंकि देश में गहरी जड़ों वाला लोकतंत्र ही नहीं है बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी न्यायपालिका भी है।

जो लोग क़साब को फ़ांसी पर लटकता (हालांकि इन पंक्तियों का लेखक भी न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद क़साब को सज़ा देने का समर्थन करता है) देखना चाहते हैं, उन्हें अभी बहुत लंबा इंतज़ार करना होगा। अभी क़साब इंसाफ़ के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा सकता है। वहां भी केस पर लंबी बहस चलेगी। और अगर देश की सबसे बड़ी अदालत में भी क़साब को कोई राहत न मिली तो भी पाकिस्तानी आतंकी सर्वोच्च न्यायालय में ही पुनर्विचार याचिका दायर कर सकता है। और अदालत से पूरी तरह निराश होने का बाद आख़िर में क़साब राष्ट्रपति के यहां जीवनदान की अपील कर सकता है।

राष्ट्रपति के पास भी 2001 में संसद पर हमला करने की साज़िश रचने वाले मोहम्मद अफजल उर्फ अफ़ज़ल गुरू समेत करीब 30 मर्सी पिटिशन पहले से ही विचाराधीन हैं। इनमें से २४ राष्ट्रपति सचिवालय और तीन गृह मंत्रालय में विचाराधीन हैं जबकि दो पर राज्य सरकारों की राय की प्रतीक्षा है। राष्ट्रपति के यहां विचाराधीन अपील में अफ़ज़ल की याचिका का 27वां नंबर है। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि अफ़ज़ल की तमाम अपील को खारिज़ कर सुप्रीम कोर्ट 2004 में ही उसे फ़ांसी की सज़ा सुना चुका है। इस लश्कर आतंकी को 20 अक्टूबर 2006 को फ़ांसी दी भी जाने वाली थी। लेकिन राष्ट्रपति के दरबार में दया की गुहार लगाने के बाद उसकी फ़ांसी टल गई।

राष्ट्रपति के यहां विचाराधीन दया याचिकाओं के निबटारे की ताजा गति पर गौर करें तो अगले 10 साल तक अफजल की बारी शायद ही आए। मौके दर मौके राजनीतिक दल अफजल को फांसी पर लटकाने की मांग सरकार से करते रहे हैं।

कानून मंत्री वीरप्पा मोइली तल्ख़ लहज़े में कहते हैं कि जहां विधि का शासन है वहां किसी को पकड़कर ज़बरन फ़ांसी पर नहीं लटकाया जा सकता है। वे यह भी मानते हैं कि दया याचिकाओं के शीघ्र निबटारे के लिए क़ानूनगत प्रक्रिया में सुधार की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन ऐसे सुधार की पहल कब होगी, इसका ठीक-ठीक जवाब उनके पास भी नहीं है। क़ानून की यही विवशता रही तो अफ़ज़ल को लंबे समय तक फ़ांसी पर लटकाना मुमकिन नहीं लग रहा है। क्योंकि दया याचिकाओं के निबटारे की गति बेहद चिंताजनक है। गृह मंत्रालय की ही मानें तो पिछले एक वर्ष में एक भी दया याचिका का निबटारा नहीं किया जा सका है।

कहने का मतलब अफ़ज़ल को सज़ा सुनाने के छह साल बाद भी दंडित नहीं किया जा सका है तो क़साब को क़ानूनी प्रक्रिया मुक़म्मिल किए बिना कैसे फ़ांसी पर चढ़ाया जा सकता है। क़साब के लिए देश की ज्यूडिशियरी सिस्टम बदली तो नहीं जा सकती। लिहाज़ा क़साब को फ़ांसी देने की मांग करने वालों को लंबे इतज़ार के लिए तैयार रहना होगा।

वैसे, 1996 में शंकर दयाल शर्मा ने राजस्थान के राम चंद्र रावजी की दया याचिका पर छह दिन में ही फैसला सुनाया था। अपील राष्ट्रपति के पास 13 मार्च, 1996 को भेजी गई और 19 मार्च को खारिज हो गई। पिछले तीन दशकों में राष्ट्रपतियों ने केवल 77 क़ैदियों की दया याचिकाओं पर निर्णय दिया।

राष्ट्रपति के पास सबसे पुरानी दया अपील यूपी के श्याम, शिवराम, प्रकाश, रवींद्र और हरीश की है। फ़ांसी पर तामील करने का सबसे ताजा मामला छह साल पुराना है। 14 अगस्त 2004 को कोलकाता में धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई। महाराष्ट्र में आखिरी बार 26 अगस्त, 1995 को सुधाकर जोशी को फांसी दी गई थी। उससे पहले जनरल अरुण कुमार वैद्य के हत्यारे सुक्खा और जिंदा 9 अक्टूबर, 1992 को फांसी पर लटकाए गए। फिलहाल राज्य में क़साब समेत 58 को मौत की सज़ा मिली है। सबकी अपील हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। एक दया याचिका राष्ट्रपति के पास है। देश में मृत्युदंड पाए क़ैदियों की संख्या 1177 है।

वैसे भी अगर पाकिस्तानी आतंकी अजमल क़साब को फ़ांसी दी जाती है तो सबसे पहले जल्लाद का जुगाड़ करना होगा। महाराष्ट्र में 1997 में आरएस जाधव के रिटायर होने के बाद से देश में कोई जल्लाद नहीं है। जेल मैनुअल के हिसाब से जल्लाद हर फ़ांसी पर अमल के एवज में 75 रुपये लेता हैं। पहले लोग पीढ़ी दर पीढ़ी यह पेशा अपनाते थे, पर नई पीढ़ी इसमें नहीं आ रही। ब्रिटेन समेत 95 देशों में मृत्युदंड पर रोक है।

एक बात और क़साब के पक्ष में जाती है। दरअसल, आतंकवाद ज़हर भारत अस्सी के दशक से ही पी रहा है। पहले पंजाब में आतंकवाद और उसके बाद जम्मू-कश्मीर में दहशतगर्दी। यानी ख़ून-ख़राबे का सिलसिला शुरू होने के बाद से ही भारत पूरी दुनिया से कहता आ रहा है कि देश में मानवनिर्मित विनाश के लिए पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान ज़िम्मेदार है। लेकिन इस्लामाबाद नई दिल्ली के आरोप को सिरे से खारिज़ कर प्रत्यक्ष सबूत मांगता रहा है। यहां तक कि आतंकी के रूप में भारतीय सरज़मीन पर मारे गए अपने नागरिकों के शव भी लेने से पाकिस्तान कतराता रहा है। इसलिए क़साब भारत के लिए अहम है क्योंकि मुंबई आतंकी हमले के दौरान तुकाराम ओंबले द्वारा पकड़ा गया यह आतंकी वह ज़िंदा सबूत है जिसे पाकिस्तानी हुक़्मरान झुठला नहीं सके। इसीलिए क़साब देश का सबसे महंगा क़ैदी है और मुंबई के आर्थर रोड जेल में उसकी सुरक्षा पर हर रोज़ क़रीब 85 लाख रुपए ख़र्च हो रहे हैं। वस्तुतः पाकिस्तानी नागरिक के रूप में क़साब की पहचान के बाद ही भारत पड़ोसी मुल्क़ पर दबाव बनाने में क़ामयाब रहा। इतना ही नहीं, भारत में किसी भी आतंकी हमले में अपना हाथ होने की बात पहली बार पाकिस्तान ने क़बूल किया। चाहे वह ख़ानापूर्ति ही कर रहा है लेकिन दुनिया भर को बता तो रहा है कि हमले की साज़िश के सूत्राधार जकीउर रहमान लखवी समेत लश्कर-ए-तैयबा के कई लोगों के ख़िलाफ़ पाकिस्तानी अदालत में आरोप पत्र दायर किया जा चुका है। अगर भारत ने कूटनीतिक प्रयास ऐसे ही जारी रखा तो इस्लामाबाद देर-सबेर लश्कर चीफ़ हाफ़िज़ मोहम्मद सईद के ख़िलाफ़ कार्रवाई के लिए मज़बूर हो जाएगा। इसलिए भारत क़साब के रूप में मिले इस बेशकीमती सबूत की जान लेकर उसे नष्ट नहीं करना चाहेगा, यही बात क़साब की जीवन-अवधि बढा देगी। (समाप्त)

रविवार, 30 जनवरी 2011

अयोध्या में न तो बाबरी मस्जिद थी न ही राम मंदिर

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अयोध्या में जिस विवादित स्थल को लेकर छह दशक से ज़्यादा समय से देश में सांप्रदायिक दंगे-फ़साद हो रहे हैं, जिनमें लाखों लोग मज़हब के नाम पर अपनी आहुति दे चुके हैं और जिसके चलते आज भी करोड़ों धर्मांध हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हैं, वहां न तो कभी बाबरी मस्जिद नाम की कोई मस्जिद थी न कोई राम मंदिर, जिसे तोड़कर मस्जिद बनवाई गई हो। यह ख़ुलासा आज से दस साल पहले ही हो चुका है और यह किसी ऐरे-ग़ैरे ने नहीं, देश के शीर्षस्थ कालजयी साहित्यकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले उपन्यासकार कमलेश्वर ने दस साल के गहन शोध, अध्ययन और तफ़तीश के बाद लिखे उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में किया है। सन् 2000 में प्रकाशित इस उपन्यास को नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, अमृता प्रीतम, राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, हिमांशु जोशी और अभिमन्यु अनत जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने विश्व-उपन्यास की संज्ञा देते हुए इसकी दिल खोलकर प्रशंसा की है। कई प्रतिष्ठित हिंदी-अंग्रेज़ी अख़बारों में उपन्यास की समीक्षा भी प्रकाशित हो चुकी है। मज़ेदार बात यह है कि भारत सरकार ने भी इस किताब को मान्यता दी है। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने उपन्यास में पाकिस्तान बनने के बारे में दिए गए तथ्यों की दिल खोलकर तारीफ़ की थी और इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा था। ग़ौरतलब है कि साहित्य अकादमी केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन आता है और तब उसके मुखिया हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के बहुत बड़े पैरोकार डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे। अगर कमलेश्वर के निष्कर्ष से सरकार को किसी भी तरह की आपत्ति होती तो कम से कम उन्हें सरकारी पुरस्कार नहीं दिया जाता। ये माना जाता है कि कोई सरकार किसी किताब को पुरस्कृत कर रही है तो वह सरकार उसमें लिखी हर बात से सहमत है।

बहरहाल, कमलेश्वर ने समय और किरदार की सीमाओं को तोड़कर बड़ी खूबसूरती से ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना की है जिसमें ‘अदीब’ यानी लेखक ‘समय की अदालत’ लगाता है जिसमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, अली बंधु, लार्ड माउंटबेटन, बाबर, हुमायूं, कबीर जैसे सैकड़ों विश्व-इतिहास के अहम किरदारों ने ख़ुद अपने अपने बयान दिए हैं। इसके अलावा कई दर्जन विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भी इस अनोखी अदालत में हर विवादास्पद घटनाओं पर गवाही दी है। किताब में इन्हीं बयानों और अंग्रेज़ों के कार्यकाल में तैयार गजेटियर, पुरातत्व विभाग के दस्तावेज़ों और इतिहास के नामचीन हस्तियों की आत्मकथाओं में उपलब्ध जानकारी को आधार बनाया गया है। जिनकी प्रमाणिकता पर संदेह करने का सवाल ही नहीं उठता।

‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने कई अध्याय अयोध्या मुद्दे को समर्पित किया है। उपन्यास के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद बाबर के आक्रमण और उसके भारत आने से पहले ही मौजूद थी। बाबर आगरा की सल्तनत पर 20 अप्रैल 1526 को क़ाबिज़ हुआ जब उसकी सेना ने इब्राहिम लोदी को हराकर उसका सिर क़लम कर दिया। एक हफ़्ते बाद 27 अप्रैल 1526 को आगरा में बाबर के नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया।

मज़ेदार बात यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना है कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाक़ी ने 1528 में मिसमार करके वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी का पूरा नाम मीरबाक़ी ताशकंदी था और वह अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था। इसी तथ्य को आधार बनाकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सितंबर में बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है। जिस पर अभी तक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।

दरअसल, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं) में एक शिलालेख भी लगा था जिसका जिक्र अंग्रेज़ अफ़सर ए फ़्यूहरर ने कई जगह किया है। फ़्यूहरर ने 1889 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा जिसे बाद में, किताब के अनुसार, अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के आदेश पर 1523 में शुरू हुआ और 1524 में मस्जिद बनकर तैयार हुई। इतना ही नहीं, शिलालेख के मुताबिक, मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बल्क़ि ख़ाली जगह पर बनवाई गई थी। इसका यह भी मतलब होता है कि अगर विवादित स्थल पर राम या किसी दूसरे देवता का मंदिर था, जिसके अवशेष खुदाई करने वालों को मिले हैं, तो वह 15वीं सदी से पहले नेस्तनाबूद कर दिया गया था या ख़ुद नष्ट हो गया था। उसे कम से कम बाबर या मीरबाक़ी ने नहीं तोड़वाया जैसा कि इतिहासकारों का एक बड़ा तबक़ा और अनेक हिंदूवादी नेता कई दशक से मानते और दावा करते आ रहे हैं।

‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक मस्जिद में इब्राहिम लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में अंग्रेज़ अफ़सर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। वह सारी ख़ुराफ़ात और साज़िश का सूत्राधार था। उसने ही आधिकारिक तौर पर फ़ैज़ाबाद का गजेटियर तैयार किया। नेविल की साज़िश में दूसरा फ़िरंगी अफ़सर कनिंघम भी शामिल था जिसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने हिंदुस्तान की तवारिख़ और पुरानी इमारतों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी दी थी। कनिंघम ने बाद में लखनऊ का गजेटियर भी तैयार किया। किताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने धोखा और साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद नींव रखी थी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमला करके बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हज़ार हिंदुओं को हलाक़ किया जबकि फ़ैज़ाबाद के गजेटियर में आज भी लिखा है कि 1869 में, उस लड़ाई के क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद, अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की कुल आबादी महज़ दस हज़ार थी जो 1881 में बढ़कर साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। सवाल उठता है कि जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों को हलाक़ कैसे किया या फिर इतने मरने वाले कहां से आ गए? यहीं, बाबरी मस्जिद के बारे में देश में बनी मौजूदा धारणा पर गंभीर सवाल उठता है।

बहरहाल, हैरान करने वाली बात यह है कि दोनों अफ़सरों नेविल और कनिंघम ने सोची-समझी नीति के तहत बाबर की डायरी बाबरनामा, जिसमें वह रोज़ाना अपनी गतिविधियां दर्ज करता था, के 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच 20 से ज़्यादा पन्ने ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी ‘औध’ को ‘अयोध्या’ कर दिया। उल्लेखनीय बात है कि मस्जिद के शिलालेख का फ़्यूहरर द्वारा किए गए अनुवाद को ग़ायब करना अंग्रेज़ अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी आर्कियोल़जिकल इंडिया की फ़ाइल में महफ़ूज़ है और ब्रितानी साज़िश से परदा हटाता है। इसके अलावा बाबर की गतिविधियों की जानकारी बाबरनामा की तरह हुमायूंनामा में भी है। लिहाज़ा, बाबरनामा के ग़ायब पन्ने से नष्ट सूचना हुमायूंनामा से ली जा सकती है। हुमायूंनामा के मुताबिक 1528 में बाबर अफ़गान हमलावरों का पीछा करता हुआ घाघरा (सरयू) नदी तक अवश्य गया था लेकिन उसी समय उसे अपनी बीवी बेग़म मेहम और अन्य रानियों और बेटी बेग़म ग़ुलबदन समेत पूरे परिवार के काबुल से अलीगढ़ आने की इत्तिला मिली। बाबर लंबे समय से युद्ध में उलझने की वजह से परिवार से मिल नहीं पाया था इसलिए वह तुरंत अलीगढ़ रवाना हो गया। पत्नी-बेटी और परिवार के बाक़ी सदस्यों को लेकर वह अपनी राजधानी आगरा आया और 10 जुलाई तक उनके साथ आगरा में ही रहा। उसके बाद बाबर परिवार के साथ धौलपुर चला गया। वहां से सिकरी पहुंचा, जहां सितंबर के दूसरे हफ़्ते तक रहा।

ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि, पुस्तक के मुताबिक, गोस्वामी तुलसीदास से पहले जम्बूद्वीप (तब भारत या हिंदुस्तान था ही नहीं था सो इस भूखंड को जम्बूद्वीप कहा जाता था) के हिंदू धर्म के अनुयायी नटखट कृष्ण और फक्कड़ शंकर की पूजा करते थे। तब राम का उतना क्रेज नहीं था। राम का महिमामंडन तो तुलसीदास ने किया और रामचरित मानस रचकर राम को हिंदुओं के घर-घर प्रतिष्ठित कर दिया। तुलसीदास १४९८ में पैदा हुआ और बाबर के कार्यकाल तक वह किशोर था और पत्नी का दीवाना तुलसादास अपनी मायावी दुनिया में मशगूल था। तुलसी ने रामचरित मानस की रचना बुढापे में की जो हुमायूं और अकबर का दौर था। रामचरित मानस के प्रचलन में आने के बाद ही राम हिंदुओं के देवता नंबर वन बने।
कुल मिलाकर ‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने ऐतिहासिक तथ्यों का सहारा लेकर कहा है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ चौकन्ने हो गए और ब्रिटिश इंडिया की नई पॉलिसी बनाई जिसके मुताबिक अगर इस उपमहाद्वीप पर लंबे समय तक शासन करना है तो इस भूखंड को धर्म के आधार पर विभाजित करना होगा। ताकि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से ही लड़ते रहें और उनका ध्यान आज़ादी जैसे मुद्दों पर न जाए। और, इसी नीति के तहत इब्राहिम लोदी की बनवाई मस्जिद ‘बाबरी मस्जिद’ बना दी गई और उसे ‘राम मंदिर’ से जोड़कर एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो सदियों तक हल नहीं हो। अंग्रेज़ निश्चित रूप से सफल रहे क्योंकि उस वक़्त पैदा की गई नफ़रत ही अंततः देश के विभाजन की मुख्य वजह बनी।

(समाप्त)

(Note: This article was written by Hari Govind Vishwakarma in 2003 (then he was bureau chief of UNI at Varanasi) when Kamleshwar got Sahitya Academy award but could't publish due to some reason)

बुधवार, 5 जनवरी 2011

राष्ट्रीय एकता के वाहक बनते टीवी सीरियल

हरिगोविंद विश्वकर्मा.
मनोरंजन टेलीविज़न चैनलों पर आने वाले धारावाहिकों की एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेयर और चाइल्ड-लेबर जैसे मसले पर चाहे जितनी आलोचना की जाए या विरोध हो लेकिन इतना तो सच है कि ये सीरियल्स फिलहाल राष्ट्रीय एकता के वाहक बनते जा रहे हैं। सोमवार से शुक्रवार शाम सात बजे से रात ग्यारह बजे तक प्रमुख टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले इन धारावाहिकों को नियमित देखने से देश के दूसरे हिस्से लोगों की जीवन-शैली और भाषा की जानकारी मिल रही है। ऐसे में कहें कि इन धारावाहिकों से देश की क्षेत्रीय जीवनशैली, भाषा, सभ्यता और संस्कार का गुपचुप तरीक़े से विस्तार हो रहा है तो कतई अतिशयोक्ति न होगा। वस्तुतः ये धारावाहिक हिंदी में हैं लेकिन इनकी कहानी और जीवनशैली अलग-अलग संस्कृति-भाषा का प्रतिनिधित्व करती है। संवादों में क्षेत्रीय भाषाओं और वेशभूषा के इस्तेमाल से इसे स्थानीय टच मिल रहा है।

मसलन, ज़ीटीवी पर नौ बजे आने वाले “पवित्र रिश्ता” में मराठीभाषी परिवारों की कहानी है। जिसमें बीच-बीच में पात्र मराठी बोलते हैं जिन्हें ग़ैर-मराठी दर्शक भी आसानी से समझ लेते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि यह धारावाहिक मराठी भाषा और मराठी संस्कृति को देश के अन्य हिस्से में पहुंचा रहा है। दूसरे प्रांतों के लोग जानने लगे हैं कि महाराष्ट्र या मुंबई में मराठी परिवार किस तरह रहता है और किस तरह की समस्याओं से दो-चार होता है। “अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो” में उत्तरप्रदेश के ठाकुर परिवार की कहानी है। जिसमें पूर्वांचल की वेशभूषा और भोजपुरी मिश्रित अवधी भाषा से देश के बाक़ी हिस्से के लोग रूबरू हो रहे हैं। सहारा वन पर आने वाले सीरियल “बिट्टो” में भी उत्तरप्रदेश की ही कहानी है और निचली जाति पर ऊंची जाति के अत्याचार की थीम पर आधारित है। “छोटी बहू” में ब्रजभाषा और मथुरा के आसपास रहने वाले लोगों की जीवन शैली देखने-सुनने को मिल रहा है। खासकर राजपुरोहित परंपरा को दिखाया जा रहा है। ठीक इसी तरह की कहानी स्टार प्लस के “प्रतिज्ञा” की है, जहां पूर्वांचल की वेशभूषा और भाषा दिखती है। “12/24 करोल बाग” और स्टार वन के “गीत हुई परायी” जैसे धारावाहिकों के पंजाबी डॉयलॉग दूसरी भाषा के लोग भी समझने लगे हैं। “मैं घर-घर खेली“ में उज्जैन के दो परिवार की कहानी है जहां मालवा जीवनशैली और भाषा दिखती है। “ससुराल गेंदा फूल” देश की राजधानी दिल्ली खासकर पुरानी दिल्ली की संस्कृति का दीदार होता है और वहां बोली जाने वाली भाषा सुनने को मिलती है। स्टार प्लस के “ये रिश्ता क्या कहता है” में उदयपुर में रहने वाले परंपरागत मारवाड़ी परिवार की कहानी है। इसके विपरीत कलर्स के चर्चित और विवादास्पद धारावाहिक “बालिका वधू” में राजस्थान के देहात में रहने वाले परिवारों दिनचर्या और रहन-सहन की कहानी है। इस सीरियलों में दर्शकों को मारवाड़ी भाषा के डॉयलॉग सुनने को मिलते हैं जिसे लोग अब आसानी से समझने लगे हैं। इसी चैनल पर ही अभी हाल ही शुरू “तेरे लिए” में बंगाली जीवन शैली और संस्कृति की झलक मिलती है, खासकर आदमियों द्वारा खींचा जाने वाले इक्के को देख सकते हैं। “चांद छुपा बादल” में शिमला में रहने वाले परिवारों की कहानी और जीवन शैली बयां करती है। इसमें भी संवादों में ज़्यादातर स्थानीय पहाड़ी भाषा सुनने को मिलती है। स्टार प्लास की लाडली, सोनी टीवी के चर्चित सीरियल “रंग बदलती ओढ़नी” और सब टीवी के “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” में गुजराती परिवारों की कथाएं हैं तो “मिस्टर ऐंड मिसेज़ शर्मा इलाहाबाद वाले” में इलाहाबाद की कहानी है। इमैजिन के सीरियल “काशी” बिहार में निचले तबके की कहानी है जहां बचपन में ही लड़कियां व्याह दी जाती हैं। इस धारावाहिक में भोजपुरीयुक्त संवाद भी सुनने को मिलते हैं। सीरियल को संवाद के जरिए स्थानीय टच देने की सफल कोशिश की गई है। स्टारप्लस पर आने वाला “मर्यादा” हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश का रहन-सहन पर बेस्ड है। कलर्स के “न आना इस देश में लाड़ो” में उस समाज की कहानी है, जहां विवाह में गोत्र अहम माना जाता है। “मान रहे तेरा पिता” छत्तीसगढ़ में कोयले की खान की पृष्ठभूमि पर आधारित पिता-पुत्री के रिश्ते की भावनात्मक कहानी है। इसमें भी संवाद में भी स्थानीय भाषा होती है।

भाषा और रहन-सहन के अलावा कई धारावाहिक हिंदुस्तानी समाज की परंपराओं के अलावा सामाजिक बुराइयों-कुरीतियों पर आधारित हैं। सोनी टीवी पर गोद भराई ऐसा ही धारावाहिक है जिसमें “गोद भराई” का धार्मिक संस्कार है। यह देश के हर हिस्से में मनाया जाता है खासकर घर की गर्भवती महिला के सात महीने पूरे करने पर होता है। बंगाली में इसे शाद कहते हैं। केरल में यह सीमंधा और तमिलनाडु में वेलाकप्पू नाम से मनाया जाता है। जीटीवी पर इन दिनों रानी लक्ष्मीबाई सीरियल आ रहा है जो लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित है। इसी तरह पिछले दो दशक के दौरान “भारत एक खोज”, “रामायण” और “महाभारत”समेत कई ऐतिहासिक और पौराणिक धारावाहिकों का प्रसारण हुआ जिससे ऐतिहासिक और पौराणिक किरदारों के बारे में लोगों के जनरल नॉलेज में काफी इजाफा हुआ।

देश में छोटे परदे पर सीरियलों की उम्र 26 साल है जो बहुत कम है। यह सिलसिला दूरदर्शन ने सात जुलाई 1984 को शुरू किया। जब मनोहर श्याम जोशी की “हमलोग“ के रूप में मध्यम वर्ग की कहानी आई और बेहद लोकप्रिय हुई। आम भारतीय उसमें अपनी कहानी देखने लगा। तीन साल से ज़्यादा समय चक चले हमलोग के हर किरदार लोकप्रिय हुए। बहरहाल, अभी लंबा रास्ता तय करना है और उम्मीद की जानी चाहिए कि सीरियल राष्ट्रीय एकता के वाहक बने रहेंगे।

बेशक, यह देश की एकता और अखंडता मज़बूत करने के दृष्टिकोण से सकारात्मक प्रयास है। भविष्य में बाक़ी रिमोट हिस्सों के लोगों की जीवन-शैली को भी सीरियल के माध्यम से पेश किया जाए तो बूद्धू बक्से की प्रतिष्ठा में चार चांद लग जाएगा। गौरतलब है कि सिनेमा ने हिंदी को देश के कोने कोने में पहुंचाया है। अधिकृततौर पर हिंदी भले ही न राष्ट्रीय भाषा का दरजा पा सकी हो लेकिन अगर व्यवहारिक रूप से देखें तो हिंदी देश की संपर्क भाषा बन गई है। देश के किसी भी हिस्से में चले जाइए हर जगह हिंदी बोलने समझने वाले मिल जाएंगे। दक्षिण में नेताओं के हिंदी विरोध को हिंदी सिनेमा ने इतिहास की चीज़ बना दी। आजकल हिंदी कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ही नहीं तमिलनाडु और केरल के दूर-दराज़ के हिस्सों में भी धड़ल्ले से बोली जाने लगी है।

दरअसल, जानकारी की स्रोत किताबें होती हैं या फिर देशाटन। अपने देश में दोनों बेहद महंगी हैं। एक आम आदमी जीवन भर दो जून की रोटी जुटाने में व्यस्त रहता है। वह न तो किताब खरीद पाता है न ही उसे घूमने की फ़ुर्सत मिलती है फिर इन सबके लिए उसके पास उतना पैसा भी नहीं होता। ऐसे में ये सीरियल्स ही आम आदमी की जानकारी के स्रोत बन रहे हैं। समस्या यह है कि सैटेलाइट चैनलों की पहुंच केवल शहरों में है। देहातों में कहीं-कहीं लोगों ने सेटबाक्स लगा रखे हैं लेकिन बिजली की कमी के चलते निजी टीवी मनोरंजन से वंचित है रहते हैं। यानी देश की साठ फ़ीसदी आबादी आज भी टीवी देखने से वंचित रहती है। लेकिन जिस तरह दूरसंचार तकनीकी क्रांति कर रही है। भविष्य में संभव है यह मुश्किल काम आसान हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो इस देश की भाषाई अखंडता के लिए शुभ संकेत होगा।

(Note... I written this article around 3 months before)
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