रविवार, 30 जनवरी 2011

अयोध्या में न तो बाबरी मस्जिद थी न ही राम मंदिर

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अयोध्या में जिस विवादित स्थल को लेकर छह दशक से ज़्यादा समय से देश में सांप्रदायिक दंगे-फ़साद हो रहे हैं, जिनमें लाखों लोग मज़हब के नाम पर अपनी आहुति दे चुके हैं और जिसके चलते आज भी करोड़ों धर्मांध हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हैं, वहां न तो कभी बाबरी मस्जिद नाम की कोई मस्जिद थी न कोई राम मंदिर, जिसे तोड़कर मस्जिद बनवाई गई हो। यह ख़ुलासा आज से दस साल पहले ही हो चुका है और यह किसी ऐरे-ग़ैरे ने नहीं, देश के शीर्षस्थ कालजयी साहित्यकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाले उपन्यासकार कमलेश्वर ने दस साल के गहन शोध, अध्ययन और तफ़तीश के बाद लिखे उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ में किया है। सन् 2000 में प्रकाशित इस उपन्यास को नामवर सिंह, विष्णु प्रभाकर, अमृता प्रीतम, राजेंद्र यादव, कृष्णा सोबती, हिमांशु जोशी और अभिमन्यु अनत जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने विश्व-उपन्यास की संज्ञा देते हुए इसकी दिल खोलकर प्रशंसा की है। कई प्रतिष्ठित हिंदी-अंग्रेज़ी अख़बारों में उपन्यास की समीक्षा भी प्रकाशित हो चुकी है। मज़ेदार बात यह है कि भारत सरकार ने भी इस किताब को मान्यता दी है। अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार ने उपन्यास में पाकिस्तान बनने के बारे में दिए गए तथ्यों की दिल खोलकर तारीफ़ की थी और इसे साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाज़ा था। ग़ौरतलब है कि साहित्य अकादमी केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय के अधीन आता है और तब उसके मुखिया हिंदुत्व और राम मंदिर आंदोलन के बहुत बड़े पैरोकार डॉ. मुरली मनोहर जोशी थे। अगर कमलेश्वर के निष्कर्ष से सरकार को किसी भी तरह की आपत्ति होती तो कम से कम उन्हें सरकारी पुरस्कार नहीं दिया जाता। ये माना जाता है कि कोई सरकार किसी किताब को पुरस्कृत कर रही है तो वह सरकार उसमें लिखी हर बात से सहमत है।

बहरहाल, कमलेश्वर ने समय और किरदार की सीमाओं को तोड़कर बड़ी खूबसूरती से ‘कितने पाकिस्तान’ की रचना की है जिसमें ‘अदीब’ यानी लेखक ‘समय की अदालत’ लगाता है जिसमें महात्मा गांधी, मोहम्मद अली जिन्ना, अली बंधु, लार्ड माउंटबेटन, बाबर, हुमायूं, कबीर जैसे सैकड़ों विश्व-इतिहास के अहम किरदारों ने ख़ुद अपने अपने बयान दिए हैं। इसके अलावा कई दर्जन विश्व-प्रसिद्ध इतिहासकारों ने भी इस अनोखी अदालत में हर विवादास्पद घटनाओं पर गवाही दी है। किताब में इन्हीं बयानों और अंग्रेज़ों के कार्यकाल में तैयार गजेटियर, पुरातत्व विभाग के दस्तावेज़ों और इतिहास के नामचीन हस्तियों की आत्मकथाओं में उपलब्ध जानकारी को आधार बनाया गया है। जिनकी प्रमाणिकता पर संदेह करने का सवाल ही नहीं उठता।

‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने कई अध्याय अयोध्या मुद्दे को समर्पित किया है। उपन्यास के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद बाबर के आक्रमण और उसके भारत आने से पहले ही मौजूद थी। बाबर आगरा की सल्तनत पर 20 अप्रैल 1526 को क़ाबिज़ हुआ जब उसकी सेना ने इब्राहिम लोदी को हराकर उसका सिर क़लम कर दिया। एक हफ़्ते बाद 27 अप्रैल 1526 को आगरा में बाबर के नाम का ख़ुतबा पढ़ा गया।

मज़ेदार बात यह है कि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी माना है कि अयोध्या में राम मंदिर को बाबर और उसके सूबेदार मीरबाक़ी ने 1528 में मिसमार करके वहां बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया। मीरबाक़ी का पूरा नाम मीरबाक़ी ताशकंदी था और वह अयोध्या से चार मील दूर सनेहुआ से सटे ताशकंद गांव का निवासी था। इसी तथ्य को आधार बनाकर हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सितंबर में बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है। जिस पर अभी तक प्रतिक्रियाएं आ रही हैं।

दरअसल, अयोध्या की मस्जिद (बाबरी मस्जिद नहीं) में एक शिलालेख भी लगा था जिसका जिक्र अंग्रेज़ अफ़सर ए फ़्यूहरर ने कई जगह किया है। फ़्यूहरर ने 1889 में आख़िरी बार उस शिलालेख को पढ़ा जिसे बाद में, किताब के अनुसार, अंग्रेज़ों ने नष्ट करवा दिया। शिलालेख के मुताबिक अयोध्या में मस्जिद का निर्माण इब्राहिम लोदी के आदेश पर 1523 में शुरू हुआ और 1524 में मस्जिद बनकर तैयार हुई। इतना ही नहीं, शिलालेख के मुताबिक, मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बल्क़ि ख़ाली जगह पर बनवाई गई थी। इसका यह भी मतलब होता है कि अगर विवादित स्थल पर राम या किसी दूसरे देवता का मंदिर था, जिसके अवशेष खुदाई करने वालों को मिले हैं, तो वह 15वीं सदी से पहले नेस्तनाबूद कर दिया गया था या ख़ुद नष्ट हो गया था। उसे कम से कम बाबर या मीरबाक़ी ने नहीं तोड़वाया जैसा कि इतिहासकारों का एक बड़ा तबक़ा और अनेक हिंदूवादी नेता कई दशक से मानते और दावा करते आ रहे हैं।

‘कितने पाकिस्तान’ के मुताबिक मस्जिद में इब्राहिम लोदी के शिलालेख को नष्ट करने में अंग्रेज़ अफ़सर एचआर नेविल ने अहम भूमिका निभाई। वह सारी ख़ुराफ़ात और साज़िश का सूत्राधार था। उसने ही आधिकारिक तौर पर फ़ैज़ाबाद का गजेटियर तैयार किया। नेविल की साज़िश में दूसरा फ़िरंगी अफ़सर कनिंघम भी शामिल था जिसे अंग्रेज़ी हुक़ूमत ने हिंदुस्तान की तवारिख़ और पुरानी इमारतों की हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी दी थी। कनिंघम ने बाद में लखनऊ का गजेटियर भी तैयार किया। किताब के मुताबिक दोनों अफ़सरों ने धोखा और साज़िश के तहत गजेटियर में दर्ज किया कि 1528 में अप्रैल से सितंबर के बीच एक हफ़्ते के लिए बाबर अयोध्या आया और राम मंदिर को तोड़कर वहां बाबरी मस्जिद नींव रखी थी। यह भी लिखा कि अयोध्या पर हमला करके बाबर की सेना ने एक लाख चौहत्तर हज़ार हिंदुओं को हलाक़ किया जबकि फ़ैज़ाबाद के गजेटियर में आज भी लिखा है कि 1869 में, उस लड़ाई के क़रीब साढ़े तीन सौ साल बाद, अयोध्या-फ़ैज़ाबाद की कुल आबादी महज़ दस हज़ार थी जो 1881 में बढ़कर साढ़े ग्यारह हज़ार हो गई। सवाल उठता है कि जिस शहर की आबादी इतनी कम थी वहां बाबर या उसकी सेना ने इतने लोगों को हलाक़ कैसे किया या फिर इतने मरने वाले कहां से आ गए? यहीं, बाबरी मस्जिद के बारे में देश में बनी मौजूदा धारणा पर गंभीर सवाल उठता है।

बहरहाल, हैरान करने वाली बात यह है कि दोनों अफ़सरों नेविल और कनिंघम ने सोची-समझी नीति के तहत बाबर की डायरी बाबरनामा, जिसमें वह रोज़ाना अपनी गतिविधियां दर्ज करता था, के 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 के बीच 20 से ज़्यादा पन्ने ग़ायब कर दिए और बाबरनामा में लिखे ‘अवध’ यानी ‘औध’ को ‘अयोध्या’ कर दिया। उल्लेखनीय बात है कि मस्जिद के शिलालेख का फ़्यूहरर द्वारा किए गए अनुवाद को ग़ायब करना अंग्रेज़ अफ़सर भूल गए। वह अनुवाद आज भी आर्कियोल़जिकल इंडिया की फ़ाइल में महफ़ूज़ है और ब्रितानी साज़िश से परदा हटाता है। इसके अलावा बाबर की गतिविधियों की जानकारी बाबरनामा की तरह हुमायूंनामा में भी है। लिहाज़ा, बाबरनामा के ग़ायब पन्ने से नष्ट सूचना हुमायूंनामा से ली जा सकती है। हुमायूंनामा के मुताबिक 1528 में बाबर अफ़गान हमलावरों का पीछा करता हुआ घाघरा (सरयू) नदी तक अवश्य गया था लेकिन उसी समय उसे अपनी बीवी बेग़म मेहम और अन्य रानियों और बेटी बेग़म ग़ुलबदन समेत पूरे परिवार के काबुल से अलीगढ़ आने की इत्तिला मिली। बाबर लंबे समय से युद्ध में उलझने की वजह से परिवार से मिल नहीं पाया था इसलिए वह तुरंत अलीगढ़ रवाना हो गया। पत्नी-बेटी और परिवार के बाक़ी सदस्यों को लेकर वह अपनी राजधानी आगरा आया और 10 जुलाई तक उनके साथ आगरा में ही रहा। उसके बाद बाबर परिवार के साथ धौलपुर चला गया। वहां से सिकरी पहुंचा, जहां सितंबर के दूसरे हफ़्ते तक रहा।

ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि, पुस्तक के मुताबिक, गोस्वामी तुलसीदास से पहले जम्बूद्वीप (तब भारत या हिंदुस्तान था ही नहीं था सो इस भूखंड को जम्बूद्वीप कहा जाता था) के हिंदू धर्म के अनुयायी नटखट कृष्ण और फक्कड़ शंकर की पूजा करते थे। तब राम का उतना क्रेज नहीं था। राम का महिमामंडन तो तुलसीदास ने किया और रामचरित मानस रचकर राम को हिंदुओं के घर-घर प्रतिष्ठित कर दिया। तुलसीदास १४९८ में पैदा हुआ और बाबर के कार्यकाल तक वह किशोर था और पत्नी का दीवाना तुलसादास अपनी मायावी दुनिया में मशगूल था। तुलसी ने रामचरित मानस की रचना बुढापे में की जो हुमायूं और अकबर का दौर था। रामचरित मानस के प्रचलन में आने के बाद ही राम हिंदुओं के देवता नंबर वन बने।
कुल मिलाकर ‘कितने पाकिस्तान’ में कमलेश्वर ने ऐतिहासिक तथ्यों का सहारा लेकर कहा है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज़ चौकन्ने हो गए और ब्रिटिश इंडिया की नई पॉलिसी बनाई जिसके मुताबिक अगर इस उपमहाद्वीप पर लंबे समय तक शासन करना है तो इस भूखंड को धर्म के आधार पर विभाजित करना होगा। ताकि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे से ही लड़ते रहें और उनका ध्यान आज़ादी जैसे मुद्दों पर न जाए। और, इसी नीति के तहत इब्राहिम लोदी की बनवाई मस्जिद ‘बाबरी मस्जिद’ बना दी गई और उसे ‘राम मंदिर’ से जोड़कर एक ऐसा विवाद खड़ा कर दिया जो सदियों तक हल नहीं हो। अंग्रेज़ निश्चित रूप से सफल रहे क्योंकि उस वक़्त पैदा की गई नफ़रत ही अंततः देश के विभाजन की मुख्य वजह बनी।

(समाप्त)

(Note: This article was written by Hari Govind Vishwakarma in 2003 (then he was bureau chief of UNI at Varanasi) when Kamleshwar got Sahitya Academy award but could't publish due to some reason)

बुधवार, 5 जनवरी 2011

राष्ट्रीय एकता के वाहक बनते टीवी सीरियल

हरिगोविंद विश्वकर्मा.
मनोरंजन टेलीविज़न चैनलों पर आने वाले धारावाहिकों की एक्स्ट्रामैरिटल अफ़ेयर और चाइल्ड-लेबर जैसे मसले पर चाहे जितनी आलोचना की जाए या विरोध हो लेकिन इतना तो सच है कि ये सीरियल्स फिलहाल राष्ट्रीय एकता के वाहक बनते जा रहे हैं। सोमवार से शुक्रवार शाम सात बजे से रात ग्यारह बजे तक प्रमुख टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले इन धारावाहिकों को नियमित देखने से देश के दूसरे हिस्से लोगों की जीवन-शैली और भाषा की जानकारी मिल रही है। ऐसे में कहें कि इन धारावाहिकों से देश की क्षेत्रीय जीवनशैली, भाषा, सभ्यता और संस्कार का गुपचुप तरीक़े से विस्तार हो रहा है तो कतई अतिशयोक्ति न होगा। वस्तुतः ये धारावाहिक हिंदी में हैं लेकिन इनकी कहानी और जीवनशैली अलग-अलग संस्कृति-भाषा का प्रतिनिधित्व करती है। संवादों में क्षेत्रीय भाषाओं और वेशभूषा के इस्तेमाल से इसे स्थानीय टच मिल रहा है।

मसलन, ज़ीटीवी पर नौ बजे आने वाले “पवित्र रिश्ता” में मराठीभाषी परिवारों की कहानी है। जिसमें बीच-बीच में पात्र मराठी बोलते हैं जिन्हें ग़ैर-मराठी दर्शक भी आसानी से समझ लेते हैं। ऐसे में कहा जा सकता है कि यह धारावाहिक मराठी भाषा और मराठी संस्कृति को देश के अन्य हिस्से में पहुंचा रहा है। दूसरे प्रांतों के लोग जानने लगे हैं कि महाराष्ट्र या मुंबई में मराठी परिवार किस तरह रहता है और किस तरह की समस्याओं से दो-चार होता है। “अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो” में उत्तरप्रदेश के ठाकुर परिवार की कहानी है। जिसमें पूर्वांचल की वेशभूषा और भोजपुरी मिश्रित अवधी भाषा से देश के बाक़ी हिस्से के लोग रूबरू हो रहे हैं। सहारा वन पर आने वाले सीरियल “बिट्टो” में भी उत्तरप्रदेश की ही कहानी है और निचली जाति पर ऊंची जाति के अत्याचार की थीम पर आधारित है। “छोटी बहू” में ब्रजभाषा और मथुरा के आसपास रहने वाले लोगों की जीवन शैली देखने-सुनने को मिल रहा है। खासकर राजपुरोहित परंपरा को दिखाया जा रहा है। ठीक इसी तरह की कहानी स्टार प्लस के “प्रतिज्ञा” की है, जहां पूर्वांचल की वेशभूषा और भाषा दिखती है। “12/24 करोल बाग” और स्टार वन के “गीत हुई परायी” जैसे धारावाहिकों के पंजाबी डॉयलॉग दूसरी भाषा के लोग भी समझने लगे हैं। “मैं घर-घर खेली“ में उज्जैन के दो परिवार की कहानी है जहां मालवा जीवनशैली और भाषा दिखती है। “ससुराल गेंदा फूल” देश की राजधानी दिल्ली खासकर पुरानी दिल्ली की संस्कृति का दीदार होता है और वहां बोली जाने वाली भाषा सुनने को मिलती है। स्टार प्लस के “ये रिश्ता क्या कहता है” में उदयपुर में रहने वाले परंपरागत मारवाड़ी परिवार की कहानी है। इसके विपरीत कलर्स के चर्चित और विवादास्पद धारावाहिक “बालिका वधू” में राजस्थान के देहात में रहने वाले परिवारों दिनचर्या और रहन-सहन की कहानी है। इस सीरियलों में दर्शकों को मारवाड़ी भाषा के डॉयलॉग सुनने को मिलते हैं जिसे लोग अब आसानी से समझने लगे हैं। इसी चैनल पर ही अभी हाल ही शुरू “तेरे लिए” में बंगाली जीवन शैली और संस्कृति की झलक मिलती है, खासकर आदमियों द्वारा खींचा जाने वाले इक्के को देख सकते हैं। “चांद छुपा बादल” में शिमला में रहने वाले परिवारों की कहानी और जीवन शैली बयां करती है। इसमें भी संवादों में ज़्यादातर स्थानीय पहाड़ी भाषा सुनने को मिलती है। स्टार प्लास की लाडली, सोनी टीवी के चर्चित सीरियल “रंग बदलती ओढ़नी” और सब टीवी के “तारक मेहता का उल्टा चश्मा” में गुजराती परिवारों की कथाएं हैं तो “मिस्टर ऐंड मिसेज़ शर्मा इलाहाबाद वाले” में इलाहाबाद की कहानी है। इमैजिन के सीरियल “काशी” बिहार में निचले तबके की कहानी है जहां बचपन में ही लड़कियां व्याह दी जाती हैं। इस धारावाहिक में भोजपुरीयुक्त संवाद भी सुनने को मिलते हैं। सीरियल को संवाद के जरिए स्थानीय टच देने की सफल कोशिश की गई है। स्टारप्लस पर आने वाला “मर्यादा” हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश का रहन-सहन पर बेस्ड है। कलर्स के “न आना इस देश में लाड़ो” में उस समाज की कहानी है, जहां विवाह में गोत्र अहम माना जाता है। “मान रहे तेरा पिता” छत्तीसगढ़ में कोयले की खान की पृष्ठभूमि पर आधारित पिता-पुत्री के रिश्ते की भावनात्मक कहानी है। इसमें भी संवाद में भी स्थानीय भाषा होती है।

भाषा और रहन-सहन के अलावा कई धारावाहिक हिंदुस्तानी समाज की परंपराओं के अलावा सामाजिक बुराइयों-कुरीतियों पर आधारित हैं। सोनी टीवी पर गोद भराई ऐसा ही धारावाहिक है जिसमें “गोद भराई” का धार्मिक संस्कार है। यह देश के हर हिस्से में मनाया जाता है खासकर घर की गर्भवती महिला के सात महीने पूरे करने पर होता है। बंगाली में इसे शाद कहते हैं। केरल में यह सीमंधा और तमिलनाडु में वेलाकप्पू नाम से मनाया जाता है। जीटीवी पर इन दिनों रानी लक्ष्मीबाई सीरियल आ रहा है जो लक्ष्मीबाई के जीवन पर आधारित है। इसी तरह पिछले दो दशक के दौरान “भारत एक खोज”, “रामायण” और “महाभारत”समेत कई ऐतिहासिक और पौराणिक धारावाहिकों का प्रसारण हुआ जिससे ऐतिहासिक और पौराणिक किरदारों के बारे में लोगों के जनरल नॉलेज में काफी इजाफा हुआ।

देश में छोटे परदे पर सीरियलों की उम्र 26 साल है जो बहुत कम है। यह सिलसिला दूरदर्शन ने सात जुलाई 1984 को शुरू किया। जब मनोहर श्याम जोशी की “हमलोग“ के रूप में मध्यम वर्ग की कहानी आई और बेहद लोकप्रिय हुई। आम भारतीय उसमें अपनी कहानी देखने लगा। तीन साल से ज़्यादा समय चक चले हमलोग के हर किरदार लोकप्रिय हुए। बहरहाल, अभी लंबा रास्ता तय करना है और उम्मीद की जानी चाहिए कि सीरियल राष्ट्रीय एकता के वाहक बने रहेंगे।

बेशक, यह देश की एकता और अखंडता मज़बूत करने के दृष्टिकोण से सकारात्मक प्रयास है। भविष्य में बाक़ी रिमोट हिस्सों के लोगों की जीवन-शैली को भी सीरियल के माध्यम से पेश किया जाए तो बूद्धू बक्से की प्रतिष्ठा में चार चांद लग जाएगा। गौरतलब है कि सिनेमा ने हिंदी को देश के कोने कोने में पहुंचाया है। अधिकृततौर पर हिंदी भले ही न राष्ट्रीय भाषा का दरजा पा सकी हो लेकिन अगर व्यवहारिक रूप से देखें तो हिंदी देश की संपर्क भाषा बन गई है। देश के किसी भी हिस्से में चले जाइए हर जगह हिंदी बोलने समझने वाले मिल जाएंगे। दक्षिण में नेताओं के हिंदी विरोध को हिंदी सिनेमा ने इतिहास की चीज़ बना दी। आजकल हिंदी कर्नाटक और आंध्रप्रदेश ही नहीं तमिलनाडु और केरल के दूर-दराज़ के हिस्सों में भी धड़ल्ले से बोली जाने लगी है।

दरअसल, जानकारी की स्रोत किताबें होती हैं या फिर देशाटन। अपने देश में दोनों बेहद महंगी हैं। एक आम आदमी जीवन भर दो जून की रोटी जुटाने में व्यस्त रहता है। वह न तो किताब खरीद पाता है न ही उसे घूमने की फ़ुर्सत मिलती है फिर इन सबके लिए उसके पास उतना पैसा भी नहीं होता। ऐसे में ये सीरियल्स ही आम आदमी की जानकारी के स्रोत बन रहे हैं। समस्या यह है कि सैटेलाइट चैनलों की पहुंच केवल शहरों में है। देहातों में कहीं-कहीं लोगों ने सेटबाक्स लगा रखे हैं लेकिन बिजली की कमी के चलते निजी टीवी मनोरंजन से वंचित है रहते हैं। यानी देश की साठ फ़ीसदी आबादी आज भी टीवी देखने से वंचित रहती है। लेकिन जिस तरह दूरसंचार तकनीकी क्रांति कर रही है। भविष्य में संभव है यह मुश्किल काम आसान हो जाए। अगर ऐसा हुआ तो इस देश की भाषाई अखंडता के लिए शुभ संकेत होगा।

(Note... I written this article around 3 months before)
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