मंगलवार, 4 मार्च 2014

राज ठाकरे से नितिन गडकरी की मुलाक़ात का मतलब?

राज ठाकरे से नितिन गडकरी की मुलाक़ात का मतलब?
मासूम उत्तर भारतीय बच्चों को मारने वालों को माफ़ी नहीं!

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई, ठाणे और महाराष्ट्र के बाक़ी इलाक़ों में रहने वाले उत्तर भारतीयों सावधान हो जाओ। नौकरी के लिए परीक्षा देने आए तुम्हारे बच्चों को मुबई के रेलवे स्टेशनों, सड़कों और परीक्षा केंद्रों पर दौड़ा-दौड़ा कर पिटवाने वाले राज ठाकरे को भूलना नहीं। पिछले एक हफ़्ते में पूर्व बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी राज ठाकरे से दो बार मिले हैं। ये दोनों नेता बहुत अच्छे दोस्त हैं। यानी बीजेपी के रिजिम में भी राज ठाकरे प्रोटेक्टेड रहेंगे। उत्तर भारतीय लोगों के ख़िलाफ़ अपमानजनक कमेंट करते रहेंगे, ज़हर उगलते रहेंगे क्योंकि बीजेपी के मैनेजर गडकरी उनके दोस्त हैं।

हे उत्तरभारतीयों! अब तुम्हें तय करना है कि तुम्हारे अपने मासूम बच्चों की पिटने वालों, पिटवाने वालों और हमलावरों से दोस्ती रखने वालों को इस लोकसभा चुनाव में वोट देना है या नहीं? यक़ीन मानो जो लोग नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी या सेक्युलरिज़्म का हवाला देकर इन हमलावरों से दोस्ती गांठ रहे हैं। या इन हमलावरों से किसी भी तरह से जुड़े हैं। उनकी बातों में आना है या नहीं, यह तुम्हें ही तय करना है। निश्चित तौर पर अगर तुम्हारे अंदर का स्वाभिमान मरा नहीं है, उन बच्चों को दौड़ा-दौड़ा कर पीटने का दृश्य नहीं भूले होगे तो तुम लोग इनको कतई वोट नहीं दोगो।

तुम्हारे बीच के वे नेता जो इन हमलावरों से जुड़े हैं, उनके दोस्त हैं, या उनके ख़ेमे में हैं, उनके अपने स्वार्थ हैं। उनके अपने स्वार्थ के आगे तुम्हारा हित कहीं ठहरता ही नहीं। इस बात को ज़ेहन में रखना। इसलिए इस तरह के अवसरवादी नेताओं से भी सावधान रहना क्योंकि ये अवसरवादी अपना हित साधने के लिए यानी विधायक, सांसद या मंत्री बनने के लिए तुम्हारा इस्तेमाल कर रहे हैं। यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं सत्ता के लालची ये स्वार्थी नेता उत्तर भारतीय समाज के लिए हमलावरों से भी ज़्यादा ख़तरनाक हैं। ये विभीषण की कैटेगरी में आते हैं।

उत्तर भारतीय छात्रों की पिटाई करवाने वाले महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे को कांग्रेस और बीजेपी दोनों प्रमोट कर रही हैं। कांग्रेस ने कभी राज ठाकरे के ख़िलाफ़ उचित कार्रवाई नहीं की तो अब बीजेपी चुनाव में उनका साथ और समर्थन चाह रही है। यानी ये दोनों राष्ट्रीय पार्टियां उत्तर भारतीय छात्रों पर हुए हमले की सीधी दोषी हैं। कांग्रेस शासन में संरक्षण इंन्जॉय करने वाले राज ठाकरे आज भी मराठी धरती पुत्रों का हवाला देकर उत्तर भारत के लोगों का हड़काते रहते हैं, अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हैं और कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियां मौन धारण किए रहती हैं।

बीजेपी ने तो अपनी मुंबई इकाई में उत्तर भारतीयों का पत्ता ही साफ़ कर दिया है। कोई है बीजेपी नेता जिसे आज की तारीख़ में उत्तर भारतीयों का हितैषी या प्रतिनिधि कहा जा सके। मुंबई बीजेपी ने उत्तर भारतीय नेताओं को चुन-चुनकर हाशिए पर डाल दिया। ऐसे में उत्तर भारतीय वोटों की उम्मीद यह पार्टी क्या राजनाथ सिंह के नाम किस आधार पर कर रही है। ज़ाहिर हैं कांग्रेस और बीजेपी में यहां भी कोई ख़ास अंतर नहीं है जैसे देश के बाक़ी हिस्सों में। दोनों पार्टियां एक ही सिक्के की दो पहलू हैं।

हमारा देश 26 जनवरी 1950 को लागू किए गए 397 अनुच्छेदों वाले संविधान से चल रहा है। इसमें अब तक सौ से ज़्यादा संशोधन किए गए हैं। देश का वहीं संविधान देश के हर नागिरक को रोज़ी-रोटी के लिए देश के किसी भी कोने में जाने, रहने और काम करने का अधिकार देता है। इसीलिए देश के हर कोने के लोग दूसरी जगह बसे हैं। इसी को हम विविध संस्कृति के नाम से जानते हैं। जिसे हम गंगा-जमुनी संस्कृति भी कहते हैं। लेकिन राज ठाकरे जैसे सत्ता के लालची अरबपति नेता मराठीभाषियों की भावनाओं को अपने स्वार्थ के लिए भड़काते हैं। तो ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ फ़ॉस्टट्रैक कोर्ट में मामला चलवाकर इन्हें यथाशीघ्र सज़ा दी जानी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इस राजनीति को बेनक़ाब करने का वक़्त आ गया है।

अगर उत्तर प्रदेश, बिहार और बाक़ी प्रदेशों के लोग रोज़ी-रोटी के लिए मुंबई की रुख करते हैं तो इसके लिए 67 साल तक शासन करने वाली कांग्रेस, बीजेपी, जनता पार्टी, जनता दल और इन दलों के नेता जवाहरलाल नेहरू, लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, पीवी नरसिंह राव, मनमोहन सिंह के अलावा मोराजी देसाई, चौधरी चरण सिंह, विश्वनाथप्रताप सिंह, चंद्रशेखर सिंह, एचडी देवेगौड़ा, इंद्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी को ज़िम्मेदार ठहराया जाएगा। क्योंकि इन नेताओं ने देश का संतुलित विकास नहीं किया। मुंबई को अगर विरार तक मान लें, तो यह शहर देश की 60-65 किलोमीटर में समुद्री सीमा में सिमटा है और देश के पास 7000 हज़ार किलोमीटर से ज़्यादा की समुद्री सीमा है। इस लिहाज़ से देश में 100 से ज़्यादा मुंबई विकसित की जा सकती थी। लेकिन नहीं की गई। कल्पना कीजिए, इस देश के पास 100 से ज़्यादा मुंबई जैसे शहर होते तो क्या मुंबई में इतनी भयानक भीड़ होती? कौन चाहेगा अपनी मिट्टी से दूर ऐसी जगह रहे जहां उसे बाहरी कहा जाता है और तमाम तरह के अपमान झेलने पड़ते हैं। अपने गांव तक आने-जाने के लिए स्ट्रगल करना पड़ता है।

अगर मुंबई के ओरिजिन की बात करें तो कभी यह सात टापुओं पर बसा वीरान इलाक़ा था। यहां हर कोई बाहर से ही आया है। हां, कोई बहुत पहले आ गया था, कोई बाद में आया, कोई अब आ रहा है और कोई भविष्य में आएगा। यहां अगर ठाकरे परिवार की बात करें तो आधुनिक डीएनए विश्लेषण से यह साबित हो गया है कि ठाकरे के पूर्वज चंद्रसेनिया कायस्थ समुदाय से आते हैं जिनका मूल चिनाब नदी यानी कश्मीर है। यानी वे कश्मीर से ही निकलकर पूरे देश में फैले और बिहार, मध्य प्रदेश होते हुए महाराष्ट्र (तब महाराष्ट्र था ही नहीं) में पहुंचे। यानी जब हर कोई मुंबई में बाहर से आया है तो कोई किसी को बाहरी कैसे कह सकता है। इसलिए सबको भारतीय कहना ज़्यादा प्रासंगिक होगा।

बहुत से लोगों को पता नहीं है कि वाराणसी में बहुत बड़ी तादाद में मराठी और बंगाली रहते हैं। मराठियों और बंगालियों ने बनारस में काशी की संस्कृति को आत्मसात कर लिया है। इसलिए वे वहां अपने को बाहरी नहीं समझते। फिर उत्तर प्रदेश बिहार जैसे राज्यों में इस बात पर ध्यान ही नहीं दिया जाता कि कौन कहां से आया है। लिहाज़ा किसी के साथ भाषा के आधार पर भेद किया ही नहीं जाता। ऐसे में यह सवाल जायज है कि फिर मुंबई में उत्तर प्रदेश के लोगों को किस बिना पर परप्रांतीय या बाहरी कैसे कहा जा सकता है? ख़ासकर जब महाराष्ट्र राज्य ही 1960 में बना हो तो कैसे कोई यही का आदमी अपने आपको धरती पुत्र और बाक़ी लोगों को बाहरी कह सकता है। इस तरह की नफ़रत फैलाने वालों के ख़िलाफ़ जब यह सिलसिला शुरू हुआ तभी ऐक्शन लिया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा नहीं किया गया। कांग्रेस ऐसे तत्वों को बढ़ावा देती रही। ऐसी कांग्रेस को कभी माफ़ नहीं किया जाना चाहिए जिसने कुछ चुनिंदा राज्यों के अलावा कहीं भी विकास नहीं किया लिहाज़ा हर जगह से लोग रोज़ी रोटी की तलाश में अपना घर बार छोड़कर चले जाते हैं और वहां राज ठाकरे जैसे लोगों की राजनीति के शिकार होते हैं।

आज़ादी के बाद कांग्रेस पूरे समय केवल और केवल वोट बैंक की राजनीति करती रही है। एक साज़िश के तहत मुसलमानों को शिक्षा से वंचित रखा। नतीजा सामने हैं, आज सरकारी नौकरियों में मुसलमान अपनी आबादी के अनुपात में कहीं है भी नहीं। इतनी बड़ी आबादी और सरकारी नौकरी में इतना कम प्रतिनिधित्व हैरान करता है। इसलिए यह क़ौम आज भी सुरक्षा के नाम पर कांग्रेस और समाजवादी पार्टी जैसे अवसरवादी राजनीतिक दलों को वोट देने के लिए मज़बूर है। और ये पार्टियां और उनके मुस्लिम नेता इस क़ौम को बेवकूफ़ बनाते हैं।

उत्तर भारतीयों की तरह मुसलमानों का मुद्दा कम अहम नहीं है। छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद मुंबई में दिसंबर और जनवरी में दो चरण में दंगे (हुए तो कतई नहीं) करवाए गए। जिसमें हज़ार से ज़्यादा निर्दोष लोग मारे गए। उसकी जांच के लिए श्रीकृष्णा आयोग का गठन हुआ। आयोग ने अपनी रिपोर्ट भी दी लेकिन आज कहां है वह रिपोर्ट। 1999 में कांग्रेस ने उसी रिपोर्ट को लागू करने का वादा करके मुसलमानों का वोट हासिल किया था। आज मुंबई दंगे को लोग पूरी तरह भूल गए हैं जबकि उस मारकाट के दोषी शायद ही किसी को सज़ा मिली होगी।

ज़ाहिर सी बात है कि अगर कांग्रेस-एनसीपी सीरियस होती तो श्रीकृष्ण आयोग में दोषी ठहराए गए लोगों के ख़िलाफ़ फ़ॉस्टट्रैक कोर्ट में मुक़दमा चलता और उन्हें उनके ग़ुनाह के लिए जेल भेजा जाता लेकिन कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। मुसलमानों का हितैषी होने का दंभ करने वाले भी विधायक और मंत्री का पद पाते ही अपनी क़ौम को भूल गए। लिहाज़ा आज ये सभी कैरेक्टर जब आप के पास वोट के लिए आएं तो क्या आपको उन्हें वोट देना चाहिए? नहीं बिलकुल नहीं। हां, आपके पास इन नेताओं के अलावा और कोई ऑप्शन न हो तो राइट टू रिजेक्ट का इस्तेमाल कीजिए लेकिन सत्तावर्ग के इन कथित दलालों को वोट कभी मत देना।

कुल मिलाकर ख़ुशहाल और शांतिपूर्ण जीवन हर आदमी का सपना होता है। समाज और शहर ऐसा हो जो अपने परिवार जैसा लगे। ऐसे में नफ़रत फैलाने का क्या तुक? जो लिहाज़ा लोग नफ़रत की आग पर अपनी रोटी सेंकते हैं उन्हें आइडेटिफ़ाई करके बाहर का रास्ता क्यों न दिखा दिया जाए और इसके लिए चुनाव जैसा लोकतंत्र का महापर्व सबसे शुभ और पाक घड़ी है।

समाप्त