बुधवार, 30 अप्रैल 2014

घर हुआ सपना कांग्रेस-शासन में! (हरिगोविंद विश्वकर्मा)

घर हुआ सपना कांग्रेस-शासन में!
 हरिगोविंद विश्वकर्मा
मुंबई को सपनों का शहर कहा जाता है। माना जाता है कि यहां सपने पूरे होते हैं। इसीलिए देश के कोने-कोने से लोग अपने सपने संजोए यहां भागे चले आते हैं। लेकिन सपने साकार करने वाली नगरी क्या अब भी मुंबई सपने साकार करती है? बिना किसी भेदभाव के अब तक लोगों को रोटी कपड़ा और मकान देती आई मुंबई अब बदलने लगी है। इस हक़ीक़त से कोई भी असहमत नहीं होगा कि मुंबई ने अब अपना घरबनाने के सपने को साकार करना बंद कर दिया है। यानी मायानगरी में आशियाने का ख़याल ही सपना हो गया है। दरअसल, यह सब हुआ है कांग्रेस के 10 साल के शासन में। मुंबई ही नहीं देश के हर छोटे-बड़े शहर में रियल इस्टेस के भाव में दस गुना तक की बढ़ोतरी हुई है जिससे अब औसत आदमी के लिए घर बनाना किसी सपने जैसा हो गया है।

सन् 2004 तक मुंबई शहर तो नहीं, उपनगरों में ज़रूर घर ख़रीदना मुमकिन था। लोग-बाग बैंक से क़र्ज़ लेकर या मित्रों-रिश्तेदारों से मदद मांगकर किसी तरह सिर पर छांव बना लेते थे। क़रीब 225 वर्गफ़ीट क्षेत्रफल का घर तब चार-पांच लाख रुपए तक मिल जाता था। वन बेडरूम-हॉल-किचन (बीएचके) का सेट आठ से दस लाख में उपलब्ध था। लेकिन कांग्रेस की सरकार क्या बनी, रातोंरात सब कुछ बदल गया। घर के दाम में मानो पंख लग गए। चार-पांच लाख के फ़्लैटों की कीमत 10 साल में 35 से 40 लाख पहुंच गई। आठ से दस लाख के घर 75 से 90 लाख के हो गए। चूंकि लोगों की आमदनी में उस हिसाब से इज़ाफ़ा नहीं हुआ, लिहाज़ा महंगाई की मार झेल रहा आम आदमी घर खरीद ही नहीं सकता। कांग्रेस-रिजिम में बिल्डर और रियल इस्टेट कारोबारी जमकर फल-फूल रहे हैं। अब तो हालत यह हो गई है कि अगर आप किसी तरह कमा-धमाकर अपना और परिवार का पेट पाल रहे हैं तो मुंबई में रहने की तो कल्पना ही मत कीजिए। इतना ही नहीं आसपास के नगरों में रहने का भी ख़्वाब मत देखिए क्योंकि अब विरार-बोइसर या कल्याण-उल्हासनगर-टिटवाला में भी घर ख़रीदना आपकी हैसियत से परे हो गया है।

अभी कुछ महीने पहले बंगलुरु की फ़र्म नाइट फ़्रैंक इंडियाने देश में फ़्लैट की कीमतों पर सर्वे किया था। सर्वे के मुताबिक मुंबई में 30 फ़ीसदी अंडर-कंस्ट्रक्शन फ़्लैट्स की कीमत करोड़ रुपए से अधिक है जबकि 52 फ़ीसदी घरों के दाम 60-70 लाख से ऊपर। जो सस्ते घर उपलब्ध हैं उनमें ज़्यादातर स्लम रिडेवलपमेंट अथॉरिटी के 225 से 270 वर्गफ़ीट के रेंज के कम क्षेत्रफल के छोटे घर हैं, जिनकी कीमत 35-45 लाख के बीच है। अगर रिडेवलपमेंट योजना की बिल्डिंगों को छोड़ दें तो मुंबई में औसत इमारतों, यानी पांच, सात या नौ मंज़िल की बिल्डिंग, का निर्माण ही बंद हो गया है। अब हर जगह केवल और केवल गगनचुंबी टॉवर्स बनाए जा रहे हैं जो औसतन 25 से 40 और कोई-कोई 50 मंज़िल के हैं। देश की सबसे ऊंची इमारत भी मुंबई में ही बनाई जा रही है। इन बहुमंज़िली इमारतों में वन बीएचके सेट का कॉन्सेप्ट ही नहीं हैं। यानी जो फ़्लैट बन रहे हैं, उनमें सबसे छोटा घर दो बीएचके है, जिसकी न्यूनतम जगह 900 वर्गफ़ीट है।

दो साल पहले जनता को बेवकूफ़ बनाने के लिए महाराष्ट्र की कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने सर्कुलर जारी किया कि बिल्डरों को सुपरबिल्टअप एरिया के मुताबिक नहीं, बल्कि कारपेट एरिया के हिसाब से फ़्लैट बेचने पड़ेगे। सरकार के फ़रमान से लोग ख़ुश हुए कि घर के दाम गिरेंगे। वे भी घर ख़रीद सकेंगे लेकिन हुआ उलटा। घर के दाम बढ़ते ही गए। मज़ेदार बता यह है कि नए सरकारी नॉर्म के मुताबिक आज की तारीख़ में सुपरबिल्टअप एरिया के हिसाब से घर बेचा नहीं जा सकता लेकिन यह फ़ाइलों की बात है। क़ानून बना दिया गया, पर ध्यान नहीं दिया गया कि उस पर अमल हो रहा है या नहीं। सरकार और नेताओं के आशीर्वाद से दिन दूना रात चौगुना तरक़्क़ी कर रहे बिल्डर कारपेट-एरिया की बजाय ग्राहकों से सुपरबिल्टअप का चार्ज ले रहे हैं। ग़ौर करने वाली बात है कि रजिस्ट्री कारपेट-एरिया पर ही हो रही है यानी बाक़ी टैक्सेज़ वगैरह कारपेट-एरिया पर ही लग रहे हैं।

मिसाल के तौर पर मुंबई के पश्चिमी उपनगर गोरेगांव में फ़िलहाल फ़्लैट के भाव 12 से 16 हज़ार रुपए प्रति वर्गफ़ीट के बीच है। यहां सबसे छोटे घर 900 वर्गफ़ीट कारपेट एरिया के हैं जिनका सुपरबिल्टअप क्षेत्रफल 1420 से 1450 वर्गफ़ीट के बीच है। ये फ़्लैट कारपेट भाव पर नहीं धड़ल्ले से सुपरबिल्टअप रेट पर बेचे जा रहे हैं। कारपेट-एरिया के अनुसार मौज़ूदा भाव से फ़्लैट की कीमत एक करोड़ से थोड़ा ज़्यादा (1 करोड़ 8 लाख) है। पर सुपरबिल्टअप दाम 1 करोड़ 74 लाख रुपए कर देता है। इस पर 9 लाख रुपए वेहिकल पार्किंग चार्ज लिया जाता है जो कि क़ानूनन मुफ़्त है। इसके अलावा दो साल की अवधि के लिए सोसाइटी चार्ज के रूप में 4 लाख रुपए (यानी लगभग 18 हज़ार रुपए प्रति माह) वसूला जाता है। इसमें आजकल 100 रुपए प्रति वर्गफ़ुट फ़्लोरराइज़ चार्ज भी लगने लगा है। यानी अगर 31वीं मंज़िल पर घर है तो 3100 रुपए प्रति वर्गफ़ुट के हिसाब से 38 लाख 75 हज़ार रुपए फ़्लोरराइज़ चार्ज लगेगा। मतलब ले देकर फ़्लैट की कीमत सवा दो करोड़ रुपए (2.225 करोड़) की सीमा को पार कर जाती है।

मज़ेदार बात यह है कि काग़ज़ पर फ़्लैट की कीमत कारपेट-एरिया के अनुसार ही होती है। बल्कि रेट को और भी कम कर दिया जाता है। मतलब घर की रजिस्ट्री बहुत कम दर पर होती है। कारपेट एरिया के अलावा बाक़ी क्षेत्रफल की जो भी धनराशि होती है उसका भुगतान कैश में होता है। दो करोड़ के फ़्लैट का औसतन व्हाइट-ट्रांज़ैक्शन केवल 80 से 85 लाख रुपए या उससे भी कम में होता है। यानी 60 फ़ीसदी से ज़्यादा धनराशि ब्लैकमनी होती है। रेवेन्यू और आयकर विभाग के लोग बिल्डरों के साथ मिलकर अपने ही विभाग को चूना लगाते हैं। कहा जा सकता है कि अंधेरगर्दी और लूट-खसोट के खेल में बिल्डरों के अलावा नेता, नौकरशाह, राजस्व अफ़सर, ब्यूरोक्रेट्स, सरकारी कर्मचारी, पुलिस, आयकर विभाग और बाक़ी एजेंसियों के लोग शामिल रहते हैं। यह तो मुंबई का उदाहरण है। पूरे देश में रियाल इस्टेट का मुंबई  फ़ॉर्मूला ही लागू है। कोई औसत आमदनी वाला आदमी घर खरीद कर दिखाए। पूरा जीवन बैंक का इंटरेस्ट भरते भरते गुज़ार जाएगा।

कांग्रेसी ज़ोर-शोर से कह रहे हैं कि देश तरक़्की कर रहा है। इनसे कौन पूछे कि तरक़्की का मतलब क्या नागरिकों को शहर से बाहर खदेड़ देना है। फिलहाल, काग्रेस यही कर रही हैं। आख़िर उस विकास का क्या मतलब जब आदमी घर ही न खरीद पाए। इतनी महंगाई में औसत आमदनी वाली आदमी कैसे रहेगा मुंबई जैसे शहर में? यानी देश की आर्थिक राजधानी में 10-20 हज़ार रुपए महीने कमाने वालों के लिए कोई ग़ुंज़ाइश ही नहीं रह गई है। वह घर के सपने तो देख सकता है लेकिन अपने देश और अपने शहर में ही घर नहीं खरीद सकता। ऐसे में अगर कहें कि इस विकसित भारत से बेहतर तो अपना पिछड़ा भारत ही था, जहां कम से कम आदमी थोड़ी कोशिश करके रोटी, कपड़ा और मकान तो जुटा लेता था। जिस देश में एक बड़ा तबक़ा दिन भर पसीना बहाने के बाद भी सौ रुपए न कमा पाता हो, वहां करोड़ों रुपए के घर की बात बड़ी अटपटी लगती है। लेकिन सच तो यही है।

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