रविवार, 25 जनवरी 2015

भारत केवल टैक्स देने वालों का देश, हर सुविधा और योजना केवल टैक्स देने वालों के लिए...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आपको बुरा लग सकता है, लेकिन सच यही है कि यह पूरा देश महज 10 फ़ीसदी लोगों का होकर रह गया है। वहीं दस प्रतिशत लोग गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस समेत तमाम सरकारी त्यौहार मनाते हैं। फिलहाल देश की कुल आबादी 1.25 अरब है। वित्त मंत्रालय के मुताबिक 2012-13 में केवल 42,800 लोगों की सालाना आमदनी एक करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा थी। यानी फ़र्स्ट कैटेगरी में आबादी का मात्र 0.00354 फ़ीसदी ऐसा है, जो हर साल एक करोड़ या उससे ज़्यादा कमा रहा है। 

इस फेहरिस्मेंत उद्योगपति, बिल्डर, कारोबारी, राजनेता, अभिनेता, बड़े खिलाड़ी और भ्रष्ट नौकरशाह, भ्रष्ट पुलिस अफ़सर और भ्रष्ट जज शामिल हैं। इस कैटेगरी में सत्तावर्ग के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने वाले सेकेंड कैटेगरी वे लोग भी शामिल किए जा सकते हैं जिनकी जनसंख्या 4.06 लाख है। ये भी देश की आबादी का महज 0.0319 फ़ीसदी हिस्सा है। इनकी सालाना कमाई 20 लाख से 1 करोड़ के बीच होती है। इन दोनों कैटेगरी (फ़र्स्ट और सेकेंड कैटेगरी) के लोगों को सत्तावर्ग का आदमी यानी रूलिंग फ़ैमिली कहा जाता है। अगर इन दोनों वर्ग को मिला दीजिए तो होता हैः 0.00354 + 0.03190 = 0.03544 फीसदी। यह देश की कुल आबादी का एक (1.0) फ़ीसदी भी नहीं है। आधी (0.5) फ़ीसदी या एक चौथाई (0.25) फ़ीसदी भी नहीं है। बल्कि एक आठवां (0.125) फ़ीसदी भी नहीं है और एक सोलहवां (0.0625) फ़ीसदी भी नहीं है। यह आबादी देश की कुल आबादी की एक बत्तीसवां फ़ीसदी के आसपास है।

कहने का मतलब हमारी आबादी का एक बहुत कम हिस्सा ख़ुशहाल है। मनचाही ज़िंदगी जीता है। इनके सामने जीवित रहने या रोज़ी-रोटी का संकट नहीं जो आम आदमी रोज़ाना झेलता है। महंगाई कितनी भी बढ़ जाय सत्तावर्ग को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इनके पास इतनी दौलत है कि आने वाली कई पीढ़ियां ख़र्च नहीं कर पाएंगी। इस वर्ग पर किसी तरह के संकट का असर नहीं होता है। यह वर्ग ठाट से वातानुकूलित घरों में सोता है। जहां भी रहता है, वहां उसे एसी कमरे में रखा जाता है। यह वर्ग केवल प्लेन से सफ़र करता है और समस्याओं के हल करने के लिए वातानुकूलित कमरे में बातचीत करता है। इसी 0.03544 फ़ीसदी हिस्से के लोग लोकसभा और राज्यसभा में पहुंचने की हैसियत रखते हैं। चुनाव के बाद सरकार बनाते हैं। अब सोचिए, आप पर शासन कौन लोग करते हैं और आपके मुक़ाबले उनकी हैसियत क्या है? ये लोग जो भी दान देते हैं, या धर्म-कर्म करते हैं, वह इसलिए करते हैं ताकि इन्हें इनकम टैक्स में छूट मिले। वरना ये हमारे आपकी ओर देखना भी पसंद नहीं करते हैं।

देश की संसद पर इन लोगों का क़ब्ज़ा है। ब्यूरोक्रेसी यानी कार्यपालिका को इन लोगों ने ही बंधक बना रखा है। तमाम इकॉनॉमी में इन्हीं का दख़ल है। शेयर बाज़ार में यही लोग निवेश करते हैं। मुंबई जैसे महानगरों में करोड़ों रुपए के महंगे फ़्लैट ख़रीदने की हैसियत इन्ही लोगों की है। हर छोटी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ इनके ही कंट्रोल में है। सभी खेल संघों में अहम पदों पर यही लोग हैं। छोटे-बड़े सभी संस्थानों में इनका ही वर्चस्व है। मीडिया के असली ओनर यही लोग हैं, जहां पत्रकारों को ये लोग टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं और ज़रूरत ख़त्म होने पर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं। सीमा पर सैनिक और आतंकवादी एक दूसरे का ख़ून बहाते हैं लेकिन हर डायलॉग यही लोग करते हैं। देश की 95 फ़ीसदी संपत्ति, संसाधन और धन इन्हीं के क़ब्ज़े में है।

अभी रिज़व बैंक ऑफ़ इंडिया में आरटीआई के ज़रिए एक विस्फोटक सूचना निकाली गई। देश की बड़ी बैंकों ने 5 लाख करोड़ रुपए रिपीट 5 लाख करोड़ रुपए औद्योगिक घरानों को और 3.75 लाख करोड़ रुपए रिपीट 3.75 करोड़ रुपए बिल्डरों यानी रियल इस्टेट की कंपनियों को लोन के रूप में दिया था। अब पौने नौ लाख करोड़ रुपए की यह धनराशि बैड लोन कैटेगरी में रख दी गई है। बैड लोन का मतलब इसकी रिकवरी नहीं हो सकती। इसमें किंगफ़ीशर के कर्मचारियों को वेतन न दे पाने लेकिन पिछले साल 14 करोड़ में आईपीएल टीम के लिए युवराज को ख़रीदने वाले उद्योगपति विजय माल्या शामिल हैं जिनका उधार लिया गया क़रीब 3000 करोड़ रुपए का क़र्ज़ बैड लोन की कैटेगरी में चला गया है। यानी उसे वापस करने की बाध्यता माल्या पर नहीं क्योंकि वह कंपनी ही सिक कंपनी की कैटेगरी में आ गई है तो वे क्या करें। मज़ेदार बात यह है कि इस मामले में अभी तक केवल एक बैंक के बड़े अफ़सर के ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई है। बैड लोन को मंज़ूर करने वाले बाक़ी बैंक अफ़सर रिश्वत की रकम से ऐश कर रहे हैं। तो ये हैं रूलिंग क्लास यानी रूलिंग फ़ैमिली।

इस रूलिंग फ़ैमिली का साथ हमारे-आपके बीच के दो कैटेगरी के लोग देते हैं। जिन्हें हम थर्ड कैटेगरी और फोर्थ कैटेगरी कह सकते हैं। आइए इसे भी आंकड़ों के ज़रिए समझते हैं। थर्ड कैटेगरी में देश की आबादी का 0.108 फ़ीसदी हिस्सा यानी 13.78 लाख लोग आते हैं। जिनकी आमदनी 10 से 20 लाख रुपए के बीच होती है। इन पर भी महंगाई वगैरह का बहुत ज़्यादा असर नहीं होता है। इस वर्ग के क़रीब 90 फ़ीसदी लोग सत्ता परिवार की ओर झुके रहते हैं। यानी दलाली या चमचागिरी करते हैं। इसमें फोर्थ कैटेगरी के लोगों को भी शामिल कर लीजिए। फोर्थ कैटेगरी की संख्या 17.88 लाख है और यह आबादी का 0.140 फ़ीसदी है। ये लोग हर साल 5 से 10 लाख रुपए की कमाई कर लेते हैं। इसमें हमारे आप के बीच के मोटी सेलरी वाले चंद सीनियर पत्रकार भी हैं। इस फ़ोर्थ कैटगरी के 80 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग यथास्थितिवादी होते हैं। यानी परिवार पालने या दूसरी मज़बूरियों के चलते अपने ज़मीर से समझौता करके सत्ता वर्ग की हां में हां मिलाते हैं और फ़ेसबुक या दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी जमात यानी आम आदमी को ख़ूब गाली देते हैं या उसकी आलोचना करते हैं।

अब इन चारों वर्ग को मिला दीजिए तो होता हैः 0.00354 + 0.0319 + 0.108 + 0.140 = 0.28344... यह देश की आबादी का आधा प्रतिशत भी नहीं है। यानी कह सकते हैं कि मुट्ठी भर लोग देश को चला रहे हैं या उनका समर्थन कर रहे हैं।

आमदनी की फ़िफ़्थ कैटेगरी में आमदनी न्यूनतम टेक्स सीमा 1 लाख अस्सी हज़ार रुपए से 5 लाख के बीच के लोग आते हैं। टैक्स देने वालों में ये सबसे नीचे हैं। इसे लोअर मिडिल क्लास कहा जाता है जिसकी जनसंख्या 288.44 लाख है। यह देश की कुल आबादी का 2.271 फ़ीसदी है।

पूरे देश में टेक्सपेयर्स की कुल संख्या  3.25 फ़ीसदी है। यानी जितने संपन्न हैं सब इसी में हैं। इसमें 3.25 फ़ीसदी पर आश्रित लोगों को जोड़ दिया जाए तो यह क़रीब 10 फ़ीसदी होता है। यानी इस देश में महज दस फ़ीसदी लोग ही इंसान की तरह रहते हैं। बाक़ी लोग जीवन के लिए संघर्ष करते हैं।

जिस नौकरी में आरक्षण होता है और वह आरक्षण हमें अगड़े-पिछड़े या हंदू-मुस्लिम रूप में आपस में लड़ाता है उसका परसेंटेज बहुत कम है। महज़ 3 फ़ीसदी के क़रीब है। इस तीन फ़ीसदी के लिए हम कहीं धर्म, कहीं जाति, कहीं क्षेत्र, कही भाषा तो कहीं नस्ल के नाम पर आपस में बंटे हैं।

दूसरी ओर प्रजा परिवार यानी पूरे देश की जनता है, जो देश की आबादी का 96 फ़ीसदी है। प्रजावर्ग परिवार के लोग अनाज की बोरी की तरह ट्रेन में ठुंसने वाले लोग होते हैं। ये वे लोग हैं, जिनके न तो पैदा होने की नोटिस ली जाती है न ही मरने की।  बड़े ज़ोर-शोर से मनरेगा रोज़गार योजना का जिक्र की जाती है। मनरेगा में साल भर में युवा बेरोज़गार को 100 दिन के रोज़गार की गारंटी मिली है। इसमें सौ रुपए दैनिक मज़दूरी मिलती है। कोई सहज कल्पना कर सकता है कि साल भर में किसी को 100 दिन काम यानी 10 हज़ार रुपए मिल जाए तो क्या वह साल भर इतनी धनराशि से सरवाइव कर सकता है?

चाहे साबित हो या न हो, पर पूरा देश जान गया है कि सत्ता के शिखर पर बैठे सभी लोग महाभ्रष्ट हैं। और इस ग़रीब देश को और आम जनता को बिना किसी अपराधबोध के ख़ुलेआम लूट रहे हैं। लूटमारी के धंधे में कोई नेता किसी से कम नहीं है। ये इतने निरंकुश हैं कि इन्हें अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं है। इनकी छांव में फल-फूल रहे, इनके चमचे, इन भ्रष्टों का बेखौफ़ होकर बचाव करतो हैं। भारतीय क़ानून में बचाव-पक्ष को दिए जाने वाले मौक़े का नाजायज़ तरीक़े से दुरुपयोग कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री है। सब डींग हांकते हैं कि वह चाय बेचकर प्रधानमंत्री बने हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने अपनी जमात चायवालों के लिए क्या किया? ज़ाहिर है कुछ नहीं। प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले दिल्ली कटरा (वैष्णोदेवी) के बीच श्रीशक्ति एक्सप्रेस चलाई जो पूरी तरह एसी ट्रेन है। इसमें कितने चायवाले यात्रा करेंगे, कोई सहज सोच सकता है। मोदी की दूसरी बहु-प्रचारित जन-धन योजना है। जिसमें लोगों का खाता खुल रहा है और परिवार के मुखिया को एक लाख रुपए का मुफ़्त दुर्घटना बीमा मिल रहा है। इसका लाभ हादसे में मरने के बाद ही मिल सकता है। बेहतर होता, मोदी लाख की जगह 50 हज़ार का ही बीमा देते और वह भी हेल्थ बीमा ताकि लोग जीते जी उसका लाभ लेते और बीमार होने पर अपना इलाज करवाते। खैर ऐसा नहीं हुआ क्योंकि मोदी अब चायवालों के नहीं सत्तावर्ग के प्रतिनिधि हैं।

इसी तरह सत्ता-परिवार में सोनिया गांधी, नितिन गडकरी, शरद पवार, मुलायम यादव, मायावती, लालू प्रसाद यादव, करुणानिधि, जयललिता, प्रकाश बादल, नीतीश कुमार, ममता बैनर्जी, राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, शीबू सोरेन, अशोक गहलोत, देवेंद्र फडनवीस, पृथ्वीराज चव्हाण, अशोक चव्हाण के अलावा सभी राजनेता, सभी सांसद, 99 फ़ीसदी विधायक है। हमें लगता है ये एक दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन यक़ीन मानिये ये एक दूसरे के हितैषी हैं। इनकी मदद करते हैं अंबानी-बंधु, टाटा-बिरला, महिंद्रा, एन श्रीनिवासन और सभी औद्योगिक घराने। इसके अलावा अमिताभ बच्चन, शाहरुख ख़ान, सलमान खान, अक्षयकुमार, सचिन तेंदुलकर, महेंद्रसिंह धोनी और बाक़ी खरबपति लोग भी सत्तावर्ग क्लब में शामिल हैं।

मुलायम से पूछना चाहिए, पिछले 45 साल के दौरान आपने ऐसा क्या किया कि इतने दौलतमंद हो गए? आपके परिवार का हर सदस्य संसद या विधनसभा में क्यों है? क्या देश में दूसरे लोग नहीं हैं? बादल से पूछना चाहिए, ख़ुद मुख्यमंत्री बन गए, चलो ठीक है, बेटे को डिप्टी सीएम बनाते वक़्त आपको जरा भी शर्म नहीं आई? चुनाव में जीत मिली इसका मतलब आपका परिवार ही सरकार चलाएगा।  

नवीन पटनायक और अखिलेश यादव (कुछ समय पहले उमर अब्दुल्ला और हेमंत सोरेन) इसलिए सीएम हैं क्योंकि पॉलिटिशियन्स के बेटे हैं। उमर के पिता फ़ारुक अब्दुल्ला भी शेख अब्दुल्ला का बेटा होने के कारण सीएम थे। सोनिया गांधी इसलिए देश की सबसे ताक़तवर महिला हैं क्योंकि राजीव गांधी की पत्नी हैं। राहुल इसलिए कांग्रेस उपाध्यक्ष हैं क्योंकि वे सोनिया-राजीव के बेटे हैं। उनकी युवा टीम में माधवराव सिंधिया के बेटे ज्योतिर्दित्य, राजेश पायलट के बेटे सचिन, मुरली देवड़ा के बेटे मिलिंद, जीतेंद्र प्रसाद के बेटे जतिन जैसे लोग हैं जो बाप की बोई गई फसल काट रहे हैं। उत्तरप्रदेश में मुलायम, रामगोपाल, धर्मेंद्र, ट्विंकल, तेज प्रताप सभी सांसद, अखिलेश और शिवपाल विधायक एक ही परिवार के हैं।

देश का लोकतंत्र, लोकतंत्र के स्तंभ- कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया, तमाम व्यवस्थाएं- शासन-तंत्र, पुलिस, बैंक, सभी योजनाएं सब की सब फ़र्ज़ी हैं। देश में 1.25 अरब लोग रहते हैं। पिछली सदी या उससे पहले और अंग्रेज़ों के जाने के बाद शुरुआत में जिन्हें मौक़ा मिला उन्होंने ही संपत्ति का बहुत बड़ा हिस्सा, क़रीब नब्बे फ़ीसदी, हथिया लिया और आज वही धन्नासेठ कहलाते हैं।

इस बात की ख़ूब डींग हांकी जाती है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां जनता के हित के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की सरकार है। क्या यह सही है? बिल्कुल नहीं। इस देश में और इस देश के लोकतंत्र में आम जनता की कितनी भागीदारी शून्य है?

दरअसल, हमारी क़ुदरत ने जो दिया है वह समस्त देशवासियों के लिए है। लेकिन सत्ता-परिवार के लोगों ने दूसरों के हिस्से के रिसोर्सेज़ पर भी क़ब्ज़ा कर लिया है। रूलिंग क्लास ने निर्धन लोगों का हक़ मारने का सामाजिक और नैतिक अपराध किया है। लिहाज़ा इनके साथ अपराधियों की तरह सलूक किया जाना चाहिए। इनके लिए दंड निर्धारित किया जाना चाहिए।


इन चंद लोगों के पास लाखों-हज़ारों करोड़ रुपए की संपत्ति है जबकि बाक़ी पूरा देश कंगाल है और केवल हवा खा रहा है। इसलिए हे देशवासियों जागो! इन बेइमानों को पहचानो! ये तुम्हारे दुश्मन हैं! इन्हें इनकी असली जगह आप ही ला सकते हैं। इसके लिए होना होगा आप सबको एकजुट! अंधेरनगरी को ख़त्म करने के लिए जनता को ही आगे आना होगा।