बुधवार, 30 सितंबर 2015

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत विमान हादसे में नहीं हुई -फ्रांस की खुफिया रिपोर्ट

हरिगोविंद विश्वकर्मा
भारतीय राजनीति के कर्ण माने जाने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मौत के बारे में नया खुलासा करते हुए कहा है कि फ्रांस की खुफिया रिपोर्ट ने 15 जुलाई 2017 को दावा किया कि नेताजी की मौत हवाई हादसे में नहीं हुई है। पेरिस के इतिहासकार जेबीपी मूर का दावा है कि नेताजी की मौत ताइवान के प्लेन क्रैश में नहीं हुई है, बल्कि नेताजी के ठिकाने के बारे में दिसंबर 1947 तक पता नहीं था। मूर के दावे के बाद एक बार फिर से यह साफ हो जाता है कि फ्रांस नेताजी के प्लेन क्रैश में 18 अगस्त 1945 में मारे जाने के दावे को मानने को तैयार नहीं है। आपको बता दें कि मूर पेरिस के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानमें प्रोफेसर हैं।  मूर का कहना है कि फ्रांस की खुफिया विभाग का मानना है कि बोस 18 अगस्त 1947 में प्लेन क्रैश में नहीं मारे गए थे, बल्कि वह इंडो-चीन से बच निकलने में सफल हुए थे, उनके ठिकाने के बारे में 11 दिसंबर 1947 तक किसी को पता नहीं था। इससे साफ है कि वह कहीं ना कहीं 1947 तक जिंदा थे।

देशवासियों को “तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” का नारा देने वाले स्वतंत्रता आंदोलन के असली हीरो नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अगर भारतीय राजनीति का कर्ण कहा जाए, तो अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा। जैसे महाभारत में महाबली कर्ण के साथ जीवन पर्यंत, यहां तक कि मृत्यु तक, अन्याय होता रहा, उसी तरह नेताजी के साथ पूरे जीवनकाल ही नहीं, मृत्यु के बाद भी अन्याय पर अन्याय ही हुआ. वह भी उनके अपने ही देश में। दरअसल, महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सुभाषचंद्र बोस तीनों समान स्टैचर के नेता थे, लेकिन जहां अंग्रेज़ों का “ब्लूआई परसन” होने के कारण गांधी और नेहरू भारतीय राजनीति में युधिष्ठिर और अर्जुन बनने का गौरव हासिल करने में सफल रहे, वहीं ब्रिटिश हुक्मरानों की आंख की किरकिरी रहे सुभाषबाबू के खाते में केवल उपेक्षा, अपमान, पलायन और मौत ही आई।

कहा जाता है, सुभाषबाबू के आज़ाद हिंद फ़ौज में भर्ती होने की भारतीय युवकों में दीवानगी देखकर ब्रिटिश सरकार के होश भी उड़ गए थे। बहरहाल, बाग़ी तेवर और सशस्त्र संघर्ष की पैरवी करने के कारण ही जंग-ए-आज़ादी के महानायक को लंबे समय तक निर्वासन का जीवन बिताना पड़ा। दूसरी ओर गांधी-नेहरू की अगुवाई वाली उदार कांग्रेस हमेशा ही अंग्रेज़ों की कृपापात्र रही। तब गांधी-नेहरू जहां उदारवादी गुट का नेतृत्व करते थे, वहीं नेता जोशीले क्रांतिकारी दल के प्रिय नेता थे। सत्तासुख भोगने वाले नेहरू ही नहीं कांग्रेसियों ने भी बोस के साथ इंसाफ़ नहीं किया। उनसे जुड़े तमात तत्यों को इतने लंबे समय तक इस तरह छिपाया कि हर देशवासी उनकी मंशा पर शक करने लगा।

इतिहास और इतिहासकारों ने भी सुभाषचंद्र बोस के साथ कर्ण जैसा व्यवहार किया। भारतीय इतिहासकारों ने महात्मा गांधी और पं. नेहरू के कार्यों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जबकि नेताजी की नीति और कार्यों को इस तरह पेश नहीं किया गया, जितना वह डिज़र्व करते थे। कांग्रेस, ख़ासकर गांधी, अपनी अहिंसावादी नीति के चलते सुभाष को पसंद ही नहीं करते थे। उनकी इच्छा के विपरीत 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद नेताजी ने राष्ट्रीय योजना आयोग का गठन करके प्रगतिशील क़दम उठाया था। इसकी ख़ूब सराहना हुई, लेकिन यह नीति गांधी के आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी, लिहाज़ा गांधी और उनके समर्थक नेताजी का विरोध करने लगे।

इसी तरह अगले साल (सन् 1939 में) कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में सुभाष और गांधी फिर आमने-सामने आ गए। जैसे ही सुभाषबाबू ने दोबारा अध्यक्ष का चुनाव लड़ने की घोषणा की, गांधी ने यूरोप के लंबे प्रवास से स्वदेश लौटे नेहरू को नामांकन दाखिल करने को कहा, लेकिन स्मार्ट नेहरू ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का नाम आगे कर दिया। मगर पराजय के डर से मौलाना ने अपना नाम वापस ले लिया। अंत में गांधी ने आनन-फानन में आंध्रप्रदेश के नेता डॉ. पट्टाभी सितारमैया का नामांकन भरवाया। लेकिन वह सुभाषबाबू से हार गए। नेताजी को 1580 वोट मिले थे, जबकि सितारमैया को 1377 वोट। गांधी ने इसे अपनी व्यक्तिगत हार माना और सार्वजनिक तौर पर कहा, “सुभाषबाबू की जीत मेरी व्यक्तिगत हार है।” ऐसा लगा, गांधी कांग्रेस वर्किंग कमिटी से इस्तीफ़ा दे देंगे। उनके विरोध के चलते ही सुभाषबाबू ने अध्यक्ष से त्यागपत्र दे दिया। फिर डॉ. राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए थे।

इतिहासकार बताते हैं कि सुभाषबाबू आज़ादी के संघर्ष के पुरोधा महात्मा गांधी का बहुत सम्मान करते थे। उनके विचार बेशक भिन्न थे लेकिन वह अच्छी तरह जानते थे कि गाधी और उनका मक़सद एक ही है, यानी देश की आज़ादी। बस दोनों के रास्ते अलग-अलग हैं। महात्मा गांधी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ कहकर नेताजी ने ही संबोधित किया था। बाद में उन्हें औपचारिक रूप से राष्ट्रपिता मान लिया गया।

23 जनवरी 1897 को उड़ीसा (तब उड़ीसा ब्रिटिश बंगाल प्रेसीडेंसी का हिस्सा था) में कटक के बंगाली परिवार में जन्मे नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी 64 अति गोपनीय फाइलों को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी द्वारा सार्वजनिक करने के बाद कहा जा रहा है कि नेताजी 1945 के बाद भी जीवित थे। तो क्या 18 अगस्त 1945 को ताइवान के ताईहोकू हवाई अड्डे (अब ताइपेई डोमेस्टिक एयरपोर्ट) पर विमान हादसे में नेताजी के मरने की झूठी ख़बर फैलाई गई? ऐसे में इस तरह की आशंका की गहन जांच कराकर देश को सच बताने की ज़रूरत है ताकि नेताजी की मौत की सात दशक पुरानी अनसुलझी गुत्थी सुलझ सके।

इस खुलासे के बाद अब सवाल यह भी उठता है कि क्या देश के नेहरू के स्टेनों रहे श्यामलाल जैन की बात, जैसा कि बीजेपी नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी दावा करते रहे हैं, सही है कि नेताजी की हत्या नेहरू के कहने पर रूसी तानाशाह जोसेफ स्तालिन ने करवा दी थी। डॉ स्वामी के मुताबिक़ “मेरठ निवासी श्यामलाल नेहरू के स्टेनो थे। नेताजी की मौत की ख़बर के पब्लिक होने के नेहरू ने उन्हें आसिफ अली के घर बुला कर एक पत्र टाइप करावाया था, जिसमें उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लिमेंट एटली को लिखा था कि उनका वॉर क्रिमिनल रूस के क़ब्ज़े में है। हालांकि, श्यामलाल ने खोसलाकमीशन के सामने यह बयान दिया था, लेकिन उनके पास अपने बयान के समर्थन में कोई सुबूत नहीं था।“

सुभाषचंद्र बोस की मौत के रहस्य पर चार क़िताबें “बैक फ्रॉम डेड इनसाइड द सुभाष बोस मिस्ट्री” (2005), “सीआईए'ज आई ऑन साउथ एशिया” (2008), “इंडिया'ज बिगेस्ट कवरअप” (2012) और “नो सेक्रेट” (2013) लिखने वाले और एनजीओं ‘मिशन नेताजी’ के संस्थापक पत्रकार-लेखक अनुज धर ने तीन साल पहले ही कह दिया था कि कांग्रेस और कांग्रेस का एक बंगाली नेता दोनों नहीं चाहते थे कि नेताजी के बारे में रहस्यों से परदा हटे। अनुज ने कड़ी मेहनत से लिखी क़िताबों में ताइवान सरकार के हवाले से दावा किया है कि 15 अगस्त से पांच सितंबर 1945 के दौरान कोई विमान हादसा नहीं हुआ था।

अनुज का दावा सीआईए की रिपोर्ट से मेल खाता है। दरअसल, नेताजी की कथित मौत के 20 दिन बाद तीन सितंबर 1945 को अमेरिकी सेना ने जापानी सेना को हराकर ताइवान पर क़ब्ज़ा कर लिया था। इसके बाद अमेरिकी की ख़ुफिया एजेंसी सीआईए ने अपनी रिपोर्ट में साफ़-साफ़ कहा था कि ताइवान में पिछले छह महीने से कोई विमान हादसा नहीं हुआ था। यहां इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि अपनी कथित मौत से दो दिन पहले 16 अगस्त 1945 को नेताजी वियतनाम के साइगॉन शहर से भागकर मंचूरिया गए थो जो उस समय रूस के क़ब्ज़े में था।

सुभाषबाबूजी के निजी गनर रहे जगराम भी दावा करते हैं कि नेताजी की विमान दुर्घटना में मौत नहीं हुई थी, उनकी हत्या कराई गई होगी। उनका कहना था कि अगर विमान हादसे में नेताजी की मौत होती तो कर्नल हबीबुर्रहमान ज़िंदा कैसे बच जाते? क्योंकि वह दिन रात साये की तरह नेताजी के साथ रहते थे। यही बात ख़ुद कर्नल हबीबुर्रहमान ने कही है।

नेताजी की रहस्यमय मौत की जांच के लिए अब तक तीन जांच कमेटी/कमिशन की नियुक्ति की जा चुकी है. सबसे पहली शाहनवाज़ कमेटी 1956 में नेहरू ने गठित की. दूसरा जीडी खोसला कमीशन 1970 में इंदिरा गांधी ने बनाया और तीसरा एनएम मुखर्जी कमीशन का गठन 1999 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने किया। खोसला कमीशन ने कहा था कि नेताजी की मौत विमान हादसे में हुई। लेकिन अनुज धर का मानते हैं कि खोसला कमीशन के गवाह कांग्रेसी और इंटेलिजेंस ब्यूरो के ही लोग थे। लिहाज़ा उस पर भरोसा नही किया जा सकता।

बहरहाल, मुखर्जी कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में नेताजी की विमान हादसे में मौत होने की संभावनाओं से इनकार कर दिया था। रिपोर्ट 17 मई 2006 को लोकसभा में पेश की गई थी, लेकिन कांग्रेस नीत सरकार ने रिपोर्ट अस्वीकार कर दिया था। हालांकि इस साल मई में नेताजी की सुश्री प्रपौत्री राज्यश्री चौधरी ने कहा था कि अगर मुखर्जी कमीशन की रिपोर्ट बिना संपादित किए संसद में रख दी जाए तो सच सामने आ जाएगा। तथ्यों पर आधार पर सुश्री चौधरी ने दावा किया था कि नेहरू ने कुर्सी के लिए स्टालिन के जरिए अमानवीय यातनाएं देकर साइबेरिया में नेताजी को मरवाया।

नेताजी कटक शहर के मशहूर वक़ील जानकीनाथ बोस और प्रभावती की 14 संतानों (6 बेटियां और 8 बेटे) में नौवीं संतान थे। उनकी पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल, प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई। इंडियन सिविल सर्विस की तैयारी के लिए वे केंब्रिज विश्वविद्यालय भेजे गए। जहां परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। उनका मानना था कि अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर आज़ादी हासिल की जा सकती है। इसीलिए ब्रिटिश के चंगुल से निकलकर अफगानिस्तान और रूस होते हुए जर्मनी जा पहुंचे।

सुभाषबाबू ने दुनिया भर का भ्रमण किया। हिटलर-मुसोलिनी के दौर में वह यूरोप में रहे और दोनों से मिले भी। उन्होंने 1937 में अपनी सेक्रेटरी ऑस्ट्रियन नागरिक एमिली शेंकल से शादी कर ली थी। नेताजी ने 1943 में जर्मनी छोड़कर जापान चले गए और वहां से सिंगापुर। वहीं 21 अक्टूबर को आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया था। रासबिहारी बोस आज़ाद हिंद फ़ौज के नेता थे। फ़ौज का पुनर्गठन किया गया और महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजिमेंट का गठन किया, जिसकी मुखिया कैप्टन लक्ष्मी सहगल बनी। नेताजी आजाद हिंद फ़ौज के साथ चार जुलाई 1944 को बर्मा (म्यानमार) पहुंचे। यहीं पर उन्होंने अपना नारा, "तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा" दिया।

देश को आज़ादी का सपना दिखाने वाले सुभाषबाबू के साथ आज़ादी मिलने का बाद उसी देश ने सौतेला व्यवहार किया। लिहाज़ा, वक़्त का तकाजा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर निजी दिलचस्पी लेकर सात दशक से जारी रहस्य से परदा हटाएं,ताकि पूरा मुल्क जान सके कि सुभाषबाबू के साथ आख़िर हुआ क्या था?

सोमवार, 28 सितंबर 2015

केजरीवाल की महत्वकांक्षा की भेंट चढ़ गईं “आप” की संभावनाएं

हरिगोविंद विश्वकर्मा
बिहार विधानसभा चुनाव में जहां हर प्रमुख राजनीतिक दल अपनी-अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, वहीं अपने आपको राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली आम आदमी पार्टी की मैदान में उतरने की हिम्मत ही नहीं पड़ रही है। “आप” सुप्रीमो (अरविंद केजरीवाल के लिए परफेक्ट नाम) अरविंद केजरीवाल देश के क्षेत्रीय दलों की तर्ज पर अपने को दो साल से सेक्यूलर कहने वाले नीतीश कुमार का समर्थन कर रहे हैं।

जो नेता जनता के हित में काम करने का बड़े-बड़े दावे करता रहा हो, उसका जनता का सामना करने में हिचकिचाना यही दर्शाता है कि दल या नेता आश्वस्त नहीं हैं कि उसे जनता का सहयोग मिलेगा ही। यानी उसे यह एहसास हो गया कि पिछले नौ-दस महीने में ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिसे बिना विज्ञापन के जनता जान सके। जिस काम को बताने के लिए इश्तेहार देना पड़े, आमतौर पर उसे काम माना ही नहीं जाता है।

विधानसभा चुनाव में “आप” दूसरे सेक्यूलर दलों की तरह नीतीश कुमार का समर्थन कर रही है। अरविंद भूल गए कि सेक्यूलर पॉलिटिक्स के नाम पर बीजेपी और नरेंद्र मोदी को गरियाने का फॉर्मूला देश 2014 के आम चुनाव में रिजेक्ट कर चुका है। भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ देश भर में उपजे आक्रोश के कारण जन्मी इस पार्टी ने चारा घोटाले में सज़ायाफ़्ता लालूप्रसाद यादव और भ्रष्टाचार के कारण रिजेक्टेड कांग्रेस से हाथ मिलाने वाले नीतीश कुमार को समर्थन देने की घोषणा करके पार्टी का बहुत बड़ा नुक़सान कर दिया है जो आने वाले दिनों में निश्चित तौर पर दिखेगा।

अगर 2014 के आम चुनाव की बात करें तो “आप” ने देश में 432 उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन चार ही लोकसभा में पहुंचे। पंजाब और दिल्ली की 13 सीट में से 12 पर “आप” के प्रत्याशी पहले या दूसरे नंबर पर रहे। वैसे कुल 14 प्रत्याशी दूसरे नंबर पर रहे। 47 स्थानों पर “आप” के लोग तीसरे नंबर पर रहे। पार्टी पूरे देश में दो फ़ीसदी वोट बटोरने में सफल रही। महज डेढ़ साल पुरानी पार्टी के लिए यह बुरा प्रदर्शन कतई नहीं कहा जा सकता था, क्योंकि बीजेपी को अपने पहले चुनाव में केवल दो सीटें मिली थीं। लेकिन केजरीवाल मीडिया के झांसे में आ गए और दिल्ली में सभी सात सीटों पर “आप” की हार से मान बैठे कि उनकी पार्टी वाक़ई देश में हार गई।

कल्पना कीजिए, जनवरी 2014 का वक़्त जब एक से एक धुरंधर लोग आम आदमी पार्टी की तारीफ़ और समर्थन करने लगे थे। मेधा पाटकर जैसी अराजनीतिक शख्सियत भी “आप” के टिकट पर चुनाव मैदान में कूद गई थीं। उस समय ऐसा लगा भी था कि भारतीय राजनीति में एक अलग पार्टी का प्रादुर्भाव हुआ है, जिसकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है। लेकिन इस साल गर्मियों में अरविंद के गाली देते स्टिंग ने सब कुछ ध्वस्त कर दिया। आदर्शवाद और संस्कार की डींग हांकने वाले आदमी के मुंह से अपने से ज़्यादा उम्र वाले वरिष्ठ साथियों के लिए गाली सुनकर हर किसी सबका सिर शर्म से झुक गया। अरविंद कभी योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार जैसे सौम्य लोगों को गाली देंगे, यह किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

दरअसल, सिद्धांत यह कहता है कि गाली-गलौज़ करने वाला कोई आदमी जब शरीफ़ आदमी की भाषा बोलने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि वह अभिनय कर रहा है, क्योंकि कोई शरीफ़ आदमी कितने ही ग़ुस्से में क्यों न हो, कम से कम वह किसी से गाली-गलौज़ नहीं कर सकता या किसी से मारपीट नहीं कर सकता। जो गाली-गलौज़ करता है, वह सब कुछ हो सकता है, शरीफ़ आदमी नहीं हो सकता. हां, वह शरीफ़ आदमी होने की उम्दा ऐक्टिंग ज़रूर कर सकता है। अरविंद भी लगता है अभिनय ही कर रहे थे, जो वास्तव में स्वभावतः गाली-गलौज़ करने वाले व्यक्ति हैं।

अपने जन्म के साल भर के भीतर ही दिल्ली में शानदार जीत हासिल करके सरकार बनानी वाली “आप” ने देश को कांग्रेस-बीजेपी से इतर वैकल्पिक राजनीति देने की जो प्रबल संभावनाएं पैदा की थी, वे सभी छह महीने के भीतर टांय-टांय फिस्स हो गईं। कांग्रेस के भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ देश भर में उपजे आक्रोश के कारण जन्मी इस पार्टी के बारे में अगर कहें कि राष्ट्रीय पार्टी बनने की इस दल की तमाम उम्मीदें पार्टी सुप्रीमो केजरीवाल की बदतमीज़ी, महत्वकांक्षा, उच्चकांक्षा और अपरिपक्वता की भेंट चढ़ गईं, तो कोई ग़लत नहीं होगा।

दरअसल, देश को अलग तरह की राजनीति परोसने का दावा करने वाले अरविंद ने पावर इन्जॉय करने के लिए ऐसे क़दम उठाए और ऐसे लोगों को प्रमोट किया जिसके चलते साल भर पहले अपने को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाला यह दल दिल्ली की क्षेत्रीय दल बनकर रह गया है। अगर दिल्ली के अगले एसेंबली इलेक्शन तक यह पार्टी समाजवादी पार्टी (उप्र), तृणमूल कांग्रेस (बंगाल), अन्नाद्रमुक (तमिलनाडु), तेलुगु देशम (सीमांध्र), टीआरएस (तेलंगाना), नैशनल कॉन्फ्रेंस (जम्मू-कश्मीर) और राष्ट्रीय जनता दल (बिहार) की तरह स्थाई रूप से दिल्ली का क्षेत्रीय दल बन जाए तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

पहले लगा था कि केजरीवाल देश के युवाओं की उम्मीद हैं, लेकिन उनकी हरकतों ने तमाम उम्मीदों पर पानी फेर दिया। अब भविष्य में वह नीतीश कुमार को समर्थन देने के फ़ैसले को कितना भी जस्टिफ़ाई करें, शायद ही किसी के गले उतरे। नीतीश अगर जीते तो उसी सरकार की अगुवाई करेंगे जिसमें आरजेडी और कांग्रेस रहेंगे। यानी नीतीश का समर्थन करके अरविंद ने अप्रत्यक्ष रूप से लालू प्रसाद और कांग्रेस का समर्थन किया है।

दिल्ली में अभूतपूर्व सफलता ने “आप” के नेताओं शीर्ष नेताओं को कांग्रेस-बीजेपी जैसी पार्टियों के नेताओं की तरह अहंकारी बना दिया। मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय अरविंद ने अपने  नेताओं से कहा था, “कुछ भी हो, किसी भी क़ीमत पर अपने ऊपर अंहकार को हावी मत होने देना, क्योंकि अहंकार ने बीजेपी और कांग्रेस का बेड़ा गर्क किया। लेकिन सबसे ज़्यादा अहंकार उनके अंदर ही भर गया। गाली वाला स्टिंग इसका सबसे बड़ा सबूत है।

कहने का मतलब “आप” भी अब वह सबकुछ करने लगी है, जो बीजेपी और कांग्रेस जैसी पार्टियां आज़ादी के बाद से करती आ रही हैं। पहले लगता था कि मीडिया “आप” और अरविंद को लेकर पूर्वाग्रहित है लेकिन लोग मानने लगे हैं कि मीडिया ग़लत नहीं है। धीरे-धीरे साफ़ लगने लगा है कि अरविंद उसी तरह पदलोलुप और उच्चाकांक्षी हैं जिस तरह दूसरे दलों का हाईकमान।

पत्नी के साथ मारपीट जैसे शर्मनाक हरकत के आरोपी सोमनाथ भारतीय के बारे में जागने में केजरीवाल ने बड़ी देर कर दी। ठीक उसी तरह जैसे फ़र्ज़ी डिग्रीधारी जीतेंद्र सिंह तोमर के मामले में। अरविंद के इन दोनों क़रीबी नेताओं ने आम आदमी के मन में आम आदमी पार्टी की बची-खुची क्षवि को पूरी तरह नष्ट कर दी।

सोमवार, 14 सितंबर 2015

क्या देश में धर्मनिरपेक्षता की सियासत ही ख़त्म कर देंगे ओवैसी?

हरिगोविंद विश्‍वकर्मा
लोकसभा सदस्य असदुद्दीन ओवैसी और उनके फ़ायरब्रांड भाई विधायक अकबरूद्दीन की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन को अल्पसंख्यक समाज से मिल रहे बड़े जनसमर्थन से भारतीय जनता पार्टी का तो नहीं, सेक्यूलरिज़्म यानी की धर्मनिरपेक्षता का झंडा लेकर चलने वाले समाजवादी पार्टी और जनता दल यूनाइटेड जैसे दलों के नेताओं का बल्डप्रेशर ज़रूर बढ़ रहा है।

88 साल पुरानी इस पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव में मैदान में उतरने का फ़ैसला किया है। मुबंई समेत समूचे महाराष्ट्र में मुलायम सिंह यादव की पार्टी का सफ़ाया करने वाली एमआईएम के बिहार (उत्तर भारत) का रुख करने पर राजनीतिक गलियारे में चर्चा है कि क्या असद-अकबर की जोड़ी देश में सेक्यूलरिज़्म की सियासत ख़त्म कर देंगी? कहा जा रहा है कि एमआईएम मुलायम, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी के लिए सबसे ज़्यादा ख़तरा बन रही है।

ओवैसी ने कहा है कि पार्टी बिहार के सीमांचल क्षेत्र के मुस्लिम बाहुल्य अररिया, पूर्णिया, किशनगंज और कटिहार में उम्मीदवार उतारेगी। हालांकि सीटों की संख्या का अभी खुलासा नहीं किया है। अख़्तर इमाम को बिहार में पार्टी का अध्यक्ष भी नियुक्त करते हुए ओवैसी ने राज्य के पिछड़ेपन के लिए कांग्रेस, नीतीश कुमार और अन्य दूसरी पार्टियों को ज़िम्मेदार ठहराया। नीतीश के ख़िलाफ़ उनके बयान से साफ़ है, वे चुनाव में उनका जमकर विरोध करेंगे।

दरअसल, तेलंगाना, कर्नाटक, महाराष्ट्र और बिहार के बाद असद के एजेंडे में उत्तर प्रदेश और बंगाल जैसे राज्य हैं, जहां साल-दो साल में विधानसभा चुनाव होंगे। इन राज्यों में मुस्लिम मतदाता ही सेक्यूलर दलों के भाग्य का फ़ैसला करते रहे हैं। वैसे मतदाता जिस तरह से अकबर के भड़काने वाले और नफ़रत भरे भाषणों के दीवाने हो रहे हैं, उससे सेक्यूलर पार्टियों की चिंता बढ़ना लाज़िमी है। राजनीतिक टीकाकारों का मानना है कि आने वाला समय धर्मनिरपेक्षता के नज़रिए से कोई सुखद संकेत नहीं दे रहा है। कह सकते हैं, अच्छे दिन नहीं, बहुत बुरे दिनों की दस्तक हो रही है। अपने को सेक्यूलर कहने वाले नेता अप्रासंगिक हो रहे हैं। इसका सीधा फ़ायदा बीजेपी और एमआईएम को मिल रहा है।

राजनीति पर नज़र रखने वालों का मानना है कि एमआईएम को हैदराबाद की क्षेत्रीय पार्टी कहकर ख़ारिज़ करना बड़ी भूल होगी। इसने कर्नाटक और महाराष्ट्र में बेस बना लिया है। पार्टी अब उत्तर भारत में पांव फैला रही है। बिहार में एसेंबली चुनाव लड़ना उसी रणनीति का हिस्सा है। संभावना भी जताई जा रही है कि बिहार, उत्तर प्रदेश और बंगाल जैसे राज्यों में अल्पसंख्यकों का एक बहुत बड़ा वोटबैंक एमआईएम से जुड़ सकता है। मुलायम यादवों और मुस्लिम वोटों के दम पर ही अपने परिवार को देश का सबसे ताक़तवर परिवार बनाते हुए शासन कर रहे हैं।

अगर यूपी में उनसे मुस्लिम वोटबैंक खिसका तो निश्चित तौर पर बाप-बेटे का राजनीतिक कॅरियर ख़त्म हो सकता है, क्योंकि असदुद्दीन ऐसा मुंबई में कर चुके हैं। कुछ महीने पहले मुंबई के बांद्रा पूर्व सीट पर उपचुनाव एवं औरंगाबाद कॉरपोरेशन इलेक्शन में एमआईएम ने ख़ूब वोट बटोरे। बांद्रा में पार्टी ज़रूर तीसरे नंबर पर रही, परंतु औरंगाबाद कॉरपोरेशन में 25 सीट जीत ली। इससे पहले 2012 में मराठवाड़ा की नांदेड़ नगरपालिका में इसके 12 नगरसेवक चुने गए थे। विदेश में शिक्षा ग्रहण करने वाले ओवैसी बंधु महाराष्ट्र एसेंबली इलेक्शन में भी सक्रिय रहे। अकबर ने तो तूफानी प्रचार किया था।

मुंबई, ठाणे के मुंब्रा, औरंगाबाद, नांदेड और परभणी में उनकी चुनावी सभाओं में बहुत भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी। ईसाई महिला से निकाह करने के बावजूद 44 साल के अकबर हिंदुओं के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक बयान देने के लिए जाने जाते हैं। कुछ साल पहले हैदराबाद में हिंदुओं के ख़िलाफ़ दिया गया उनका ख़तरनाक बयान यू-ट्यूब पर उपलब्ध है। जो भी सुनता है, सन्न रह जाता है। यक़ीन नहीं होता कि दूसरे मजहब के ख़िलाफ़ किसी के मन में इतनी नफ़रत भरी है। ख़ासकर धर्मनिरपेक्ष संविधान पर चलने वाले भारत जैसे देश में।

इतिहास गवाह है, किसी क़ौम विशेष के ख़िलाफ़ इतना ज़हर कभी किसी नेता ने नहीं उगला था। यहां तक कि मुस्लिम लीग के मोहम्मद अली जिन्ना या अली बंधु ने भी कभी खुले मंच से कुछ नहीं कहा था। इतिहासकारों के मुताबिक़ सन् 1946 में विभाजन से ठीक पहले मुस्लिम लीग ने ऐक्शन प्लान ज़रूर चलाया था, लेकिन गुप्त रूप से। बहरहाल, अकबर की उस बयान के कारण ही गिरफ़्तारी भी हुई थी और काफ़ी जद्दोजहद के बाद ज़मानत मिली थी। जेल से बाहर आते ही वह मुसलमानों, ख़ासकर युवाओं के सुपरहीरो बन गए।

बुद्धिजीवी तबक़े का मानना है कि नफ़रत भरे बयानों के लिए मुस्लिम समाज द्वारा अकबर की भर्त्सना होनी चाहिए थी, उनका बहिष्कार होना चाहिए था। जैसे गैर-मराठियों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने वाले राज ठाकरे को मराठी समाज ने ही चुनाव में रिजेक्ट कर दिया। लेकिन अकबर को भारी समर्थन मिल रहा है। अब तो कई बुद्धिजीवी और सेक्यूलर पत्रकार भी एमआईएम के टिकट की आस लगा बैठे हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि वोटर्स अकबर के नफ़रत भरे बयान का वोटों के ज़रिए स्वागत कर रहे हैं।

महाराष्ट्र में वोटरों के समर्थन का असर था कि एमआईएम को राज्य की एसेंबली में एंट्री मिल गई। पार्टी ने मुंबई की 14 सीटों समेत राज्य में कुल 24 उम्मीदवार खड़े किए थे। जिनमें एनडीटीवी के पुणे पूर्व संवाददाता इम्तियाज जलील (औरंगाबाद पश्चिम) और वारिस यूसुफ पठान (भायखला) जीतने में सफल रहे। तीन सीटों पर एमआईएम दूसरे नंबर पर रही और नौ साटों पर तीसरे स्थान पर। बाक़ी दस सीटों पर भी पार्टी को भरपूर वोट मिले। सबसे अहम, किसी भी एमआईएम उम्मीदवार की ज़मानत जब्त नहीं हुई। यह सेक्यूलर दलों को हैरान करने वाला डेटा है। महाराष्ट्र में कांग्रेस की नैया डुबोने में इस डेटा का बहुत बड़ा योगदान रहा।

बहरहाल, अकबर की सियासत को जिस तरह पसंद किया जा रहा है, वह ख़तरनाक संकेत हैं। एमआईएम का उदय दर्शाता है कि कांग्रेस से मुंह मोड़ चुके वोटर आने वाले दिनों में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, जनतादल यूनाइटेड या तृणमूल कांग्रेस को वोट नहीं देंगे। वे एमआईएम को वोट दें सकते हैं। तब इस देश का धर्म के आधार पर पूरी तरह ध्रुवीकरण हो सकता है।

मतलब, सेक्यूलरिज़्म की राजनीति करने वाले तेज़ी से हाशिए पर जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, सेक्यूलर लोग संघ परिवार, बीजेपी या नरेंद्र मोदी को जितनी गाली देते हैं, संघ और मोदी उतना ही फ़ायदा मिलता है। गुजरात दंगों के बाद सेक्यूलर नेता 12 साल तक हर मंच से मोदी को ‘हत्यारा मोदी’ कहते रहे। इसकी परिणति 2014 के आम चुनाव में मोदी और बीजेपी के लिए 282 सीट के बहुमत के रूप में हुई।

अगर एमआईएम के इतिहास की बात करें तो इसकी स्थापना नवाब महमूद नवाज़ ख़ान क़िलेदार ने 1927 में की थी। एमआईएम के नेता भारत से अलग होने वाले मोहम्मद अली जिन्ना और अली बंधुओं के खेमे में थे। विभाजन के लिए दबाव बनाने के लिए इन लोगों ने 1928 में मुस्लिम लीग से गठबंधन भी किया था।

1944 में नवाब की मौत के बाद निज़ाम के पैरोकार एडवोकेट क़ासिम रिज़वी एमआईएम के अध्यक्ष बने थे। वह भी हैदराबाद स्टेट के भारत में विलय के कट्टर विरोधी थे। उन्होंने भारत के ख़िलाफ़ संघर्ष भी छेड़ दिया था। उनके राष्ट्रविरोधी कार्य को रोकने के लिए सेना को हैदराबाद में ऑपरेशन पोलो शुरू करना पड़ा था। सरदार बल्लभभाई पटेल ने एमआईएम पर प्रतिबंध लगाने के बाद रिज़वी को नज़रबंद करवा दिया। नौ साल बाद उन्हें इस शर्त पर रिहा किया गया था कि चुपचाप सीधे पाकिस्तान चले जाएंगे। रिज़वी पार्टी की ज़िम्मेदारी अब्दुल वाहिद ओवैसी को सौंपकर पाकिस्तान चले भी गए थे। अब्दुल ओवैसी के बाद एमआईएम की कमान उनके बेटे सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी ने संभाली और वह लोकसभा के लिए भी चुने गए। असद और अकबर सुल्तान के ही पुत्र हैं।

यह संयोग ही है कि 1928 में एमआईएम ने विभाजन के मुद्दे पर मुस्लिम लीग का साथ दिया था। 20वीं सदी के आरंभ में माहौल ऐसा ही था। दरअसल, अंग्रेज़ों ने बंग-भंग के ज़रिए अलगाववाद का पौधा 1906 में रोपा था और उसी समय 1906 में जनाब सैयद अहमद ख़ान ने मुस्लिम लीग की स्थापना की थी। महज 41 साल की उम्र में मुस्लिम लीग ने देश का धर्म के आधार पर विभाजन करवा दिया। लिहाज़ा, देश के व्यापक हित में राष्ट्रवादियों को एमआईएम की राजनीति से सावधान रहने की ज़रूरत है।

शनिवार, 12 सितंबर 2015

हिंदी दिवस पर आदर्श भाषण

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आदरणीय, अध्यक्ष महोदय, गुरुवृंद, मंचासीन तमाम महानुभाव, अभिभावक और बच्चों, सबको मेरा करबद्ध नमन, प्रणाम और शुभाशीष...

हिंदी दिवस पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनाएं...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हिंदी दुनिया में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। य़ह अपने आप में पूर्ण रूप से एक समर्थ और सक्षम भाषा है। सबसे बड़ी बात यह भाषा जैसे लिखी जाती है, वैसे बोली भी जाती है। दूसरी भाषाओं में कई अक्षर साइलेंट होते हैं और उनके उच्चारण भी लोग अलग अलग करते हैं, लेकिन हिंदी के साथ ऐसा नहीं होता। इसीलिए हिंदी को बहुत सरल भाषा कहा जाता है। हिंदी कोई भी बहुत आसानी से सीख सकता है। हिंदी अति उदार, समझ में आने वाली सहिष्णु भाषा होने के साथ भारत की राष्ट्रीय चेतना की संवाहिका भी है।

पूरब से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण, आप देश के किसी कोने में चले जाइए, दो अलग-अलग भाषा के लोग जब एक दूसरे से बात करेंगे तो केवल हिंदी में ही। महाराष्ट्र का उदाहरण ले सकते हैं, जब यहां कोई गुजरातीभाषी व्यक्ति किसी मराठीभाषी व्यक्ति से मिलता है, तो दोनों हिंदी में बातचीत करते हैं। इसी तरह जब कोई दक्षिण भारतीय को किसी मराठीभाषी या गुजरातीभाषी या बंगालीभाषी से कुछ कहना चाहता है तो वह भी केवल हिंदी का ही सहारा लेता है।

आप चेन्नई या तमिलनाडु के किसी दूसरे इलाक़े में चले जाइए। राजनीतिक रूप से हिंदी का विरोध करने के बावजूद वहां लोग धड़ल्ले से हिंदी बोलते हैं। जो तमिलनाडु की जनता को हिंदी विरोधी जनता मानते हैं, उन्हें भी वहां तमिल लोगों को हिंदी बोलते देखकर हैरानी होगी कि हिंदी का सबसे ज़्यादा विरोध करने वाले तमिलनाडु में भी दूसरी भाषा के लोग आमतौर पर हिंदी में ही बात करते हैं। यही हाल केरल में है। सीमांध्र-तेलंगाना और कर्नाटक में तो हिंदी रच बस गई है।

पिछले साल भोपाल में 10वें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी माना कि भारत में हिंदी सर्वमान्य भाषा है। बचपन का अनुभव शेयर करते हुए प्रधानमंत्री कहा था कि गुजरात के वड़नगर रेलवे स्टेशन, जहां वह पैदा हुए थे, पर चाय बेचते समय जब भी उनसे कोई गैर-गुजरातीभाषी रेल यात्री मिलता था, तो वह हिंदी ही बोलता था, उससे टूटी-फूटी हिंदी बोलते-बोलते वह भी हिंदी सीख गए। यानी जो बात हमारे देश के प्रधानमंत्री कह रहे हैं, उसमें कोई बात तो ज़रूर होगी।

हिंदी भविष्य में विश्व-वाणी बनने के पथ पर अग्रसर है। विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा कई अवसरों पर अमेरिकी नागरिको को हिंदी सीखने की सलाह दे चुके हैं। वह कहते हैं भविष्य में हिंदी सीखे बिना काम नहीं चलेगा। यह सलाह अकारण ही नहीं थी। भारत उभरती हुई विश्व-शक्ति के रूप में पूरे विश्व में जाना जा रहा है। यहां संस्कृत और भाषा हिंदी को ध्वनि-विज्ञान और दूर संचारी तरंगों के माध्यम से अंतरिक्ष में अन्य सभ्यताओं को संदेश भेजे जाने के नज़रिए से सर्वाधिक सही पाया गया है।

हिंदी भाषा का इतिहास की बात करें तो यह भाषा लगभग एक हज़ार साल पुरानी मानी जाती है। सामान्यतः प्राकृत की अंतिम अपभ्रंश अवस्था से ही हिंदी साहित्य का आविर्भाव स्वीकार किया जाता है। उस समय अपभ्रंश के कई रूप थे और उनमें सातवीं-आठवीं शताब्दी से ही 'पद्म' रचना प्रारंभ हो गयी थी। हिंदी भाषा व साहित्‍य के जानकार अपभ्रंश की अंतिम अवस्‍था 'अवहट्ठ' से हिंदी का उद्भव स्‍वीकार करते हैं। चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' ने इसी अवहट्ठ को 'पुरानी हिंदी' नाम दिया। हिंदी चीनी के बाद विश्व में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। हिंदी और इसकी बोलियां उत्तर एवं मध्य भारत के विविध राज्यों में बोली जाती हैं। विदेशों में भी लोग हिंदी बोलते, पढ़ते और लिखते हैं। फ़िजी, मॉरीशस, गयाना, सूरीनाम और नेपाल की जनता भी हिंदी बोलती है। एक अनुमान के अनुसार भारत में 42.2 करोड़ लोगों की आम भाषा हिंदी है। वैसे इस देश में क़रीब एक अरब लोग हिंदी बोलने और समझते हैं।

इसी तरह हिंदी साहित्य का इतिहास अत्यंत प्राचीन है। भाषा वैज्ञानिक डॉ हरदेव बाहरी के शब्दों में, 'हिंदी साहित्य का इतिहास वस्तुतः वैदिक काल से शुरू होता है। साहित्य की दृष्टि से आरंभ में पद्यबद्ध रचनाएं मिलती हैं। वे सभी दोहा के रूप में ही हैं और उनके विषय, धर्म, नीति, उपदेश होते हैं। राजाश्रित कवि और चारण नीति, शृंगार, शौर्य, पराक्रम आदि के वर्णन से अपनी साहित्य-रुचि का परिचय दिया करते थे। यह रचना-परंपरा आगे चलकर शैरसेनी अपभ्रंश या प्राकृताभास हिंदी में कई वर्षों तक चलती रही। पुरानी अपभ्रंश भाषा और बोलचाल की देशी भाषा का प्रयोग निरंतर बढ़ता गया। हिंदी को कवि विद्यापति ने देसी भाषा कहा है, किंतु यह निर्णय करना सरल नहीं है कि हिंदी शब्द का प्रयोग इस भाषा के लिए कब शुरू हुआ। इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि शुरू में हिंदी शब्द का प्रयोग मुस्लिम आक्रांताओं ने किया था। इस शब्द से उनका तात्पर्य 'भारतीय भाषा' का था।

दरअसल, हिंदी को हर क्षेत्र में प्रचारित-प्रसारित करने के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर ही सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है।  निर्णय लिया गया जो भारतीय संविधान के 17 वें अध्याय की धारा 343/एक में वर्णित है: भारतीय संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। भारतीय संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा। 14 सितंबर 1949 को ही संविधान सभा ने लंबी बहस के बाद एक मत से निर्णय लिया था कि हिंदी ही भारत की राजभाषा होगी। बहस में देश के पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी भाग लिया था। संविधान सभा में 13 सितंबर, 1949 को पं. नेहरू ने तीन प्रमुख बातें कही थीं-
·         पहली बात- किसी विदेशी भाषा से कोई राष्ट्र महान नहीं हो सकता।
·         दूसरी बात- कोई भी विदेशी भाषा आम लोगों की भाषा नहीं हो सकती।
और
·         तीसरी बात- भारत के हित में, भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के हित में, ऐसा राष्ट्र बनाने के हित में जो अपनी आत्मा को पहचाने, जिसे आत्मविश्वास हो, जो संसार के साथ सहयोग कर सके, हमें हिंदी को अपनाना ही होगा।
संविधान सभा की भाषा संबंधी बहस लगभग 278 पृष्ठों में छपी है। इस संबंध में डॉ. कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी और गोपाल स्वामी आयंगार की अहम भूमिका रही। बहस में सहमति बनी कि भारत की भाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। हालांकि देवनागरी में लिखे जाने वाले अंकों तथा अंग्रेज़ी को 15 वर्ष या उससे अधिक अवधि तक प्रयोग करने के मुद्दे पर तीखी बहस हुई। अंतत: आयंगर-मुंशी का फ़ार्मूला भारी बहुमत से स्वीकार कर लिया गया। वास्तव में अंकों को छोड़कर संघ की राजभाषा के सवाल पर अधिकतर सदस्य सहमत हो गए। अंकों के बारे में भी यह स्पष्ट था कि अंतर्राष्ट्रीय अंक भारतीय अंकों का ही एक नया संस्करण है। कुछ सदस्यों ने रोमन लिपि के पक्ष में प्रस्ताव रखा, लेकिन देवनागरी को ही अधिकतर सदस्यों ने स्वीकार किया।

भारत में भले ही अंग्रेज़ी बोलना सम्मान की बात मानी जाती हो, पर विश्व के बहुसंख्यक देशों में अंग्रेज़ी का इतना महत्त्व नहीं है। हिंदी बोलने में हिचक का एकमात्र कारण पूर्व प्राथमिक शिक्षा के समय अंग्रेज़ी माध्यम का चयन करना है। आज भी भारत में अधिकतर लोग बच्चों का दाख़िला ऐसे अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों में करवाना चाहते हैं। जबकि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार शिशु सर्वाधिक आसानी से अपनी मातृभाषा को ही ग्रहण करता है और मातृभाषा में किसी भी बात को भली-भांति समझ सकता है। अंग्रेज़ी भारतीयों की मातृभाषा नहीं है। अत: भारत में बच्चों की शिक्षा का सर्वाधिक उपयुक्त माध्यम हिंदी ही है।

देश की मौजूदा शिक्षा पद्धति में बालकों को पूर्व प्राथमिक स्कूल में ही अंग्रेज़ी के गीत रटाए जाते हैं। घर में बालक बिना अर्थ जाने ही अतिथियों को अंग्रेज़ी में कविता सुना दे तो माता-पिता का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है। कई अंग्रेज़ी भाषी विद्यालयों में तो किसी विद्यार्थी के हिंदी बोलने पर ही मनाही होती है। हिंदी के लिए कई जगह अपमानजनक वाक्य लिखकर तख्ती लगा दी जाती है। अतः बच्चों को अंग्रेज़ी समझने की बजाय रटना पड़ता है, जो अवैज्ञानिक है। ऐसे अधिकांश बच्चे उच्च शिक्षा में माध्यम बदलते हैं और भाषिक कमज़ोरी के कारण ख़ुद को समुचित तरीक़े से अभिव्यक्त नहीं कर पाते हैं और पिछड़ जाते हैं। इस मानसिकता में शिक्षित बच्चा माध्यमिक और उच्च्तर माध्यमिक में मजबूरी में हिंदी पढ़ता है, फिर विषयों का चुनाव कर लेने पर व्यावसायिक शिक्षा का दबाव हिंदी छुड़वा ही देता है।

हिंदी की शब्द सामर्थ्य पर प्रायः अकारण तथा जानकारी के अभाव में प्रश्न चिह्न लगाए जाते हैं। वैज्ञानिक विषयों, प्रक्रियाओं, नियमों और घटनाओं की अभिव्यक्ति हिंदी में कठिन मानी जाती है, किंतु वास्तव में ऐसा नहीं है। हिंदी की शब्द संपदा अपार है। हिंदी में से लगातार शब्द बाहर हो जाते हैं तो कई शब्द प्रविष्ट होते हैं। हिंदी के अनेक रूप आंचलिक या स्थानीय भाषाओं और बोलिओं के रूप में प्रचलित हैं। इस कारण भाषिक नियमों, क्रिया-कारक के रूपों, कहीं-कहीं शब्दों के अर्थों में अंतर स्वाभाविक है, किंतु हिंदी को वैज्ञानिक विषयों की अभिव्यक्ति में सक्षम विश्व भाषा बनाने के लिए इस अंतर को पाटकर क्रमशः मानक रूप लेना होगा। अनेक क्षेत्रों में हिंदी की मानक शब्दावली है, जहां नहीं है, वहां क्रमशः आकार ले रही है।

जन सामान्य भाषा के जिस देशज रूप का प्रयोग करता है, वह कही गई बात का आशय संप्रेषित करता है, किंतु वह पूरी तरह शुद्ध नहीं होता। ज्ञान-विज्ञान में भाषा का उपयोग तभी संभव है, जब शब्द से एक सुनिश्चित अर्थ निकले। इस दिशा में हिंदी का प्रयोग न होने को दो कारण इच्छा शक्ति की कमी और भाषिक एवं शाब्दिक नियमों और उनके अर्थ की स्पष्टता न होना है। हिंदी को समक्ष बनाने में सबसे बड़ी समस्या विश्व की अन्य भाषाओं के साहित्य को आत्मसात कर हिंदी में अभिव्यक्त करने की तथा ज्ञान-विज्ञान की हर शाखा की विषयवस्तु को हिंदी में अभिव्यक्त करने की है। हिंदी के शब्दकोष का पुनर्निर्माण परमावश्यक है। इसमें पारंपरिक शब्दों के साथ विविध बोलियों, भारतीय भाषाओं, विदेशी भाषाओं, विविध विषयों और विज्ञान की शाखाओं के परिभाषिक शब्दों को जोड़ा जाना बहुत ज़रूरी है।

तकनीकी विषयों और गतिविधियों को हिंदी भाषा के माध्यम से संचालित करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उनकी पहुंच असंख्य लोगों तक हो सकेगी। हिंदी में तकनीकी शब्दों के विशिष्ट अर्थ सुनिश्चित करने की ज़रूरत है। तकनीकी विषयों के रचनाकारों को हिंदी का प्रामाणिक शब्द कोष और व्याकरण की पुस्तकें अपने साथ रखकर जब और जैसे समय मिले, पढ़ने की आदत डालनी होगी। हिंदी की शुद्धता से आशय उर्दू, अंग्रेजी यानी किसी भाषा, बोली के शब्दों का बहिष्कार नहीं, अपितु भाषा के संस्कार, प्रवृत्ति, रवानगी, प्रवाह तथा अर्थवत्ता को बनाये रखना है। चूंकि इनके बिना कोई भाषा जीवंत नहीं होती।

हिंदी भाषा की चर्चा बॉलीवुड यानी हिंदी सिनेमा की चर्चा किए बिना अधूरी मानी जाएगी। जी हां, हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी सिनेमा की सबसे ज़्यादा भूमिका रही है। हिंदी फिल्में शुरू से देश दुनिया में हिंदी का अलख जगाती रही हैं। यही वजह है कि जितने लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मों में काम करने वाले अभिनेता-अभिनेत्री हुए, उतने लोगप्रिय दूसरी भाषा के कलाकार नहीं हो पाए। आजकल तमाम चैनलों पर प्रसारित हिंदी सीरियल हिंदी का वैश्वीकरण कर रहे हैं। हिंदी की चर्चा पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के ज़िक्र के बिना पूरी हो ही नहीं सकती क्योंकि दुनिया में हिंदी का परिचय बतौर विदेश मंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने कराया था। जहां भारतीय नेता विदेशों में हिंदी बोलने में संकोच करते हैं, वहीं चार अक्टूबर 1977 को दौरान संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन में वाजपेयी ने हिंदी में भाषण दिया और उन्होंने इसे अपने जीवन का अब तक का सबसे सुखद क्षण बताया था। यहां, यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि सभी भारतीय भाषाओं की हिंदी बड़ी बहन है। बड़ी बहन अपनी सभी छोटी बहनों का ख़याल रखती है।


जैसा कि आप लोगों को पता है और मैं पहले बता चुका/चुकी हूं कि पिछले साल भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में कुल 29 देशों के पांच हज़ार से ज़्यादा हिंदी विद्वानों और प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया लिया। प्रधानमंत्री के अलावा इसमें केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी हिस्सा लिया। उन्होंने भी हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने पर ज़ोर दिया। यानी अगर देश का गृहमंत्री हिंदी की पैरवी कर रहा है तो यह उम्मीद की जानी चाहिए कि हिंदी को अपने देश में आधिकारिक रूप से वही सम्मान मिल जाएगा जो चीनी को चीन में, जापानी को जापान में मिला हुआ है।

इन्हीं शब्दों के साथ मैं अपनी बात ख़त्म करता/करती हूं।

जय हिंद
जय हिंदी

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

दिग्विजय-अमृता की शादी और जनचर्चा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
राज्यसभा टीवी की जर्नलिस्ट अमृता राय ने सीनियर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से अपनी औपचारिक शादी की खबर को अपने फेसबुक वॉल पर शेयर क्या किया, मानो भूचाल-सा आ गया है। वॉट्सअप और दूसरे सोशल नेटवर्किंग साइट पर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। गली-नुक्कड़, बस-ट्रेन में इसी शादी की चर्चा हो रही है। कई लोग तो बक़ायदा लिखकर लोगों से पूछ रहे हैं, क्या दिग्गी राजा का क़दम उचित है? ज़ाहिर है, ज़्यादातर कमेंट या विचार एकदम निगेटिव हैं और नवविवाहित जोड़े के मौलिक अधिकारों को वायलेट करते हैं। कोई दिग्गी राजा को कोस रहा है, तो कोई लानत भेज रहा है। ऐसे कहा जा रहा है, जैसे मानो दिग्विजय सिंह ने शादी करके कोई बहुत बड़ा ग़ुनाह कर दिया है। जन अदालत में उन्हें दोषी करार देकर जल्दी से जल्दी सज़ा सुनाने की मांग भी की जा रही है। कई लोगों के कमेंट या विचार तो इस हद तक भावुकता से भरे हैं, मानो, दिग्विजय सिंह की शादी से उनका बहुत बड़ा व्यक्तिगत नुक़ासन हो गया है। कई लोगों की टिप्पणी अमृता के क़रीबी रिश्तेदार जैसे हैं और जताने की कोशिश कर रहे हैं कि अमृता ने यह क्या कर दिया। ये लोग उनके भी फ़ैसले के लिए भी दिग्विजय को ही ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं।

सबसे पहली बात यह है कि दिग्विजय सिंह और अमृता वयस्क और सिंगल थे। ब्रिटिश राज के प्रिंसली स्टेट होल्कर के इंदौर में 28 फरवरी 1947 को जन्में दिग्विजय सिंह की पत्नी रानी आशा का बीमारी से 2013 में निधन हो गया। उनके पांच बेटियां और एक बेटा है। उधर 44 साल की बिहार की अमृता राय का प्रेम-विवाह नब्बे के दशक में ग़ाज़ीपुर (उत्तर प्रदेश) के राजनीतिक चिंतक आनंद प्रधान से हुआ था। दोनों आपसी मतभेद के चलते अलग हो गए और स्वेच्छा से तलाक़ ले लिया। मतलब दिग्विजय सिंह और अमृता क़ानूनी तौर पर अपनी मर्जी से शादी करने की पात्रता रखते हैं। भारत में शादी के लिए जो बुनियादी एलिजीबिलिटी यानी पात्रता चाहिए, वह इन दोनों में है। इसके अलावा दिग्विजय सिंह के फ़ैसले का विरोध न तो उनके बच्चों ने किया है न ही परिवार ने। आनंद प्रधान ने भी कहा है कि अमृता को अपने ढंग से जीवन जीने का अधिकार है।

कहने का मतलब शादी में कहीं कोई डिस्प्यूट है ही नहीं। दो वयस्क नागरिकों ने बिना किसी पारिवारिक या सामाजिक दबाव के अपनी मर्ज़ी से एक दूसरे से शादी की है। इससे न तो संविधान का उल्लंघन हुआ है, न ही आईपीसी के किसी सेक्शन का और न ही किसी समुदाय विशेष की भावनाएं आहत हुई हैं। इसके बावजूद पिछले हफ़्ते भर इसकी निगेटिव चर्चा हो रही है। चर्चा भी वे लोग कर रहे हैं, जिनका दिग्विजय सिंह या अमृता राय से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है। हां, दिग्गी राजा का कसूर इतना है कि वह 68 साल के हो गए हैं। लकीर के फकीरों द्वारा भारत में इस उम्र को वानप्रस्थ का समय माना जाता है। माना जाता है, प्राचीनकाल में इस उम्र में आदमी केवल पूजा-पाठ करते हुए मौत का इंतज़ार करता था। इन लकीर के फकीरों को लगता है कि दिग्विजय सिंह को भी राम-राम जपते हुए मौत का इंतज़ार करना चाहिए था, लेकिन उन्होंने कर ली शादी। वह भी अपने से पूरे 24 साल छोटी औरत से। नैतिकता, संस्कृति और पुरुष प्रधान परिवार के परोकारों को यही बात हजम नहीं हो पा रही है।

दरअसल, दिग्विजय सिंह और अमृता राय की शादी से आहत लोगों की सोच, प्राचीनकाल के उन तथाकथित परंपरावादियों की तरह है जो पुरुष-प्रधान समाज के प्रबल पैरोकार थे और स्त्री को बस भोग की वस्तु मानते थे। इसी तरह की सोच वालों ने 1829 में अंग्रेजों द्रारा सतीप्रथा पर रोक लगाए जाने पर उस फ़ैसले को प्रिवी काउंसिल में अपील की थी, लेकिन प्रिवी काउंसिल ने जब उनसे पूछा कि किस आधार पर आप लोग किसी स्त्री को ज़िंदा जलाना चाहते हैं, तो उनकी बोलती बंद हो गई। ऐसे लोग ही चाहते हैं, हर आदमी उनके अनुसार चले और उनके अनुसार शादी करे। इस सोच की तुलना अगर तालिबानी आतंकवादियों से करें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। तालिबान भी तो यही करता है, अपने अनुसार लोगों को चलने के लिए मजबूर करता है।

समाज के ठेकेदारों की हरकतों से अमृता कितनी परेशान रहीं, यह उनके फेसबुक वॉल को पढ़कर समझा जा सकता है। उन्होंने लिखा है, “मैं आत्मनिर्भर महिला हूं। पिछले कुछ दिन मेरे लिए बहुत परेशानी भरे रहे हैं। मैं साइबर क्राइम की विक्टिम रही। अब मुझे विधिवत एक आरोपी की तरह पेश किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर अनाप-शनाप पोस्ट किए जा रहे थे।ज़ाहिर है यह किसी सम्मानित महिला के मन की व्यथा है जो तालिबानी सोच के लोगों की मूर्खता से दुखी है। अमृता ने आगे लिखा है, “ लोग मेरी और दिग्विजय सिंह की उम्र को लेकर बात कर रहे थे। मैं समझदार और मैच्योर लड़की हूं, जिसे अपना अच्छा-बुरा मालूम है। मुझे अपने इस फैसले के अच्छे-बुरे परिणाम के बारे में सब पता है। मैंने खुद कड़ी मेहनत करके अपने पेशे में अपना मुकाम बनाया है। मैं दिग्विजय सिंह को प्यार करती हूं और सिर्फ़ इसी वजह से मैंने शादी की है। मैं चाहूंगी कि वे अपनी सारी संपत्ति बेटे और बेटियों के नाम कर दें। मुझे कुछ भी नहीं चाहिए।''

परंपरावादी लोग ज़ाहिर है अमृता के फ़ैसले से आहत हैं कि अपने से 24 साल बड़े व्यक्ति से उन्होंने शादी क्यों की। अब ये लोग अमृता के लिए लड़का खोजेंगे। शादी के लिए उम्र का अंतर कोई मायने नहीं रखता है। समान उम्र के लोगों के बीच शादी की पैरवी करने वाले लोगों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं कि अमृता और आनंद हमउम्र ही थे फिर क्यों नही चल पाई शादी। लिहाज़ा, शादी जैसे सामाजिक बंधन को एज-गैप के नज़रिये से देखना बहुत उचित नहीं। दिग्विजय सिंह को पिछले साल लोकसभा चुनाव से पहले अमृता के साथ अंतरंग पलों के कई फोटोग्राफ वायरल हो गए थे। हालांकि दिग्विजय ने हिम्मत से स्वीकार किया था कि उनका अमृता से रिलेशनशिप है और अमृता को औपचारिक तलाक़ मिलने के बाद वह उनसे शादी कर लेंगे। उसी कमिटमेंट के तहत दिग्विजय सिंह ने पिछले महीने चेन्नई में अमृता के साथ सात फेरे ले लिए। वैसे भी वृद्धावस्था में आदमी अकेलेपन का शिकार होकर कई बीमारियों की चपेट में आ जाता है। इसीलिए लोगों को जीवन साथी की ज़रूरत वृद्धावस्था में सबसे ज़्यादा होती है। लिहाज़ा, अकेलेपन से निजात पाने के लिए अगर दिग्विजय सिंह ने शादी कर ली तो क्या बुरा किया?


वैसे 20 साल से ज़्यादा उम्र के अंतर से शादी करने वाले दिग्विजय सिंह कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं। पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने जब रुतिन पेटिट से 1918 में दूसरी शादी की तब वह 18 साल की थी और जिन्ना 42 साल के। दोनों के बीच 24 साल का अंतर था। इसी तरह ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार ने 1966 में जब सायरा बानो से दूसरा निकाह किया तो युसूफ साहब 44 साल के थे और सायरा 22 साल की। दोनों की उम्र में 22 साल का फ़ासला था। इसी तरह महान अफ्रीकन नेता नेलसन मंडेला ने जब 1998 में तीसरी शादी की तब उनकी पत्नी ग्रेका मचेल 52 साल की थीं और मंडेला 80 साल के। दोनों में 28 साल का अंतर था। कहने का मतलब, एक ख़ूबसूरत रिश्ते की एज-गैप जैसे अप्रासंगिक मुद्दे के आधार पर आलोचना नहीं की जानी चाहिए। मोहम्मद अली जिन्ना, दिलीप कुमार और नेलसन मंडेला की शादियां बहुत कामयाब रहीं, इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि दिग्गी राजा और अमृता की शादी भी लंबे समय तक चलेगी और मिसाल बनेगी।

सोमवार, 7 सितंबर 2015

मुंबई पुलिस में हमेशा रहे हैं दाऊद के जासूस व सिंपैथाइज़र


पिछले दो दशक से ज़्यादा समय से देश के लिए सिरदर्द रहा मोस्टवांटेड क्रिमिनल दाऊद इब्राहिम कासकर एक बार फिर चर्चा में है। अंडरवर्ल्ड डॉन इस बार स्कॉटलैंड यार्ड के समकक्ष मानी जाने वाली मुंबई पुलिस में कथित लिंक यानी अपने जासूसों और सिंपैथाइज़र्स के कारण सुर्खियों में है। अगर दाऊद के पुलिस में लिंक की बात करें तो उसे अपराध की दुनिया में क़दम रखते ही खाकी वर्दी का सहयोग मिलने लगा था। इसीलिए जब कुछ लोग कहते हैं कि दाऊद को डी-सिंडिकेट का सरगना और अडरवर्ल्ड डॉन मुंबई पुलिस ने ही बनाया तो हैरानी बिलकुल नहीं होती।

दरअसल, कांग्रेस शासन में केंद्रीय गृह सचिव रहे बीजेपी के बिहार से लोकसभा सदस्य आरके सिंह ने 10-11 साल पहले के इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक कथित ऑपरेशन का ज़िक्र करते हुए पिछले हफ़्ते टीवी इंटरव्यू में कह दिया कि दाऊद के लिए जासूसी करने वाले मुंबई पुलिस के चंद भ्रष्ट अफसरों की वजह से 2005 में डॉन को मारने का प्लान एक्ज़िक्यूट नहीं हो सका। कहा जा रहा है कि 1990 में रथयात्रा से सोमनाथ से अयोध्या जा रहे सीनियर बीजेपी लीडर लालकृष्ण आडवाणी को समस्तीपुर में गिरफ़्तार करने का आदेश देने वाले इस पूर्व नौकरशाह ने कोई नई बात नहीं कही। दरअसल, जो लोग दाऊद के मुंबई पुलिस में लिंक पर हैरानी जता रहे हैं, उन्हें मुंबई पुलिस में दाऊद की पोज़िशन का पता नहीं है।

मुंबई में अपराध की मामूली समझ रखने वाले भी दाऊद को मारने या पकड़कर लाने की चर्चा 1994 से सुनते ही आ रहे हैं। कई रिटायर पुलिस अफ़सर मानते हैं कि दाऊद के ख़िलाफ़ ऑपरेशन के सफल न होने के लिए केवल मुंबई पुलिस को ही ज़िम्मेदार ठहराना अतिरंजना होगी। इनके मुताबिक़, दाऊद के बारे में सबसे ज़्यादा इनपुट्स रखने वाली मुंबई पुलिस और आईबी ने अगर मिलकर ऑपरेशन को किया होता, तब सफलता की संभावना ज़्यादा हो सकती थी। वस्तुतः दोनों जांच एजेंसियों के अकेले क्रेडिट लेने की अपरिपक्व स्पर्धा के कारण ही डॉन के ख़िलाफ़ हर ऑपरेशन फेल होते गए।

कहा जाता है कि दाऊद की बड़ी बेटी महरूख की क्रिकेटर जावेद मियांदाद के बेटे जुनैद के साथ 23 जुलाई 2005 को दुबई के ग्रैंड हयात होटेल में निकाह की रस्म के समय ही डॉन को ख़त्म करने की योजना आईबी ने बनाई थी। लेकिन, आरके सिंह के मुताबिक़, मुंबई पुलिस में एक अफ़सर के इशारे पर इस काम पर लगे विक्की मल्होत्रा और फरीद तनाशा की गिरफ़्तारी से ऑपरेशन ही फेल हो गया। बहरहाल, बेहद चौकन्ने दाऊद ने एहतियातन दूसरी बेटी मेहरीन एवं बेटे मोइन का निकाह 2011 में क्रमशः चार फरवरी और 25 सितंबर को कराची के अपने बंगले मोइन पैलेस में ही किया। छोटी बेटी मारिया अभी 19 साल की है।

वैसे मुंबई में क्राइम रिपोर्टरों के बीच यह भी चर्चा होती रही है कि छोटा राजन के इशारे पर दाऊद की हत्या करने के लिए विक्की और तनशा पहले भी कई बार कराची जा चुके थे। इसी से आग बबूला होकर दाऊद के लेफ़्टिनेंट छोटा शकील ने सन् 2000 में थाईलैंड की राजधानी बैंकॉक राजन को मारने की असफल कोशिश की थी। वैसे यह भी कहा जाता है कि दाऊद को मारने का प्लान गोपनीय तरीक़े से अटलबिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में 1998 के पोखरण दो के बाद शुरू हुआ। राजन के गुंडे रोहित वर्मा के हाथों दाऊद के ख़ास आदमी नेपाल के सांसद मिर्जा दिलसाद बेग की काठमांडो के पास हत्या के बाद डॉन टारगेट पर था। सुरक्षा एजेंसियां राजन की मदद कर रही थीं, लेकिन हर बार सूचनाएं के दाऊद तक पहुंच जाने से हर कोशिश नाकाम होती रही।

दो साल पहले इंटरव्यू में राजन ने स्वीकार किया था कि दाऊद को मारने के लिए उसने अपने शार्प शूटर दाऊद के क्लिफ़्टन रोड, कराची के आवास के पास दरगाह तक भेजे थे। परंतु ऐन मौक़े पर साज़िश की भनक लगने से दाऊद आया ही नहीं। यह भी चर्चा थी कि दाऊद ठिकाने लगाने के लिए राजन ख़ुफिया एजेंसी रॉ और आईबी की मदद कर रहा है। यह भी कहा जाता है कि मुंबई क्राइम ब्रांच के कई डबल एजेंट दाऊद के आसपास हैं। वे डॉन की डेली लोकेशन और दिनचर्या की जानकारी देते रहते हैं।

थोड़ा और पहले जाएं तो कहा जाता है कि 1994 में रॉ ने दाऊद को ख़त्म करने की दो कोशिश की थी, लेकिन दोनों बार ऐन मौक़े पर नरसिंह राव सरकार ने प्लान को वीटो कर दिया था। उसी साल महाराष्ट्र होम मिनिस्ट्री शीर्ष अधिकारी ने जनसत्तारिपोर्टर को बताया कि टाइगर मेमन की कराची में हत्या हो गई और दाऊद भारत लाया जा चुका है। संवाददाता ने ख़बर फ़ाइल कर दी, जो सभी संस्करणों में छपी। बाद में पता चला, अफ़सर की सूचना ग़लत थी। वैसे, दाऊद के भारत लाने या समर्पण की ख़बर से आज भी कई पॉलिटिशियन और दूसरे लोग टेंशन में आ जाते हैं। शायद उसके यहां आने से वे मुश्किल में पड़ सकते हैं। इसी ल़बी ने दाऊद के सरेंडर प्लान को सैबोटेज किया था।

यह भी माना जाता है कि मुंबई पुलिस में अब भी दाऊद के कई लोग हैं। कहा तो यहां तक जाता है, जब भी किसी गवाह को किसी केस की गवाही के लिए पुलिस मुख्यालय बुलाया जाता है, तो जानकारी पाकिस्तान में बैठे भाई तक पहुंच जाती है और चंद मिनटों में गवाह के पास फोन आ जाते हैं और गवाही का अंजाम भुगतने की धमकी दी जाती है।

जुलियो रिबेरो के बाद 1985 में कमिश्नर बने डीएस सोमण ने दाऊद का साम्राज्य ध्वस्त करने का फ़ैसला किया था, क्योंकि बेल कैंसल होने पर भी डॉन फ़रार था। चार बहुत भरोसेमंद अफ़सरों की स्पेशल टीम बनी। 1986 में एक दिन देर रात दाऊद के अड्डे पाकमोडिया स्ट्रीट के चाल मुसाफ़िरखाना को रेड किया गया, पर दाऊद नहीं मिला। दरअसल, सूचना किसी ने डॉन को दे दी थी और वह पांच मिनट पहले नौ दो ग्यारह हो गया। दूसरे दिन ख़बर आई कि डॉन मुंबई से दुबई पहुंच गया है। सोमण ने आपात बैठक में पूछा, “इतनी पक्की सूचना के बावजूद दाऊद को क्यों पकड़ नहीं पाए? क्या पुलिस के बहुत भरोसेमंद लोग दाऊद के हमदर्द या मोल हैं? या मुंबई पुलिस में हर लेवल पर उसके जासूस हैं?”

वैसे जानकार बताते हैं कि मुंबई पुलिस में दाऊद की दख़ल सत्तर के दशक से थी। उसे लेकर पुलिस पर नरम रवैया अपनाने और सूचनाएं लीक करने के आरोप लगते रहे हैं। 1981 से 85 के बीच दक्षिण मुंबई के थानों में दाऊद पहचाना नाम था। समद समेत दो मर्डर में पुलिस गिरफ़्त में आया भी लेकिन मई 1984 में अंतरिम बेल मिलते ही फ़रार हो गया। उसके शूटर सुहैल ने करीम लाला के भाई रहीम लाला को मार डाला। इसमें दाऊद का नाम आने पर उसे पुलिस तलाशने लगी। कहते हैं, पुलिस को पता होता था कि दाऊद कहां है, परंतु गिरफ़्तार नहीं करती थी। जब भी पकड़ने की योजना बनी, सूचना पहले दाऊद को मिल जाती और वह बचता जाता था। उसका नेटवर्क पुलिस में कई लेयर पर था। यह भी आरोप लगते रहे कि कई नामचीन एन्काऊंटर स्पेशलिस्ट केवल दाऊद की टिप्स पर ही राइवल गैंग के अपराधियों को मारते हैं।

बुज़ुर्ग पत्रकार और फ्रांसीसी पत्रिका शार्ली अब्दो का विवादित कार्टून छापने के विवाद में बंद उर्दू अखबार अवधनामाके संपादक खलील जाहिद, जो पहले उर्दू साप्ताहिक अख़बार-ए-आलमनिकालते थे, बताते हैंसत्तर के दशक में अपराध जगत में पठान गैंग सबसे ख़तरनाक व बेरहम था। हालांकि दाऊद और उसके भाई साबिर ने ग़ुनाह के सफ़र का आगाज़ पठान गैंग से ही किया। लेकिन बाद में माल के बंटवारे को लेकर पंगा होने से अलगाव हो गया। तब पठान गैंग के संरक्षक करीम लाला, हाजी मस्तान व वरदराजन मुदलियार की तूती बोलती थी। पठान गिरोह के गुंडों द्वारा की जा रही हत्या, अपहरण, बलात्कार, मारकाट और लूटपाट की वारदात से मुंबई पुलिस परेशान थी।

पठान गिरोह के इन गुंडे बेक़ाबू से जनता और व्यापारी परेशान थे। इसमें करीम लाला के भतीजों समद ख़ान, आमिरज़ादा, आलमज़ेब के अलावा सईद बाटला और अयूब लाला जैसे खूंखार हत्यारे थे। सुपारी किलर अयूब सबसे ख़तरनाक था। वह अनगिनत हत्याएं कर चुका था। जब भी कहीं दिखता तो माना जाता था कि बड़ा गेम होने वाला है। गुंडों से निपटने के लिए पुलिस ने कॉंन्टेबल रहे इब्राहिम कासकर के बेटे दाऊद को प्रमोट करना शुरू किया। कहा जाता है कि 1970 में 14 साल की उम्र में पहला अपराध करने वाले दाऊद के ख़िलाफ़ शिकायत पुलिस का बेटा होने के कारण नहीं ली जाती थी। बाद में दाऊद का पंगा डॉन बाशूदादा से हुआ। बासू ने इब्राहिम की इनसल्ट कर दी थी। लिहाज़ा, दाऊद ने बासू पर हमला किया और उसके अखाड़ें में तोड़फोड़ की, लेकिन पुलिस ने अपराध का संज्ञान ही नहीं लिया।

सन् 1974 में दाऊद-साबिर और उसके साथियों ने मस्जिद में दिन दहाड़े डकैती की और फ़िल्मी स्टाइल में टैक्सी से मेट्रोपोलिटन कॉरपोरेशन बैंक के 4 लाख 75 हज़ार रुपए लूटे, लेकिन पायधुनी पुलिस ने फौरी कार्रवाई नहीं की। इब्राहिम से बेटों को थाने लाने को कहा गया। पुलिस कहीं भी अपराधी के सौंपे जाने का इंतज़ार नहीं करती, लेकिन दाऊद को लेकर रवैया ऐसा ही रहा। उस घटना ने दाऊद को भावी डॉन के रूप में स्टेब्लिश्ड कर दिया। हालांकि, दाऊद पर मुक़दमा चला। सेशन्स कोर्ट ने सभी आरोपियों को चार साल की सज़ा सुनाई। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने ज़मानत दे दी।

आपातकाल के बाद पुलिस खुले तौर पर दाऊद को प्रमोट करने लगी। पठान गैंग के सईद बाटला और अयूब लाला नागपाड़ा के चावला गेस्टहाऊस में ठहरे नवविवाहित दंपति के कमरे में घुसकर पति की हत्या की और पत्नी के साथ रेप किया। पुलिस कमिश्नर की वीवी चौबल ख़ूब किरकिरी हुई। यह करीम लाला गिरोह का आतंक था कि हत्यारों और रेपिस्टों को लोग जानते थे, लेकिन किसी की मुंह खोलने की जुर्रत नहीं की। इन्क़लाबसे जुड़े दाऊद के साथी पत्रकार मोहम्मद इक़बाल नाटिक़ ने अपने क्राइम वीकली राज़दारमें बाटला और अयूब का नाम लेकर ख़बर छाप दी। दोनों गिरफ़्तार हो गए।

हालांकि बाद में पठानों ने नाटिक़ को बेरहमी से पीट करके खाड़ी में फेंक दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। यही से दाऊद की पठानों से खुली दुश्मनी शुरू हुई जो गैंग के नेस्तमाबूद होने तक चली। इससे शुरू गैंगवार से सबसे ज़्यादा फ़ायदा पुलिस को हुआ। वैसे बेनिफिशियरी दाऊद भी रहा। उसके राइटहैंड ख़ालिद पहलवान ने अयूब को डोंगरी की एक गली में तड़पा-पड़पा कर मारा। उसका एक-एक अंग काटा, लेकिन पुलिस मौन बैठी रही। डोंगरी के सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर रणबीर सिंह लीखा जैसे पुलिस अफ़सर दाऊद के सिंपैथाइज़र थे, क्योंकि वह पठानों को चुनौती दे रहा था। पुलिस के सहयोग से दाऊद की धाक जम गई और पहले वह कोंकणी युवकों के गैंग का मुखिया हुआ फिर मुंबई का निर्विवाद डॉन बन गया।

इसी बीच 12 फरवरी 1981 की रात प्रभादेवी में पठान गैंग के आमिरज़ादा-आलमज़ेब ने धोखे से साबिर की हत्या कर दी। साज़िश मनोहर उर्फ मान्या सुर्वे ने रची थी। लिहाज़ा, साल भर के अंदर मान्या को इशाक बाग़वान की टीम ने अंबेडकर कॉलेज के पास एककाउंटर में मार दिया। छह सितंबर 1983 को दाऊद की सुपारी पर बड़ा राजन उर्फ अन्ना के गुंडे डेविड परदेसी ने कोर्ट में जज के सामने आमिरज़ादा को भून डाला। चार अक्टूबर 1984 को पुलिस की मौन स्वीकृत पर दाऊद ने पठान गिरोह का सबसे बड़ा विकेट गिरा दिया। वीपी रोड गिरगांव के सिक्कानगर परिसर में डॉन ने छोटा राजन, बाबू रेशिम, रमा नाईक, दिलीप बुआ, सुनील सावंत और अली अंतुले के साथ समद को छलनी कर दिया। 1985 में 29 दिसंबर को आलमज़ेब सूरत के बाहरी इलाके में एक फ्लैट में मुठभेड़ में मार डाला गया। यह चर्चा थी कि दाऊद ने सब-इंसपेक्टर दलसुख पारधी को टिप दी थी। इस तरह दाऊद ने तीन साल से भी कम समय में पठान गिरोह को नेस्तनाबूद कर दिया और उसका बाल भी बांका नहीं हुआ।

गुजरात के तस्कर किंग सुकूर नारायण बखिया के साथ मिलकर तस्करी का मोटे मुनाफे का काम शुरू करने वाला दाऊद निर्विवाद रूप से अंडरवर्ल्ड का बेताज़ बादशाह बन गया। खाड़ी देशों से गोल्ड तस्करी के दौरान उसने पुलिस को मोटा नज़राना देने की परिपाटी शुरू की, जिसका बहुंत बढ़िया रिजल्ट आया। मुंबई पुलिस ही नहीं, हर जगह उसके आदमीबन गए। जो बेहद मददगार साबित हुए। दाऊद ने कस्टम में कोंकणी मुस्लिम अफ़सरों से मधुर रिश्ता बनाकर उम्दा नेटवर्क खड़ा कर लिया। इस दौरान उसके रास्ते में जो भी आया, मारा गया। कुछ को दाऊद ने गुंडों से मरवा दिया तो कुछ को दाऊद के दुश्मनों को निशाना बनाने वाले पुलिसवालों से इनकाउंटर में ख़त्म कर दिया। दाऊद के टिप पर 21 जुलाई 1988 को नागपाड़ा के सबइंपेक्टर राजन कटधरे अपने ज्यूरिडिक्शन से बाहर चेंबूर जाकर रमा नाईक को मार डाला। इसी तरह अशोक जोशी, पापा गवली, माया डोलस, दिलीप बुआ, शैलेश हल्दनकर, अमर नाईक, सदा पावले, विजय तांडेल, नामदेव हरी पाटिल और साधु शेट्टी वगैरह मारे गए।

कई लोग मानते हैं कि दाऊद के मुंबई पुलिस में लिंक का पता लगाना है तो तीन दशक के दौरान मुंबई पुलिस के आला अफ़सरों द्वारा खड़ी की गई संपत्ति की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए, ख़ासकर एन्काउंटर सेल से जुड़े अफसरों की। तब पता लग सकता है कि किन-किन पुलिस वालों ने दाऊद को डॉन बनाने में मदद की। वैसे दाऊद को देश में लाने की चर्चा सीरियल धमाकों के बाद से हो रही है। एक तबक़ा चाहता है कि 257 निर्दोषों की हत्या के आरोपी को देश में लाया जाए। इसलिए दिल्ली सल्तनत पर क़ाबिज़ होने वाली हर सरकार डॉन को लाने की बात करती है। कांग्रेस गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने दो बार कहा था कि दाऊद जल्द भारत लाया जाएगा। भारत अमेरिकी की फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन के संपर्क में है। हालांकि बाद में एफ़बीआई ने साफ़ किया कि भारत ने इस तरह का कोई फॉर्मल अनुरोध नहीं किया है।


वैसे ज़ियाउद्दीन अंसारी उर्फ अबु जिंदल, अब्दुलकरीम टुंडा और यासिन मलिक की गिरफ़्तारी के बाद लगा था भारत सीरियस है। भारत पाकिस्तान ही नहीं अमेरिका को भी कई बार डोज़ियर सौंप चुका है जिसमें दाऊद की कुंडली है। हालांकि कुछ न हुआ। विदेशी मामलों के जानकार कहते हैं कि परमाणु बम बना लेने के बावजूद भारत की इमैज दुनिया में सॉफ़्ट नेशन की है। इसीलिए नई दिल्ली अपनी बात ग्लोबल फोरा पर नहीं मनवा पाती। सल्तनत बदल गई है। उदार कांग्रेस की जगह सख़्त बीजेपी सत्ता में है। कठोर प्रशासक नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं और दाऊद के बारे में देश में सबसे ज़्यादा जानकारी रखने वाले अजित डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं। फिर मोदी चुनाव से पहले ही कह चुके हैं कि दाऊद के ख़िलाफ़ कोई ऐक्शन शोर मचाकर नहीं, गोपनीय तरीक़े से लिया जाएगा लेकिन वह ऑपरेशन कब होगा, इस बारे में मोदी भी ख़ामोश हैं।