गुरुवार, 26 नवंबर 2015

26/11 की सातवीं वर्षगांठ परः आतंकवाद से लोहा लेने के लिए तैयार है मुंबई?


हरिगोविंद विश्वकर्मा
बृहस्पतिवार को मुंबई पर आतंकी हमले 26/11 को सात साल पूरे हो गए। इस दौरान मुंबई पुलिस और राज्य पुलिस में बदलाव की ख़ूब बातें हुईं, लेकिन क्या उन पर वाकई अमल किया गया, इस पर आम आदमी को भारी संदेह है। मुंबई पुलिस ने हथियार वगैरह तो जुटा लिए लेकिन देश में पुलिस की मानसिकता पहले जैसी “खैनी खाने वाले” जैसी है, जिसे देखकर संदेह होता है कि ये लोग आतंकी हमले का मुकाबला कर पाएंगे। कम से कम लोग राह चलते हुए लोग पुलिस को यही रवैया देखते हैं। रेलवे स्टेशनों या दूसरे संवेदनशील जगह पर तैनात पुलिस वालों का रवैया देखकर इस आशंका की पुष्टि होती है,कि पुलिस बल में वाकई कोई सुधार हुआ है। इससे लगता यही है कि मुंबई आतंकवाद से निपटने के लिए आधी-अधूरी ही तैयार है।
मुख्यमंत्री देवेद्र फडनवीस, महाराष्ट्र पुलिस महानिदेश प्रवीण दीक्षित और मुंबई पुलिस कमिश्नर अहमद जावेद समय समय पर बयान देते रहते हैं कि मुंबई ही नहीं पूरे राज्य में किसी भी हिमाकत से निपटने की सुरक्षा तैयारियां मुकम्मल हैं और जवान हर दुस्साहस का जवाब देने के लिए सक्षम और चौकस हैं। लेकिन अगर ज़मीनी हकीकत का अवलोकन करें तो ये दावे उसी तरह लगते हैं, जैसे दावे सन् 1993 सीरियल बम ब्लास्ट के बाद से सत्ता संभालने वाले तमाम चीफ मिनिस्टर या शीर्ष पुलिस अफसरान करते आ रहे हैं और इन दावों के विपरीत आतंकी हमले समय-समय पर होते रहे हैं।
दरअसल, आईएसआईएस के उदय के बाद दहशतगर्दी का ज़्यादा ख़तरनाक रूप में सामने आया है। अब तक एजेंसियां सिमी, इंडियन मुजाहिदीन, लश्करे तैयबा, हिजबुल मुजाहिद्दीन, जैशे मोहम्मद, अल बदर, अलकायदा और तालिबान से निपटने में परेशान हो रही थी। आईएसआईएस की बर्बरता देखकर हर आदमी का दिल दहल जाता है। इस बेरहम संगठन का काम करने का तरीक़ा अलग हैं। कैमरे के सामने दुश्मनों का सिर कलम करने के लिए कुख्यात इस संगठन के फिदाइनों से निपटने के लिए पुख्ता तैयारी करनी पड़ेगी। यह अपना काम इंटरनेट के जरिए करता है। दुनिया भर के युवकों को बरगलाकर लगातार अपनी ताक़त बढ़ाने वाले इस संगठन में भारत से भी युवक भर्ती हो रहे हैं। इन विपरीत परिस्थितियों में देश की मुंबई पुलिस, महाराष्ट्र एटीएस, एनआईए एवं दूसरी सुरक्षा एजेंसियां और खुफिया तंत्र के लोगों को पूरी तरह चौकस रहना होगा। अपनी तैयारियों में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा।
पूर्व आईपीएस वाईपी सिंह इंटेलिजेंस को मज़बूत करने पर ज़ोर देते हैं। उन्हें नहीं लगता कि बिना मज़बूत खुफिया तैयारियों के मुंबई पुलिस आईएसआईएस जैसी हिमाकत से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है। उनको लगता है कि हमले का जवाब हमले से देने रणनीति से अधिक कारगर खुफिया तंत्र को मज़बूत करना है। इंटेलिजेंस को मज़बूत करके आतंकवाद का मुकाबला बेहतर तरीक़े से किया जा सकता है। बाईपी सिंह कहते हैं कि भारत में राज्य और केंद्र की खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेत का अभाव देखा जाता है, जिसकी मुख्य वजह अधिकारियों का व्यक्तिगत इगो होता है। जबकि ऐसे नाजुक समय पर सभी संबंधित एजेंसियों को तालमेल के साथ काम करना चाहिए।
हालांकि एक सीनियर पुलिस अफसर कहते हैं, कि अगर मुंबई में फिर आतंकी हमला हुआ तो सात साल पहले जितना नुक़सान नहीं होगा। पुलिस बहुत मजबूत पोज़िशन में है। आतंकवादियों को मुंहतोड़ जवाब देने में पूरी तरह सक्षम है। जबकि कमिश्नर रहे एक दूसरे अधिकारी कहते हैं 26/11 जैसे हमले के लिए तो पुलिस पूरी तरह तैयार है, लेकिन बदलते समय के साथ अब आतंकियों की रणनीति भी बदल गई है। अत्याधुनिक हथियार और टेक्नॉल़ॉजी हासिल करने के बाद आतंकी और ख़तरनाक हो गए हैं। लिहाज़ा, 21वीं सदी के आतंकवाद का सामना करने के लिए पुलिस को और आधुनिक बनाना होगा और जवानों को अंतरराष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग देनी होगी और सुरक्षा तैयारियों को फिर से परखना होगा।
दरअसल, राज्य ने हमले के दौरान पुलिस की नाकामियों का पता लगाने के लिए नौकरशाह राम प्रधान और इंटेलिजेंस विशेषज्ञ वपल्ला बालचंद्रन की दो सदस्यों वाली हाई लेवल कमेटी बनाई थी। कमेटी ने फोर्स का सही नेतृत्व न कर पाने के लिए तत्कालीन पुलिस कमिश्नर हसन गफूर को कठघरे में खड़ा करते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी, जिसमें देश की आर्थिक राजधानी की सुरक्षा चाक-चौबंद करने के लिए कई सिफारिशों की गई थीं। प्रधान कमेटी ने राज्य की समुद्री सीमा पर चौकस निगरानी करने, केंद्र-राज्य खुफिया एजेंसियों के बीच सही तालमेल बाने,  पुलिस को घातक हथियारों और वेहिकल्स से लैस करने, संवेदनशील स्थानों पर वॉच टॉवर बनाने और शहर में हर प्रमुख जगह सीसीटीवी कैमरे लगाने की ज़ोरदार सिफारिश की थी. लेकिन सात साल बाद भी सभी सिफारिशों लागू नहीं की जा सकी, ख़ासकर शहर में पांच हज़ार सीसीटीवी कैमरे लगाने का सुझाव अभी तक फाइलों की धूल खा रही है।
वैसे कमेटी के सुझावों के अनुसार आतंकवाद से निपटने के लिए एनएसजी की तर्ज पर राज्य में फोर्स वन बनाई गई है। आईपीएस संजय सक्सेना की अगुवाई में प्रशिक्षित जवान किसी भी तरह की चुनौती से निपटने के लिए चौकस हैं। फोर्स वन हर महीने तीन मॉक ड्रिल करती है, जिसमें तैयारियों का जायजा लिया जाता है। आतंकवाद से लड़ने के लिए क्विक रिस्पॉन्स टीम (क्यूआरटी) भी बनी है और हर दो थाने के बीच एक वेहिकल्स दिया गया है। जिसका संचालन संबंधित थाना इंचार्ज की सलाह पर किया जाता है। इसकी मदद के लिए मुंबई की पांचों रिजन में चार रिजर्व पलाटून मौजूद रहती हैं। केंद्र ने भी एनएसजी का हब मुंबई में भी बनाया है। आतंकियों से निपटने के लिए बुलेटप्रूफ मार्क्समैन जीप भी पुलिस के पास है और विस्फोटक का पता लगाने के लिए स्कैनर वैन, स्नाइपर गन और दूसरे अत्याधुनिक हथियार भी पुलिस को दिए गए हैं।
प्रधान कमेटी ने भी समुद्री सुरक्षा को मजबूत करने के क्रम में जगह जगह कोस्टल पोस्ट बनाने का सुझाव दिया था। लिहाज़ा, समुद्री सीमा को सुरक्षित करने के लिए स्पीड बोट्स और एमफिबियस मरीन क्राफ्ट्स तैनात की गईं। मगर समुचित रखरखाव और मुस्तैद जवानों के अभाव में ज्यादातर स्पीड बोट और एमफिबियस मरीन क्राफ्ट्स समुद्र में खड़ी रहती हैं। सबसे बड़ी बात यह कि पिछले दिनों मीडिया में यह भी ख़बर आई थी कि कोस्टल पुलिस में तैनात कई लोग तैरना भी नहीं जानते। वे मुंबई की समुद्री सीमा की रक्षा कैसे करेंगे। यह कोई भी सहज समझ सकता है। सात साल बाद हालात बदल चुके हैं और फोर्स वन और क्यूआरटी को छोड़ दें तो बाकी तैयारी उस स्तर की नहीं हैं जैसी होनी चाहिए। प्रधान कमेटी की सिफारिश पर अमल करते हुए मुंबई में हुतात्मा चौक पर पहला वॉच चॉवर बनाया गया। इसके बाद सीएसटी, डीजी ऑफिस, मेट्रो सिनेमा और बधवार पार्क में भी वॉचटॉवर बनाए गए हैं।
प्रधान कमेटी की सिफारिशों के तहत पांच हज़ार से ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगाने थे। लेकिन अभी तक अलम नहीं किया जा सका है। पहले कांग्रेस-एनसीपी और अब बीजेपी-शिवसेना घोषणाए करती रही है कि इतने सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएंगे, पर अभी तक अमल नहीं किया गया, जो बहुंत बड़ी लापरवाही कही जा सकती है। इस साल मई में सरकार ने शहर में छह हज़ार (6020) सीसीटीवी कैमरे लगाने का निर्णय किया था, पर अमल अभई तक नहीं हुआ है। इसी तरह 26/11 के दौरान अत्याधुनिक हथियारों के अलावा जवानों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के बुलेटप्रूफ जैकेट की कमी महसूस की गई थी। मगर सरकार ने बूलेटप्रूफ वाहन तो खरीद लिए लेकिन अभी तक बुलेटप्रूफ जैकेट मुंबई पुलिस के पास नहीं हैं।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

किरण-आमिर का डर कितना वाजिब? 1993 में डरे थे संजय दत्त भी...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आमिर ख़ान अभिनेता हैं। इसमें थोड़ा और संशोधन करें तो वह केवल अभिनेता नहीं, स्टार हैं। अगर थोड़ा और संशोधन कर दें, तो वह स्टार नहीं सुपरस्टार हैं। सुपरस्टार यानी एक ऐसी हस्ती जिसकी हर ऐक्ट्विटी पर देश ही नहीं दुनिया की नज़र होती है। जब किसी का रहन-सहन, मूवमेंट, व्यवहार और सबसे ऊपर बयान अगर इतनी अहमियत रखने लगे तो उसे हर शब्द बहुत सोच-समझ कर ज़ुबान से निकालना चाहिए। एकदम लिखी हुई स्क्रिप्ट की तरह। उसे एक भी शब्द ऐसा नहीं बोलना चाहिए, जिससे देश या समाज की प्रतिष्ठा पर कोई आंच आए। इसी फिलॉसफी के तहत दुनिया भर के प्रमुख लोग हर सार्वजनिक मंच पर लिखा हुआ भाषण पढ़ते हैं।

सबसे पहले इस पर ध्यान देना ज़रूरी है कि आमिर ख़ान ने कहा क्या, जिस पर इतना बवाल मच गया है। दरअसल, रामनाथ गोयनका पुरस्कार समारोह में आमिर ख़ान से पुरस्कार वापसी पर पूछे गए एक सवाल के जवाब कहा, विरोध करने का कोई भी अहिंसक तरीक़ा मुझे उचित जान पड़ता है। यानी साहित्यकारों और कलाकारों के पुरस्कार वापस करने के फ़ैसले का अभिनेता ने समर्थन किया। आमिर से दूसरा सवाल था कि क्या इस बात से वह सहमत हैं कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है? इस पर आमिर ने अपनी सहमति जताई। यानी आमिर को भी लगता है कि इस देश में असहिष्णुता बढ़ रही है। इस पर पत्नी किरण राव से बातचीत का हवाला देते हुए आमिर ने कहा, मेरी पत्नी किरण और मैं जन्म से ही भारत में रह रहे हैं, परंतु पहली बार किरण ने बातचीत कै दौरान मुझसे कहा कि क्या हम लोग भारत छोड़कर विदेश चले जाएं?” यानी यह देश इस सेलेब्रेटी कपल के लिए सेफ़ नहीं है। हालांकि, आमिर ख़ान ने साथ ही यह भी जोड़ा था कि किरण का इस तरह का सवाल पूछना ही अपने आप में बड़ा बयान है और डिज़ास्टरस यानी दुर्भाग्यपूर्ण या आपदाकारी है। आमिर ख़ान के इसी बयान पर पूरा देश दो खेमे में बंट गया है। ज़्यादातर लोग आमिर ख़ान से सहमत नहीं हैं, जबकि कुछ लोग आदतन आमिर के बयान का समर्थन कर रहे हैं।

कई लोग मानते हैं कि पहली बात आमिर ख़ान 50 साल पार कर गए हैं। उन्हें समझदारी दिखाते हुए
पत्नी से सवाल करना चाहिए था कि देश में ऐसा क्या नया हो गया है, कि वह देश में रहना असुरक्षित मानने लगी है। लेकिन पत्नी की ग़लतफ़हमी दूर करने की बजाय इस संजीदा अभिनेता ने उसके बयान को पब्लिक कर दिया। यहां निश्चित तौर पर आमिर ख़ान यह भूल गए कि देश के हर नागरिक का पहला कर्तव्य होता है कि वह कोई भी बयान, ख़ासकर जिससे देश की साख़ पर असर पड़े, अपने मौजूदा स्टैटस को ध्यान में रखकर देना चाहिए। किसी पूर्वाग्रह के तहत वह बात नहीं कहनी चाहिए जिसका कोई आधार या सिर-पैर न हो।

अब इस बात पर भी चर्चा करना बेहद ज़रूरी है कि क्या वाकई आमिर ख़ान या उनकी पत्नी किरण राव पर इस देश में कथित तौर पर बढ़ रही इनटॉलरेंस का असर हो सकता है। यानी इस देश मे रहना उनके या उनके बच्चों के लिए जोखिम भरा हो सकता है। दरअसल, आमिर ख़ान अभिनेता हैं तो उनकी पत्नी किरण राव फिल्म बनाती हैं। आमिर अपनी हर फिल्म अभिनय या टीवी शो में ऐंकरिंग करने के बदले करोड़ों रुपए मेहनताना लेते हैं। साल में उनकी कम से कम दो-तीन फिल्में या शो आ ही जाते हैं। यानी आमिर ख़ान उन लोगों में है जो साल भर में 40-50 करोड़ रुपए कमा लेते हैं। 2013-14 के बजट के मुताबिक सवा अरब से ज़्यादा जनसंख्या वाले इस देश में केवल 42800 लोग यानी आबादी का 0.00354 फ़ीसदी लोग ही सालाना एक करोड़ कमाते हैं। ये लोग वीवीआईपी माने जाते हैं। कमाई के आधार पर आमिर ख़ान देश में उस क्लास के नागरिक हैं, जिन्हें वीवीआईपी कहा जाता है। जैसा कि सर्वविदित है किसी भी वीवीआईपी देश के हालात कैसे भी हो कोई असर नहीं पड़ता। इन पर महंगाई का भी असर नहीं पड़ता। कीमतें आसमान छूने लगें तब भी उनकी मौज़मस्ती जस की तस रहती है। जो घटनाएं या बदलाव आम आदमी का जीना हराम कर देते हैं, वीवीआईपी लोग उससे बिल्कुल अछूते रहते हैं. दरअसल, ये घटनाएं या बदलाव सड़क, गली मोहल्ले, गार्डन जैसे सार्वजनिक स्थलों पर दिखते हैं, जहां वीवीआईपीज़ की मौजूदगी ही नहीं होती। यानी देश में इनटॉलरेंस चाहे जितना बढ़ जाए, कम से कम किसी वीवीआईपी समुदाय के सदस्य का बाल भी बांका नहीं हो सकता। भारत ही नहीं, किसी भी मुल्क में वीवीआईपी पर देश में होने वाली घटनाओं, बदलावों या गतिविधियों का असर तब पड़ता है, जब कोई बहुत बड़ी बग़ावत हुई हो या किसी दूसरे देश ने आक्रमण कर दिया हो गया फिर सरकार ने ही आपातकाल घोषित दिया गया हो। इन तीनों का भारत में निकट भविष्य में कोई संभावना नहीं है। इसके विपरीत, फ़िलहाल भारत जैसे जनतांत्रिक देश में विधि का शासन है। हर नागरिक को जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, नस्ल और लिंग से परे वह हर नागरिक स्वतंत्रता हासिल है जो किसी भी सभ्य देश में नागरिकों को मिलता है। उसी अधिकार का इस्तेमाल करके आमिर ख़ान ने पीके जैसी फिल्म में विवादास्पद डायलॉग बोल गए थे, जिस पर थोड़ा विवाद ज़रूर हुआ था, लेकिन इस देश की सहिष्णु जनता ने उसे कला मानकर विरोध या विरोधियों को बढ़ावा ही नहीं दिया। इसलिए किरण का इस देश में डर जाना और आमिर ख़ान का ख़ुद किरण के डर से इत्तिफाक ही नहीं रखना, बल्कि उनके डर को सार्वजनिक कर देना अपने आपमें बेहद अगंभीर क़दम है। आमिर का पत्नी की बात सार्वजनिक करना किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं है। यह उनकी प्रतिष्ठा और उनके क़द को कम करने वाला बयान है। उनकी पत्नी किरण राव का डर भी काल्पनिक और निहायत बचकाना है।

यहां गैरक़ानूनी तौर पर घातक हथियार रखने के जुर्म में सज़ा काट रहे अभिनेता संजय दत्त का जिक्र करना समीचीन होगा, क्योंकि इसी तरह का डर संजय को भी महसूस हुआ था। संयोग हैं कि आमिर ख़ान और संजय दत्त मुंबई में बांद्रा के बेहद पॉश इलाके पाली हिल में रहते हैं। दरअसल, मुंबई में दंगे शुरू होने पर संजय भी बहुत डर गए थे और मुंबई सीरियल ब्लास्ट के मास्टरमाइंड और मुख्य फ़रार आरोपी दाऊद इब्राहिम कासकर के भाई अनीस से अपनी और परिवार की रक्षा के लिए हथियार मांगा था। वह भी इंसान को सेकेंड में मार देने वाली प्रतिबंधित एके-56 राइफल। मज़ेदार पहलू यह था कि संजय जिस पॉश पाली हिल इलाक़े में रहते थे, वहां कभी दंगा हुआ ही नहीं। दंगे (इन पंक्तियों के लेखक ने तब जनसत्ताके लिए दंगों की रिपोर्टिंग की थी) पॉश इलाकों में नहीं, बल्कि झुग्गीबाहुल्य क्षेत्रों में हुए थे। लिहाज़ा, संजय का सुरक्षा की दुहाई देना सरासर बेमानी थी। यानी उस समय कम से कम संजय या दत्त परिवार के लिए किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं था। दंगे मुस्लिम इलाकों से ही शुरू हुए और मारकाट में सबसे ज़्यादा जानमाल का नुकसान अल्पसंख्यकों को ही उठाना पड़ा था। छह दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहाये जाने के बाद पूरे देश की तरह मुंबई में भी दंगे हुए। जिसमें श्रीकृष्णा आयोग के मुताबिक, कुल 850 लोग (575 मुसलमान और 275 हिंदू) मारे गए। कहने का तात्पर्य संजय ने किसी तरह का ख़तरा न होने के बावजूद केवल शेखी बघारने के लिए एके-56 राइफ़ल जैसा प्रतिबंधित ख़तरनाक़ हथियार मंगवाया था।

कहने का मतलब किसी भी इंसान को डर लगना चाहिए, लेकिन हाइपोथेटिकल डर रहीं लगना चाहिए, जैसा कि 1993 में संजय दत्त को लगा था और आजकल किरण राव ख़ान और आमिर ख़ान को लग रहा है। आमिर ख़ान के अभिनय की धाक भारपत ही नहीं पूरी दुनिया में है। ऐसे में उनके इस तरह के अगंभीर बयान से देश की साख पर बुरा असर पड़ सकता है। चचीन और पाकिस्तान जैसे भारत के राइवल देश इसका ग़लत इस्तेमाल कर सकते हैं। राहुल गांधी या अरविंद केजरीवाल जैसे लोग, जो आमिर ख़ान के बयान पर गंभीरता से गौर किए बिना उनके बयान का समर्थन कर रहे हैं, वे लोग अपना बहुत बड़ा नुक़सान कर रहे हैं।


समाप्त

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

पहले ही हो सकते थे पीटर मुखर्जी अरेस्‍ट, क्या रोका गया राकेश मारिया को..?

मीडिया टायकून और स्टार इंडिया के पूर्व सीईओ प्रीतम ऊर्फ पीटर मुखर्जी का अपनी पत्नी इंद्राणी मुखर्जी के परिवार या उसके द्वारा शीना बोरा की फिल्मी स्टाइल में की गई सनसनीखेज हत्या की कोई जानकारी न होने का तर्क पहले मुंबई पुलिस के गले भी नहीं उतरा था और सीबीआई भी उनसे इंप्रेस्‍ड नहीं हुई और देश की सबसे प्रतिष्ठित इनवेस्टिगेटिंग एजेंसी ने आख़िरकार पीटर को शीना बोरा हत्याकांड में गुरुवार की शाम गिरफ़्तार कर लिया। पीटर पर शीना बोरा हत्याकांड में जानकारी छुपाने और सबूत नष्ट करने जैसे संगीन आरोप लगाए गए हैं। अब उनके बेटे और शीना के लिव-इन पार्टनर राहुल मुखर्जी से सघन पूछताछ की जा रही है।
Indrani
पीटर मुखर्जी गिरफ़्तारी के बाद सवाल उठने लगा है कि चूंकि वह शुरू से बार-बार अपने बयान बदल रहे थे और उनकी भूमिका भी संदिग्ध हो गई थी, इसके बावजूद तत्कालीन मुबई पुलिस कमिश्नर राकेश मारिया ने उन्हें गिरफ़्तार क्यों नहीं किया? मारिया ख़ुद दो हफ्ते से ज़्यादा समय तक पीटर से पूछताछ ही करते रहे। हैरानी वाली बात है कि मारिया अपने ट्रांसफ़र की पूर्व संध्या तक पूछताछ ही करते रहे। इन परिस्थियों में सिर्फ़ दो ही सवाल उठ रहे हैं कि या तो मारिया पीटर को गिरफ़्तार नहीं करना चाहते थे या फिर उन्हें पीटर को गिरफ़्तार नहीं करने दिया गया और ट्रांसफर कर दिया गया। हालांकि मारिया के ट्रांसफर के एक दिन पहले देर रात तक ख़बर आईं कि पीटर मुखर्जी को पुलिस गिरफ्तार करने वाली है। यहां एक बात स्पष्ट है कि मारिया ने साफ़-साफ कहा भी था, पीटर मुखर्जी को क्लीन चिट नहीं दी गई है। अभी वह शक के दायरे में हैं।
दरअसल,  केस की शुरूआती जांच के दौरान पीटर से लगातार पूछताछ से ही साबित हो गया था कि पीटर गोलमोल जवाब दे रहे हैं जो पुलिस के गले नहीं उतर रहा है। इसी बीच बीजेपी के सांसद और पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह का बयान आ गया था कि मारिया की पीटर से दोस्ती है। हालांकि इस पर मारिया ने सफ़ाई दी थी कि वह शीना हत्याकांड से पहले तक पीटर से मिले तक नहीं थे। मारिया ने यह भी कहा था कि अगर उन्हें इस केस को दबाना होता तो जो मर्डर तीन साल तक ओपन ही नहीं हुआ, उसे वह अब क्यों ओपन करते। फिर मारिया ने पीटर को अरेस्ट क्यों नहीं किया। अगर उनके ऊपर पीटर को गिरफ़्तार न करने का दबाव था, तो उन्हें इसका खुलासा करना चाहिए।
indrani-mukherjea-new6.jpg
दरअसल, शीना बोरा मर्डर केस में इंद्राणी की गिरफ़्तारी पर हैरानी का इज़हार करते हुए पीटर ने मीडिया से कहा था, "मेरी बीवी की छोटी बहन है। ऐसा मुझे 15 साल से पता है। मुझे मालूम नहीं था कि वो बहन नहीं बेटी है। मैं इंद्राणी के अभिभावकों से कभी मिला नहीं हूं। प्रॉपर्टी का विवाद है भी या नहीं, इस बारे में मुझे पता नहीं है। शीना और इंद्राणी के बीच तकरार हुई यह भी मुझे नहीं मालूम था। शीना का मेरे बेटे के साथ अफेयर था, लेकिन मैंने इसे अहमियत नहीं दी। इसके बाद से शीना मेरे पास कभी नहीं आई। बाद में इंद्राणी ने मुझे बताया गया था कि उसने शीना को पढ़ाई के लिए अमेरिका भेज दिया। हालांकि मेरे बेटे ने मुझे बताया था कि शीना अमेरिका से नहीं लौटेगी।“
मुख्य आरोपी इंद्राणी अपने पति पीटर से 17 साल छोटी है। पीटर से शादी के समय वह 30 साल की थी और पीटर 47 साल के थे। शादी से पहले इंद्राणी ने अपनी बेटी और बेटे के उम्र के शीना और मिखाइल बोरा को क्रमशः अपनी बहन और भाई बताकर पीटर से इंट्रोड्यूस किया था। पीटर इंद्राणी से बेइंतहां प्यार करते थे, इसलिए उसकी बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लिया, क्योंकि वह उनकी जीवनसंगिनी बनने जा रही थी। पीटर 12 साल तक इंद्राणी के पति के रूप में उसके साथ रहे, लेकिन इंद्राणी के शीना और मिखाइल से संबंधों से अनजान ही रहे।
दरअसल, वह इस रहस्य से महीने भर या साल दो साल अनभिज्ञ रह सकते थे। लेकिन 12 साल तक अंधेरे में रहने की बात किसी के गले नहीं उतर रही थी। दरअसल, हाईप्रोफाइल शीना हत्याकांड का सबसे बड़ा राज़ यही था।  लोग सोच रहे थे, वह आदमी जो एक विदेशी टीवी चैनल्स समूह को देश में स्टेबलिश्ड करने और नंबर वन बनाने की क्षमता रखता है। हज़ारों लाखों लोगों से मिलता हो और उनसे काम लेता हो। वहीं आदमी इतने लंबे समय तक अपनी ही बीवी के बच्चों की हक़ीक़त क्या वाक़ई नहीं जान पाया?
यही तर्क पहले मुंबई पुलिस के गले नहीं उतरा और अब सीबीआई के। इसीलिए शीना बोरा हत्याकांड की में पीटर को जानकारी छिपाने और सबूत मिटाने जैसे आरोपों के बिना पर गिरफ्तार कर लिया। सीबीआई ने पीटर को गिरफ्तार करने का फैसला करने से पहले उनसे कई घंटे पूछताछ की। बाद में सीबीआई प्रवक्ता ने कहा कि जांच के दौरान पीटर का नाम सामने आया और उन्हें गिरफ्तार किया गया है। कहा जा रहा है कि शीना बोरा हत्याकांड की जानकारी पीटर को थी, लेकिन उन्होंने उसे पुलिस के साथ शेयर नहीं किया। दरअसल, सीबीआई के सामने पीटर के बयानों में कथित विरोधाभास के बाद उनको गिरफ्तार करने का फैसला किया गया।
Rakesh Maria thinking for resigning after trasnfer
यह केस 29 सितंबर को सीबीआई को सौंपा गया था और 50 दिन की जांच के बाद सीबीआई ने इंद्राणी मुखर्जी, उनके पूर्व पति संजीव खन्ना और ड्राइवर श्याम राय के ख़िलाफ़ 19 नवंबर को करीब हज़ार पन्नों की चार्जशीट दायर की। इस केस में 150 गवाह हैं। चार्जशीट में सीबीआई ने कहा है कि इंद्राणी ने रात में शीना का शव अपने घर पर रखा और फिर उसे ठिकाने लगाने के लिए अगली सुबह रायगढ़ के जंगल ले गई। इस केस में सीबीआई इंद्राणी के ड्राइवर को सरकारी गवाह बना सकती है, क्योंकि उसका बयान 164 के तहत दर्ज कराया गया है।
शीना के जीवित रहते इंद्राणी उसे बेटी की बजाय बहन बता कर दुनिया के सामने पेश किया करती थी और उसकी हत्या के बाद इंद्राणी ने कथित रूप से उसके दोस्तों और परिवार वालों को बताया कि वह पढ़ाई करने अमेरिका चली गई है। इस मामले की जांच के दौरान पता चला कि शीना रिश्ते में अपने सौतेला भाई राहुल मुखर्जी से प्रेम किया करती थी, जो कि पीटर मुखर्जी की पहली शादी हुआ बेटा था। शुरुआती जांच के मुताबिक, इंद्राणी दोनों के इस रिश्ते के खिलाफ थी और यही शीना के कत्ल की वजह बनी।
आपको बता दें कि 24 साल की शीना बोरा का शव हत्या के तीन महीने बाद रायगढ़ के जंगल में मिला था। इस मामले में शीना की मां इंद्राणी पर आरोप है कि उसने अपने पूर्व पति संजीव खन्ना और ड्राइवर श्यामवर राय के साथ मिलकर अपनी बेटी की गला घोंट कर हत्या कर दी और फिर उसका शव जंगल ले जाकर जला दिया था। इंद्राणी, खन्ना और राय फिलहाल यहां न्यायिक हिरासत में बंद हैं।