शनिवार, 31 दिसंबर 2016

नोटबंदी - लोगों की असुविधा के लिए बैंकवालों को माफ़ नहीं किया जाना चाहिए

हरिगोविंद विश्वकर्मा
2016 आख़िरकार बीत गया। साल के अंतिम 53 दिन बेहद संकट भरे रहे। संकट इतना गहरा रहा कि पैसे होने के बावजूद मध्यम वर्ग पाई-पाई का मोहताज़ रहा। डिमोनिटाइज़ेशन की घोषणा करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने समर्थकों (जिन्हें मोदी विरोधी भक्त कहते हैं) के हीरो बन गए, लेकिन अपने विरोधियों, ख़ासकर गैरदक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों के लिए मोदी विलेन बन गए। नोटबंदी की घोषणा के बाद मोदी समर्थकों के साथ आम जनता को भी लगा कि कालधन रखने वालों के बुरे दिन आ गए, लेकिन जब धन्नासेठों के पास नए नोटों की गड्डियां मिलने लगी तो लोगों का मोदी से मोहभंग होने लगा और लोग मानने लगे कि आम आदमी को बेवकूफ बनाने के लिए यह योजना शुरू की गई।

कई लोगों ने और बहुसंख्यक जनता ने भी माना कि मोदी की नोटबंदी की योजना ठीक थी, लेकिन बैंकवालों ने एक साज़िश के तहत इसे फेल कर दिया। इसीलिए देश में आजकल बैंक और बैंक अधिकारी विलेन बने हुए हैं। ट्रेन हो, बस हो या फिर चाय की दुकान, लोग बैंकवालों को ही कोस रहे हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी, बीजेपी और आरएसएस के टिपिकल विरोधी इसे प्रधानमंत्री की नई चाल मान रहे हैं। उनके अनुसार नोटबंदी फेल होने पर लोग मोदी को नहीं, बल्कि बैकों को गाली दे रहे हैं यानी मोदी के किए की सज़ा भुगत रहे हैं बैंकवाले। दरअसल, बैंकों को लोग इसलिए भी कोस रहे हैं, क्योंकि नोटबंदी के बाद जो भी रुपए वितरित हुए, उसे केवल बैंकों ने ही वितरित किया। लिहाज़ा, लोगों को जो भी असुविधा हुई या हो रही है, उसके लिए सरकार से ज़्यादा बैंकें ज़िम्मेदार हैं।

दरअसल, अतीत पर नज़र डाले तो भारत में बैंकों का कामकाज कभी भी चर्चा का विषय नहीं रहा है। एकाध मामले को छोड़ दें, तो बैंकवाले आमतौर पर ऊपर से देखने में बहुत ईमानदार माने जाते रहे हैं, जबकि यह सच नहीं है। सच तो यह है कि तमाम बैंक अफ़सरान आम जनता के लिए बहुत सख़्त मालूम पड़ते हैं, लेकिन धन-कुबेरपतियों के सामने नरम हो जाते हैं और बिना बारीक़ी से जांच पड़ताल किए करोड़ों रुपए का क़र्ज़ मंजूर करके ख़ूब दरियादिली दिखाते हैं। इसके बावजूद इक्का-दुक्का केसेज़ को छोड़ दें तो बैंकवालों पर सरकार या दूसरी एजेंसियों की नज़र नहीं के बराबर रहती है।

यही वजह है कि बेइमान धन्नासेठों से सांठगांठ करके बैंकवाले करोड़ों रुपए का क़र्ज़ बांटते रहे हैं, जो दो चार साल बाद बैड लोन में तब्दील हो जाता है, लेकिन इसके लिए किसी क़र्ज़दाता बैंक ने कभी क़र्ज़ मंजूर करने वाली शाखा के तत्कालीन मैंनेजर को दोषी नहीं ठहराया। यहां तक कि ऐयाशी के लिए मशहूर विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस के क़रीब 1201 करोड़ रुपए समेत 63 लोन डिफॉल्टर्स के 7000 (सात हज़ार) करोड़ रुपए को बट्टे खाते (क़रीब-क़रीब माफ़ कर देना) में डालने के स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के फ़ैसले पर किसी ने सवाल नहीं उठाया। इतनी बड़ी रकम बट्टे खाते में डालने पर एसबीआई के एक भी अधिकारी की नौकरी नहीं गई। यहां तक कि इन 63 लोगों को लोन मंज़ूर करने वाले एसबीआई अफ़सरों से भी जवाब-तलब नहीं किया गया।

लब्बोलुआब यह कि परदे के पीछे काम करने के कारण बैंकवालों को पूरा भरोसा था कि नोटबंदी के बाद भी वे जो कुछ करेंगे उस पर किसी एजेंसी की नज़र नहीं पड़ेगी। लिहाज़ा, मौक़ा मिला है तो हाथ साफ़ कर लेने में कोई बुराई नहीं। लगता है, बैंकवालों का यही अति आत्मविश्वास अब भारी पड़ रहा है। दरअसल, 8 नवंबर 2016 की शाम जब प्रधानमंत्री ने 500/1000 की नोट बंद करने की घोषणा की तो जनता को लगा बहुत अच्छा फ़ैसला है, लेकिन बैंकवाले उसी समय भांप गए कि बिना तैयारी के शुरू की गई यह योजना देर-सबेर टांय-टांय फिस्स होने वाली ही है। सरकार ने इस योजना में इतनी ज़्यादा बार संशोधन किया कि वाक़ई लगने लगा कि उसने इसे बिना तैयारी के शुरू कर दिया था।

जो भी हो बैंकवालों ने नोटबंदी योजना के तमाम लूप होल्स को फ़ौरन पढ़ लिए। लिहाज़ा, उन्होंने सोचा कि क्यों न इन लूप होल्स का फ़ायदा उठाकर अपने ख़ास लोगों का कल्याण करते हुए उनके पुराने नोट (कालेधन) नई करेंसी में बदल दिए जाएं। जोड़-घटाने और आंकड़बाजी में बेहद उस्ताद बैंकवालों ने कैलकुलेट कर लिया था कि अगर बांटने के लिए रिज़र्व बैंक से मिली धनराशि जनता से पैनकार्ड लेकर अपने ख़ास लोगों को दे दी जाए तो सरकार बिल्कुल भांप ही नहीं पाएंगी। न ही पकड़ पाएगी। इससे उनकी सेहत पर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्योंकि इतने माइक्रो लेवल पर जांच पड़ताल करेगा कौन?

इसके बाद बैंक वालों ने वह खेल खेलना शुरू किया जो अब तक अरबपतियों के क़र्ज़ को बैडलोन में तब्दील होने को जस्टीफाई करने के लिए खेलते आ रहे हैं। इस बार खेल था 500/1000 की पुरानी करेंसी को 2000 की नई करेंसी में बदलने का। पूरे देश सोचता रहा कि बेचारे बैंकवाले बिना छुट्टी के दिन-रात काम कर रहे हैं, जबकि बैंकवाले कैश बांटने की बजाय रसूखदार लोगों को नई करेंसी की गड्डी की गड्डी पहुंचाने में लगे थे। पहले दो हफ़्ते नोटबंदी की आड़ में ब्लैक मनी हो ह्वाइट करने का खेल बदस्तूर जारी रहा। इसका नतीजा यह हुआ कि एक सीरीज़ के ढेर सारे नोट कुछ चंद लोगों तक पहुंच गए।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), इनकम टैक्स (आईटी) और लोकल पुलिस द्वारा
देशव्यापी छापे मारकर जिस तरह से रसूखदार लोगों के पास से रोज़ाना करोड़ों रुपए पकड़े जा रहे हैं। यानी जिस तरह दो हज़ार की नई करेंसी की गड्डियां और सोने के भंडार ज़ब्त किए जाने की ख़बरें आ रही हैं। उससे ऐसा लगता है जैसे बैंकवालों ने 2000 रुपए की नई करेंसी का ज़्यादातर हिस्सा रातोंरात रसूखदार लोगों को दे डाला और बेचारा आम आदमी लाइन में खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार करता रह गया। नंबर आने पर उसे कैश ख़त्म होने का बोर्ड देखने को मिला।

सरकार के निर्देश पर रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने कहा कि एक आदमी एक दिन में केवल दो हज़ार रुपए एटीएम से निकाल पाएगा। यानी एक एटीएम कार्ड होल्डर एक दिन में केवल 2000 रुपए (500 की नई नोट जारी होने के बाद 2500) की एक नोट पा सकता है। यानी अगर एटीएम 24 घंटे चलता (जो हुआ नहीं) तब एक आदमी के पैसे निकालने में 2 मिनट जोड़ लें तो दिन भी में अधिकत 720 लोग 14 लाख 40 हज़ार रुपए निकाल सकते थे। इसी तरह चेक के ज़रिए शेविंग अकाउंट से 10 हज़ार रुपए यानी 2000 की पांच नोट और करेंट अकाउंट से 24 हज़ार रुपए यानी 2000 की 12 नोट ले सकते हैं, लेकिन यहां तो रसूखदार लोगों के पास से एक-एक, दो-दो, तीन-तीन, चार-चार करोड़ नहीं बल्कि दस-दस और बीस-बीस करोड़ रुपए मिल रहे हैं। एक सज्जन के पास तो 250 करोड़ रुपए की 2000 की गड्डियां मिलीं, वह भी एक सीरियल की नोट यानी ये नोट एक ही बैंक से आए होंगे। इसका यह भी मतलब है कि बैंकें आम आदमी को पैसे नहीं हैं कहकर बेरंग लौटा रही थीं और पैसे रसूखदार लोगों तक पहुंचा रही थीं।

सवाल यह है कि 2000 की एक नोट (एटीएम) या पांच नोट (शेविंग खाता) की बजाय लोगों के पास गड्डी की गड्डी कैसे पहुंच गई। इसका क्या जवाब है, जो लोग बैंकवालों को ईमानदार बता रहे हैं। जिस तरह से काला धन रोज़ाना पकड़ा जा रहा है, उसे बैंकवाले कैंस करेंगे जस्टीफाई। ज़ाहिर है, भारतीय बैंकों ने देशवासियों ही नहीं पूरे देश को धोखा दिया। चंद ईमानदार बैंक अफ़सरों व कर्मचारियों को स्वाभाविक तौर पर बुरा लग सकता है, लेकिन इस कटु सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि नोटबंदी की घोषणा और 2000 की नोट जारी किए जाने के बाद भारतीय बैंकों ने देश के साथ गद्दारी की।

8 नवंबर के बाद बैंकों ने जो कुछ किया, उसकी गहन जांच-पड़ताल के लिए एक आयोग यानी कमीशन बिठाने की ज़रूरत है और ज़ब्त की जा रही 2000 रुपए की गड्डियां जिस बैंक से दी गई हों, उस बैंक के पूरे ब्रांच के सभी अधिकारियों-कर्मचारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार ही नहीं, बल्कि देशद्रोह का भी मामला दर्ज करके उन पर मुक़दमा चलाया जाना चाहिए और उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए, क्योंकि बैंक अफसरों ने कैश धनराशि अगर रसूखदार लोगों को न देकर आम जनता में बांटा होता तो लोगों को इतनी ज़्यादा असुविधा नहीं होती, जितनी हुई या अभी तक हो रही है। बैंकवालों को माफ़ नहीं किया जाना चाहिए।


गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

2012 दिल्ली गैंगरेप - इंसाफ़ के लिए कब तक करना होगा इंतज़ार?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
16 दिसंबर का दिन संभवतः हर किसी को याद होगा। चार साल पहले इसी दिन राजधानी दिल्ली में एक चलती हुई बस में एक बर्बरतापूर्ण गैंगरेप हुआ था। उसकी चौथी बरसी पर एक बार फिर लोग गाहे-बगाहे सवाल उठा रहे हैं कि आख़िर ग़ुनाहगारों को अब तक सज़ा क्यों नहीं दी गई? सरकार की ओर से कहा जा रहा हा कि उसने तो अपनी तरफ़ से दोषियों को सज़ा देने की प्रक्रिया में पूरी कर दी। मतलब, दिल्ली पुलिस ने रिकॉर्ड समय में मामले की जांच करके आरोप पत्र दाखिल कर दिया। इसके बावजूद अपराधी अभी तक ज़िंदा है।

दरअसल, चार साल पहले दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों को जल्दी सज़ा देने के लिए फास्टट्रैक कोर्ट का गठन किया गया था। रोहिणी की फास्टट्रैक कोर्ट ने 173 दिन यानी छह महीने से भी कम समय में सज़ा सुना दी थी। बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी 180 दिन यानी छह महीने के अंदर फांसी की सज़ा पर मुहर लगा दी थी। उस समय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों कार्यपालिका (पुलिस+सरकार), विधायिका (संसद) और न्यायपालिका (निचली अदालत+दिल्ली हाईकोर्ट) की सक्रियता देखकर एक बार पूरे देश को लगा और भरोसा भी हुआ कि पूरी व्यवस्था बदल जाएगी। ऐसे प्रावधान हो गए हैं कि कोई बलात्कार की हिमाकत नहीं करेगा। महिलाओं पर यौन हमला करने वाला हर अपराधी जेल में होगा।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। तमाम कवायदें टांय-टांय फिस्स हो गईं, क्योंकि देश का सबसे महत्वपूर्ण मुक़दमा 14 मार्च 2014 से यानी क़रीब-क़रीब तीन साल (2 साल 10 महीने) से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। अगर कहें कि इस देरी से देश में कम से कम बलत्कृत महिला को जल्दी न्याय दिलाने की सरकार की कोशिश की हवा देश की सबसे बड़ी अदालत में निकल गई, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। मतलब, आप सरकार में हैं तो चाहे जितना उछल कूद लें, कमेटी बिठा लें, जांच करवा लें और फॉस्टट्रैक कोर्ट बना लें, लेकिन फ़ैसला अदालत मुक़दमे की प्रक्रिया पूरी होने पर ही देगी। अब व्यवस्था ही ऐसी है तो सुप्रीम कोर्ट क्या करे।

बहरहाल, 16-17 दिसंबर 2012 की रात आठ से नौ के बीच पैरामेडिकल छात्रा के साथ छह दरिंदों ने इतना अमानवीय व्यवहार किया था कि लड़की का शरीर ही नष्ट हो गया। भारत में डॉक्टरों ने उसकी जान बचाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। भारतीय डॉक्टरों के नाकाम होने पर उसे सिंगापुर के विश्वविख्यात माउंट एलिजाबेथ अस्पताल ले जाया गया, फिर भी उसकी जान नहीं बचाई जा सकी। कहने का मतलब दो हफ़्ते मौत से जूझने के बाद 29 दिसंबर को वह यमराज से उसी तरह हार गई, जैसे दो हफ़्ते पहले बलात्कारियों से लड़ने के बाद हार गई थी।

गैंगरेप की दुनियाभर में निंदा हुई थी। देश में कहीं शांतिपूर्ण तो कहीं उग्र प्रदर्शन भी हुए थे। दिल्ली में प्रदर्शन के उग्र होने पर मेट्रो सेवा बंद करनी पड़ी थी। रायसीना हिल्सरोड पर तो दिल्ली पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज कर दिया था। घटना के दो दिन बाद संसद के दोनों सदनों में जोरदार हंगामा हुआ था। आक्रोशित संसद सदस्यों ने रेपिस्ट्स के लिए फ़ांसी की सज़ा तय करने मांग की थी। इसके बाद तत्कालीन गृहमंत्री सुशीलकुमार शिंदे ने संसद को आश्वासन दिया कि आरोपियों को जल्द से जल्द सज़ा दिलवाने की सरकार की ओर से हर संभव कोशिश की जा रही है और राजधानी दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा के लिए हर संभव क़दम उठाए जा रहे हैं।

वह घटना कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्र ने महिलाओं के ख़िलाफ़ बढ़ते य़ौन अपराध को रोकने के लिए कठोर क़ानून बनाने की घोषणा की। लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे जस्टिस जेएस वर्मा की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया गया। कमेटी ने दिन रात काम किया। उसे ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी समेत देश-विदेश से क़रीब 80 हजार सुझाव मिले। कमेटी ने रिकॉर्ड 29 दिन में 630 पेज की रिपोर्ट 23 जनवरी 2013 को सरकार को सौंप दी।

कमेटी को महिलाओं पर यौन अत्याचार करने वालों को कठोरतम दंड देने की सिफारिश करनी थी। लोगों को उम्मीद भी थी कि बलात्कारियों को फ़ांसी की सज़ा देने का प्रावधान किया जाएगा। मगर कमेटी की रिपोर्ट बेहद निराशाजनक रही। रिपोर्ट में कमेटी ने रेप को रेयर ऑफ़ रेयरेस्ट केस माना ही नहीं, जबकि देश का पूरा नेतृत्व हर बलात्कारी को फ़ांसी की सज़ा देने के पक्ष में था। इसीलिए, वर्मा कमेटी की रिपोर्ट पढ़कर कई महिला संगठनों ने आरोप लगाए थे कि पुरुष प्रधान समाज में पले-बढ़े और न्याय-व्यवस्था का संचालन करने वाले जस्टिस वर्मा संभवतः बलत्कृत स्त्री की पीड़ा महसूस करने में असफल रहे, अन्यथा हर बलात्कारी के लिए फ़ांसी की सज़ा की सिफ़ारिश ज़रूर करते।

वस्तुतः कमेटी ने रेप के बाद लड़की की हत्या या मौत को रेयरेस्ट ऑफ़ रेयर ज़रूर माना और हत्यारे रेपिस्ट के लिए मौत की सज़ा का प्रावधान किया। इसके अलावा जस्टिस वर्मा ने यौन अपराध करने वालों को कड़ी सज़ा का प्रावधान किया जिसके चलते तरुण तेजपाल जैसे तथाकथित बुद्धिजीवी पुलिस की गिरफ़्त में आए। बहरहाल, 21 मार्च 2013 को लोकसभा ने बलात्कार विरोधी बिल पास कर दिया और इस क़ानून को क्रिमिनल लॉ संशोधन अधिनियम 2013 कहा गया।

दिल्ली गैंगरेप पर बीबीसी के लिए फिल्मकार लेस्‍ली एडविन ने 'इंडियाज डॉटर्स' शीर्षक से डॉक्‍यूमेंट्री बनाई थी, जिसमें उन्होंने देश में महिलाओं या लड़कियों के प्रति पुरुष की मानसिकता को बताने की हर संभव कोशिश की थी। इसके लिए उन्होंने तिहाड़ जेल में एक आरोपी का इंटरव्यू भी लिया था। उस इंटरव्यू के कारण यह वृत्तचित्र विवाद में आ गया। उस पर प्रसारण से पहले ही बैन लग गया। भारत सरकार के सख़्त होने पर वृत्तचित्र के कंटेंट को यू-ट्यूब से भी हटाना पड़ा।

इस बीच दिल्ली गैंगरेप के मुख्य आरोपी ड्राइवर रामसिंह ने न्यायपालिका से पहले ख़ुद को सज़ा दे दी और 11 मार्च 2013 की सुबह तिहाड़ जेल में ख़ुकुशी कर ली। पिछले साल बरसी के दो दिन बाद यानी 16 दिसंबर की रात पीड़ित लड़की पर सबसे ज़्यादा हैवानियत करने वाला आरोपी मुहम्मद अफरोज भारतीय न्याय-व्यवस्था पर हंसता हुआ जेल (सुधार घर) से बाहर आया, क्योंकि रेप करते समय उसकी उम्र 18 साल से कुछ दिन कम थी यानी वह नाबालिग था।

दिल्ली गैंगरेप के बाक़ी चार आरोपियों मुकेश सिंह, अक्षय ठाकुर, विनय शर्मा और पवन गुप्ता को विशेष त्वरित अदालत ने दोषी क़रार देते हुए फ़ांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है। बेशक न्यायपालिका के पास वर्कलोड ज़्यादा है. जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के एक जज दो साल पहले हैदराबाद में एक सेमिनार में कह चुके हैं कि देश में 65 हज़ार (64,919) आपराधिक मुक़दमे लंबित हैं। वैसे पूरे देश में तीन करोड़ मुकदमे अंडरट्रायल हैं। इसके बावजूद दिल्ली गैंगरेप की सुनवाई हो जानी चाहिए थी।

जो भी हो, नया अपराध क़ानून के बने क़रीब तीन साल होने वाले हैं, लेकिन इसके तहत अभी तक किसी को सज़ा नहीं हुई है। एक लड़की के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या करने वाले कोलकाला के गार्ड धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को फांसी दी गई थी। मौत की सज़ा पाने वाला धनंजय अब तक एकमात्र रेपिस्ट है। नए क़ानून के बाद दिल्ली के अलावा मुंबई शक्तिमिल कंपाउंड गैंगरेप समेत कई बलात्कार के आरोपियों को निचली अदालतों की ओर से फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है, लेकिन सभी मुक़दमे ऊपरी अदालतों में लटके पड़े हैं।

संभवतः यही वजह है कि तमाम कोशिश के बावजूद रेप की वारदातें रोके नहीं रुक रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक़, पिछले साल बलात्कार के 3,27,394 मुक़दमे दर्ज हुए। इसी तरह 2014 में 36735 महिलाएं बलात्कार की शिकार हुईं। 2013 में रेप के 33707 और 2012 में 24923 मामले केस हुए थे। 2014 में रोज़ाना 101 रेप की वारदात दर्ज हुई। यानी 14 मिनट में एक महिला अपनी इज्ज़त गंवा बैठती है। सन् 2012 के बाद रेप की घटनाओं में सात फ़ीसदी से ज़्यादा बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली और मुंबई महिलाओं के लिए सेफ मानी जाती है, लेकिन यहां बलात्कार की घटनाएं सबसे ज़्यादा होती है। अकेले दिल्ली में रोज़ाना चार महिलाएं रेप की शिकार होती हैं।

उर्दू के मशहूर शायर ख़्वाज़ा हैदर अली 'आतिश' का शेर बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का, जब चीरा तो क़तरा-ए-खूं न निकला। इस देश की व्यवस्था की करनी-कथनी में अंतर बयां करता है। मतलब, कभी लोग क्रांति करने के लिए उतावले हो जाते हैं और कभी घटना ही विस्मृत कर देते हैं। सरकार भी पीछे नहीं रहती और घोषणा पर घोषणा करने लगती है, यह सोचे बिना ही कि घोषणा पर अमल संभव है या नहीं। इतनी सक्रियता देखकर लगता है कि अब ऐसी वारदातें भविष्य में नहीं होंगी, लेकिन जल्द ही लोग घटना ही भूल जाते हैं और पुलिस कांख में डंडा दबाए फिर से वही खैनी खानेवाली मुद्रा में आ जाती है। उसका यह अप्रोच हर घटना को लेकर रहता है। चाहे वह आतंकी हमला हो या फिर महिलाओं पर यौन हमला यानी गैंगरेप।

समाप्त

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

बैंकिंग सिस्टम की साख पर लगा बट्टा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
एक तरफ़ रोज़ाना प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और इनकम टैक्स (आईटी) के छापे में चंद लोगों के पास से कई-कई करोड़ रुपए ज़ब्त किए जा रहे हैं और निजी बैंक और नैशनलाइज़्ड बैंक ही नहीं बल्कि रिज़र्व बैंक के अधिकारी पकड़े जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर लोग खाते में पैसे होने के बावजूद पैसे-पैसे के लिए मोहताज़ हैं और बैंकों का चक्कर काट रहे हैं।

डिमॉनिटाइज़ेशन यानी नोटबंदी की घोषणा को एक महीने से कुछ ज़्यादा हो गए हैं, लेकिन तमाम बैंकों और एटीएम सेंटर्स के सामने लगने वाली लाइन कम होने का नाम ही नहीं ले रही है। मुंबई में हालात अपेक्षाकृत थोड़े सुधरे हुए ज़रूर लग रहे हैं, लेकिन देश के बाक़ी हिस्से में लंबी लाइनों का सिलसिला बरक़रार है। यह सच है कि नवंबर महीने में जितनी भीड़ थी, अब उतनी तो नहीं है, लेकिन अब भी लोग अपने ख़ून-पसीने की कमाई बैंक से निकालने के लिए कई-कई घंटे संघर्ष कर रहे हैं।

परेशान लोगों के जले पर नमक छिड़कते हुए केंद्र सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की ओर से दावा किया जा रहा है कि 90 फ़ीसदी एटीएम अपडेट कर दिए गए हैं और वे काम करने लगे हैं, लेकिन सच यह है कि किसी भी ओर निकल जाइए, आपको हर जगह 90 फ़ीसदी एटीएएम केंद्रों पर शटर गिरा हुआ ही दिखेगा। अभी एक न्यूज़ चैनल ने मुंबई में कोलाबा से बोरिवली, मुलुंड और मानखुर्द तक सभी निजी और राष्ट्रीयकृत बैंकों के एटीएम चेक करवाया तो पता चला 90 फ़ीसदी से ज़्यादा एटीएम पर अब भी ताला लगा हुआ है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बैंकवाले केंद्र सरकार को ग़लत रिपोर्ट दे रहे हैं? अगर हां, तो सवाल है कि बैंकवाले ऐसा क्यों कर रहे हैं? आख़िर वे कौन लोग हैं जो सरकार को गुमराह करते हुए बता रहे हैं कि 90 फ़ीसदी एटीएम काम करने लगे हैं। जिस तरह से देश में रोज़ाना अलग-अलग हिस्से में करोड़ों रुपए में नई करंसी के पकड़े जाने की ख़बरें आ रही हैं। उससे लोग हतप्रभ हैं कि वे तो महज़ दो हज़ार रुपए की एक नोट पाने के लिए कई-कई घंटे एटीएम की क़तार में खड़े हो रहे हैं, फिर इतनी बड़ी मात्रा में नई करेंसी चंद लोगों के पास कैसे पहुंच रही है?

दरअसल, प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और इनकम टैक्स अधिकारियों की जांच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं, उन पर एक बार किसी को यक़ीन नहीं होगा। पिछले 30-33 दिनों में बैंकवालों ने जो कुछ किया, उससे देश का पूरा बैंकिंग सिस्टम सवालों के घेरे में आ गया है। दरअसल, निजी बैंकों में जो घपले हुए सो हुए, कई नैशनलाइज़्ड बैंकों के असरों ने जमकर काल धन सफेद किया। यहां तक कि रिज़र्व बैंक का अधिकारी भी कालाधन सफ़ेद करने के अभियान में लग गया।

बेंगलुरु से 93 लाख रुपए के नए नोट बरामद होने की घटना सामने आने के बाद अब पुलिस ने रिजर्व बैंक अधिकारी के माइकल को गिरफ्तार कर लिया। माइकल पर 1.51 करोड़ के पुराने नोटों को नई करेंसी  से बदलने का आरोप है। माइकल कमीशन के लिए पुराने नोटों को नए नोटों से बदल रहा था। इसके पास से 17 लाख रुपए नकद बरामद हुआ है। इस अधिकारी पर दलालों के साथ मिलकर कालेधन को सफेद करने का आरोप है।

बहरहाल, बैंकवालों ने जो कुछ किया, वे तमाम बुरे कारनामे अगर सार्वजनिक कर दिए गए तो लोग बैंकों पर दोबारा कभी भरोसा नहीं करेंगे। लोग बैंकों पर आंख मूंदकर भरोसा करते रहे हैं और स्वेच्छा से अपने व्यक्तिगत दस्तावेज़ उनके हवाले कर देते हैं। भविष्य में जब उन्हें पता चलेगा कि उनके व्यक्तिगत दस्तावेज़ों को ग़लत इस्तेमाल किया गया तब खाताधारक को क्या सदमा नहीं लगेगा। इस बार बैंकवालों ने यही सब किया है।

सीबीआई ने बेंगलुरु के इंदिरानगर शाखा के कर्नाटक बैंक के चीफ़ मैनेजर सूर्यनारायण बेरी को फर्जीवाड़े में पकड़ा है। दरअसल, नोटबंदी की घोषणा के बाद सूर्यनारायण ने पूरी शाखा के साथ मिलकर अपने खाताधारकों के पैन कार्ड का गलत इस्तेमाल करके अवैध लेनदेन किया। बैंक ने ग्राहकों को एक बार पैसे देकर उनके पैन कार्ड का विवरण ले लिए, जब कस्टमर्स दोबारा ब्रांच में गए तो उन्हें नए नोट नहीं होने का हवाला देकर लौटा दिया गया। बैंकरों ने इन कस्टमर्स को पैसे देने के बजाय नए नोटों का अवैध लेनदेन किया।

सीबीआई जांच में पाया गया कि धनलक्ष्मी बैंक के 31 एटीएमों में डाले जाने के लिए 1.30 करोड़ रुपये के नए नोट जारी किए गए थे, लेकिन पैसे कर्नाटक सरकार के शीर्ष अधिकारी एससी जयचंद्र और चंद्रकांत रामलिंगम समेत अनेक सहयोगियों के पास पहुंच गए। हालांकि बाद में इन सबको सस्पेंड कर दिया गया। दरअसल, नोटबंदी के बाद दो दिन एटीएम बंद रहे। इस दौरान कछेक एटीएमों को अपडेट कर दिया गया। इसके बावजूद एटीएम चालू नहीं किए गए। कई यूं ही डेड पड़े रहे। अब जांच में पता चला है कि एटीएमों के लिए दिए गए नए नोटों से काला धन सफेद किया गया और नए नोट काले धनवालों के पास पहुंचा दिया गया।

ये तो दो उदाहरण है। बैंक अधिकारियों द्वारा 8 नवंबर के बाद जमकर घोटाला किया गया। लोगों की यह भी धारणा बन गई है कि जनता को जो भी कठिनाई हो रही है उसके लिए केवल बैंकवाले ही ज़िम्मेदार है। दरअसल, अकूत काला धन रखने वाले बैंक अधिकारी नहीं चाहते है कि प्रधानमंत्री की नोटबंदी के ज़रिए काला धन नष्ट करने की योजना फलीभूत हो। इसीलिए वर्कलोड का रोना रोते हुए इस योजना की हवा निकाल रहे हैं। बैंक अफसर नोटबंदी के लूपहोल्स का फ़ायदा उठाकर कालाधन जमकर सफ़ेद कर रहे हैं।

आजकल ट्रेन या बस में नोटबंदी और बैंकर्स के कथित भ्रष्टाचार की ही चर्चा है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि बैंकवालों ने पूरे जीवन की कमाई एक महीने में ही कर ली। जिस तरह से रोज़ाना नई करेंसी देश के हर कोने से ज़ब्त हो रही है, उससे तो लोगों की आशंका सच लग रही है। ओवरटाइम कार्य का हवाला देकर बैंकवाले केवल कालेधन को सफ़ेद करने में जुटे हैं। दादर पूर्व में एक बैंक के गेट के सामने सैंडविच बेचने वाला एक दिन उसी बैंक से सौ-सौ रुपए के कई बंडल लेकर निकला। पूछने पर पहले तो उसने आनाकानी की, फिर बताया कि बैंक में उसकी सेटिंग है, इसलिए, उसने ख़ूब पैसे एक्सचेंज किए।

रिज़र्व बैंक के डिप्टी गवर्नर आर गांधी ने 13 नंवबर को अधिकृत बयान जारी किया कि नोटबंदी के बाद 10 दिसंबर तक बैंकों ने 35 दिन में 4.61 लाख करोड़ रुपये नए नोट वितरित कर दिए गए हैं। मात्रा के हिसाब से कुल 21.8 अरब नोट जारी हैं. इनमें से 20.1 अरब नोट 10, 20, 50 और 100 रुपये के हैं. वही 500 और 2,000 के कुल 1.7 अरब नए नोट जारी किए गए हैं। वहीं दूसरी ओर बैंकों में 12.44 लाख करोड़ रुपये के पुराने 1000 और 500 के नोट जमा हुए हैं. रिजर्व बैंक और करेंसी चेस्ट को लौटाए गए पुराने नोट 12.44 लाख करोड़ रुपये के हैं। वहीं दूसरी ओर बैंकों में अब तक 12.44 लाख करोड़ रुपये के पुराने 1000 और 500 के नोट जमा हुए हैं। अभी इससे कुछ ही ज़्यादा करेंसी कालाधन के रूप में लोगों के पास है, जिसके 30 दिसंबर तक बैंक में जमा होने की उम्मीद है।


नोटबंदी पर बैंकवालों की भूमिका की जांच करने के लिए ईडी, सीबीआई और इनकमटैक्स डिपार्टमेंट का एक टॉस्क फोर्स या आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं बैंकों में काम करने वालों की निजी संपत्तियों की जांच की जानी चाहिए और उनकी संपत्ति की उनके आय के स्रोतों से मिलान की जानी चाहिए। इसके अलावा नोटबंदी के बाद जिन लोगों को पुराने नोट स्वीकार करने अनुमति दी गई थी। उनके लेनदेन की बारीक़ी से जांच होनी चाहिए कि 8 नंवबर के बाद उनका लेनदेन अचानक बढ़ क्यों गया, जबकि नोटबंदी के बाद पूरा देश मंदी के दौर में है।

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

कौन होगा जयललिता का उत्तराधिकारी ? नेतृत्व संकट से जूझ सकती है एआईडीएमके


नेतृत्व संकट से जूझ सकती है एआईडीएमके

हरिगोविंद विश्वकर्मा
मायावाती और ममता बैनर्जी की तरह जयराम जयललिता ने भी अपनी पार्टी के भीतर सेकेंड इन कमान यानी दूसरे नंबर की लीडरशिप को पनपने ही नहीं दिया। इसके चलते भविष्य में ऑल इंडिया द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (एआईडीएमके) को नेतृत्व संकट से गुज़रना पड़ सकता है। फ़िलहाल, जयलिलता की गैरमौजूदगी में दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके ओ पनीरसेल्वम को राजभवन में राज्यपाल विद्यासागर राव ने राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में शपथ तो दिला दी, लेकिन वह पार्टी को एकजुट रख पाएंगे और उसे जीत दिला पाएंगे यह भरोसा राजनीति के जानकार नहीं कर पा रहे हैं।

पनीरसेल्वम के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी पार्टी संगठन पर उतनी मजबूत पकड़ नही है जितनी जयललिता की थी। इतना ही नहीं जयललिता की छत्रछाया में वह अपनी खुद की कोई खास छवि या प्रभाव नहीं बना पाए। भविष्य में अगर किसी दूसरे नेता ने उन्हें रिप्लेस किया तो उनकी यही कमज़ोरी ज़िम्मेदार होगी। तमिलनाडु की दो बड़ी पार्टियों में डीएमके के एम करुणानिधि तो अपने बेटे और बेटियों को राजनीति में लाकर अपने उत्तराधिकारी के विकल्प दे दिए, लेकिन जयललिता ऐसा नहीं कर पाईं। यही वजह है कि उनकी पार्टी को भविष्य में नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ सकता है।

इसमें दो राय नहीं कि तमिलनाडु ही नहीं देश की राजनीति में जयललिता ने अपना क़द इतना विराट कर लिया था कि उनके दल में कोई भी नेता क़द में उनकी बराबरी तो दूर उनके आसपास भी नहीं पहुंच सकता। यह वजह है कि एआईडीएमके भविष्य में उसी तरह नेतृत्व संकट से गुज़र सकती है, जैसे एमजी रामचंद्रन के निधन के बाद हुई थी। उस समय रामचंद्र की पत्नी जानकी रामचंद्रन और जयललिता के बीच उत्तराधिकारी बनने के लिए भयानक संघर्ष और विधान सभा में मारपीट तक हो गई थी। बहरहाल चुनाव में जानकी की पराजय के बाद जयललिता निर्विवाद रूप से पार्टी की नंबर एक नेता बन गईं।

दरअसल, जैसे उत्तर प्रदेश और बिहार की जनता परिवारवाद की आदी तमाम नाकामी के बावजूद वह मुलायम सिंह यादव, मायावती और लालू प्रसाद यादव में ही भरोसा जताती है। वैसे ही दक्षिण भारत की प्रजा अभिनेताओं को भगवान की तरह पूजने वाले स्वभाव की होती है। ये नेता चाहे जितना भ्रष्टाचार करें, जनता उन्हें ही चुनेगी। यही वजह है कि तमिलनाडु में पिछले 60 साल से बारी बारी से डीएमके या एआईडीएमके सत्ता में आती रही है।

वस्तुतः जनता की इसी मानसिकता के कारण दक्षिण के राज्यों में एमजी रामचंद्रन, जयललिता और एनटी रामाराव की बोलबाला रहा। यहां तक कि द्रविड़ मुनेत्र कज़गम के नेता और पांच बार मुख्यमंत्री रह चुके एम करुणानिधि भी तमिल फिल्म और तमिल साहित्य के नामचीन नाम रहे हैं। तमिलनाडु में रजनीकांत की लोकप्रियता का आलम यह है कि उनकी फिल्म फ्लॉप फिल्म भी इतना ज़्यादा बिज़नेस कर लेती है कि हिंदी की हिट फिल्म भी उतने पैसे नहीं कमा पाती है।

अब सवाल उठ रहा है कि करिश्माई नेता के नेतृत्व की आदी तमिल जनता 65 साल के पनीरसेल्वम को अपने नेता के रूप में स्वीकार कर पाएंगी, इस पर बहुत भारी संदेह है, क्योंकि जयललिता का अंधभक्त होने के नाते उन्हें भले सरकार का मुखिया बना दिया गया हो, लेकिन वह पूरी पार्टी को संभालकर एकजुट रख पाएंगे और करुणानिधि को चुनैती दे पाएंगे इस पर भी दुविधा है। फिर पार्टी में जयललिता का कद इतना बड़ा था कि उनकी पार्टी में सब उनके आगे बौने लगते हैं।

दरअसल, पनीरसेल्वम की इमैज जयललिता के कट्टर भक्त की रही है। यहां तक कि 2014 में भ्रष्टाचार के आरोप में जयललिता के जेल भेजे जाने के बाद वह सार्वजनिक मंच पर फूट-फूट कर रोए थे। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते समय भी पूरे देश ने उन्हें मंच पर ही अपने आंसू बहाते देखा था। बहरहाल, इस साल सितंबर में जयललिता के बीमार होने पर पनीरसेल्वम ही जयललिता के नाम पर तमिलनाडु का राजकाज संभाल रहे थे। जयललिता के आठ विभागों का प्रभार उन्हें ही दिया गया था।

राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि जयललिता के उत्तराधिकारी और तमिलनाडु के अगले मुख्यमंत्री के रूप में 45 साल के दक्ष‍िण भारतीय सुपरस्टार थला अजित कुमार पनीरसेल्वम से बेहतर विकल्प हो सकते थे। वह युवा हैं और सबसे बड़ी बात उस परंपरा के प्रतिनिधि है। जिससे एमजी रामचंद्रन और जे जयलिलता इस मुकाम तक पहुंची हैं यानी वह ग्लैमरस दुनिया के आदमी है, तमिल जनता जिनकी दीवानी रही है।

जयललिता की हालत बहुत ज़्यादा बिगड़ने के बाद सोमवार को कहा जा रहा था कि जयललिता ने अपनी वसीयत में लिखा हुआ है कि अजित कुमार ही उनके उत्तराधिकारी होंगे। इस वसीयत से जयललिता के तमाम बेहद भरोसमंद सहयोगी अच्छी तरह अवगत थे लेकिन, कहा जा रहा है कि सियासत का कोई अनुभव नहीं होने के कारण अंतिम समय में पनीरसेल्वम को ही जयललिता का उत्तराधिकारी और मुख्यमंत्री बनाने का फ़ैसला किया गया।

तमिलनाडु की जनता भावुक स्वभाव की होती है। अभिनेताओं के रूपहले परदे की छवि को ही असली मानती आई है। यही वजह है कि इस दक्षिणी राज्य में अभिनेताओं की लोकप्रियता सिर चढ़कर बोलती है। एमजी रामचंद्रन और जयललिता अपने रूपहले परदे की इमैज के चलते लोकप्रियता के शिखर तक पहंचने में कामयाब रहे। इसी परिपाटी के चलते जयललिता के उत्तराधिकारी के रूम में अजीत कुमार का नाम आगे किया जा रहा था।  

मुख्यमंत्री की कुर्सी पर शशिकला नटराजन की भी नज़र थी। शशिकला जयललिता की सबसे करीबी मानी जाती रही हैं। एक जमाने में कहा जाता था कि जयललिता के हर फैसले के पीछे शशिकला का हाथ होता है लेकिन बाद में दोनों के रिश्तों में खटास आ गई थी। शशिकला भी पनीरसेल्वम की तरह थेवर समुदाय से हैं। उनका प्रभाव जयललिता के करीबी लोगों में तो है पर वह परदे के पीछे ही काम करती रही हैं इसलिए कहा जाता है कि उनके पास जनाधार नहीं है। फिर शशिकला पर भी जयललिता के साथ इन पर भ्रष्‍टाचार के मामले चले हैं। उनके भतीजे सुधाकरन को जयललिता ने दत्‍तक पुत्र माना था और 1995 में उसकी भव्‍य शादी के चर्चे आज भी होते हैं। शादी में खर्चे के कारण जयललिता की आलोचना भी हुई थी और बाद में उन पर जो आरोप लगे उसकी पृष्ठिभूमि शाही शादी ही थी।


वैसे तो एआईडीएमके में 78 साल के पानरुति रामचंद्रन, लोकसभा के उप सभापति एम. थंबीदुरई, मंत्री इडापड्डी पलानीस्वामी, अन्नाद्रमुक के उभरते सितारे 57 साल के एम फोई पांडियाराजन और शीला बालाकृष्‍णन भी संभावित उत्तराधिकारियों की फेहरिस्त में हैं। पनीसेल्वम करुणानिधि और उनके बेटे को चुनौती देते हुए पार्टी का सफल नेतृत्व कर पाएंगे, इस पर इस समय दावा करना आत्मघाती हो सकता है। फ़िलहाल तो राज्य में सात दिन का राजनीतिक शोक है। कोई गतिविधि उसलके बाद होगी।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

जनरल क़मर जावेद बाजवा के पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष बनने के बाद भारत को सीमा पर ज़्यादा चौकस रहना होगा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
पाकिस्तान के निवर्तमान चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टॉफ़ जनरल राहील शरीफ़ भारत के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हुए, उनके कार्यकाल में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर सबसे ज़्यादा सीज़फायर का उल्लंघन हुआ था। लेकिन कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल क़मर जावेद बाजवा भारत के नज़रिए से जनरल शरीफ़ से भी ज़्यादा ख़तरनाक जनरल साबित हो सकते हैं, क्योंकि उनको कश्मीर मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है और वह सैन्य ट्रेनिंग मामलों में भी बहुत कुशल सेना अधिकारी रहे हैं। सबसे अहम पाकिस्तानी आईएसआई के डायरेक्टर जनरल को भी कोर कमांडर बनाकर कराची भेजा जा रहा है यानी वहां भी नया व्यक्ति आएगा।

लिहाज़ा, जनरल याह्या खान (1966 से 1971), जनरल असलम बेग (1988 से 1991) और जनरल अशरफ परवेज कयानी (2007 से 2013) के रूप में देश को तीन-तीन सेनाध्यक्ष देने वाले बलूच रेजीमेंट के जनरल बाजवा के पाकिस्तान का नया चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टॉफ़ बनाए जाने के बाद भारत को ज़्यादा सीमा पर चौकस नज़र रखनी होगी, क्योंकि जनरल बाजवा कश्मीर में पोस्टिंग के दौरान बेहद निरंकुश थे और उनके 26 महीने का कार्यकाल में पाकिस्तान की ओर से एलओसी पर सबसे ज़्यादा सीज़फायर का उल्लंघन हुआ था।

जनरल क़मर जावेद बाजवा के कार्यकाल में भारतीय सेना को सीमा -लाइन ऑफ़ कंट्रोल (एलओसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) दोनों पर ख़ासा मुस्तैद रहना होगा। ख़ासकर पाकिस्तान कश्मीर ही नहीं पूरे भारत को अस्थिर करने के लिए जनरल बाजवा की अगुवाई में ज़्यादा से ज़्यादा आतंकवादियों की घुसपैठ कराने का दुस्साहस ज़्यादा कर सकता है, क्योंकि ख़ुद जनरल बाजवा कश्मीर के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ हैं। भारतीय सैनिकों का सिर जनरल बाजवा के कार्यकाल में काटा गया था।

दरअसल, लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और भारत से लगी अतंरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर सक्रिय दो बटालियनों में से एक 10 वीं कोर (कोर्प टेन) के अगस्त 2013 से सितंबर 2015 तक कमांडर रहे हैं। 10 कोर पाकिस्तान की सबसे बड़ी बटालियान है और जिसकी तैनाती सियाचिन से रावलपिंडी तक है। इसमें पूरा लाइन ऑफ कंट्रोल का एरिया भी शामिल है। इसके अलावा लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा नॉर्दर्न एरिया फोर्स कमांड के चीफ रहे हैं। इस रेजिमेंट की तैनाती पूरे गिलगिट-बल्तिस्तान में रही है।

राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि जनरल बाजवा को उनके कश्मीर अनुभव के आधार पर ही प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने उन्हें सेना प्रमुख के पद की रेस में जनरल स्टाफ के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जुबैर महमूद हयात पर तरजीह दी। वरिष्ठता क्रम में फ़िलहाल सैन्य मुख्यालय में चीफ ऑफ जनरल स्टाफ पद पर तैनात लेफ्टिनेंट जनरल हयात जनरल बाजवा से ऊपर थे। लिहाज़ा, सेनाप्रमुख पद पर पहले उनका दावा था। हालांकि हयात को ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमन पद पर नियुक्त करके नवाज़ शरीफ ने उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश की है। बहरहाल, प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति मामनून हुसैन ने दोनों सैन्य अधिकारियों को थ्री स्टार से प्रोन्नत कर फोर स्टार रैंक दे दिया।

वस्तुतः वरिष्ठता क्रम में दूसरा नाम लेफ्टिनेंट जनरल अश्फाक नदीम अहमद का था जो मुल्तान के कोर कमांडर हैं। इससे पहले वह चीफ ऑफ जनरल स्टाफ रह चुके हैं। उन्होंने स्वात और उत्तरी वज़ीरीस्तान में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की है। बहरहाल, चारो नामों में लेफ्टिनेंट जनरल जावेद इक़बाल रामदेई के सेना प्रमुख बनाए जाने की चर्चा ज़्यादा थी, क्योंकि घायल सैनिक होने के कारण वह सेना और देश में ज़्यादा लोकप्रिय हासिल हैं। यही लोकप्रियता उनके आड़े आ गई। हालांकि जनरल राहील शरीफ़ भी नहीं चाहते थे कि लेफ्टिनेंट इक़बाल उनके उत्तराधिकारी बनें।

बहरहाल, तमाम सस्पेंस और अटकलों को विराम देते हुए शनिवार को घोषित किया गया कि लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा पाकिस्तान का 16 वें आर्मी चीफ होंगे। वज़ीरे आजम नवाज शरीफ ने उनको आर्मी चीफ़ के पद पर नियुक्त करने का फ़ैसला लिया। शरीफ ने उपलब्ध सीमित विकल्प में लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा में ज़्यादा भरोसा जताया। जनरल बाजवा 29 नवंबर को जनरल राहिल शरीफ के स्थान पर पाकिस्तानी फौज के नये प्रमुख बन जाएंगे।

दरअसल, 24 अक्टूबर 1980 को 16 बलोच रेजिमेंट में कमीशन पाने वाले जनरल बाजवा का 10 कोर के कमांडर के तौर पर कार्यकाल काफी चर्चित रहा। 10 कोर का गठन 1974 में लेफ्टिनेंट जनरल अफ़ताब अहमद ख़ान ने 1974 में की। इसका मुख्यालय रावलपिंडी में है। इसे उर्दू में आफ़ताब यानी 10 सूर्य किरण के नाम पर किया गया। यह कश्मीर में हर ऑपरेशन के लिए ज़िम्मेदार होती है। बहरहाल, 10 कोर ने जनरल अशफ़ाक़ कियानी के बाद देश को दूसरा सेनाध्यक्ष दिया है।

पाकिस्तान में सेना प्रमुख बदलना बहुत बड़ी घटना मानी जाती है। संभवतः वहां प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति चुनने से ज़्यादा मशक़्कत भरा सैनाध्यक्ष का चयन होता है। बहरहाल, पाकिस्तान ने शांति के साथ अपने सेनाध्यक्ष को बदल दिया। हमारे पड़ोसी मुल्क में सेनाध्यक्ष को जैसी ताक़त हासिल है, उसे देखते हुए यह बहुत बड़ी घटना मानी जाती है। यह तय था कि जनरल शरीफ को सेवा विस्तार नहीं मिलने जा रहा है। तभी से नए सेना प्रमुख के नाम की अटकल लगाई जा रही थी।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और उत्तरी इलाके गिलगिट-बल्तिस्तान में मामलों से निपटने में माहिर माने जाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा अभी तक पाकिस्‍तानी सेना मुख्‍यालय (जीएचक्‍यू) में प्रशिक्षण और मूल्यांकन विभाग में महानिरीक्षक पद पर कार्यरत थे। कांगों में संयुक्त राष्ट्र के इंटरनैशनल पीस मिशन के दौरान भी ब्रिगेडियर रहते हुए बाजवा अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वहां पर वह भारत में सेना प्रमुख रह चुके जनरल बिक्रम सिंह के मातहत थे। इसके अलावा, बाजवा क्‍वेटा के इन्‍फैंट्री स्‍कूल में भी काम कर चुके हैं।

पाकिस्तानी सूत्रों का कहना है कि कश्मीर मामले का अच्छा जानकार माने जाने वाले जनरल बाजवा जेहादी ताकतों को पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा भी मानते हैं। अब आने वाला समय ही बताएगा कि कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों को पाकिस्तानी सेना की मदद में इजाफा होगा या कमी आएगी। वैसे बाजवा के करीबियों के मुताबिक़, वह सुर्खियों में रहना पसंद नहीं करते और अपनी सेनाओं से करीबी से जुड़े रहते हैं। दरअसल, जनरल कमर जावेद बाजवा को पाकिस्‍तान की सेना और राजनीति में बेहद मजबूत पकड़ मानी जाती है। वह कश्‍मीर ऑपरेशंस पर बेहद रुचि लेते हैं और कट्टर विचारधारा के हैं।

जनरल रहील शरीफ और पीएम नवाज शरीफ के रिश्तों में खटास सार्वजनिक थी। इस वजह पिछले दो साल के दौरान देश में सत्ता विभाजित थी। जनरल शरीफ़ जहां राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से जुड़े सारे फ़ैसले ले रहे थे, वहीं नवाज़ शरीफ की सरकार अर्थव्यवस्था और सामान्य प्रशासन संभाल रही थी। माना जा रहा है कि जनरल बाजवा और नवाज़ शरीफ के बीच रिश्ते बेहतर रहेंगे। पाक के रक्षा हलक़ों में इन दिनों बलूचिस्तान के मामले में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की नीतियों के प्रति गहरी चिंता जताई जा रही है। बाजवा की चुनौतियों में इसे प्रमुख मुद्दा बताया जा रहा है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पास सेनाध्यक्ष को सेवावृद्धि देने का अधिकार है, कहा जा रहा है कि इसी खटास के कारण जनरल शरीफ़ को सेवा विस्तार नहीं दिया गया। बेबाक और अनुशासित सैन्य अफसर जनरल जहांगीर करामत को छोड़ दें तो क़रीब क़रीब सारे सेनाध्यक्षों ने सेवावृद्धि ली है। 1998 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नवाज शरीफ ने जनरल करामत से पद छोड़ने का आग्रह किया था। इसके बाद उन्होंने समयपूर्व इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद सेनाध्यक्ष पद पर जनरल परवेज मुशर्रफ की नियुक्ति का रास्ता साफ हुआ था। मुशर्रफ ने 1999 में करगिल में घुसपैठ की साजिश अंजाम दी। बाद की घटनाओं की अंतिम परिणति नवाज शरीफ के तख्ता पलट में हुई थी।


शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

ग़ज़ल - ख़यालों में वफा

ख़यालों में वफा
जो भी सच है उसको कबूल कर
कल्पनाओं से अपने को दूर कर

वह तेरा नहीं है उसको भूल जा
कुछ बोलने को मत मजबूर कर

उससे मिलना महज संयोग था
जो तेरा भ्रम है उसको दूर कर

वो तेरा होता तो तेरे साथ होता
उसे अपनाने का मत कसूर कर

निगल जा सच को ज़हर समझ
बस ख़यालों में वफा भरपूर कर


हरिगोविंद विश्वकर्मा

बुधवार, 16 नवंबर 2016

बाल ठाकरे की कीर्ति हिंदुस्तान की सरहद के बाहर तक गई ( पुण्यतिथि पर विशेष)

हरिगोविंद विश्वकर्मा
शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे भारत के उन चंद नेताओं में से रहे जिनकी न्यूज़वैल्यू अंतिम समय तक जस की जस रही। यही वजह से है कि उनकी कीर्ति हिंदुस्तान की सरहद के बाहर तक गई और क़द पाने वाले ठाकरे महाराष्ट्र के इकलौते नेता रहे। इसमें दो राय नहीं कि मराठी मानुस से  जैसा मान-सम्मान और प्यार बाल ठाकरे को मिला वह विरले ही राजनेताओं को मिल पाता है। शिवसेना का आम कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि मराठी समाज का एक बहुत बड़ा तबका आज भी ठाकरे को भगवान की तरह पूजता है। यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर शिवाजी पार्क में ठाकरे को श्रद्धा सुमन अर्पित करने वालों का तांता लग जाता है।

बहरहाल, देश भर में बालासाहेबके रूप में लोकप्रिय रहे ठाकरे देश के उन नेताओं में से रहे जिनका करिश्मा लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। उनकी एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते थे। उनकी सभाओं में अपार भीड़ जुटती थी। इसीलिए उनकी शुमार उन नेताओं में होती है, जिन्होंने केवल अपने ही दम पर एक राजनीतिक दल को खड़ा ही नहीं किया, बल्कि उसे सत्ता भी दिलवाई। लेकिन ख़ुद कभी कोई पद क़बूल नहीं किया। उनका यही त्याग उन्हें बाक़ी राजनेताओं से उन्हें अलग करता है।

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में प्रोग्रेसिव ऐक्टिविस्ट प्रबोधनकार ठाकरे उर्फ केशव के घर 23 जनवरी 1926 को जन्मे ठाकरे बचपन से ही होनहार थे। पुणे की आबोहवा का असर उन पर जीवन भर रहा और वह पूरी तरह मराठी संस्कृति में रच-बस गए थे। उनकी वाणी में जादू ही नहीं, करिश्मा भी था जिसमें भीड़ खींचने का माद्दा होता था। उनके अंदर व्यंग्य कार्टूनिस्ट ने बचपन में ही जन्म ले लिया था। परंतु उसे सही फोरम 1950 के दशक में मिला जब कार्टूनिस्ट के रूप में उन्हें फ्रीप्रेस जर्नल में नौकरी मिल गई। उनके कार्टून इतने अपीलिंग थे कि टाइम्स ऑफ इंडिया भी संडे एडिशन में छापने लगा। इस प्रोत्साहन से प्रेरित होकर ठाकरे ने 1960 में कार्टून साप्ताहिक मार्मिक शुरू किया।

बाल ठाकरे का कारवां एक बार मंज़िल की ओर बढ़ा तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मराठी समाज के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने 19 जून 1960 में शिवसेना की स्थापना की। शिवसेना का लक्ष्य शुरू में मराठीभाषियों को नौकरी दिलाना था, क्योंकि उन दिनों नौकरी में मराठी कम्युनिटी के लोग बाक़ी लोगों के मुक़ाबले पिछड़े थे। ऐसे में ठाकरे की पहल को अभूतपूर्व प्रतिसाद मिला। ख़ासकर मराठी युवाओं ने उन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया। उन्होंने मुंबई ट्रेड यूनियनों में कम्युनिस्टों का एकाधिकार ही ख़त्म कर दिया। उसकी जगह शिवसेना की कामगार सेना ने ले ली। ये वह दौर था जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक खुलकर ठाकरे को प्रमोट कर रहे थे। इसीलिए ठाकरे के उदय में वसंतराव नाईक का बड़ा योगदान माना जाता है।

मराठी मानुस के लिए बहुत ज़्यादा डेडिकेटेड ठाकरे जीवन भर मराठी भाषा और संस्कृति के पैरोकर रहे। उनकी राह में जो भी आया, उससे उनका पंगा हो गया। चाहे वो साठ के दशक में गुजराती मारवाड़ी रहे हों या फिर सत्तर के दशक में दक्षिण भारतीय या फिर अस्सी-नब्बे के दशक में उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग। यही वजह है कि अभी 2010 में जब क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर ने मुंबई के बारे में ठाकरे की नीति के विपरीत कमेंट किया तो ठाकरे उन पर भी भड़क उठे। हालांकि तकनीकी तौर पर ठाकरे ने कभी किसी भी व्यक्ति या समुदाय का सीधे विरोध नहीं किया। वह तो बस मराठी समाज को उसका अधिकार देने की पैरवी करते रहे हैं सो उनकी विचारधारा से इत्तिफाक न रखने वालों से टकराव लाजिमी ही था।

छह दशक के पब्लिक लाइफ़ में ठाकरे हमेशा किसी न किसी विवाद में रहे। सबसे बड़ा विवाद उनकी हिंदुत्ववादी विचारधारा पर रहा। उनके अतिवादी हिंदुत्ववाद ने उन्हें कट्टर मुस्लिम विरोधी बना दिया। शिवसेना उन लोगों का विरोध करती थी, जिनकी आस्था, उनके अनुसार, भारत की बजाय पाकिस्तान में थी। वह मुंबई में अशांति के लिए बांग्लादेशियों को ज़िम्मेदार ही मानते थे। इसी लाइन पर चलते हुए ठाकरे ने 2002 में इस्लामी आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए हिंदू आत्मघाती दस्ता बनाने की पैरवी। उनका बयान मीडिया की सुर्खियां में रहा। हिंदू संस्कृति के पैरोकार ठाकरे वेलेंटाइन डे को हिंदू सभ्यता के अनुकूल नहीं मानते थे। उनके भाषण के कारण निर्वाचन आयोग ने उनसे छह साल के लिए मतदान का अधिकार भी छीन लिया था।

हिटलर एवं इंदिरा गांधी के प्रशंसक और तमिल चीतों के समर्थक ठाकरे का यह करिश्मा ही था सत्तर के दशक तक छोटी पार्टी रही, शिवसेना अस्सी के दशक में सशक्त जनाधार वाली पार्टी बना गई। ठाकरे ने ऐलान किया कि विधान भवन पर भगवा ध्वज फहराकर रहेंगे। लक्ष्य हासिल करने के लिए 1987 में बीजेपी से गठबंधन किया। 1995 में शरद पवार और कांग्रेस से उब चुकी जनता ने भगवा गठबंधन पर भरोसा जताया। चुनावों में इस गठजोड़ ने कांग्रेस को धूल चटा दी और ठाकरे का सपना साकार हुआ। लेकिन जनता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए जो टीम बनी, उसने ईमानदारी से काम नहीं किया और 1999 के चुनाव में पिछड़ गया। यानी अगली पीढ़ी के नेता ठाकरे की विरासत को संभाल नहीं पाए।

इस बात में दो राय नहीं रही कि ठाकरे का उत्तराधिकारी बनने में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की लड़ाई से सबसे ज़्यादा नुकसान शिवसेना को उठाना पड़ा। फ़िलाहाल उनकी विरासत उनके पुत्र उद्धव ठाकरे संभाल रहे हैं। बहरहाल, उद्धव-राज की लड़ाई के चलते शिवसेना भगवा ब्रिगेड में भाजपा के बाद नंबर दो की हैसियत वाली पार्टी बन गई। जहां बाल ठाकरे के दौर में सत्तारूढ़ भगवा गठबंधन में शिवसेना सरकार का नेतृत्व कर रही थी और उसने राज्य को मनोहर जोशी और नारायण राणे (अब कांग्रेस में) के रूप में दो चीफ़ मिनिस्टर दिए, वहीं ठाकरे के बाद बीजेपी ने शिवसेना को दूसरे नंबर पर ढकेलते हुए सरकार की कमान अपने हाथ में ले ली।

सन् 2014 के विधान सभा चुनाव में शिवसेना बीजेपी का क़रीब तीन दशक पुराना गठबंधन ही टूट गया और दोनों दल एक दूसरे के सामने आ गए। बहरहाल, चुनाव में एक बार तो 288 सीटों वाली विधानसभा में अपने ही दम पर सरकार बनाती दिखने लगी, लेकिन 22 सीट कम रह गए। बीजेपी ने 27.8 फ़ीसदी वोट हासिल किया और उसके 122 विधायक जीते। दूसरी ओर शिवसेना महज 19.3 फ़ीसदी वोट हासिल कर पाई और 63 सीटों के साथ उसकी स्थिति कमोबेश 2009 के चुनाव जैसी ही रही।

चुनाव प्रचार के दौरान शिवसेना और बीजेपी में इतनी कटुता आ गई कि एक लगा कि दोनों का फिर से गठबंधन असंभव है। उद्धव ठाकरे और उनके सिपहसालारों ने तो चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के ख़िलाफ़ बहुत तल्ख भाषण दिया। बहरहाल, उद्धव को अपनी पार्टी में बग़ावत को रोकने के लिए बहुत मजबूरी में बीजेपी के साथ पोस्ट-इलेक्शन गठबंधन करना पड़ा। उद्धव ने बीजेपी के देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार तो कर लिया, लेकिन हार की पीड़ा अब तक जज्ब नहीं कर पाए हैं। यही वजह है कि सरकार में रहने के बावजूद उद्धव का व्यवहार विपक्षी नेता जैसा होता है। शिवसेना के मुखपत्र सामना के जरिए वह अब भी बीजेपी और केंद्र सरकार पर हमला करते रहते हैं।

यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500 और 1000 रुपए के नोट को बंद करने के फ़ैसले पर भी शिवसेना सरकार में रहकर भी विपक्षी दलों के साथ खड़ी नज़र आ रही है। राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि अगर ठाकरे जीवित होते तो यह तल्खी इतनी न बढ़ती। वैसे ठाकरे की राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं उद्धव का पहले अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से ही सबसे ज़्यादा ख़तरा था, क्योंकि शिवसेना कार्यकर्ता राज ठाकरे में बाल ठाकरे की छवि और स्टाइल देखते थे। यही वजह है कि जब राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया तो एक बार मराठी मुद्दे पर उद्धव को ओवरटेक करने लगे थे।

यही वजह है कि ठाकरे के ज़िंदा रहते ही एमएनएस राज्य में बड़ी ताक़तवर पार्टी बनकर उभरी और 2009 के विधान सभा चुनाव में उसके 13 विधायक चुने गए। 2009 के चुनाव के बाद एक बार तो ऐसा लगा कि राज ठाकरे शिवसेना को ही ख़त्म कर देंगे, क्योंकि बड़ी संख्या में शिवसेना कार्यकर्ता एमएनएस में शामिल होने लगे थे। राज ठाकरे की अपरिपक्व और बचकानी राजनीति के चलते उद्धव ठाकरे को शिवसेना की विचारधारा में राज ठाकरे से एक तरह से वॉकओवर मिल गया। 2014 के चुनाव में तो मराठीवाद का नारा देने वाले राज को मराठी जनता ने अस्वीकार कर दिया और पार्टी महज खाता ही खुल पाया वह भी दूसरे दल से आए नेता ने जीत दर्ज करके एमएनएस के सूपड़ा साफ़ होने से बचाया। अब राज ठाकरे उद्धव ठाकरे के लिए दूर-दूर तक कोई चुनौती ही नहीं रह गए।



शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

क्या मोदी की योजना की पानी फेर रहे हैं RBI, बैंकर्स और नौकरशाह?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 के नोट को वापस लेने की घोषणा करके अपने ढाई साल के कार्यकाल में सबसे बेहतरीन फ़ैसला लिया है। कई लोग उम्मीद कर रहे थे कि सत्ता संभालते ही मोदी 500 और 1000 की नोट बंद कर देंगे, लेकिन उन्होंने यह फ़ैसला लेने में ढाई साल लगा दिया। खैर देर आयद, दुरुस्त आयद। इससे बहुत थोड़े से लोगों को दो-चार दिन असुविधा हो सकती है, लेकिन इसके बाद इस फ़ैसले का दूरगामी परिणाम दिखेगा, लेकिन उससे पहले कुछ दिन तक जनता और देश को भयानक मौद्रिक संकट से गुज़र पड़ सकता, क्योंकि सरकारी मशीनरी इस योजना को पूरे मन से लागू नहीं कर रही है।

दरअसल, देश के उद्योगपतियों, बिल्डरों और कारोबारियो के अलावा जजों, नौकरशाहों, पुलिस अफसरों, सैन्य अफसरों, खिलाड़ियों, बड़े संपादकों ने काले धन का जखीरा कैश के रूप में जमा करके रखा है। इसके अलावा बहुत बड़ा काला धन सरकारी मुलाज़िंमों के पास जमा है। देश में सरकारी कर्मचारियों (केंद्र, राज्य, पब्लिक सेक्टर, बैंक) की कुल संख्या 2 करोड़ हैं। बैंकों में कुल 11 लाख 51 हज़ार (पब्लिक सेक्टर बैंकों में 8 लाख 30 हजार, निजी बैंकों में 2 लाख 96 हज़ार और विदेशी बैंकों में क़रीब 25 हज़ार) लोग काम करते हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे ज़्यादा 1 लाख 98  हज़ार लोगों को नौकरी दे रखी है। सबसे ज़्यादा काला धन सरकारी नौकरी करने वाले इन लोगों के पास है, क्योंकि ये लोग वेतन तो ह्वाइट लेते हैं, लेकिन रिश्वत कैश वसूलते हैं। इसीलिए ये लोग नहीं चाहते कि नरेंद्र मोदी की योजना सफल हो और काला धन बाहर आए।

बैंकों में जो अफरातफरी मची है, उसके लिए बैंक अफसरों-कर्मचारियो, नौकरशाहों और पुलिस अफसरों के नैक्सस की साज़िश है। ज़रूरत से ज़्यादा पैसा रखने वाले यो लोग नहीं चाहते हैं कि प्रधानमंत्री की योजना सफल हो। इसीलिए 10 नवंबर से एटीएम और बैंकों में जिस तरह की लाइन लग रही है, वह अभूतपूर्व घटना है। बैंक के कर्मचारी तो ग्राहकों से बहुत बदतमीज़ी से पेश आ रहे हैं। जो कुछ हो रहा है, उससे लग रहा है कि पानी सिर के ऊपर से जाने लगा है। जो कुछ हो रहा है, उससे साफ़ लग रहा है कि रिजर्व बैंक गवर्नर ऊर्जित पटेल और वित्त मंत्रालय के दूसरे अफसरान हालात का संभाल नहीं पा रहे हैं या जानबूझकर इस फ़ैसले को फेल करना चाहते हैं या जानबूझ कर योजना पर पानी फेर रहे हैं। सबसे ज़्यादा लापरवाही नीजी क्षेत्र के बैंक और उसके कर्मचारी कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस योजना से कोई लाभ नहीं, उल्टा घाटा ही है।

यहां एक उदारहण, वरिष्ठ पत्रकार और नवभारत टाइम्स (मुंबई) के सीनियर क्राइम रिपोर्टर सुनील मेहरोत्रा शुक्रवार को पांच सौ-पांच सौ के चार हज़ार रुपए की पुरानी नोट को एक्सचेंज कराने के लिए निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी बैंक आईसीआईसीआई बैंक की मुंबई के वरली में कमला मिल शाखा में गए। क़रीब तीन घंटे लाइन में लगने के बाद उनसे बैंक के लोग ठीक से पेश नहीं आए। लिहाज़ा, उनको बिना नोट बदले ही वापस लौटना पड़ा। सुनील मेहरोत्रा के मुताबिक, विरोध दर्ज कराने पर बैंक अधिकारी ने कहा, कोटक महिंद्रा बैंक वाले अपने बैंक के अलावा किसी दूसरे बैंक के ग्राहकों से पुराने रुपए ले ही नहीं रहे हैं, हमने तो आपके लिए अलग काउंटर बनाया है। सुनील कहते हैं, यह जवाब सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी बैंक में भीख मानने के लिए खड़ा हूं। कुछ मिनट अपमान सहन करने के बाद बिना रकम लिए यह कहकर वापस चल दिया कि आप लोग कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। यह केंद्र सरकार का आदेश है कि किसी भी बैंक से ग्राहक आया हो आपको नोट बदलनी ही पड़ेगी। या तो सामने लिख दीजिए कि दूसरे बैंक के ग्राहकों की रकम एक्सचेंज नहीं की जा सकती। तब यहां जिनका अकाउंट दूसरे बैंक में हैं, वे लोग नहीं आएंगे।

यह केवल सुनील मेहरोत्रा की समस्या नहीं हैं। यही बर्ताव पूरे देश में हर खाताधारक के साथ बैंक वाले कर रहे हैं। यह साफ़ लग रहा है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया 500 व 1000 की नोट बंद करने पैदा हालात को संभाल नहीं पा रहा है। बैंकों के अफ़सरान एवं कर्मचारी और वित्त मंत्रालय के नौकरशाह सब मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक करने वाली योजना पर जानबूझकर पानी फेर रहे हैं? दरअसल, पहले आम आदमी को लगा था कि प्रधानमंत्री की 500 और 1000 रुपए की नोट बंद करने की योजना सही है, लेकिन पूरे देश में पिछले तीन-चार दिन से जिस तरह भगदड़ मच रही है, उससे तो यही लग रहा है कि हालात सरकार के हाथ से बाहर निकल रहे हैं।

शुक्रवार की सुबह सात बजे से देश भर के एटीएम और बैंकों में रेलमपेल भीड़ लगी है। ऐसा लगा आज के बाद एटीएम और बैंक कभी खुलेंगे ही नहीं। सबसे दुर्भाग्य की बात कि ज़्यादातर एटीएम में पैस खत्म होने का बोर्ड लगा है। बैंकों में ज़्यादातर जगह भीड़ क़ाबू में करने के लिए पुलिस बुलानी पड़ रही है। खाताधारकों का बैंक गार्डों और बैंक अधिकारियों से गर्मागर्म बहस हो रही है। लोग देर रात तक बंद पड़े एटीएम के पास खड़े रहे। अब लोग वाक़ई नाराज़ होने लगे हैं, क्योंकि अब उनके पास बचे हुए 100 या 50 नोट ख़त्म होने लगे हैं और ज़रूरत की रकम उनके हाथ में नहीं आ रही है। बैंक में पैसे होने के बावजूद उनका दैनिक जीवन कष्टमय हो चुका है। प्रधानमंत्र ने इतना बड़ा फ़ैसला लिया है तो अउन्हें देश में ही रह कर हालात पर ख़ुद नियंत्रण रखना चाहिए। 500 व 1000 की नोट बंद करने की निगेटिव इंपैक्ट अपेक्षित था।

इस योजना से 80 करोड़ लोगों को कोई असर ही नहीं पड़ेगा। इसमें पहली कैटेगरी 27 करोड़ आबादी आती है। इन्हें रोज़ाना दो डॉलर यानी 130 से 135 रुपए मजदूरी मिलती है। लोअर मज़दूर वर्ग के इन लोगों की सालाना आमदनी 50 हज़ार से ज़्यादा नहीं होती। इनकी तादाद 23.3 करोड़ यानी क़रीब-क़रीब एक चौथाई है। दिन भर ख़ून पसीना बहाने का बावजूद ये लोग महज 130 रुपए रोज़ पाते हैं। दूसरी कैटेगरी में 49 करोड़ 69 लाख 60 हजार लोग काम करने वाले हैं। इनमें से कुछ को मनरेगा के तहत न्यूसाल भर में न्यूनतम 100 दिन काम और 174 रुपए दैनिक मज़दूरी मिलती है। इऩकी सालाना आमदनी 16 हज़ार से 1 लाख 80 हज़ार रुपए होती है। ये बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। तीसरी और अंतिम कैटेगरी में बेरोज़गार हैं, जिनकी 4 करोड़ 56 लाख हैं। यह आबादी का 3.8 फ़ीसदी है। ये अपने माता-पिता या संरक्षक पर निर्भर होते हैं। इनका जीवन संकटपूर्ण होता है। बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। तीनों केगरी को मिलाकर 80 फ़ीसदी लोग होते हैं। इन पर 500-1000 की नोट बंद करने से न लाभ होगा न नुकसान।

दरअसल, 500-1000 के नोट बंद करने का सबसे ज़्यादा असर जिन 1 फ़ीसदी लोगों पर पड़ रहा है, उनके कारण देश की कुल आबादी की 20 जनता का पेट भरता है। ऐसे में कह सकते हैं कि इन नोटों को बंद करने का असर ज़्यादा से ज़्यादा 20 फ़ीसदी जनता पर पड़ रहा है। ज़रूरत इस बात की है, कि जो लोग 500 और 1000 के नोट ले रहे हैं, उनको भी राडार पर रखने की। ख़ासकर गहने के कारोबार से जुड़े लोगों पर कड़ी निगरानी रखने का वक्त आ गया है। इसके अलावा चार्टर्ड अकाउंटेंट पर भी नज़र रखी जानी चाहिए, जो लोगों को 500 या 1000 के पुराने नोट को बदलने की तरकीब बता रहे हैं। इसका एक और विकल्प हो सकता है कि जितने लोग 500 यी 1000 के नोट दे रहे हैं, उनसे उनके पैन कार्ड की फोटो कॉपी ले लेनी चाहिए।