सोमवार, 25 जनवरी 2016

भारतीय लोकतंत्र पर चंद राजनीतिक परिवारों क़ब्ज़ा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
आज गणतंत्र दिवस है। यह देश का एक राष्ट्रीय पर्व है जो हर साल 26 जनवरी को मनाया जाता है। इसी दिन सन 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया था। दरअसल, भारत को स्वतंत्र और पूर्ण लोकतांत्रिक गणराज्य बनने के लिए 26 नवंबर 1949 को भारतीय संविधान सभा ने मौजूदा संविधान को अपनाया था। एक साल दो महीने बाद इसे लोकतांत्रिक सरकार प्रणाली के साथ विधिवत लागू किया गया था। इस तारीखः का चयन इसलिए भी हुआ, क्योंकि 1930 में इसी दिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत को पूर्ण स्वराज घोषित किया था।

गणतंत्र समारोह पिछले 66 साल से मनाया जा रहा है। ऐसे में यह आकलन तो होना ही चाहिए कि जिस मकसद से भारत को भारतीय गणराज्य यानी इंडियन रिपब्लिक बनाया गया था, वे मकसद पूरे हुए या नहीं? अगर नहीं तो क्योंइस दृष्टि से यह आकलन करने का सर्वोत्तम दिन है, कि आज़ादी या लोकतंत्र का लाभ किन-किन लोगों को सबसे ज़्यादा मिला? इतना ही नहीं, क्या ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें कोई शेयर ही नहीं मिला। यह बहुत बड़ा विषय है, इसलिए आज भारतीय राजनीति में लोकतंत्र को हाईजैक करने वालों पर ही चर्चा सीमित रहेगी।

किसी परिवार में पैदा होना कोई गुनाह नहीं है। इसके लिए किसी को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि कोई कहां पैदा हो, यह प्रकृति तय करती है, लेकिन किसी को उसकी योग्यता और उसके परिश्रम से बहुत ज़्यादा मिल जाना तो गंभीर दोष है और अगर किसी को किसी ख़ास परिवार में पैदा होने के कारण उसकी योग्यता और उसके परिश्रम से ज़्यादा मिला है तो यह बेशक ग़लत है, यह असामाजिक, असंवैधानिक और अनैतिक भी है। कोई नौसिखिया व्यक्ति इसीलिए मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बन जाए कि वह किसी ख़ास आदमी का बेटा या उसके परिवार का है, इसे तो ग़लत कहा जाएगा। तब योग्यता या कॉम्पीटिशन का क्या मतलब रह गया ?

वंशवाद के नाम पर गांधी परिवार को सबसे ज़्यादा कोसा जाता रहा है, जबकि यह सच है कि दूसरे दलों में परिवारवाद - मुलायम-लालू-पासवान-सिंधिया-बादल-ठाकरे-मुंडे-पवार-संगमा-करुणानिधि - ज़्यादा में फैल गया है। बहरहाल, मुद्दा इंदिरा की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाए जाने के बाद ज़्यादा मुखर हुआ और तब से गाहे-बगाहे चलता ही रहा है। देश की राजनीति में परिवारवाद को लेकर चाहे जितनी भी बात की जाए, लेकिन कोई दल इससे अछूता नहीं रहा। राजनीति में परिवारवाद ख़त्म होने की बजाय वटवृक्ष की तरह फैलता जा रहा है। यह कई दशक से कोई दूसरा नेतृत्व तैयार ही नहीं होने दे रहा है।

भारतीय राजनीति में वंशवाद यानी परिवारवाद पर ब्रिटिश लेखक पैट्रिक फ्रेंच ने बहुत लंबे शोध के बाद एक किताब लिखी है, जो 2011 में प्रकाशित हुई और ख़ासी चर्चित भी रही। मजेदार बात यह कि वंशवाद उससे भी आगे बढ़ चुक है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. पिछले चुनाव में 80 करोड़ लोग मतादादा थे। आबादी के हिसाब से दुनिया का हर छठा व्यक्ति भारतीय था, मगर हर 10 में से तीन सांसद एक ही परिवार से आते रहे हैं।

पैट्रिक के अनुसार पिछली लोकसभा में 28.6 फीसदी सदस्य वंशानुगत थे, 6.4 फीसदी इंडस्ट्री या बिजनेस से सीधे आए थे और 9.6 फीसदी अन्य तरह के कनेक्शनों से लोकसभा में थे. केवल 46.8 फीसदी सदस्य ही वंशानुगत नहीं थे। पिछली लोकसभा में 30 साल से कम उम्र के सभी सदस्य परिवार के प्रतिनिधि थे, जबकि 40 साल तक के 65 फीसदी सदस्य वंशानुगत। अगर महिला की बात करें तो क़रीब 70 फीसदी महिला सदस्य राजनीतिक पारिवार की थीं। पैट्रिक फ्रेंच कहते हैं कि अगर संसद में 33 फीसदी रिज़र्वेशन हो गया परिवार की भागीदारी और बढ़ जाएगी।

66 साल के लोकतंत्र में सबसे पिछड़े राज्य यूपी में मुलायम यादव परिवार सबसे ज़्यादा तरक्की किया और तक़रीबन हर सदस्य किसी न किसी पद पर है। मुलायम आजमगढ से लोकसभा में हैं तो बहू डिंपल यादव कन्नौज से। बेटा अखिलेश यादव सूबे का सीएम है, तो भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा में हैं। दूसर भाई शिवपाल यादव राज्य में पीडब्ल्यूडी मंत्री हैं, तो दो भतीजे धर्मेंद्र यादव बदायूं और अक्षय यादव फिरोजाबाद से एमपी हैं। अब बड़े भाई का पोता तेज़ प्रताप यादव भी मैनपुरी से लोकसभा में पहुंच गया है। यह राज्य की ग़रीब जनता का जनादेश है। इसी तरह केवल बेटे को उत्तराधिकारी मानने वाले चारा घोटाले में सज़ायाफ़्ता लालूप्रसाद यादव के दोनों बेटे तेजस्वी और तेजस नीतीश कुमार के बिहार मंत्रिमंडल में मंत्री हैं यह बिहार की जनता जनार्दन का फ़ैसला है।

मजेदार बात यह है कि कई परिवार में तो राजनीति करने लायक जितने भी सदस्य हैं वे सभी किसी न किसी पद पर हैं। कुछ परिवारों ने तो दो-दो दलों में अपनी पैठ बना रखी है और हवा के रूख के हिसाब से अपने भविष्य की राजनीति को तय करते हैं। लेकिन वंश का माल खाकर तरक्की हासिल करना क्या उचित है। पैट्रिक फ्रेंच डाटाबेस के मुताबिक वंशानुगत लोकसभा सदस्य गैर-वंशानुगत सदस्य के मुकाबले औसतन 4.5 गुना अमीर हैं. अगर वंशानुगत सदस्यों में उन सदस्यों की संपत्ति देखी जाए जिनके एक से ज्यादा पारिवारिक कनेक्शन हैं यानी हाइपर वंशानुगत सदस्य, तो पता चलता है कि हाइपर वंशानुगत सदस्य बाकी वंशानुगत सदस्यों के मुकाबले लगभग दोगुना संपत्ति वाले हैं।

बिहार ही नहीं, पंजाब का कैबिनेट भी वंशवाद को पुष्ट करने के लिए काफी है। पंजाब यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर आशुतोष ने एमए की छात्रा गुनरीत कौर की थीसीस का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बादल के पुत्र सुखबीर डिप्टी सीएम हैं, भतीजे मनप्रीत वित्तमंत्री, दामाद आदेश सिंह कैरों (पूर्व सीएम कैरों के पौत्र) मंत्री, करीबी रिश्तेदार, जनमेजा सिचाई मंत्री। सुखबीर के साले बिक्रमाजीत मजीठिया मंत्री रहे हैं। प्रकाश बादल की पत्नी सुरिंदर कौर अकाली दल महिला शाखा की संरक्षक हैं। बहू हरसिमरत कौर केंद्र में मंत्री। शासन ऐसा कर रहा है कि आतंकवादी बेख़ौफ़ राज्य में आने लगे हैं। इसी तरह कैप्टन अमरिंदर सिंह, सिमरनजीत सिंह मान की पत्नी और बेअंत सिंह के बाद सीएम हरचरण सिंह बरार की बहू आपस में बहन हैं।

प्रो आशुतोष कहते हैं, जैसे प्रचीनकाल में हिंदू और मध्यकाल में मुस्लिम शासक अपने राज्य के विस्तार के लिए दूसरी जाति और धर्म में शादियां करते थे या दूसरे रिश्ते बनाते थे उसी तरह आज के राजनेता करते रहे हैं। परिवारिक सदस्य होने के नाते राजनीति में सफल होने के लिए संसाधन आसानी से मिल जाते हैं. आर्थिक संसाधनों के साथ-साथ वंशानुगत राजनीतिक नेटवर्क का फायदा भी मिलता है। परिवार से होने के नाते क्षेत्र व समाज में पारिवारिक दबदबा, खानदानी और जातिगत समर्थन विरासत में मिलता है. इसके चलते राजनीति और सत्ता तक उनकी पहुंच आसानी से हो जाती है। इसके अलावा अनुशासन, वरिष्ठता और नियम-कायदे उन पर लागू नहीं होते हैं। लेकिन आम कार्यकर्ता पर सब कुछ लागू होता है और अगर वह सब अर्हताएं पूरी भी करें तब भी कोई खानदानी नेता सार कि-धर को गुड़गोबर कर सकता है।

कह सकते हैं कि लोकतंत्र के इस तमाशे में हर तरह के लोग हैं। विश्व के लोकतंत्रिक इतिहास में भारत ऐसा देश है, जहां परिवारवाद की जड़ें गहरी धंसी हुई है। आज़ादी के तुरंत बाद शुरू हुई वंशवाद की यह अलोकतानात्रिक परंपरा अपनी जड़े दिनोंदिन गहरी करती जा रही है। राष्ट्रीय राजनीति के साथ-साथ राज्य और स्थानीय स्तर पर इसकी जड़े इतनी जम चुकी है कि देश का लोकतंत्र परिवारतंत्र नजर आने लगा है। इस परिवारतंत्र को कितना लोकतांत्रिक कहा जा सकता है, यह सवाल दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। प्राचीन और मध्यकाल के राजा और सुल्तानों की जगह पोलिटिकल फैमिलीज़ ने ले ली है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं। पहले जैसे राजा का बेटा राज बनता था, वैसे है आज प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का बेटा (या बेटी) प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनता है। इसका साफ मतलब है कि इन दलों में नेतृत्व करने के लिए दूसरा नाम आना असंभव है।

परिवारवादी नेताओं ने राज्य में कैसा शासन किया। एक तस्वीर उसकी भी देखिए। सन् 1943 में ब्रिटिश सरकार ने हेल्थ सेवा के लिए सर जोसेफ भोरे की अध्यक्षता में समिति का गठन किया था, जिसने 1946 में रिपोर्ट दे दी थी। भोरे समिति ने कहा था, हेल्थ सर्विस उपलब्ध कराना सरकार की ज़िम्मेदारी है। पैसे के अभाव में किसी नागरिक को अच्छी स्वास्थ सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता है। अंग्रेज़ सिफ़ारिश को मानकर इलाज मुफ़्त करने वाले थे, लेकिन उनके जाने के बाद आज़ाद भारत में उस रिपोर्ट को डस्टबिन में डाल दिया गया। मतलब अपनी तथाकथित ग़ुलाम जनता के लिए जितने चिंतित गोरे थे, उतनी अपनी सरकार नहीं रही हैं।

सबसे अहम बात यह कि अंग्रेज़ जब देश को भारतीयों के हवाले कर रहे थे, तब देश पर एक पाई भी क़र्ज़ नहीं है, आज हर भारतीय पर औसतन 45 हज़ार रुपए से ज़्यादा क़र्ज़ है। इसी तरह अंग्रेज़ों के समय भारतीय रुपया डॉलर के बराबर था, लेकिन आज एक डॉलर 64 रुपए के बराबर हो गया है। ऐसे हालात में ऐसे बहुत सारे लोग भी मिलेंगे, जो निःसंकोच कह देंगे कि इससे बेहतर को अंग्रेज़ों का शासन था। 

कहा जाता है कि अमेरिका में एक फ़ीसदी लोग शासन करते हैं। यानी महज एक फ़ीसदी लोगों ने डेमोक्रेसी को हाइजैक कर लिया है। भारत में इससे भी कम लोगों ने यह काम कर दिया है। जी हां, भारत में तो यह आधा या एक चौथाई फ़ीसदी नहीं है। लोकतंत्र के 66 साल में एक करोड़ या उससे ज़्यादा वार्षिक आमदनी वाले केवल 42,800 (बयालिस हज़ार आठ सौ) लोग हैं, जो कुल आबादी का 0.00354 फ़ीसदी है। यही लोग लोकतंत्र के लाभार्थी रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि भारत में लोकतंत्र 66 साल के सफ़र के दौरान इसे परिवारतंत्र में बदलने वाली कैंसर जैसी बीमारी लग गई है इस कैंसर जैसी बीमारी का इलाज केवल एक डॉक्टर कर सकता है और वह है भारतीय मतदाता।

समाप्त


रविवार, 24 जनवरी 2016

जूझारू रोहित को मौत में क्यों नज़र आया समाधान?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
इसमें कोई संदेह नहीं कि आत्महत्या एक अमानवीय, दुखद, दहलाने वाली और निंदनीय वारदात होती है। वह किसी अच्छे नागरिक की हो या बुरे की। वह किसी विद्वान की हो या अज्ञानी की। हर हाल में होती तो है हानि एक मनुष्य जीवन की ही। इसमें क़ुदरत से मिली एक बेशकीमती जान चली जाती है, जिसे कोई मां पूरे नौ महीने अपने गर्भ में पालती है। इसीलिए इसे इंसान के जीने के अधिकार का हनन भी माना जा सकता है। आत्महत्या कमोबेश हर संवेदनशील को विचलित करती है। कोई आम आदमी इनके बारे में सोच कर ही थरथरा उठता है। इसके बावजूद, कोई अगर अपनी ही हत्या जैसा घातक क़दम उठाए, तो मन और भी ज़्यादा विचलित होता है। हर आदमी सोचने लगता है कि आख़िर ऐसा क्या हुआ उसके साथ, जिसके चलते उस इंसान ने अपने आपको ही ख़त्म कर लिया?

कमोबेश, विजयवाड़ा के गुरुज़ाला टाउन के दलित समुदाय के छात्र रोहित वेमुला की पिछले हफ़्ते कथित ख़ुदकुशी ऐसे ही सवाल खड़े करती है कि आख़िर ऐसा क्या हुआ जो एक मिशनरी किस्म के जूझारू छात्र ने अचानक से हथियार डाल दिया और उसे अपने तमाम संघर्षों का हल केवल और केवल अपनी मौत में ही नज़र आया। लिहाज़ा, उसने मौत का आलिंगन भी कर लिया। देखिए रोहित का सूइसाइड नोट...

मैं राइटर बनना चाहता था, साइंस का राइटर, लेकिन नौबत ऐसी आ गई है कि अब राइटर के नाम पर मैं अपने हाथ से अपना ही सूइसाइड नोट लिख रहा हूं... कमोबेश यही लिखकर उसने मौत को आत्मसात् कर लिया था। कोई हफ़्ताभर पहले... रोहित की आत्महत्या पर किसी तरह, पक्ष या विपक्ष में चर्चा से पहले यह जान लेना ज़रूरी है कि रोहित का किरदार था कैसा? साइंटिस्ट और साइंस लेखक बनने का सपना देखने वाला साइंस का छात्र कैसे साइंस से सोशल साइंस की दुनिया में चला गया ? जी हां, रोहित ने एमएससी साइंस से की थी, लेकिन पीएचडी वह सोशल साइंस से कर रहा था। यह बहुत बड़ा बदलाव था उसमें जो उसमें छात्र राजनीति का हिस्सा बनने के बाद आया।

दरअसल, जब रोहित गांव से हैदराबाद आया तो खालिस मेधावी छात्र था। उसने अपने दोस्त के आग्रह पर सबसे पहले 2009 के छात्रसंघ के चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के उम्मीदवार को वोट भी दिया था। तब वह साइंस से पढ़ाई कर रहा था। दरअसल, 2004 में हैदराबाद वह एक मिशन लेकर आया था, लेकिन संभवतः विश्वविद्यालय की राजनीति ने उसे भ्रमित कर दिया। साइंटिस्ट बनने का मकसद पीछे रह गया और वह नये ज़माने की राजनीति का हिस्सा बन गया। हैदराबाद पहुंचने पर रोहित के पहले परिचित आंध्रप्रदेश रेज़िडडेंशियल कॉलेज के प्रिंसिपल बी कोंडैया, जो 2004 में वहां लेक्चरर थे, उसे मधुरभाषी और असाधारण प्रतिभाशाली छात्र बताते हैं। कोंडैया के शब्दों में, वह राजनीति से पूरे तरह अछूता था। वह तक तक सही ट्रैक पर था। बारहवीं में उसे 600 में सले 521 अंक मिले थे, 86 फ़ीसदी अंक। रोहित के केमिस्टी टीचर ने भी बताया कि वह फिज़िक्स, केमिस्ट्री और बॉटनी में आसाधारण रूप से तेज़ छात्र था।

22 जुलाई 2010 में फेसबुक वॉल पर अंग्रेज़ी में लिखा, मैंने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में प्रवेश ले लिया है। विश्वविद्यालय में माहौल खुशगंवार है। यहां बहुत अच्छे लोग हैं। मैं बहुत अच्छा महसूस कर रहा हूं। कुछ अच्छे दोस्त बनाने की सोच रहा हूं। एक ख़ास दोस्त के मुताबिक यूजीसी जूनियर रिसर्च फेलोशिप के लिए चयनित होते ही रोहित को हर महीने 28 हज़ार रुपए वजीफा मिलने लगे जिसमें से, बताया जाता है, वह हर महीने 20 हजार रुपए अपनी मां को गांव में भेजता था। पहले वह स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (छात्रों की लेफ़्ट विंग) से जुड़ा था, लेकिन 2014 में अंबेडकर स्टूडेंट असोसिएशन से जुड़कर वह उसका युवा विचारक बन गया था। संभवतः वह इसीलिए सोशल साइंस विषय पर में रिसर्च कर रहा था।

बड़ी अहम बात यह कि मौत में हर समस्या का समाधान उसे अचानक नहीं, बल्कि तीन साल पहले ही लगने लगा था। दरअसल, दिल्ली गैंगरेप की पीड़ित लड़की ज्योति सिंह की सिंगापुर में मौत के बाद अगर रोहित का फेसबुक वाल पर देखा जाए तो यही लगेगा कि ज्योति प्रकरण से ही उसका व्यवस्था से मोहभंग होना शुरू हो गया था। उसने 29 दिसंबर 2012 को लिखा, 545 चुने हुए लोग लड़की के लिए कोई स्टैंड लेने में असफल रहे। एक ऐसा देश, जहां राजनेता चुने हुए दलाल की तरह काम करते हों, जो बिना रिश्वत के काम ही न करें। एक ऐसा देश, जहां बुराई के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने में छात्र शर्म यार डर महसूस करें। एक ऐसा देश, जहां बुद्धिजीवी रुपए बनाने वाली मशीन की तरह चालित हो। ऐसी जगह मौत ही हमें समस्याओं से मुक्त कर सकती है। यानी रोहित के व्यक्तित्व में ख़ुदकुशी के लिए जगह तीन साल पहले से बनने लगी थी। हां, विश्वविद्यालय में छोटे से अपराध के लिए बहुत लंबी सज़ा ने बेशक उसे हताश कर दिया होगा और उसने मौत को गले लगाना ही श्रेयस्कर समझा होगा।

रोहित के साथ सब ठीक चल रहा था, लेकिन पिछले साल 30 जुलाई को देश के क़ानून (जिसे निष्पक्ष मानते हैं) द्वारा मुबंई में 257 निर्दोष लोगों की हत्या के दोषी ठहराए गए आतंकवादी याक़ूब मेमन को फ़ांसी के विरोध में अंबेडकर स्टूडेंट असोसिएशन ने प्रोटेस्ट मार्च निकाला। दरअसल, देश में सेक्युलर जमात के तथाकथित बुद्धिजीवी पता नहीं किस फिलॉसफी के तहत याक़ूब जैसे आतंकवादियों को डिफेंड करते रहे हैं। वैसे, याक़ूब के समर्थन में एएसए जैसे किसी दलित संगठन के उतरने की बात हज़म नहीं होती। याक़ूब मुंबई की आलिशान इमारत में रहने वाला अरबपति चार्टर्ड अकाउंटेट था। उसका दलित जैसे मसलों से कोई लेना-देना तक नहीं था। फिर भी अंबेडकर स्टूडेंट असोसिएशन ने उसके लिए प्रोटेस्ट मार्च क्यों किया? ज़ाहिर है, रोहित अपने मकसद से भटका हुआ लग रहा था। याक़ूब के मसले पर एएसए का स्टैड प्रथमदृष्ट्या मूर्खतापूर्ण लगता है, क्योंकि याक़ूब किसी ह्यूमन राइट वायलेशन का शिकार नहीं था। उसे फांसी सुप्रीम कोर्ट ने दी थी। उसे बचाव के हर संभव मौके दिए गए। यहां तक कि उसकी फ़ांसी टालने वाली याचिका पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने आधी रात को सुनवाई की। हर बार जजों पाया कि अंबेडकर ने जो संविधान बनाया है, उसके मुताबिक़ याक़ूब फ़ांसी का ही हक़दार है। पूरे विवेक के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याकूब को फांसी पर लटकाने का फ़ैसला सुनाया था। लिहाज़ा, याकूब को फ़ांसी का विरोध असंवैधानिक था और अंबेडकर विरोधी भी। यानी रोहित और उसके साथी भ्रमित थे। इसी मुद्दे पर रोहित का अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से टकराव हुआ और केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने एचआरडी मिनिस्टर स्मृति ईरानी को पत्र लिखा। इसमें दो राय नहीं कि हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति अप्पाराव पोडिले ने रोहित समेत पांच छात्रों को विश्वविद्यालय और हॉस्टेल से निकाल कर उनसे भी बड़ा गुनाह किया। इस बिना पर बंडारू और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ तेलंगाना पुलिस का एफ़आईआर ग़लत नहीं है।

दरअसल, फेलोशिप बंद हो जाने से रोहित भयानक आर्थिक संकट में था। वह उसी व्यवस्‍था का शिकार हो गया, जिसने अब तक पता नहीं कितने दलित या मजबूर छात्रों की जान ली है। रोहित के सूइसाइडल नोट को ध्यान से पढ़ें, तो पता चलता है कि उसमें खालीपन का अहसास भर गया था, जिसने ख़ुदकुशी जैसा क़दम उठाने को मजबूर किया। दरअसल, फेलोशिप बंद होने से उसके पास खाने को भी पैसे नहीं थे। दरअसल, दलित समुदाय के लोग चूंकि आर्थिक तौर पर बहुत कमज़ोर होते हैं, इसलिए व्यवस्था के हल्के प्रहार को भी झेल नहीं पाते हैं। आज़ादी के क़रीब सात दशक के दौरान दलित समुदाय के लोगों को संविधान से ख़ूब सहूलियत मिली, लेकिन तमाम सहूलियतें जगजीवन राम, मायावती, रामविलास पासवान और रामदास अठावले जैसे धनाध्य दलित नेता हज़म करते रहे और दलित समुदाय की हालत, ख़ासकर सामाजिक और आर्थिक स्थिति कमोबेश पहले जैसी ही रही। मतलब, दलितों के आरक्षित नौकरी धनी दलित छीनते रहे। दलित संसदीय या विधानसभा सीटों से करोड़पति दलित नेता संसद या विधान सभा में पहुंचते रहे। ये नेता अपनी व्यक्तिगत हैसियत बढ़ते रहे, लेकिन उनका समाज पहले की तरह वैसे ही मुख्यधारा से कटा रहा। इसीलिए आज भी ढेर सारे दलित छात्र आरक्षण के बावजूद पढ़ नहीं पाते, उनकी सीटे रिक्त रहती हैं, या भरी जाती हैं तो आर्थिक रूप से संपन्न दलित नेताओं के बाल-बच्चों द्वारा। बेशक आरक्षण ने अनुसूचित जाति-जनजाति छात्रों की संख्या बढ़ाई है। परंतु आबादी के अनुपात के हिसाब से अब भी यह संतोषजनक नहीं है। हालांकि असमानता और शोषण को जीवन मूल्य समझने वाले यथास्थितवादी लोग इस बदलाव से चिढ़ते हैं।


बहरहाल, रोहित बहुत ग़रीब पृष्ठिभूमि से आया था। उसके सूइसाइड नोट में काटे गए अंश बताते हैं कि उसका अंबेडकर स्टूडेंट यूनियन से भी मोहभंग हो गया था। संभवतः आतंकी याक़ूब का समर्थन करके शायद उसमें आत्मग्लानि भर गई थी। जिसके चलते उसके अंदर खालीपन का अहसास भर जाना स्वाभाविक था। यह इस देश की सामूहिक त्रासदी है. रोहित जैसे न जाने कितने नागरिक व्यवस्था के खिलाफ लड़ते हुए इसी तरह के खालीपन से भर जाते हैं। भयानक ग़रीबी झेलते हुए पीएचडी तक पहुंचने वाले इन छात्रों को उनके अपराध से कई गुना ज़्यादा सज़ा दी गई थी? सात महीने से बंद फेलोशिप ने रोहित तोड़ दिया था। उसे कोई समाधान नहीं मिल रहा था। उसने अपने सूइसाइड नोट में अपनी तंग हालत का ज़िक्र किया है। भयानक आर्थिक तंगी के कारण क़र्ज़दार हो चुके रोहित को अंततः मौत ही एकमात्र समाधान नज़र आया, जो उसके दिमाग़ में तीन साल से चल रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केवल भावुक होने से ही काम नहीं चलेगा, बल्कि इस प्रकरण में सभी जवाबदेह और ज़िम्मेदार लोगों के ख़िलाफ़ ऐक्शन लेना होगा। यह सही क्षतिपूर्ति होगी। वैसे ख़बर आ रही है कि कुलपति को लंबी छुट्टी पर भेज दिया गया है। यह ऐक्शन लेने के रास्ते में सकारात्मक पहल है।

रविवार, 10 जनवरी 2016

क्या शास्त्रीजी की मौत के रहस्य से कभी हटेगा परदा ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
कई मौतें ऐसी होती हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी या कहें हमेशा रहस्य ही बनी रहती हैं। ठीक ऐसी ही मौत देश के दूसरे प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की भी थी। जो क़रीब पांच दशक गुज़र जाने के बाद भी रहस्य ही बनी हुई है। दरअसल, भारत पाकिस्तान के बीच 1965 का युद्ध ख़त्म होने के बाद 10 जनवरी 1966 को शास्त्रीजी ने पाकिस्तानी सैन्य शासक जनरल अयूब ख़ान के साथ तत्कालीन सोवियत रूस के ताशकंद शहर में ऐतिहासिक शांति समझौता किया था। हैरानी वाली बात यह रही कि उसी रात शास्त्रीजी का कथित तौर पर दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया।

बताया जाता है कि समझौते के बाद लोगों ने शास्त्रीजी को अपने कमरे में बेचैनी से टहलते हुए देखा था। शास्त्रीजी के साथ ताशकंद गए इंडियन डेलिगेशन के लोगों को भी लगा कि वह परेशान हैं। डेलिगेशन में शामिल शास्त्रीजी के इनफॉरमेशन ऑफ़िसर कुलदीप नैय्यर ने लिखा है, रात में मैं सो रहा था कि किसी ने अचानक दरवाजा खटखटाया। वह कोई रूसी महिला थी। उसने बताया कि आपके पीएम की हालत सीरियस है। मैं जल्दी से उनके कमरे में पहुंचा। वहां एक व्यक्ति ने इशारा किया कि ही इज़ नो मोर। मैंने देखा कि बड़े कमरे में बेड पर एक छोटा-सा आदमी पड़ा था।

कहा जाता है कि जिस रात शास्त्रीजी की मौत हुई, उस रात खाना उनके निजी सर्वेंट रामनाथ ने नहीं, बल्कि सोवियत में भारतीय राजदूत टीएन कौल के कुक जान मोहम्मद ने बनाया था। कहा जाता है कि आलू पालक और सब्ज़ी खाकर शास्त्रीजी सोने चले गए थे। मौत के बाद शरीर के नीला पड़ने से लोगों ने आशंका जताई थी कि कहीं उन्हें खाने में ज़हर तो नहीं दे दिया गया था। उनका निधन 10-11 जनवरी की रात डेढ़ बजे हुआ। आधी रात में विदेशी मुल्क के पीएम की मौत से भारतीय प्रतिनिधि मंडल सन्नाटे में था। जिस व्यक्ति ने चंद घंटे पहले ऐतिहासिक समझौता किया था, उसकी सहसा मौत से पूरा देश सकते में था।

शास्त्री के बेटे सुनील शास्त्री ने उनके मौत के रहस्य की गुत्थी सुलझाने की सरकार से अपील की थी. सुनील शास्त्री का कहना था कि उनकी मृत्यु प्राकृतिक नहीं थी। उनकी लाश उन्होंने देखी तो छाती, पेट और पीठ पर नीले निशान थे और कई जगह चकत्ते पड़ गए थे। जिन्हें देखकर साफ़ लग रहा था कि उन्हें ज़हर दिया गया है. पत्नी ललिता शास्त्री का भी यही मानना था कि उनकी मौत संदिग्ध परिस्थितियों में हुई थी. अगर हार्टअटैक आया तो उनका शरीर नीला क्यों पड़ गया था! यहां वहां चकत्ते पड़ गए थे। उनकी मौत का सच फौरन सामने आ जाता, अगर उनका पोस्टमार्टम कराया गया होता। लेकिन ताज्जुब की बात कि एक पीएम की रहस्यमय मौत हुई और शव का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया।

बहरहाल, बाद में बताया जाता है कि उस दिन आधी रात को शास्त्रीजी खुद चलकर सेक्रेटरी जगन्नाथ के कमरे में गए, क्योंकि उनके कमरे में घंटी या टेलीफोन नहीं था। वह दर्द से तड़प रहे थे। उन्होंने दरवाजा नॉक कर जगन्नाथ को उठाया और डॉक्टर को बुलाने का आग्रह किया। जगन्नाथ ने उन्हें पानी पिलाया और बिस्तर पर लेटा दिया। शास्त्रीजी समेत पूरे इंडियन डेलिगेशन को ताशकंद से 20 किलोमीटर दूर गेस्टहाउस में ठहराया गया था, इसीलिए वक्त पर चिकित्सा सुविधा न मिलने से उनकी मौत हो गई।

शास्त्रीजी की सादगी से हर कोई प्रभावित हो जाता था। उनका जन्म दो अक्टूबर 1904 को रामनगर चंदौली (तब वाराणसी) में हुआ। असली नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। पिता शारदाप्रसाद श्रीवास्तव शिक्षक थे, जो बाद में केंद्र की नौकरी में आ गए। शास्त्रीजी की पढ़ाई हरीशचंद्र डिग्री कॉलेज और काशी विद्यापीठ में हुई। एमए करने के बाद उन्हें 'शास्त्री' की उपाधि मिली। स्वतंत्रता के बाद उन्हें उत्तप्रदेश का संसदीय सचिव बनाया गया। गोविंदबल्लभ पंत के मंत्रिमंडल में उन्हें गृहमंत्री बनाया गया। बतौर गृहमंत्री उन्होंने भीड़ नियंत्रित करने के लिए लाठी की जगह पानी की बौछार का प्रयोग करवाया। परिवहन मंत्री रहते हुए उन्होंने महिला कंडक्टरों की नियुक्ति की।

1951 में प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में वह कांग्रेस महासचिव बनाए गए। 1952, 57 और 62 के चुनाव में कांग्रेस को मिली भारी विजय का श्रेय शास्त्री को दिया गया। उनकी प्रतिभा और निष्ठा को देखकर ही नेहरू की मृत्यु के बाद 1964 में उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया। उन्होंने 9 जून 1964 को प्रधानमंत्री का पद की शपथ ली। उन्होंने 26 जनवरी 1965 को देश के जवानों और किसानों को अपने कर्म और निष्ठा के प्रति सुदृढ़ रहने और देश को खाद्य के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने के उद्देश्य से जय जवान, जय किसान' का नारा दिया। यह नारा आज भी लोकप्रिय है।

शास्त्री के बारे में कहा जाता है कि वह हर निणर्य सोच-विचार कर ही लेते थे। कई जानकार मानते हैं कि शास्त्रीजी का ताशकंद समझौते पर दस्तख़त करना ग़लत फ़ैसला था। यह बात उन्हें महसूस होने लगी थी जिससे उन्हें दिल का दौरा पड़ा। कुछ लोग बताते हैं कि देश तब घोर आर्थिक संकट से घिरा था। शास्त्रीजी उसे हल करने में सफल नहीं हो रहे थे। लिहाज़ा, उनकी आलोचना होने लगी थी।

शास्त्री अकसर कहते थे, हम चाहे रहें या न रहें, हमारा देश और तिंरगा झंडा सदा ऊंचा रहना चाहिए’. वह उन नेताओं में थे जो अपने दायित्व अच्छी तरह समझते थे। छोटे कद और कोमल स्वभाव वाले शास्त्रीजी को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि कभी वह सफल प्रधानमंत्री बनेंगे। एक बार उन्हें रेलमंत्री बनाया गया, एक ट्रेन हादसे के बाद उन्होंने रेलमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। वह ऐसे राजनेता थे जो अपनी गलती को सभी के सामने स्वीकार करते थे। बताया जाता है कि जब 1965 में अचानक पाकिस्तान ने भारत पर शाम 7.30 बजे हवाई हमला कर दिया तब तीनों रक्षा अंगों के चीफ ने पूछा कि क्या किया जाए। तब शास्त्रीजी ने कहा, आप देश की रक्षा कीजिए और बताइए कि हमें क्या करना है?”


बेटे सुनील शास्त्री ने अपनी किताब ‘‘लालबहादुर शास्त्री, मेरे बाबूजी’’ में लिखा है मां शास्त्रीजी के कदमों की आहट से उन्हें पहचान लेती थीं और प्यार से धीमी आवाज़ में कहती थीं ‘‘नन्हें, तुम आ गये?”  शास्त्री का अपनी मां इतना लगाव था कि वह उनका चेहरा देखे बिना नहीं रह पाते थे। किसी ने सच ही कहा है कि वीर पुत्र को हर मां जन्म देना चाहती है। उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिए मरणोपरांत 1966 में उन्हें 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। शास्त्रीजी उन्हीं वीर पुत्रों में हैं जिन्हें आज भी भारत की माटी याद करती है।

सोमवार, 4 जनवरी 2016

केजरीवाल और दिल्ली सरकार से पंगा नरेंद्र मोदी का बालहठ

हरिगोविंद विश्वकर्मा
नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली सरकार फिर आमने-सामने आ गए। दिल्ली के गृहमंत्री सतेंद्र जैन का आदेश नहीं मानने पर जिन दो अफसरों को सस्पेंड किया गया था, केंद्र ने उनके सस्पेंशन को रद्द कर दिया। केंद्र के क़दम के बाद दिल्ली की लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार एक बार फिर अपने आपको असहाय महसूस कर रही है। जो भी हो, केंद्र के क़दम से प्राइमा फेसाई यह साफ़ हो गया है कि केंद्र को चाहे जो भी क़ीमत चुकानी पड़े, वह केजरीवाल सरकार को पूरे पांच साल तक काम करने ही नहीं देगी।

दरअसल, इस बार पंगा सरकारी वकील और तिहाड़ जेल के कर्मियों की वेतनवृद्धि को लेकर हुआ। दिल्ली सरकार ने बिना केंद्र की मंजूरी के कैबिनेट से पास करके फ़ाइल लेफ़्टिनेंट गवर्नर नज़ीब जंग के पास भेज दी थी। नज़ीब ने संविधान का हवाला देकर फ़ाइल केंद्र के पास भेज दी। सतेंद्र जैन दिल्ली गृह विभाग में स्पेशल सेक्रेटरी यशपाल गर्ग और सुभाष चंद्रा से नोटिफिकेशन जारी करने का आग्रह कह रहे थे, परंतु संविधान का हवाला देते हुए दोनों अफ़सर आनाकानी कर रहे थे। इस पर सतेंद्र जैन ने दोनों को सस्पेंड कर दिया था। संविधान के मुताबिक दोनों निलंबित अफ़सरान दानिक्स कैडर में आते थे और और उन्हें केंद्र की मंजूरी के बाद केवल लेफ़्टिनेंट गवर्नर ही निलंबित कर सकते हैं। दरअसल, केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकारियों को दानिक्स कैडर का माना जाता है. दानिक्स अफसरों का चयन संघ लोकसेवा आयोग की सिविल सर्विस परीक्षा के माध्य से किया जाता है।

2013-14 में केजरीवाल सरकार ने 49 दिन में गुड गवर्नेंस का परिचय दिया था। इसी आधार पर दिल्ली के लोगों ने सोचा था कि आम आदमी पार्टी को वोट देकर वे अच्छा फ़ैसला कर रहे हैं। पर केजरीवाल के दूसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी, कैबिनेट और भारतीय जनता पार्टी जिस तरह शुरू से नज़ीब जंग के ज़रिए जनता द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से चुनी सरकार को काम नहीं करने दे रहे हैं, उससे पूरे देश में बीजेपी के बारे में कम से कम अच्छा संदेश तो नहीं जा रहा है। केजरीवाल हर जगह कैमरे के सामने यही कह रहे हैं, “प्रधानमंत्री जी हमें काम करने दीजिए।“ इससे ख़ुद प्रधानमंत्री की छवि सबसे ज़्यादा ख़राब हो रही है। कमोबेश पिछले बिहार विधान सभा के चुनाव नतीजों में बीजेपी की इस कथित खुलेआम बेईमानी का भी कहीं न कहीं योगदान ज़रूर था।

हालांकि दूसरे कार्यकाल में केजरीवाल ख़ुद ही बेनकाब हो रहे थे। एक-एक करके वही क़दम उठा रहे थे, जिसकी कभी वह मुखालफत किया करते थे। उन्होंने जिस तरह गाली देकर आम आदमी पार्टी के संस्थापक सदस्यों को निकाल बाहर फेंका था, वह कार्यशैली कमोबेश सोनिया गांधी, मुलायम सिंह यादव, मायावती, जयललिता या ममता बैनर्जी जैसी सुप्रीमो कल्चर वाली थी। लेकिन, चूंकि आम आदमी पार्टी को दिल्ली की जनता ने ख़ुद अभूतपूर्व समर्थन दिया था, ऐसे में नरेंद्र मोदी, उनके कैबिनेट और बीजेपी को जनता के फ़ैसले को स्वीकार कर राज्य सरकार को उसी तरह चलने देना चाहिए था, जिस तरह आमतौर पर इस देश में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार चलती है। लेकिन केंद्र ने केजरीवाल के कामों में अनावश्यक दख़ल देकर उन्हें ख़ुद एक्सपोज़ होने ही नहीं दिया।

देश का आम आदमी यह भलीभांति जानता है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिला है। लोग यह भी जानते हैं कि चूंकि भारत सरकार का मुख्यालय दिल्ली में है, इसलिए दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता और यह संभव भी नहीं। साथ में लोग की जानकारी में यह भी है कि दिल्ली में विधान सभा का चुनाव उसी तरह होता है, जिस तरह देश में लोकसभा या किसी राज्य की विधानसभा के लिए चुनाव होता है। लोग यह भी जानते हैं कि कोई भी जनता जब किसी नेता को सरकार का नेतृत्व करने के लिए चुनती है, तो इसका मतलब यही होता है कि जनता पूरे होशों-हवास से उस नेता या उस दल अथवा उस गठबंधन को देश या राज्य में पांच साल तक शासन करने, जिसे नरेंद्र मोदी ‘सेवा’ कहते हैं, का अधिकार दिया है। इसी तरह देश की जनता ने मई 2014 में नरेंद्र मोदी और बीजेपी को वोट दिया था, तो दिल्ली की जनता ने साढ़े आठ महीने बाद अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को वोट दिया।

इन परिस्थितियों में संविधान का हवाला देकर लोकतांत्रिक चुनाव में जीत दर्ज करने वाले नेता, दल या गठबंधन को काम न करने देना अनैतिक, असंवैधानिक अपरिपक्व और तानाशाही भरा क़दम माना जाता है। ख़ासकर तब, जब केजरीवाल सरकार पुलिस को छोड़कर उन विषयों पर फैसले कर रही है, जो सीधे दिल्ली की जनता के हितों से जुड़े हैं। कम से कम केजरीवाल दिल्ली में पुलिस कमिश्नर की नियुक्ति करने की हिमाकत तो कर नहीं रहे हैं, न ही वह केंद्र सरकार के कामकाज में दख़ल दे रहे हैं या कोई अवरोध खड़ा कर रहे हैं। वह अपने दायरे में रहकर काम कर रहे हैं, लेकिन केंद्र संविधान का हवाला देकर नज़ीब जंग के ज़रिए उनके हर फ़ैसले को पलट रहा है। देश के लोग इस बात का भी बहुत अच्छी तरह नोटिस ले रहे हैं और मुमकिन है साल भर बाद उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव में उसकी अभिव्यक्ति करें भी।

इस बात पर संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं कि प्रधानमंत्री, उनका कैबिनेट और बीजेपी पिछले 11 महीने से वह सब कर रहे हैं, जिसे तानाशाही कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगा। लोकतांत्रिक ढंग से जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को संविधान या क़ानून का हवाला देकर कोई फ़ैसले न लेने देना, एक तरह से अघोषित आपातकाल है। ऐसी मिसाल केवल 1975 में मिली थी, जब कई निर्वाचित सरकारों को इंदिरा गांधी ने बर्खास्त कर दिया था। दिल्ली में अप्रत्यक्ष रूप से वहीं सब हो रहा है, जिसे दिल्ली की जनता की इनसल्ट कहें तो ग़लत नहीं होगा।

नज़ीब जंग जो कुछ कर रहे हैं, उसे बीजेपी या उसके शासन के बेनिफिशियरीज़ के अलावा दूसरा कोई व्यक्ति अप्रूव नहीं कर सकता। नज़ीब केंद्र के इशारे पर लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार को कोई काम नहीं करने दे रहे हैं। लोग समझ रहे हैं कि मोदी सरकार दिल्ली और दिल्ली की जनता के साथ खुला पक्षपात और बेइमानी कर रही है। जब यही सब करना था तो दिल्ली में विधान सभा या मुख्यमंत्री की क्या ज़रूरत? आख़िर जब काम ही नहीं करने देना था तो दिल्ली में विधान सभा का चुनाव कराने की क्या ज़रूरत थी? दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लगे रहने देना था।

दरअसल, दिल्ली की जनता ने बीजेपी को वोट क्यों नहीं दिया? इस पर बीजेपी लीडरशिप ने कभी विचार ही नहीं किया। नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उनके पास लोकसभा में 282 सीट यानी पूर्ण बहुमत से 10 सीट ज़्यादा थी। सरकार की गैरमौजीदगी में लेफ़्टिनेंट गवर्नर तब दिल्ली के शासक थे। यानी एक तरह से बीजेपी ही दिल्ली की सरकार चला रही थी। तब बीजेपी ने कोई अहम फ़ैसला नहीं लिया। वह सरकार बनाने का असफल जोड़तोड़ करती रही। 13 फरवरी को केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। यानी 26 मई 2014 से 12 फरवरी 2015 तक यानी 263 दिन दिल्ली का शासन बीजेपी के हाथ में था और जनता को दिल जीतने के लिए किसी नेता के लिए यह पर्याप्त समय था। लेकिन बीजेपी उसे भुना नहीं पाई। कांग्रेस से परेशान दिल्ली की जनता बीजेपी के 263 दिन के कार्यकाल में भी परेशान रही इसलिए उसने आम आदमी पार्टी को वेट दिया। इसमे जनता की क्या ग़लती, जिसका बदला नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार दिल्ली के लोगों से ले रही है। अब भी वक़्त है, नरेंद्र मोदी, उनका कैबिनेट और बीजेपी बालहठ छोड़कर दिल्ली सरकार को काम करने दें। ताकि केजरीवाल यह कह न सकें कि मोदी ने उन्हें काम ही नहीं करने दिया।