बुधवार, 30 मार्च 2016

शनि शिंगणापुर विवादः औरतों को मंदिर में जाने से रोकने वाले जाएंगे जेल

हरिगोविंद विश्वकर्मा
महिलाओं के साथ खुला पक्षपात करने वाली सदियों पुरानी आउटडेटेड पंरपराओं को ध्वस्त करने की श्रीगणेश बुधवार को तक हो गया जब बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहमदनगर के शनि शिंगणापुर मंदिर ट्रस्ट के लोगों को कड़ी फटकार लगाते हुए कि मिंदर में जहां-जहां पुरुष जाते हैं, वहां-वहां महिलाओं को जाने का अधिकार है और जो भी भविष्य में उन्हें जाने से रोकेगा उसे छह महीने के लिए जेल भेजा जाएगा। ज़ाहिर सी बात है अदालत का फ़ैसला ऐतिहासिक है और देश भर के हर मजहब के धर्मस्थलों में महिलाओं को प्रवेश को सुनिश्चित करने के लिए यह फ़ैसला एक मिसाल बनेगा।

इस तरह शनि शिंगणापुर मंदिर में जाने की हिंदू महिलाओं को मिली इजाज़त के बाद मुंबई के महालक्ष्मी के हाजीअली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं को प्रवेश करने का रास्ता साफ़ हो गया है। यह मामला भी हाईकोर्ट के पास विचाराधीन है. महिलाओं को बराबी का दर्जा देने के पैरोकारों का मानना है कि बॉम्बें हाईकोर्ट का फ़ैसला सदियों से चली आ रही आउटडेटेड पुरुषवादी परंपराओं को गिराने की शुरुआत है।

साढ़े चार सौ साल से भी अधिक पुराने शनि शिंगणापुर मंदिर के चबूतरे तक महिलाओं के जाने और उनके सरसों का तेल चढ़ाने पर मनाही है। यह साफ़ नहीं हो पाया है कि,  किसने इस पक्षपातपूर्ण परंपरा का आरंभ किया। इसी तरह छह सदी से ज़्यादा पुराने हाजीअली दरगाह में महिलाओं के प्रवेश पर मनाही है। जबकि किसी भी धार्मिक पुस्तक में कही नहीं लिखा है कि महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर भेदभाव किया जाए। ज़ाहिर सी बात है, इस तरह की दकियानूसी परंपराएं पुरुष-प्रधान समाज में हर जगह हैं। पहले तो महिलाओं के घर से बाहर निकलने पर ही अघोषित पाबंदी थी, लेकिन वक्त के साथ उसमें बदलाव आया और महिलाओं सीमित संख्या में ही सही हर जगह दिखती हैं।

बहराहाल, महिलाओं के साथ लैंगिक आधार पर किसी तरह का भेदभाव करना और उन्हें किसी भी धर्मस्थल पर जाने से रोकना दरअसल सामाजिक और मानवीय दोनों तरह का अपराध है। यह भारतीय संविधान में महिलाओं को मिले अधिकार का भी गंभीर हनन है। जो लोग ऐसा कर रहे हैं। चाहे वे शनि शिंगणपुर के शनि मंदिर के पुजारी हों या सबरीमाला मंदिर के पुजारी या फिर मस्जिदों के मौलवी सबके सब मानवता के खिलाफ अपराध के दोषी हैं। बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्रवाई का रास्ता साफ़ हो गया है। भविष्य में देश में हर धार्मिक स्थल पर जाने की महिलाओं को आज़ादी मिलेगी।

यहां तक कि मासिक धर्म (रजोधर्म) या पीरियड के समय भी किसी महिला को किसी धार्मिक अनुष्ठान से दूर नहीं रखना चाहिए, क्योंकि पीरियड हर महीने गर्भाशय की सफ़ाई का एक नैसर्गिक प्रक्रिया है। उसके बाद स्त्री गर्भधारण (अगर चाहे तो) के लिए शारीरिक तौर पर तैयार होती है। इसे उसी तरह की सफाई माना जा सकता है, जिस तरह स्त्री-पुरुष दैनिक नित्यकर्म करते हैं। अगर नित्यकर्म अशुद्ध नहीं है, तो पीरियड को भी अशुद्ध नहीं माना जा सकता। अब तो मेडिकल क्षेत्र से जुड़े लोग भी कहने लगे हैं कि पीरियड के समय सेक्स करने में कोई हानि नहीं होती। मेडिकल साइंस के मुताबिक़, महिला का शरीर भी कमोबेश पुरुष की तरह ही है। पुरुष का शरीर स्पर्म पैदा करता है तो महिला शरीर में एग्स बनते हैं। स्पर्म और एग्स की ब्रिडिंग गर्भाशय में होता है, जो महिला के पेट में होता है। वहीं से नौ महीने बाद मानव जन्म लेता है। लिहाज़ा, स्त्री को अशुद्ध कहने का मतलब संतानोत्पत्ति को ही अशुद्ध कहना है।

राहुल सांकृत्यायन की कालजयी रचना वोल्गा से गंगाके मुताबिक आठ से दस हज़ार साल पहले मानव दो पैरों पर खड़ा होने के बाद निर्वस्त्र हाल में एक झुंड में जंगलों और गुफाओं में रहता था। तब मनुष्य का शरीर इतना मज़बूत होता था कि कोई बीमारी नहीं लगती थीं। आजकल जानवरों की तरह उस समय हर स्त्री-पुरुष का अनगिनत लोगों से सेक्सुअल रिलेशनशिप होता था, इसलिए किसी शिशु का पिता कौन है, यह कोई नहीं जानता था। हां, दूध पीने के कारण माता को सब लोग पहचानते थे। झुंड की सबसे ताक़तवर महिला ही झुंड की मुखिया होती थी। यह परंपरा कई हज़ार साल तक चलती रही। महिला मुखिया झुंड के हर सदस्य के साथ इंसाफ करती थी। इसलिए उस समय आपसी झगड़े या लड़ाइयां भी बहुत कम हुआ करती थीं। तब सेक्स डिटरमिनेशन टेस्ट या अबॉर्शन की प्रथा भी नहीं थी। लिहाज़ा, धरती पर स्त्री और पुरुष की तादाद लगभग बराबर होती थी। यानी जनसंख्या संतुलित थी। यह तथ्य मानव विकास पर लिखी गई किताबों में भी मिलता है। कभी-कभार जब दो झुंडों की आपस में संघर्ष होती था तब दोनों झुंड की मुखिया स्त्रियां ही आपस में मलयुद्ध करती थीं।

बहरहाल, शारीरिक रुप से स्त्रियों से ज़्यादा शक्तिशाली पुरुष झुंड के मुखिया बनने लगे। यहीं से पुरुष आधिपत्य शुरू हुआ और स्त्री के साथ पक्षपात होने लगा। पुरुष स्त्री को भोग की वस्तु समझने लगा और उसके मानवीय अधिकारों का हनन करने लगा। परिवारवाद प्रथा शुरू होने पर पुरुष कई-कई पत्नियां रखने लगा, लेकिन स्त्री को दूसरे पुरुष की ओर देखने पर कुलटा कह दिया जाता था। जब शिक्षा की अवधारणा शुरू हुई तो पुरुष ने उस पर भी क़ब्ज़ा कर लिया। इसके बाद धर्म की स्थापना हुई। पुरुष आधिपत्य का कारण हर धर्म पुरुष प्रधान बनाए गए। जितने भी धार्मिक ग्रंथ रचे गए सभी पुरुषों ने रचे और पुरुष को ही महिमामंडित किया। जितने त्यौहार बनाए गए, सभी सब पुरुष वर्चस्व के प्रतीक बने। स्त्री (पत्नी के रूप में) पुरुष (पति) के लिए व्रत रहती है, लेकिन कोई पुरुष किसी स्त्री के लिए व्रत नहीं रहता।

पुरुष-प्रधान परंपराएं कमोबेश बदस्तूर जारी हैं, इसीलिए घर के बाहर हर जगह पुरुष ही पुरुष दिखते हैं। महिलाओं की विज़िबिलिटी 10-15 फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी में क्रांति के दौर में भी मुंबई-दिल्ली जैसे महानगर छोड़ दिए जाएं तो महिलाओं की घर के बाहर विज़िबिलिटी पांच फ़ीसदी भी नहीं है। महिलाओं की कम विज़िबिलिटी के चलते दुस्साहसी पुरुष बाहर निकलने वाली एक्का-दुक्का औरतों के साथ उनकी मर्जी के विरुद्ध हरकते करते हैं। भेदभाव करते हैं। महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराधों की असली वजह यही है, जिसे क़ानून को सख़्त करके नहीं रोका जा सकता। इसके लिए देश में हर जगह महिलाओं को 50 फ़ीसदी जगह रिज़र्व करनी पड़ेगी। हर जगह जितने पुरुष हैं, उतनी स्त्री करनी ही पड़ेगी।


जो भी हो, इस मौक़े पर भूमाता रण रागिनी ब्रिगेड की अध्यक्ष तृप्ति देसाई और भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की सह संस्थापक नूरजहां साफिया नियाज़ जैसी बहुदुर महिलाओं को अभिनंदन किया जाना चाहिए, जो आउटडेटेड परंपराओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रही है. लकीर के फकीर पुरुष प्रधान समाज के पैरोकार अगर अब भी होश में नहीं आए तो वह दिन दूर नहीं, जब हर भारतीय महिला पुरुषवादी परंपरा से लड़ने के लिए तैयार हो जाएगी।
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मंगलवार, 15 मार्च 2016

शहीदों को कम, आतंकियों को ज़्यादा याद रखते हैं लोग

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आप रवींद्र म्हात्रे को जानते हैं? अगर यह सवाल आप ऐसे ही कैज़ुअली 10 भारतीयों से पूछें, तो निश्चित तौर पर बमुश्किल एक या दो लोग ही उनके बारे में बता पाएंगे। अगर यह भी बता दीजिए कि पुणे में रवींद्र म्हात्रे के नाम पर एक पुल है और विक्रोली में एक मैदान, तब भी शायद ही लोगों को याद आएगा। यहां तक कि म्हात्रे पुल से गुजरने वाले हज़ारों लोग या म्हात्रे मैदान में खेलने वाले सैकड़ों बच्चों से पूछ लें तो उनमें भी बमुश्किल इक्का-दुक्का लोग ही म्हात्रे के बारे में बता पाएंगे।

इसके विपरीत अगर लोगों से मोहम्मद अफ़ज़ल गुरु या मकबूल भट के बारे में पूछें, तो बताने वालों की संख्या एकदम उल्टी हो जाएगी। यानी एकाध लोगों को छोड़कर सभी लोग बता देंगें कि दोनों कौन थे। हाल ही में हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय विवाद के केंद्र में यही दोनों थे। देश के ख़िलाफ़ साज़िश रचने वाले इन दोनों आतंकवादियों को नौ फरवरी 2016 सी शाम जेएनयू में शहीद बताया गया था। चूंकि अफ़ज़ल को लोग जानते हैं, कि 2001 में संसद पर हमले का सूत्राधार था, लेकिन मक़बूल बट के बारे में बहुत नहीं जानते कि वह कौन था और उसे फ़ांसी क्यों हुई, क्योंकि उसने अपराध पिछली सदी में किया था। इसलिए मक़बूल के अपराधों को बताना ज़रूरी है, लेकिन उससे पहले भारतीय राजनयिक रवींद म्हात्रे का ज़िक्र करना ज़्यादा मुनासिब होगा, जिनकी पढ़ाई-लिखाई मुंबई में हुई।

49 वर्षीय भारतीय राजनयिक रवींद्र म्हात्रे, दरअसल, पहली बार तीन फरवरी 1984 में चर्चा में तब आए जब ब्रिटेन में सक्रिय जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सहयोगी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी के आतंकवादियों ने बर्मिंघम में उन्हें अपहृत कर लिया। दरअसल, तत्कालीन उच्चायुक्त डॉ. सईद मोहम्मद के विदाई समारोह के चलते बर्मिंघम महावाणिज्य दूतावास के प्रभारी डिप्टी कमिश्नर बलदेव कोहली लंदन में थे, क्योंकि डॉ. सईद सेवानिवृत्त हो रहे थे। उनकी मौजूदगी में सह-उच्चायुक्त म्हात्रे दफ़्तर के प्रभारी थे। वह हमेशा की तरह शाम पांच बजे ऑफ़िस से बारटले ग्रीन इलाके में स्थित अपने घर के लिए निकल पड़े, जो दो किलोमीटर दूर था। उस दिन शुक्रवार था और अगले दिन उनकी बेटी आशा का 14वां जन्मदिन, जिसकी तैयारी करनी थी। लिहाज़ा, रास्ते में केक लेते हुए जैसे ही घर के सामने बस से उतरे थे, आतंकियों ने गनपॉइंट पर उन्हें अपनी कार में बिठा लिया।

जब म्हात्रे सात बजे तक घर नहीं पहुंचे तो पत्नी डॉ. शोभा पठारे-म्हात्रे परेशान होने लगीं। उन्होंने दफ़्तर फोन लगाया, पर कोई जवाब नहीं मिला। फिर शोभा ने कोहली को फोन लगाया। वह भी हैरान हुए, क्योंकि म्हात्रे अमूमन साढ़े पांच बजे तक घर पहुंच जाते थे। जब 9 बजे तक उनका सुराग नहीं मिला तब कोहली ने बर्मिंघम पुलिस को सूचना दी। बहरहाल, शनिवार की अल-सुबह एक अज्ञात व्यक्ति ने न्यूज़ एजेंसी रॉयटर के दफ़्तर में जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी का हाथ से टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में लिखा एक पत्र ड्रॉप किया। जिसमें दावा किया गया था कि म्हात्रे को अगवा किया गया है। म्हात्रे को छोड़ने के बदले आतंकवादियों ने उसी दिन शाम 7 बजे तक भारत के सामने जेल में बंद मक़बूल भट को छोड़ने और दस लाख ब्रिटिश पाउंड की मांग रखी। लेटर पर कोई नाम पता या फोन नंबर नहीं था, लिहाज़ा, रॉयटर के संपादक ने ख़बर चलाने से पहले स्कॉटलैंड यार्ड को सूचना दी। जहां म्हात्रे के ग़ायब होने की शिकायत दर्ज थी।

अपहरकर्ताओं ने जेकेएलएफ से जुड़े आज़ाद कश्मीर के पैरोकार ज़ुबैर अंसारी को भी फोन किया और उनसे भारत के साथ मक़बूल की रिहाई के लिए वार्ता करने की अपील की। अंसारी ने अपहर्ताओं से समय सीमा रात 10 बजे तक बढ़ाने की अपील की, जिसे मान लिया गया। अंसारी ने स्कॉटलैंड यार्ड को सूचित कर दिया, जिससे उनका फोन सर्विलॉन्स पर रख दिया गया। भारत को भी घटना से अवगत करा दिया गया। तब विदेश मंत्रालय में वरिष्ठतम अधिकारी रोमेश भंडारी और विदेश सचिव एमके रसगोत्रा ने गुवाहाटी के दौरे पर निकल चुकीं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से संपर्क करने की कोशिश की, परंतु विमान आसमान में था। आईबी और रॉ के प्रमुख आरएन कॉव और प्रिंसिपल सचिव पीसी अलेक्ज़ेंडर को सूचित कर दिया गया था। सवा चार बजे जैसे ही पीएम के विमान ने लैंड किया, उन्हें सूचित कर दिया गया।

ब्रिटेन से पहले बांग्लादेश और ईरान में राजनयिक रहे म्हात्रे की जीवन इंडियन एयरलाइंस के विमान सी-814 में सवार यात्रियों के जीवन से कम महत्वपूर्ण नहीं था। सन् 1999 में सी-814 में सवार यात्रियों की जान बचाने के लिए अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश मंत्री जसवंत सिंह जैश-ए-मोहम्मद चीफ़ मौलाना मसूद अज़हर, अहमद सईद शेख और मुश्ताक़ अहमद ज़रगर जैसे ख़तरनाक आतंकवादियों को लेकर कंधार गए थे। अटल सरकार ने आतंकवाद के आगे भले घुटने टेक दिया था लेकिन आतंकवाद की शरणस्थली बने स्वर्ण मंदिर में सेना भेजने का साहस करने वाली इंदिरा ने दहशतगर्दों के आगे झुकने से साफ़ इनकार कर दिया। इंदिरा ने कहा कि न तो मक़बूल को छोड़ा जाएगा न ही भारत आतंकियों से कोई बातचीत की जाएगी। नतीजतन छह फरवरी को आतंकियों ने म्हात्रे का कत्ल करके शव बर्मिघंम शहर से 40 किलोमीटर दूर लीसेस्टरशायर के हिंकली में हाइवे के किनारे फेंक दिया। म्हात्रे के सिर में दो गोली मारी गई थी।

बहरहाल, उसी दिन इंदिरा की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की आपात बैठक हुई, जिसमें मौजूदा राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी (वित्त मंत्री), प्रकाशचंद्र सेठी (गृहमंत्री) आर वेंकटरमन (रक्षामंत्री) और पीवी नरसिंह राव (विदेश मंत्री) मौजूद थे। कैबिनेट ने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह से मक़बूल की दया याचना नामंजूर करने की सिफ़ारिश की, ताकि उसे जल्दी से जल्दी फांसी पर लटकाया जा सके। राष्ट्रपति कोलकाता में थे। लिहाज़ा, एक अधिकारी कैबिनेट प्रस्ताव लेकर उनके पास गया और जैलसिंह ने फ़ौरन मर्सी पिटीशन रिजेक्ट कर दिया। गृह मंत्रालय के अफ़सर पीपी नैयर को ब्लैक वारंट लेने और मक़बूल भट की फांसी में आने वाली किसी भी संभावित बाधा को दूर करने के लिए कश्मीर भेजा गया। बहरहाल, म्हात्रे की हत्या के छह दिन बाद 11 फरवरी 1984 को मकबूल भट को तिहाड़ जेल में फ़ांसी पर लटका दिया गया और उसके शव को जेल में ही अज्ञात जगह दफ़ना दिया गया।

इंदिरा को एहसास था कि म्हात्रे की जान उनके कारण ही गई, लेकिन उन्होंने व्यापक राष्ट्रीय हित में मक़बूल को न छोड़ने का फ़ैसला किया था। घर में प्यार से दादा पुकारे जाने वाले रवींद्र के बूढ़े माता-पिता मुंबई के विक्रोली में छोटे बेटे अविनाश को साथ रहते थे। इंदिरा दूसरे दिन मुंबई गईं और एयरपोर्ट से सीधे म्हात्रे के घर गईं। प्रधानमंत्री को देख 75 वर्षीय पिता हरेश्वर म्हात्रे और 74 वर्षीय माता ताराबाई फूट-फूट कर रोने लगे। इंदिरा उनके हाथ पांच मिनट हाथ मे लेकर बैठी रहीं और सांत्वना देती। इंदिरा गांधी ने साफ़-साफ़ कहा, “मैं ख़ुद एक मां हूं, इसलिए आपका दर्द समझ सकती हूं। आपके बेटे की जान मेरे कारण ही गई, लेकिन मेरे लिए राष्ट्रहित ऊपर था, जिसके लिए रवींद्र को जान गंवानी पड़ी। इसके लिए मैं दोषी हूं और आपसे क्षमा मांगती हूं।” इंदिरा और कहीं नहीं गईं और सीधे हवाई अड्डे से दिल्ली वापस आ गईं।

दरअसल, पाकिस्तान अधिकृत कश्मूर यानी आज़ाद कश्मीर के मीरपुर शहर में रहने वाले जेकेएलएफ़ के चेयरमैन अमानुल्लाह ख़ान के सहयोगी और हॉलैंड में रहने वाले हाशिम कुरेशी की 1999 में प्रकाशित किताब “कश्मीरः द अनवेलिंग ऑफ़ ट्रूथः अ पोलिटिकल एनालिसिस ऑफ कश्मीर” में खुलासा हुआ कि म्हात्रे का अपहरण और उनकी हत्या की साजिश अमानुल्लाह ख़ान ने ही रची थी और जेकेएलएफ आतंकी मोहम्मद रियाज़, अब्दुल क़य्यूम राजा और मोहम्मद असलम मिर्ज़ा ने अंजाम तक पहुंचाया था। रियाज़ और राजा को जेल की सज़ा हुई, लेकिन मिर्ज़ा हत्या के बाद अपनी बीवी सकीना और अपने सात बच्चों को इंग्लैड में छोड़कर पाकिस्तान भागा। वह से पेनसिल्वेनिया गया और 2001 में पॉटसविले की एक महिला से निकाह कर लिया। बहरहाल, उसे अमेरिकी में पकड़ा गया।

तीन से छह फरवरी 1984 की घटना को याद करते हुए म्हात्रे की बेटी आशा म्हात्रे डिसिल्वा कहती हैं, “पापा के अपहरण की ख़बर हमारे लिए विपत्ति लेकर आई थी। अगले दिन मेरा बर्थडे था, इसलिए मै केक का इंतज़ार कर रही थी, लेकिन उस दिन पापा आए ही नहीं और फिर कभी नहीं आए। मैं और मम्मी रात भर सो नहीं पाईं। तीसरे दिन जब लाश मिली तो मां घर में ही गिर पड़ीं।” सिर से पिता का साया उठने के बाद आशा उम्र से भी ज़्यादा तेज़ी से परिपक्व हुईं। बहरहाल, रवींद्र म्हात्रे के सम्मान में पुणे में एक पुल का नाम उनके नाम पर म्हात्रे पुल रखा गया। इसके अलावा मुंबई के विक्रोली में उनके नाम से बीएमसी का एक मैदान है।

बहरहाल, रवींद्र म्हात्रे की हत्या के लिए ज़िम्मेदार जेकेएलएफ़ के संस्थापक मक़बूल भट का जन्म 18 फरवरी 1938 को हंडवारा (पूर्व कुपवाड़ा जिला) जिले के त्रेहगाम में किसान ग़ुलाम क़ादर भट के यहां हुआ। माना जाता है कि कश्मीर घाटी के पुराने हिंदू जो भट्ट थे वही धर्मपरिवर्तन के बाद भट या फिर बट हो गए थे। उसी ख़ानदान का मक़बूल भी था। 11 बरस की उम्र में मां को गंवाने वाले मक़बूल की प्राइमरी की पढ़ाई त्रेहगाम में हुई। पिता ने दूसरी शादी कर ली। मक़बूल ने कश्मीर विश्वविद्यालय से संबद्ध बारामूला के सेंट जोसेफ कॉलेज से इतिहास और राजनीति विज्ञान में बीए किया। ग्रेजुएशन करने के बाद मक़बूल कुछ साथियों के साथ पीओके चला गया, जहां उन सबको सेना ने गिरफ्तार कर लिया। बाद में मुज़फ़्फ़राबाद में बसे एक कश्मीरी की गारंटी पर रिहा किया गया।

रिहा होने के बाद मक़बूल लाहौर गया। वहां उसके मामूजान ने अपने संपर्कों से उसका दाखिला पंजाब विश्वविद्यालय में कराने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुए। इसके बाद मक़बूल पेशावर गया और पेशावर विश्वविद्यालय में एडमिशन मिल गया। उर्दू साहित्य से एमए करने के बाद उसने थोड़े समय शिक्षक के रूप में सेवाएं दी, बाद में लोकल अख़बार अंजाम में बतौर पत्रकार काम करने लगा। उसकी शायर अहमद फराज़ से मुलाकात हुई। बहरहाल, कुछ समय पत्रकार की नौकरी करने के बाद जब मक़बूल कई साल बाद भारत लौटा तो आज़ादी की बात करने लगा।

14 सितंबर 1966 को मकबूल अपने साथियों औरंगज़ेब और काला ख़ान के साथ मिलकर लोकल अपराध शाखा सीआईडी ​​के निरीक्षक अमरचंद के घर पर हमला कर दिया। पंजाल थाने में दर्ज एफआईआर के मुताबिक़ उसने अमरचंद को अगवा कर उनकी हत्या कर दी और कैश, गहने और दस्तावेज़ ले उड़ा। उसी दिन सुरक्षा बलों की जवाबी कार्रवाई में औरंगजेब मारा गया। मकबूल और काला गिरफ्तार कर लिए गए। मक़बूल पर पाकिस्तानी जासूस होने का आरोप लगाया गया। सुनवाई के दौरान नीलकंठ गंजू ने उसे दोषी करार दिया और मौत की सज़ा सुनाई। मक़बूल फ़ौरन बोला, “अपने ऊपर लगाए गए आरोप स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मैं पाकिस्तानी नहीं हूं। मैं कॉलोनियल माइंडसेट का दुश्मन हूं। मेरी तरफ ध्यान से देख लो, मैं तुम्हारा दुश्मन हूं।“

बहराहल, मक़बूल को अति सुरक्षित श्रीनगर जेल में रखा गया। लेकिन जेल में सुरंग बनाकर वह साथियों समेत भाग निकला और पाकिस्तान चला गया। वहां उसे भारत विरोधी साज़िश करने वाले और ज़्यादा मिल गए। कश्मीर की ओर दुनिया का ध्यान खींचने के लिए वह कोशिश करने लगा। तीन साल बाद वह फिर चर्चा में आया, जब जनवरी 1971 में इंडियन एयरलाइंस फोक्कर एफ-27 फ्रेंडशिप एयरक्राफ्ट ‘गंगा’ हाईजैक करके लाहौर ले जाया गया। यह काम उसके साथी हाशिम कुरेशी और अशरफ भट ने किया। जब प्लेन लैंड हुआ, तब एयरपोर्ट पर मक़बूल मौजूद था। यात्रियों को विमान से बाहर निकाल कर उसमें आग लगा दी गई। सुरक्षा एजेंसियों ने मकबूल को हाइजैक का मास्टरमाइंड बताया।

उसी साल दिसंबर में इंडिया और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ। दिल्ली ने इस्लामाबाद से मकबूल को गिरफ़्तार कर उसके हवाले करने को कहा। ना-नुकुर करते हुए पाकिस्तान ने मकबूल को अरेस्ट तो किया, लेकिन भारत को सौंपने से इंकार कर दिया। पाकिस्तान की अदालत ने दो साल बाद 1974 में उसे रिहा कर दिया। रिहा होते ही मक़बूल बर्मिंघम चला गया। वहां अमानुल्लाह ख़ान के साथ मिलकर जेकेएलएफ़ से जुड़े जम्मू-कश्मीर नेशनल लिबरेशन फ्रंट ने बाद में भारतीय आर्म फोर्स से सशस्त्र संघर्ष किया, जिसमें 20 साल तक खूब खून-खराबा हुआ।

बहरहाल, जब मक़बूल अपने मिशन के साथ जब दोबारा भारत में घुसा घुसा तो इंटेलिजेंस ने उसे गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने मौत की सज़ा का बरकरार रखी। संयोग से उस समय भी हाईकोर्ट के जज जस्टिस नींलकंठ गंजू ही थे। हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद 23 जुलाई 1976 को मक़बूल तिहाड़ में शिफ़्ट किया गया। हाईकोर्ट की सुनाई सजा सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखी। इस बार उसको मौत की सज़ा मिलनी तय थी। वस्तुतः उसने अनफेयर ट्रायल का आरोप लगाकर राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजी। इस दौरान उसे तिहाड़ जेल के डेथ सेल में रखा गया। उस सेल में मक़बूल घबराता था और डेथ सेल को मेंढक का कुआं कहता था।

वैसे मक़बूल के चार भाई भी थे। हबीबुल्ला भट मकबूल से तिहाड़ में मिलने के बाद रहस्यमय तरीक़े से ग़ायब हो गया। ख़ुफिया एजेंसियों का मानना कि वह पाकिस्तान में है। दो भाई जेकेएलएफ के संयोजक गुलाम नबी भट और मंजूर अहमद भट आतंकी थे और श्रीनगर और त्रेहगाम में अलग-अलग मुठभेड़ों में मारे गए। चौथा भाई जहूर भट भी जेकेएलएफ से जुड़ा है। मकबूल की जयंती पर नियंत्रण अवैध रूप से नियंत्रण रेखा पार करने की कोशिश में नज़रबंद था। क़रीब एक वर्ष बाद पुलिस ने उसे रिहा कर दिया। मक़बूल की दो बहनें सईदा और महबूबा हैं। मक़बलू की दो बीवियां थीं। पहली बीवी राज बेगम से शौकत मक़बूल और जावेद मक़बूल और ज़कीरा से लुबना मक़बूल थीं।

बहरहाल, मकबूल को छुडवाने और ज़िंदा रखने के लिए रवींद्र महात्रे को अपहृत कर उनकी हत्या की गई, लेकिन यह पाशा उल्टा पड़ा। इंदिरा गांधी के आतंकवाद के ख़िलाफ़ कड़े और स्पष्ट रुख के चलते मक़बूल को फ़ांसी पर लटका दिया गया। इस तरह उसके साथियों ने म्हात्रे का हत्या करके मक़बूल के जीवित रहने की संभावना ही खत्म कर दी। बहरहाल, 11 फरवरी को मक़बूल के समर्थक उसकी पुण्यतिथि मनाते हैं। 1989 में उसकी पुण्य तिथि के दिन ही आंतकवाद की शुरुआत की गई थी। उसी साल 4 नवंबर को मकबूल को फांसी की सजा देने वाले जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई थी। तब से हिंसा का जो सिलसिला शुरू हुआ वह दिल्ली की सल्तनत पर बैठने वालों की नरम नीति के कारण आज भी बदस्तूर जारी है।

गुरुवार, 10 मार्च 2016

विजय माल्या विदेश भागे, अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हिंदी में एक कहावत हैः अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत. बैंकों से क़र्ज़ लेकर ऐय्याशी करने वाले राज्यसभा सदस्य विजय माल्या के विदेश भागने के बाद नरेंद्र मादी सरकार के हाथ-पांव मारने की हरकत पर यह कहावत सटीक बैठती है। दरअसल, जब माल्या देश में थे, तब उनका पॉसपोर्ट ज़ब्त करने की बजाय उन्हें खुली आज़ादी दी गई। अब बैंकों का 9000 करोड़ रुपए डुबोकर माल्या विदेश भाग गए, तब उनका पॉसपोर्ट रद करने और देश में लाने की बात की जा रही है।

मुद्दा यह है कि विजय माल्या को पहले कांग्रेस और अब बीजेपी रिजिम में खूब छूट मिली। मसलन, वह दो साल पहले डिफॉल्टर घोषित किए जा चुके हैं. इसके बावजूद उनकी ऐय्याशी वाली लाइफस्टाइल जस की तस रही। अभी पिछले 18 दिसंबर को अपने 60वें जन्म दिन पर माल्या ने गोवा में तीन दिन तक इतनी ऐय्याशी की कि रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन को कहना पड़ा कि किसी डिफॉल्टर व्यक्ति को जन्मदिन पर इतनी दौलत नहीं ख़र्च करनी चाहिए।

आरबीआई गवर्नर ने इशारों-इशारों में कहा था कि देश में आम आदमी को महंगा क़र्ज़ ऐसी आलीशान बर्थडे पार्टियों के चलते ही मिल रहा है। जब रिजर्व बैंक का गवर्नर ऐसा कहे कि बैंकों का उधार न लौटा पाने वाले बड़े डिफॉल्टरों को पैसे की नुमाइश कर ऐसी ऐय्याशी के साथ जन्मदिन मनाने से गलत संदेश जा रहा है तो उसी समय उस आदमी पर शिकंजा कसना ही चाहिए था।

अभी कोई दस दिन पहले डियाजियो से 515 करोड़ रुपए की डील करने और अपनी कंपनी के चेयरमैनशिप से इस्तीफा देने के बाद भी माल्या ने कहा था कि वह लंदन में बसना चाहते हैं, ताकि वह अपने बच्चों के और करीब रह सकें। तब पूरे देश को लगा कि माल्या बैंकों का पैसा डुबोकर भागेंगे, लेकिन उन्हें रोकने वाली तमाम एजेंसियां हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं।

बुधवार को ख़बर आई कि माल्या आख़िरकार विदेश भाग ही गए। भारत के अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि माल्या फ़िलहाल देश मे नहीं है. वह कहां है, किसी को कुछ नहीं पता। हालांकि कहा जा रहा है कि वह लंदन में है, क्योंकि वह पहले ही कह चुके हैं कि वह लंदन में शिफ़्ट होना चाहते हैं।

कई लोगों का मानना है कि केंद्र सरकार की बड़े लोगों के प्रति उदार नीति के कारण माल्या को पहले गिरफ़्तार नहीं किया गया। लोग हैरानी जता रहे हैं कि इतने बड़े डिफॉल्टर का एहतियात के तौर पर पासपोर्ट क्यों ज़ब्त नहीं किया गया। बहरहाल, किंगफिशर एयरलाइंस को क़र्ज़ देने वाली 17 बैकों की अगुवाई कर रहे भारतीय स्टेट बैंक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा तब खटखटाया जब बहुत देर हो चुकी थी। एसबीआई ने सरकार से अपील की थी कि माल्या को गिरफ्तार किया जाए, ताकि वह बैंकों का 9000 करोड़ रुपए डुबोकर विदेश न भाग सके। लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रही और माल्या चुपचाप निकल लिया।

अब माल्या को क़र्ज़ देने वाली सभी 17 बैंकों से भी यह पूछा जाना चाहिए कि माल्या समेत बैड लोन वाले क़र्ज़ को देने वाले बैंक अधिकारियों के ख़िलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। गौरतलब है कि उद्योंगपतियों से सांठगांठ करके शीर्ष बैंक अफसर करोड़ों रुपए के क़र्ज़ बांटते हैं और उससे मिले नज़राने से ऐश करते हैं। क़र्ज़ मंजूर करने वाले ढेर सारे बैंक अधिकारी रिटायर होने के बाद विदेश शिफ्ट हो जाते हैं और ऐश करते हैं। ऐसे अफसरों को भी जांच के दायरे में लाने की ज़रूरत है। बैड लोन बांटने वाले बैंक अफसरों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होती, इसलिए विजय माल्या जैसे लोग बैंकों को चूना लगाते हैं।  

हम आम जीवन में देखते हैं कि कोई आदमी महज़ 5-10 हज़ार रुपए का क़र्ज़ नहीं चुका पाए तो उसे बैंकें या तो पकड़ ले जाती हैं या फिर उसके घर बॉउंसर भेज देती हैं. लेकिन माल्या जैसे धन्नासेठों के साथ रियायत करती हैं। माल्या समेत उद्योगपतियों और बिल्डरों द्वारा लिया गया क़रीब पांच लाख करोड़ रुपए का लोन लिया बैड लोन घोषित किया जा चुका है।

इससे दो जून की रोटी जुटाने के लिए एड़ी-चोटी का पसीना बहाने वाले लोगों को लगता है कि इस देश में क़ायदे का जीवन केवल विजय माल्या जैसे मुट्ठीभर लोग जीते हैं, बाक़ी तो पेट भरने के लिए भी स्ट्रगल करते हैं। देशवासियों को यह भी लग रहा है कि बीजेपी हो, कांग्रेस हो, वामदल हों, आप हो, या सपा-राजद या ममता की पार्टी हो, सभी उद्योगपतियों के हित में काम करती हैं। बहरहाल, माल्या एपिसोड के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि बैंकें बड़े लोगों को क़र्ज़ बांटने की अपनी नीति में बदलाव करेंगी और प्रवर्तन निदेशालय बैंक अफसरों के आय के स्रोतों और आय की मिलान करके कार्रवाई करेगा।

जैसी कि उम्मीद थी विजय माल्या के विदेश भागने का मामला बृहस्पतिवार को संसद के दोनों सदनों में ज़ोरदार तरीक़े से उठा। राज्यसभा में कांग्रेस के ग़ुलाम नबीं आज़ाद के सवाल पर वित्तमंत्री अरुण जेटली कहा कि माल्या से एक-एक पाई वसूली जाएगी। अब कितना वसूली करेंगे, यह तो वक्त ही बताएगा। यह यह बताना ज़रूरी है कि ललित मोदी को लंदन भागे कितने साल हो गए, उसे स्वदेश लाकर मुक़दमा चलाना तो दूर बीजेपी के नेता वहां जाकर उससे मिलते रहे हैं। ऐसे में विजय माल्या के ख़िलाफ़ कार्रवाई होगी इस पर भारी संदेह है।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

महिलाओं की हर समस्या का एक ही हल, हर जगह उन्हें 50 फ़ीसदी प्रतिनिधित्व

हरिगोविंद विश्वकर्मा
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना कर महिलाओं को ख़ुश करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल, जो हो रहा है, वह मुद्दे से ध्यान हटाने की कवायद है। यह वैसी ही प्रैक्टिस है जैसे, कभी राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तो कभी लोकसभा अध्यक्ष पद पर किसी महिला को बिठाकर मान लेना कि नारी सशक्तिकरण यानी वूमैन इम्पॉवरमेंट हो गया। दरअसल, जो लोग धूमधाम से महिला दिवस मनाते हैं, उनमें ज़्यादातर लोग महिलाओं का हक़ मारते हैं। चूंकि महिलाओं का हक़ मारना यानी उनके साथ पक्षपात एक सामाजिक अपराध है, लिहाज़ा, उसी सामाजिक अपराध का प्रायश्चित करने के लिए ही पुरुष प्रधान-समाज महिला दिवस मनाता है।

सवाल उठता है कि क्या सचमुच समाज के पैरोकार महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के पक्षधर हैं, क्या सचमुच महिलाओं का उत्थान चाहते हैं। अगर हां, तो वे सभी प्रावधान किए जाएं जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक पहुंचाते हैं। इस क्रम में सबसे ज़रूरी है कि पहले असली समस्या को जानने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि, किसी को पता ही नहीं कि असली समस्या क्या है। ज़ाहिर है मर्ज़ के नेचर का पता नहीं चलेगा तो दवा अंदाज़ से दी जाएगी, जिससे ठीक होने की बजाय कभी-कभार मरीज़ की मौत तक हो जाती है।

अगर नैशनल क्राइम ब्यूरो के डेटा देश में नया पर गौर करें तो रेप क़ानून के अस्तित्व में आने के बाद रेप की घटनाएं और बढ़ी हैं। सन् 2009, 2010, 2011 और 2012 में क्रमशः 21397, 22172, 24206 और 24923 महिलाएं रेप की शिकार हुईं। नया कानून 2013 में बना और उस साल रेप की घटनाओं का आंकड़ा 33707 पहुंच गया। इसका अर्थ है डर्टी सोचवाले क़ानून से नहीं डरते। क़ानून कठोरतम यानी रेपिस्ट को पब्लिकली ज़िंदा जलाने का भी बना दिया जाए। तब भी वे महिलाओं पर ज़ुल्म जारी रखेंगे। यानी रेप समेत महिलाओं पर होने वाले ज़ुल्म क़ानून कठोर करके नहीं रोके जा सकते। दरअसल, समाज ही असंतुलित और पुरुष-प्रधान यानी मेल-डॉमिनेटेड है और ऐसे समाज में रेप नहीं रोका जा सकता, क्योंकि अपनी जटिलताओं के चलते यह समाज महिलाओं को अल्पसंख्यक बनाता है।

कठोर रेप लॉ के बावजूद बढ़ती रेप की वारदातें साबित करती हैं कि क़ानून-निर्माता अब भी मूल समस्या समझ पाने में नाकाम हैं। या तो उनकी सोच वहां तक पहुंच नहीं रही है कि समस्या आइडेंटीफाई कर उसे हल करें या फिर वे इतने शातिर हैं कि समस्या हल ही नहीं करना चाहते। यह भावना मे बहकर अनाप-शनाप बयान देने का वक़्त नहीं, बल्कि पता करने का वक़्त है कि रेप जैसे क्राइम रोके कैसे जाएं। रेपिस्ट को दंड देने की बात तो बाद में आती है। अगर ऐसे प्रावधान हो जाएं कि रेप जैसे अपराध हो ही न, तो दंड पर ज़्यादा दिमाग़ खपाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। सवाल उठता है कि आख़िर रेप जैसे जघन्य अपराध हो ही क्यों रहे हैं। आख़िर क्यों औरत को अकेले या एकांत में देखकर चंद पुरुष अपना विवेक, जो सही मायने में उन्हें इंसान बनाता है, खो देते हैं और हैवान का रूप धारण कर लेते हैं? एक स्त्री जो हर किसी के लिए आदरणीय होनी चाहिए, माता-बहन के समान होनी चाहिए, आख़िर क्यों अविवेकी लोगों के लिए महज भोग की वस्तुबन जाती है?

दरअसल, महिलाओं की बहुत कम संख्या देखकर पुरुष उन्हें कमज़ोर मान लेते हैं और मनमानी करने का दुस्साहस करने लगते हैं। महिलाओं पर होने वाले हर ज़ुल्म के लिए समाज का मैल-डॉमिनेटेड ताना-बाना ही ज़िम्मेदार है। ऐसे समाज में स्त्री पुरुष की बराबरी कर ही नहीं सकती, क्योंकि यह सेटअप स्त्री को सेकेंड सेक्स का दर्जा देता है। सभ्यता के विकास के बाद जब से मौजूदा समाज प्रचलन में आया, तब से स्त्री दोयम दर्जे की ही नागरिक रही। बॉलीवुड अभिनेत्रियों या शहरों की लड़कियों को जींस-टीशर्ट या स्कर्ट में देखकर कुछ क्षण के लिए ख़ुश हुआ जा सकता है कि महिलाएं पुरुषों की बराबरी कर रही हैं लेकिन सच यह है कि स्त्री कभी पुरुष की बराबरी कर ही नहीं पाई। यह सच स्त्रियों से बेहतर कौन समझ सकता है।

दरअसल, पुरुष-प्रधान मानसिकता ही स्त्री को बराबरी का दर्जा देने भी नहीं देती। लिहाजा, ज़रूरत उन प्रावधानों पर अमल करने की है जो सही मायने में स्त्री को बराबरी के मुकाम तक लाते हैं। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी। क्या लोग अपने घर में स्त्री या लड़कियों को बराबरी का दर्जा देते हैं? क्या घर में बेटे-बेटी में फ़र्क़ नहीं करते? विकसित परिवारों में स्त्री के साथ खुला पक्षपात होता है, उसे एहसास दिलाया जाता है कि दोयम दर्जे की नागरिक है। ऐसे में पिछड़े और दूर-दराज़ के समाज में स्त्री की क्या पोज़िशन होती होगी, सहज समझा जा सकता है।

पुरुष-प्रधान संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण मिलेगा, अब इसकी संभावना नहीं के बराबर है। महिला आरक्षण तो किसी भी सरकार के एजेंडा में ही नहीं था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपवाद नहीं हैं। ऐसे में जो नेता रेप पर आंसू बहाते हैं, वे लोगों को बेवकूफ़ बनाते हैं। इनकी स्त्रियों को बराबरी का दर्जा देने में दिलचस्पी ही नहीं। अगर लोग सचमुच महिलाओं को बराबरी का दर्जा देने के हिमायती हैं तो सबसे पहले राजनीतिक दलों के अलावा केंद्र और राज्य सरकार में 50 फ़ीसदी पद महिलाओं को दें। यानी देश की हर सरकार में महिला-मंत्रियों की तादाद पुरुष-मंत्रियों के बराबर हो। विधायिका में 33 फ़ीसदी नहीं बल्कि 50 फ़ीसदी जगह महिलाओं के लिए सुनिश्चित हो। महिलाओं की आबादी फ़िफ़्टी परसेंट है तो विधायिका में आरक्षण 33 फ़ीसदी क्यों? संसद में 790 सदस्यों (लोकसभा-545 और राज्यसभा-245) में से किसी भी सूरत में 395 सदस्य महिलाएं होनी ही चाहिए।

एक बात और, महिला आरक्षण का लाभ केवल गांधी, पवार, बादल, पटनायक, या मुलायम जैसे राजनीतिक परिवारों की महिलाएं या लड़कियां ही हाईजैक न कर लें, जैसा कि होता रहा है। पॉलिटिकल फैमिलीज़ की महिलाएं अपने पति, पिता, ससुर या बेटे की पुरुष प्रधान सोच को ही रिप्रज़ेंट करती हैं। लिहाज़ा, महिला रिज़र्वेशन का लाभ आर्थिक-सामाजिक रूप से पिछड़े यानी ग़रीबदेहाती, आदिवासीदलित, पिछड़े वर्ग और मुस्लिम जमात की महिलाओं को भी मिले, यह भी सुनिश्चित होना चाहिए। इसके अलावा मेन स्ट्रीम से ग़ायब उच्च जाति की महिलाओं को भी मौक़ा मिले। विधायिका ही नहीं, न्यायपालिका में आधे जज और आधी एडवोकेट महिलाएं होनी चाहिए। फ़िलहाल सुप्रीम कोर्ट में 25 जज हैं, उनमें केवल एक ही महिला हैं। यही वजह है कि दिल्ली गैंगरेप का मुक़दमा सुप्रीम कोर्ट में तीन साल से लंबित है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 400 की जानी चाहिए, उनमें 200 जज महिलाएं हों। इसी तरह हाईकोर्ट और निचली अदालतों में जजों की संख्या सीधे 16 गुना बढ़ा देनी चाहिए और महिला-पुरुष जजों की संख्या बराबर होनी चाहिए।

विधायिका और न्यायपालिका के बाद नंबर आता है ब्यूरोक्रेसी का। इसमें भी हर साल छात्र-छात्राओं को चयन बराबर संख्या में होनी चाहिए। पुलिस तंत्र में महिला-पुरुष की संख्या बराबर की जानी चाहिए। कल्पना कीजिए, किसी पुलिस स्टेशन में जाते हैं और वहां जितने पुरुष हैं, उतनी ही महिलाएं भी तो आपका डर, ख़ासकर महिलाओं का डर ख़त्म हो जाएगा। इसी तरह आर्मफोर्स, बैंक, मीडिया संस्थानों और धार्मिक संस्थानों में आधी स्ट्रेंथ महिलाओं की होनी ही चाहिए। सरकारी व निजी संस्थानों, स्कूल-कॉलेज और यूनिवर्सिटीज़ में 50 प्रतिशत पोस्ट महिलाओं को दी जानी चाहिए। आख़िर महिला घर में क्यों बैठें? वे काम पर क्यों न जाएं? यदि 50 फ़ीसदी महिलाएं काम पर जाएंगी तो घर के बाहर उनकी विज़िबिलिटी पुरुषों के बराबर होगी। यानी हर जगह जितने पुरुष दिखेंगे उतनी ही महिलाएं भी। इससे महिलाओं का मोरॉल बुस्टअप करेगा।

जब गली, सड़क, बस, ट्रेन, प्लेन, दफ़्तर, थाने, कोर्ट और स्कूल-कॉलेज यानी हर जगह में महिलाओं की संख्या और मौजूदगी पुरुषों के बराबर होगी तो पुरुष की ज़ुर्रत नहीं कि महिला को बुरी नज़र से देखे। वस्तुतः महिलाओं की कम संख्या ही लंपट पुरुषों को प्रोत्साहित करती हैं। सो महिलाओं को अबला या कमज़ोर होने से बचाना है तो उन्हें इम्पॉवर करना एकमात्र विकल्प है। जिस दिन केंद्र और राज्य सरकार, लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, न्यापालिका, कार्यपालिका और पुलिस तंत्र में पुरुष-वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा और महिलाएं बराबर की संख्या में मौजूद रहेंगी, उस दिन हालात एकदम बदल जाएंगे।

नतीजा यह होगा कि जब लड़कियों को लड़कों की तरह सरकारी और प्राइवेट नौकरी मिलने लगेगी तो उनमें सेल्फ़-रिस्पेक्ट पैदा होगा। वे अपने को पराश्रितऔर वस्तुसमझने की मानसिकता से बाहर निकलेंगी। वे पति या पिता रूपी पुरुष पर निर्भर नहीं रहेंगी, बल्कि स्वावलंबी होंगी। तब वे माता-पिता पर बोझ नहीं होंगी। तब प्रेगनेंसी के दौरान सेक्स-डिटरमिनेशन टेस्ट की परंपरा ख़त्म हो जाएगी। घर में लड़की के जन्म पर उसी तरह ख़ुशी मनाई जाएगी जैसे पुत्र के आगमन पर। लोग केवल पुत्र की कामना नहीं करेंगे, बल्कि लड़की की भी कामना करेंगे। यक़ीन मानिए, तब 1000 लड़कों के मुक़ाबले 1000 लड़कियां पैदा होंगी। समाज संतुलित और ख़ुशहाल होगा। जहां हर काम स्त्री-पुरुष दोनों कर सकेंगे।

मगर यक्ष-प्रश्न यह है कि क्या नारी को अबला और वस्तु मानने वाला पुरुष-प्रधान समाज अपनी सत्ता महिलाओं को सौंपने के लिए तैयार होगा? इस राह में पक्षपाती परंपराएं और संस्कृति सबसे बड़ी बाधा हैं जिनमें आमूल-चूल बदलाव की जानी चाहिए। यानी ढोल, गंवार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारीचौपाई रचने वाले तुलसीदास जैसे पुरुष मानसिकता वाले कवियों को ख़ारिज़ करना पड़ेगा। रामचरित मानसको संशोधित करना होगा, जहां पत्नी की अग्निपरीक्षा लेने और गर्भावस्था में उसे घर से निकाल देने वाले पति को मर्यादा पुरुषोत्तम राममाना गया है। महाभारतऔर व्यास की सोच भी सुधारनी होगी, जो पत्नी को दांव पर लगाने वाले जुआड़ी पति युधिष्ठिर को धर्मराजमानती है। उन सभी परंपराओं और ग्रंथो में संशोधित करना होगा, जहां पुरुष को पति-परमेश्वरऔर स्त्री को चरणों की दासीमाना गया है। इतना ही नहीं उन त्यौहारों में बदलाव करना होगा, जिसमें पुरुष की सलामती के लिए केवल स्त्री व्रत रखती है। स्त्री की सलामती के लिए पुरुष व्रत नहीं रखता। स्त्री को घूंघट या बुरक़ा पहनने को बाध्य करने वाली नारकीय परंपराओं भी छोड़ना होगा। इतना ही नहीं लड़कियों को पिता की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी सुनिश्चित करनी होगी और उस पर सख़्ती से अमल करना होगा। सवाल खड़ा होता है, क्या यह पुरुष-प्रधान समाज इसके लिए तैयार होगा?

वस्तुतः समाज में महिलाओं की बहुत कम विज़िबिलिटी ही सबसे बड़ी समस्या या प्रॉब्लम है। घर के बाहर महिलाएं दिखती ही नहीं, दिखती भी हैं तो नाममात्र तादाद में। सड़कों, रेलवे स्टेशनों और दफ़्तरों में उनकी प्रज़ेंस बहुत कम होती है। मुंबई और दिल्ली जैसे डेवलप्ड सिटीज़ में भी महिलाओं की विज़िबिलिटी दस-पंद्रह फ़ीसदी से ज़्यादा नहीं है। देश के बाक़ी हिस्सों में तो हालत भयावह है। चूंकि महिलाओं की आबादी 50 फ़ीसदी है तो हर जगह उनकी मौजूदगी भी 50 फ़ीसदी होनी चाहिए। अगर विज़िबिलिटी की इस समस्या को हल कर लिया गया यानी महिलाओं की प्रज़ेंस 50 फ़ीसदी कर ली गई तो महिलाओं की ही नहीं, बल्कि मानव समाज की 99 फ़ीसदी समस्याएं ख़ुद-ब-ख़ुद हल हो जाएंगी। इसके बाद महिला दिवस मनाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी। महिलाएं बिना किसी क़ानून के सही-सलामत और महफ़ूज़ रहेंगी।

(समाप्त)

सोमवार, 7 मार्च 2016

महिला आरक्षण विधेयक को भूल गए पुरुष-प्रधान समाज के नेता

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क्या आपको याद हैकभी देश के लोग नारी सशक्तीकरण के प्रतीक महिला आरक्षण विधेयक की बात किया करते थे। उस बिल में संसद और राज्य विधान मंडलों में महिलाओं को 33 फ़ीसदी रिज़र्वेशन का प्रावधान था। अब उसकी चर्चा कोई नहीं करता। महिला आरक्षण बिल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की विशेष पहल राज्यसभा में भारी शोर-शराबे, विरोध और निलंबन के बीच आनन-फानन नौ मार्च 2010 को पारित किया था। संसदीय इतिहास में वह दिन ऐतिहासिक दिन माना गया था। दूसरे दिन सभी अख़बारों की लीड स्टोरी वही थी। लोगों ने पहली बार सुषमा स्वराज, वृंदा करात और नज़मा हेपतुल्ला को एक मंच से लोगों का अभिवादन करते देखा था। माना गया था कि 2014 के आम चुनाव के बाद लोकसभा में एक तिहाई महिलाएं नज़र आएंगी। लेकिन ऐसा हो न सका, क्योंकि वह बिल अंततः पंद्रहवीं लोकसभा में अटक गया।

2014 की गर्मियों में उस लोकसभा का कार्यकाल ख़त्म होते ही बिल ने भी दम तोड़ दिया। संविधान के अनुच्छेद 107 (5) के तहत विचाराधीन रहने वाले बिल लोकसभा भंग होते ही ख़त्म हो जाते हैं। महिला आरक्षण विधेयक के मुखर विरोधी समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के ज़्यादा सदस्य मौजूदा  लोकसभा में नहीं हैं। ऐसे बिल को क़ानून का रूप देने का यह सबसे अनुकूल समय था, पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को महिलाओं को संसद और विधान मडलों में प्रतिनिधित्व देने के बारे में सोचने की फ़ुर्सत ही नहीं। इसीलिए उनके 22 महीने के कार्यकाल में संसद के कई अधिवेशन हुए, लेकिन महिला रिज़र्वेशन बिल पेश करना तो दूर उसकी आहट तक नहीं है। दरअसल, यह बिल मोदी के एजेंडा में ही नहीं है।
दरअसल, पंद्रहवीं लोकसभा के पहले संयुक्त अधिवेशन मे चार जून 2009 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने घोषणा की थी कि सरकार महिला आरक्षण विधेयक 100 दिन के अंदर पारित करवाएगी, क्योंकि महिलाओ को कई कारण अवसरों से वंचित रहना पड़ता है। उस साल लोकल बॉडीज़ में महिला रिप्रज़ेंटेशन 50 फ़ीसदी कर दिया गया था। मुमकिन है, इस साल भी महिला दिवस मनाते हुए चंद लोग अफसोस जताएं कि आज़ादी के क़रीब दशक बाद भी महिलाओं को समुचित रिप्रजेंटेशन नहीं दिया जा सका, लेकिन पर्व के बीतते ही सब लोग फिर से भूल जाएंगे कि कभी महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व देने की बात होती थी।

यह विडंबना है कि महिला आरक्षण का ज्वलंत मुद्दा पिछले दो दशक से लंबित है। देश मे आधी आबादी पिछले दो दशक से अपना प्रतिनिधित्व बढाने की मांग कर रही हैं लेकिन पुरूष प्रधान राजनीति संसद में बिल पारित नहीं होने दे रही। हालांकि क़रीब हर राजनीतिक दल अपने मैनिफेस्टो में महिलाओं को रिज़रवेशन देने का वादा करता है। इस बार यानी 16 लोकसभा में 61 महिलाएं हैं। जबकि पिछली बार 58 महिलाएं लोकसभा में पहुंची थी। वैसे पिछली लोकसभा कई मायनों में अलग थी। पहली बार संसद में इतनी ज़्यादा महिला सांसद चुनी गईं थीं और सबसे बढ़कर भारतीय लोकतंत्र में पहली बार मीरा कुमार के रूप में महिला लोकसभा स्पीकर मिली थीं।

अगर महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने के इतिहास में जाएं तो महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए उन्हें रिज़र्वेशन देने का कॉन्सेप्ट राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में आया था। राजीव ने सत्ता का विकेंद्रीकरण करते हुए पंचायतों और लोकल बॉडीज़ को अधिकार देने और उसमें महिलाओं के लिए जगह सुरक्षित करने की बात की थी। पंचायतों और लोकल बॉडीज़ में महिलाओं को आरक्षण 73वें और 74वें संविधान संशोधन के ज़रिए 1993 में शुरू किया गया। उसी समय संसद और विधान मंडलों में महिलाओं की संख्या बढ़ाने की रूपरेखा बनी थी। हालांकि राजीव सरकार के घोटाले में फंस जाने से वह प्रयास फलीभूत नहीं हुआ।

दरअसल, महिला रिज़र्वेशन बिल का संसदीय सफर सितंबर 1996 से शुरू हुआ। जब संयुक्त मोर्चा सरकार ने बिल लोकसभा में पेश किया। उस समय भी निचले सदन में ज़बरदस्त हंगामा हुआ और मंत्री के हाथ से बिल छीन लिया गया।  जब बिल पास नहीं हुआ तो उसे संयुक्त संसदीय समिति के पास भेज दिया गया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की नेता गीता मुखर्जी की अगुवाई वाली समिति ने नवंबर 1996 में पेश अपनी रिपोर्ट में सात संशोधन सुझाए थे। (1) रिज़र्वेशन की अवधि 15 साल, (2) ऐंग्लो-इंडियन के लिए सब-रिज़र्वेशन, (3) तीन लोकसभा सीटों से कम वाले राज्यों में भी आरक्षण, (4) दिल्ली विधान सभा में भी आरक्षण, (5) एक तिहाई से कम नहीं की जगह क़रीब एक तिहाई’ व्यवस्था (6) ओबीसी महिलाओं के लिए सब-रिज़र्वेशन और (7) राज्यसभा और राज्य विधान परिषदों में भी आरक्षण।

संशोधित महिला आरक्षण बिल 1997 फिर पेश किया गया, लेकिन तीन यादवों (मुलायम, लालू और शरद) ने उसे पास ही नहीं होने दिया। शरद यादव महिला बिल के कट्टर विरोधी निकले। वह महिलाओं को महिलाओं के प्रतिनिधि के क़ाबिल ही नहीं मानते। 1997 में एक बार उन्होंने कहा था, आपको क्या लगता है, छोटे बाल वाली महिलाएं हमारी महिलाओं के बारे में बोल पाएंगी ?” बहराल, अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 1998 और 1999 में भी बिल पेश किया गया लेकिन विपक्ष ख़ासकर सपा और राजद के विरोध के कारण पास नहीं किया जा सका।

बहरहाल, वाम दलों और कांग्रेस के लिखित आश्वासन के बाद एनडीए सरकार ने 2002 में एक बार और 2003 में दो बार बिल पेश किया, लेकिन बहुमत होने के बावजूद बिल पास नहीं करवाया जा सका। कहते हैं अटल सरकार ने बिल पास करवाने की कोशिश ही नहीं की। इसके बाद सत्ता में आई मनमोहन सिंह सरकार ने अपने कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में महिला आरक्षण बिल को शामिल किया, लेकिन बिल पास नहीं हो सका। आम सहमति न बन पाने को कारण बताकर महिला विधेयक को एक प्रकार से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और कांग्रेस ने चार साल बाद 2008 मे फिर कोशिश की। गीता मुखर्जी समिति की पहली पांच सिफारिशों को संशोधित बिल में शामिल कर लिया गया और अंतिम दो को छोड़ दिया गया।

छह मई 2008 को विधेयक पेश करते समय लोकसभा में अजीब हालात पैदा हो गए। बिल पेश कर रहे तत्कालीन मंत्री हंसराज भारद्वाज से समाजवादी पार्टी के लोग बिल छीन न लें, इसके लिए उन्हें दो कांग्रेस महिला सांसदों कुमारी शैलजा और अंबिका सोनी के बाच बैठना पड़ा। जयंती नटराजन और अलका क्षत्रिय भारद्वाज भी उनकी रक्षा कर रही थीं। इसके बावजूद भारद्वाज के बिल पेश करने की कोशिश करते समय समाजवादी पार्टी सांसद अबु आसिम आज़मी ने बिल की कॉपी छीनने की कोशिश की, तो केंद्रीय रेणुका चौधरी ने उन्हें धक्का दे दिया था।

बहरहाल, 2008 में बिल के लोकसभा में पास न होने पर इसे संसदी की स्थाई समिति के पास भेज दिया, लेकिन स्थाई समिति में बिल पर आम राय नहीं बन पाई। समाजवादी पार्टी के सदस्य वीरेंद्र भाटिया और शेलेंद्र कुमार ने कहा कि वे महिलाओं को आरक्षण देने के ख़िलाफ नहीं हैं, लेकिन विधेयक का मौजूदा स्वरूप उन्हें स्वीकार्य नहीं। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में महिलाओं को 20 फ़ीसदी से ज़्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए। इसके अलावा पिछड़े वर्ग और अल्पसंख्यक महिलाओं के लिए भी कोटा होना चाहिए।

कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि पुरुष प्रधान राजनीतिक दलसंसद और विधान सभाएं महिलाओं को आरक्षण दिए जाने के पक्ष में नहीं हैं। महिला आरक्षण बिल पर सभी राजनीतिक दलों की सोच एक जैसी ही है। दो मुख्य दलों बीजेपी और कांग्रेस हमेशा दोहरा मापदंड अपनाया। इसलिए महिलाएं समुचित प्रतिनिधित्व से वंचित हैं। महिला ऐक्टिविस्ट मधु किश्वर कहती हैं कि अगर बिना ठोस प्रवाधान के महिला आरक्षण लागू किया गया तो लाभ मौजूदा नेताओं की पत्नियों-बेटियों की बीवी-बेटी ब्रिगेड ले उडेंगी।

रविवार, 6 मार्च 2016

जेएनयू में आज़ादी-आज़ादी का उद्घोष बेहद ख़तरनाक संकेत

हरिगोविंद विश्वकर्मा
हम क्या चाहते हैं- आज़ादी! ज़ोर से बोलो- आज़ादी! इधर से बोलो- आज़ादी, उधर से बोलो- आज़ादी। फिर से बोलो- आज़ादी। हम चाहते हैं- आज़ादी! आज़ादी! आज़ादी!! आज़ादी!!! हमें आज़ादी से कम कुछ भी मंजूर नहीं, हम आज़ादी लेकर ही रहेंगे, इस आज़ादी लेने से हमें कोई ताक़त रोक नहीं सकती, हम आज़ादी चाहते हैं। अंत में छोटा-सा स्पष्टीकरण हम देश सेनहीं, बल्कि देश मेंआज़ादी चाहते हैं। यानी सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। इसी को कहते हैं, शब्दों की कारीगरी। मतलब अपनी बात भी कह दी और देश के टीवी देखने वाले तबके ने आज़ादी की इस परिभाषा को प्रशंसा भाव से मान भी लिया और आज़ादी पर लट्टू भी हो गया। लगे हाथ संविधान का उल्लंघन भी नहीं हुआ। निश्चित तौर पर यह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार सिंह के लिए वैल्यू ऐडेडे मुद्दा साबित हुआ। आज़ादी का नारा देकर वह रातोरात देश का स्टार पोलिटिशियन बन गया।

आप नौ फरवरी 2016 की शाम जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय कैंपस में लगे कश्मीर की आज़ादी के नारे और तीन मार्च की रात कन्हैया कुमार सिंह की आज़ादी वाले नारे की तुलना कीजिए। बस सेकी जगह मेंने ले लिया। बाक़ी सारा मंजर, मतलब मन्तव्य और मकसद वही था। यानी इसमें शब्दों का भले हेरफेर कर दिया गया हो, लेकिन इसका संदेश वही गया, जो संदेश अलगाववादी तत्व भारतीय संसद पर हमला करवाने वाले जैश-ए-मोहम्मद के दुर्दांत आतंकवादी मोहम्मद अफजल गुरू को फांसी पर लटकाने की तीसरी बरसी पर देना चाहते थे और जिसके लिए सारा तामझाम किया गया था। मतलब, नौ फरवरी को लगा भारत से आज़ादीका नारा 25 दिन बाद भारत में आज़ादीमें तब्दील हो गया। गहराई से मनन करने पर लगता है क़ानूनी दांव-पेंच के चलते यह किया गया, क्योंकि देशद्रोह का आरोप झेल रहे कन्हैया कुमार सिंह छह महीने की अंतरिम ज़मानत पर हैं।

बहरहाल, किसी भी देश में आज़ादी का उद्घोष और वह भी राष्ट्रीय राजधानी में, उस जगह, जहां तीन हफ़्ते पहले कश्मीर की आज़ादी और देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाले नारे लगे हों, वहां इस तरह आज़ादी का उद्घोष किसी भी दृष्टि से शुभ संकेत नहीं है। ख़ास कर कन्हैया ने भाषण से पहले और भाषण के बाद जिस तरह आज़ादी का उद्घोष किया, वह गंभीर चिंता का विषय है। आज़ादी के उद्घोष के दूरगामी परिणामों से अनजान अरविंद केजरीवाल जैसे अपरिपक्व नेता अपने राजनीतिक लाभ के लिए इस तरह के दुस्साहस को प्रमोट करके ऐतिहासिक भूल कर रहे हैं। यह उसी तरह की भूल जैसे महात्मा गांधी ने कभी खिलाफत आंदोलन में शामिल हो करके की थी या जवाहरलाल नेहरू ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देकर या फिर इस सीमावर्ती राज्य के एक तिहाई हिस्से से पाकिस्तानी क़ब्ज़ा ताक़त से ख़त्म करने की बजाय मसला संयुक्त राष्ट्र में ले जाकर की थी।

दरअसल, “आज़ादीएक उर्दू शब्द है। इसका सहज और पहला यानी प्रचलित और सबसे ज़्यादा मान्य अर्थ स्वतंत्रतायानी स्वाधीनता” , अंग्रेज़ी में फ्रीडमही होता है। यानी जब कोई आज़ादी मांगता है तो इसका मतलब वह व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश से आज़ाद यानी स्वाधीन होना चाहता है। यानी आज़ादी की मांग केवल व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश से ही की जा सकती है। क्योंकि व्यक्ति पर व्यक्ति, समाज, संस्थान, सिस्टम, सरकार और देश का ही नियंत्रण होता है। कन्हैया ने कहा कि हम भारत में आज़ादी चाहते हैं। फिर तपाक् से कह दिया कि देश से नहीं बल्कि ग़रीबी, जातिवाद या मनुवाद आदि से आज़ादी चाहते हैं। दरअसल, यहां आज़ादी का मतलब ही ग़लत समझा गया, क्योंकि ग़रीबी, जातिवाद या मनुवाद आदि अवस्थाएं हैं, इनसे कोई आज़ादी नहीं मांग सकता। इन अवस्थाओं में बदलाव लाया जा सकता है यानी इन्हें समूल नष्ट किया जा सकता है, इनसे आज़ाद नहीं हुआ जा सकता है।

जो शब्द देश के लिए, भले ही पहले कांग्रेस लीडरशिप और अब बीजेपी लीडरशिप के नकारपन के कारण, सिरदर्द जैसा हो गया हो और जिसका सही अर्थ देश के तमाम लोग 1990 में कश्मीर में आतंकवाद के उदय से जानते हों। आज़ादी रूपी जिस शब्द को भारत और भारतीय व्यवस्था में भरोसा न करने वाले अलगाववादी तत्व लगाते आ रहे हैं। या जिस आज़ादी शब्द से देश का मेजॉरिटी पापुलेशन चिढ़ता हो, उसी शब्द का चयन या तो मूर्खता कही जाएगी या फिर असली मन्तव्य छुपाने के लिए लोगों की आंख में धूल झोंकने वाला क़दम कहा जाएगा। कन्हैया जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष है, इसलिए वह इस तरह की मूर्खता नहीं कर सकते। हां, वह उमर खालिद जैसे अपने दोस्तों का हिडेन एजेंडा लागू करने के लिए लोगों की आंख में धूल ज़रूर झोंक सकते हैं।

देश और देशवासियों को यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि जैश-ए-मोहम्मद के दुर्दांत आतंकवादी अफ़ज़ल गुरू ने देश के लोकतंत्र पर हमला करवाया था। उसी अफज़ल गुरू की बरसी पर कार्यक्रम में देश विरोधी और कश्मीर की आज़ादी के समर्थन में नारे लगाए गए थे। लिहाज़ा, कन्हैया का समर्थन करते समय हर सच्चे भारतीय को यह ज़रूर सोचना चाहिए, कि कन्हैया का समर्थन करके कहीं कोई ऐतिहासिक ग़लती तो नहीं कर रहे हैं, जिसके बाद पछताने के अलावा कुछ भी हाथ में नहीं आएगा।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और 22 महीने उनकी सरकार की नीतियों से जिन-जिन लोगों का नुकसान हो रहा है या दिल दुख रहा है, उन सबको कन्हैया का भाषण दिल छू लेने वाला या ऐतिहासिक लगा। कुछ लोगों ने तो इतना ओजस्वी भाषण जीवन में पहली बार सुना। चाहे वह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हों, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी हों, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हों या फिर वामपंथी दल, सबको कन्हैया का भाषण असाधारण लगा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव सीताराम येचुरी ने तो घोषणा भी कर दी कि कन्हैया पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में वामदलों का प्रचार भी करेंगे।

कन्हैया कुमार सिंह का इंटरव्यू लेने वाले पत्रकारों से उम्मीद की जा रही थी कि आमने-सामने मिलने पर जेएनयू नेता से ज़रूर पूछेंगे कि क्या आप आज़ाद नहीं हैं, जो आज़ादी मांग रहे हैं। आप राजधानी में देश के प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ नारे लगा रहे हैं और आज़ादी का उद्घोष कर रहे हैं, क्या यह आज़ादी नहीं है? आप देश के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थान जेएनयू में देश के ख़र्च पर में रिसर्च कर रहे हैं, क्या यह आज़ादी नहीं है? कन्हैया से यह भी पूछा जाना चाहिए था कि देश में किसने उन्हें ग़ुलाम बनाकर रखा है जो उससे आज़ादी चाहते हैं। ख़ासकर जो देश अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता रहा हो, उस देश के अंदर आज़ादी की बात करना कहां तक उचित है।

लोग उम्मीद कर रहे थे कि कि कन्हैया जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के अध्यक्ष हैं। लिहाज़ा, वह कुछ सीरियस और इश्यू-ओरिएंटेड बात करेंगे। मोदी की नीतियों में खामियों या ईपीएफ पर प्रस्तावित टैक्स पर बात करेंगे। वह लोकपाल की बात करेंगे, कि किस तरह मोदी ने उसे लटका रखा है। मोदी के एक रिटायर्ड चीफ़ जस्टिस को राज्यपाल बनाने कर जजों को पोस्टरिटायर प्रलोभन देकर एक बहुत ग़लत परिपाटी शुरू करने का मुद्दा उठाएंगे। मौजूदा संसद में कोई विपक्ष का नेता नहीं है, इससे कई समितियों में विपक्ष का प्रतिनिधित्व नहीं हो रहा है, लोग उम्मीद कर रहे थे कि कन्हैया यह मसला भी उठाएंगे। कन्हैया महिला आरक्षण की बात करेंगे, जिसे पिछले दो दशक से पहले कांग्रेस और अब बीजेपी ने ठंडे बस्ते में डाल रखा है। वह आरक्षण की बात करेंगे, जिसका लाभ केवल पासवान-मीरा कुमार, लालू-मुलायम जैसे लोग ही उठा रहे हैं। वह लोकतंत्र को पोलिटिकल फैमिलीज़ के क़ब्ज़े से मुक्त कराने की बात करेंगे, जिसके कारण किसानों को आत्महत्या करने के लिए मज़बूर होना पड़ रहा है और देश का लोकतंत्र मूकदर्शक बना हुआ है। लिहाज़ा, कन्हैया इस नकली लोकतंत्र की जगह असली लोकतंत्र लाने की बात करेंगे, लेकिन कन्हैया मोदी” “संघीऔर एबीवीपीकी टर्मिनॉलॉजी से उबर ही नहीं पाए। पूरे भाषण में वह संघी, मोदी, स्मृति, हिंदू और मनुवाद की उल्टी करते रहे। यह उलटी कई नामचीन लोगों को ऐतिहासिक लगी। कन्हैया के भाषण में आदर्शवाद हावी रहा और आदर्शवादी बातें भावुक किस्म के लोगों को बहुत अच्छी लगती हैं। लोगों ने गौर किया होगा कि कन्हैया हिदीभाषी प्रदेश बिहार से हैं, लेकिन ठीक से हिंदी भी नहीं बोल पा रहे थे। तो क्या जेएनयू में कमोबेश सभी छात्र ऐसे ही हैं। सभी सीरियस बात करने की बजाय क्या जुमलेबाज़ी और हुल्लड़ ही करते हैं?

कन्हैया ने यह ज़रूर कहा कि उन्हें कानून पर भरोसा है, बाबसाहेब भीमराव अंबेडकर के संविधान की एक एक धारा पर भरोसा है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान की प्रस्तावना में कहे गए हैं समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता, समानता के साथ खड़े हैं। लगे हाथ उन्होंने यह भी कहा कि वह उमर खालिद और दूसरे साथियों की रिहाई के लिए संघर्ष करेंगे। इसका मतलब गाहे-बगाहे या स्मार्टनेस तरीक़े से वह अपने दोस्त उमर के समर्थन में ही खड़े नज़र आए। 48 मिनट से ज़्यादा चले के भाषण में कन्हैया और उनके साथी क़रीब पहले पांच मिनट और बाद के चार मिनट किसी उन्मादी की तरह आज़ादी का उद्घोष करते रहे। इस दौरान करीब दो सौ बार आज़ादी के नारे लगे। नारे में सेकी जगह मेंका इस्तेमाल करके क़ानून और संविधान की नज़र में बच गए।

पूरा देश सोच रहा था, कि कन्हैया चश्मदीद होने के कारण देश को बताएंगे कि अफज़ल की बरसी पर आख़िर जेएनयू कैंपस में हुआ क्या था। यह तो सच है न कि जेएनयू में अफजल की बरसी मनाई गई थी और देश विरोधी और आज़ादी के समर्थन में नारे लगाए गए। उसमें किसकी कितनी भागीदारी है, यह देश की अदालत तय करेगी, लेकिन अपनी तरफ से कन्हैया को बताना चाहिए था कि उसमें उनका किरदार क्या था। लेकिन सबज्यूडिस के बहाने वह असली मुद्दे को टाल गए। असली मुद्दे पर बात करने की बजाय वह पूरे भाषण में मोदी, संघ, एबीवीपी और मनुवाद को कोसते रहे।

अगर इतिहास में जाएं तो पिछली सदी के आरंभ में सन् 1906 माहौल ऐसा ही था। वायसराय लॉर्ड कर्ज़न की अगुवाई में अंग्रेज़ों ने देश बंग-भंग के जरिए अलगाववाद को जो पौधा रोपा उसके उगते ही उसी माहौल में जनाब सैयद अहमद खान मुस्लिम लीग की स्थापना की। मुस्लिम लीग पाकिस्तान-पाकिस्तान कर रही थी। महज 41 साल की उम्र में उस पौधे ने देश का धर्म के आधार पर विभाजन कर दिया। तो क्या यह देश एक और विभाजन की ओर बढ़ रहा है? भले ही वह कई सदी बाद आए। लिहाज़ा, अभी से इस आज़ादी की असली मंशा पर चौकन्ना होने की ज़रूरत है, कि कही देर न हो जाए।