सोमवार, 30 मई 2016

हेमंत करकरे ज़िंदा होते तो क्या प्रज्ञा को फंसाने के आरोप में गिरफ़्तार हो जाते ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
कोई भी स्त्री या पुरुष किसी मुक़दमे में या तो कसूरवार होता है या बेकसूर। कोई कसूरवार और बेकसूर दोनों हो सकता है क्या? एक जाहिल आदमी भी कहेगा -नहीं! लेकिन मालेगांव ब्लास्ट 2008 की मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर दोषी भी हैं और बेकसूर भी। जब दिल्ली और महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार थी तब वह दोषी थीं। अब दोनों जगह बीजेपी की सरकार है, तब वह बेकसूर हैं। मतलब यहां दोषी होने या न होने का फ़ैसला कोर्ट नहीं, राजनीतिक दल कर रहे हैं। संभवतः इस तरह की बिचित्र मिसाल भारत जैसे देश में ही देखने को मिल सकती है, जहां कोई किसी केस में दोषी है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी वफादारी किस राजनीतिक दल के प्रति है। यानी यहां अदालत का रोल ही ख़त्म कर दिया गया।

जैसा कि सब जानते हैं, न्यायिक हिरासत में क़रीब आठ साल से जेल में बंद साध्वी प्रज्ञा को नैशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए के 13 मई 2016 को दायर पूरक आरोपपत्र में क्लीनचिट दी जा चुकी है। उम्मीद की जा रही है कि क़ानून की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होते ही वह कम से कम इस केस से बरी कर दी जाएंगी और संभव है कि वह जेल से रिहा भी हो जाएं। साध्वी को बरी करने का मतलब ब्लास्ट में उनके ख़िलाफ़ जांच एजेंसियों के पास इतने सबूत नहीं हैं, जिससे उन्हें दोषी साबित कर सज़ा दिलाई जा सके। इसका यह भी मतलब होता है कि साध्वी और अन्य दूसरे पांच आरोपियों को बिना पर्याप्त सबूत के ही गिरफ़्तार कर लिया गया था। यानी उस अपराध ने उनकी ज़िंदगी ही नष्ट नहीं कर दी, बल्कि उन्हें आठ साल की सज़ा भी दे दी, जिस अपराध को उन्होंने किया ही नहीं था। और, यह सब अमानवीय काम मुंबई आतंकी हमले में शहादत देने वाले महाराष्ट्र एटीएस के पूर्व मुखिया हेमंत करकरे के इशारे पर हुआ था।

इसी तरह ब्लास्ट के दूसरे आरोपी सैन्य अफसर लेफ़्टिनेंट कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित सहित मकोका की कठोर धारा के तहत अरेस्टेड 11 में से 10 आरोपियों के ख़िलाफ़ मकोका लगाने के सबूत ही नहीं हैं। लिहाज़ा, एनआईए ने सभी आरोपियों को मकोका से मुक्त कर दिया है। दरअसल, एनआईए का गठन मुंबई आतंकी हमले के बाद 31 दिसंबर 2008 को हुआ था और उसे मालेगांव ब्लास्ट 2008 का केस एक अप्रैल 2011 को सौंपा गया था। तब तक केस की जांच महाराष्ट्र एटीएस ही कर रहा था और दो आरोपपत्र (मुख्य और पूरक) दायर भी कर चुका था। यानी एनआईए को केस दिए जाने तक क़रीब ढाई साल प्रज्ञा (गिरफ्तारी- 23 अक्टूबर 2008) और पुरोहित (गिरफ़्तारी- 5 नवबंर 2008) एटीएस की कस्टडी में थे।

हालांकि, पुरोहित की पत्नी अपर्णा का आरोप है कि एटीएस पुरोहित को 29 अक्टूबर 2008 से ही हिरासत में लेकर पूछताछ कर रही थी। पुरोहित के साथ थर्ड डिग्री और अमानवीय तरीके से इनरोगेशन हुआ। पूछताछ ने नाम पर कर्नल आरके श्रीवास्तव के अलावा करकरे, खानविलकर, परमवीर सिंह और शेखर बागड़े जैसे पुलिस अफसर पुरोहित को टॉर्चर करते रहे। इतना टॉर्चर किया कि पुरोहित का घुटना फिर से क्षतिग्रस्त हो गया। गौरतलब है पुरोहित कश्मीर में एक आतंकी मुठभेड़ में घायल हुए थे और उनके घुटने की बड़ी सर्जरी हुई थी। बहरहाल, इसी तरह के आरोप एटीएस पर साध्वी प्रज्ञा भी लगाती हैं। फनका आरोप है कि कस्टडी के दौरान उऩहें थर्ड डिग्री टॉर्चर किया गया और एक महिला के रूप में उनकी मर्यादा को तार-तार किया गया।

अब सवाल उठता है कि इतनी लंबी कस्टडी के दौरान आख़िर हेमंत करकरे की अगुवाई में पूरी एटीएस की टीम थर्ड डिग्री टॉर्चर और मर्यादा भंग करने के बावजूद प्रज्ञा, पुरोहित और दूसरे नौ आरोपियों के ख़िलाफ़ ऐसे सबूत क्यों नहीं जुटा पाई, जिनसे उनकी गिरफ़्तारी को न्यायोचित ठहराया जाता और मालेगांव ब्लास्ट में आरोपियों की संलिप्तता साबित की जा सकती। ले-देकर सबूत के रूप में एटीएस के पास एक क्षतिग्रस्त बाइक और सभी आरोपियों एवं गवाहों एकबालिया बयान थे, जिसे, जैसा कि आरोपियों और गवाहों का आरोप है, एटीएस ने थर्ड डिग्री इंटरोगेशन के ज़रिए ज़बरदस्ती कबूलवाया था। यानी बिना फुख़्ता सबूत के एक महिला और सैन्य अधिकारी को जेल में रखने का क्या औचित्य था? इस सवाल का जवाब करकरे अगर ज़िंदा होते तो उन्हें देना ही पड़ता।

तो क्या करकरे अपने पद का दुरुपयोग कर रहे थे? क्या वह निष्पक्ष नहीं, बल्कि पूर्वाग्रहित और पक्षपाती पुलिस अधिकारी थे? तो क्या हर केस की जांच वह इसी तरह कर रहे थे? क्या साध्वी और पुरोहित को गिरफ़्तार करके उन्होंने ब्लंडर किया था? क्या उन्होंने किसी व्यक्ति या व्यक्तियों अथवा राजनीतिक दल के इशारे पर “हिंदू आतंकवाद” का हव्वा खड़ा किया? जिसका इस्तेमाल अब पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ अकसर कर रहा है। इन सबसे बड़ा सवाल यह है कि आख़िर करकरे सारी सूचनाएं कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह से क्यों शेयर करते थे? वह एटीएस चीफ के रूप में तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख को रिपोर्ट करते थे या फिर दिग्विजय को? अगर वह दिग्विजय को रिपोर्ट नहीं करते थे, तब उन्हें अकसर फोन क्यों करते थे? इन यक्ष प्रश्नों के उत्तर एटीएस और एनआईए की ओर से दायर तीनों आरोप पत्रों में भी नहीं मिलता है।

कई लोग पूछते हैं कि जब करकरे की जान को वाक़ई ख़तरा था, जैसा कि दिग्विजय सिंह दावा करते हैं कि करकरे ने उनसे कहा था कि उनकी जान को ख़तरा है, तब करकरे ने दिग्विजय को ही यह बात क्यों बताई? मान लीजिए करकरे की जान को वाक़ई ख़तरा था तब, उन्होंने राज्य के मुखिया चीफ मिनिस्टर या विभाग के मुखिया गृहमंत्री अथवा स्टेट पुलिस के मुखिया पुलिस महानिदेशक या मुंबई पुलिस के चीफ पुलिस कमिश्नर को बताने की बजाय दिग्विजय को बताना क्यों उचित समझा? जबकि दिग्विजय उस समय संसद सदस्य भी नहीं थे। क्या इस तरह की कोई मिसाल मिलती है? जब किसी शीर्ष पुलिस अफसर को किसी नेता से गुहार लगाते सुना गया? क्या किसी पुलिस अफसर के ऑफिशियल फोन से किसी ऐसे नेता को फोन कभी किया गया है, जिस नेता से उसका कोई फ़ॉर्मल कनेक्शन ही न हो।

बतौर सबूत दिग्विजय सिंह टेलीफोन कॉल के आइटमाइज़्ड बिल भी सार्वजनिक कर चुके हैं। जिससे साबित हो जाता है कि करकरे उन्हें अपने ऑफिशियल लैंडलाइन से वाक़ई कॉल किया करते थे। करकरे की इस कांग्रेस नेता से इतनी आत्मीयता थी कि वह उनसे निजी बातें भी शेयर करते थे। दरअसल, करकरे के मारे जाने के एक साल बाद दिग्विजय ने छह दिसंबर 2010 को मुंबई में एक सभा में यह दावा किया था कि मुंबई आतंकी हमले में मारे जाने से पहले करकरे ने उन्हें फोन किया था और कहा था कि मालेगांव ब्लास्ट में “हिंदू आतंकवादियों” को पकड़ने से उनकी जान को पक्षिणपंथी यानी हिंदू संगठनों से ख़तरा है।

दिग्विजय सिंह का बयान इतना विवादास्पद और शर्मसार करने वाला था कि कांग्रेस को आधिकारिक रूप से उनके बयान को उनका निजी विचार बताना पड़ा। यहां तक कि करकरे की पत्नी कविता करकरे ने भी एक बयान जारी करके दिग्विजय के दावे की निंदा की थी। दरअसल, दिग्विजय के बयान से लगा कि मुंबई पर आतंकी हमला लश्कर-ए-तैयबा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने करकरे को रास्ते से हटाने के लिए सीआईए और मोसाद के साथ मिलकर रची है।

इतना ही नहीं, दिग्विजय ने उर्दू के पत्रकार अज़ीज़ बर्नी की किताब “आरएसएस की साज़िशः 26/11” का विमोचन भी किया, जिसमें बर्नी ने भी साबित करने की हर संभव कोशिश की है कि 1993 के बाद देश में जितने ब्लास्ट हुए हैं, सब “हिंदू आतंकवादी” कर रहे हैं। हालांकि, इसके लिए बाद में बर्नी को माफ़ी भी मांगनी पड़ी थी। इसी दौरान क़रीब तीन दशक तक महाराष्ट्र पुलिस सेवा में रहे आईपीएस एसएम मुश्रीफ़ की किताब “हू किल्ड करकरे” आई, जिसमें में भी दावा किया गया कि करकरे की हत्या कसाब ने नहीं की, बल्कि आरएसएस के इशारे पर इंटेलिजेंस ब्यूरो ने करवाई। बहरहाल, इस तरह की अतार्किक बात किताब में लिखने वाले बर्नी और मुश्रीफ़ के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने नहीं की।

दरअसल, इसमें दो राय नहीं कि दिग्विजय का बयान और करकरे से बातचीत के सबूत ब्लास्ट में करकरे की भूमिका संदिग्ध बना देता है। मामले से जुड़े वकीलों और पत्रकारों का तो यहां तक कहना है कि अगर करकरे ज़िदा रहे होते तो गलत जांच के आरोप में उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई संभव थी, जिनमें उऩकी गिरफ़्तारी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। तो क्या करकरे अगर ज़िंदा होते तो वाक़ई गिरफ़्तार किए जा सकते थे? एनआईए के पूरक आरोप पत्र से पूरी जांच व्यवस्था पर सवालिया निशान पैदा हो गया है। इस साजिश की तहकीकात करने वाली तमाम भारतीय जांच एजेंसियों की साख़ ही संदिग्ध हो गई है।

राजनीतिक गलियारे में यह सवाल कौंधने लगा है कि तथाकथित ‘हिंदू आतंकवाद’ का हव्वा खड़ा करने के लिए एक महिला को झूठी साज़िश में क्या फंसाया गया?  जब क्लीनचिट देन था, उसे बिना किसी पुख़्ता सबूत के इस केस में आठ साल तक जेल में क्यों रखा गया। दूसरा सवाल है कि अगर साध्वी वाकई तथाकथित हिंदू टेरर मॉड्यूल से जुड़ी और मालेगांव ब्लास्ट में शामिल रही हैं तो उन्हें और दूसरे आरोपियों को एनआईए की ओर से राहत क्यों दी गई? इतना ही नहीं सवाल यह भी है कि पुरोहित समेत 11 में से दस आरोपियों पर से मकोका क्यों हटा लिया गया?

साध्वी-पुरोहित प्रकरण से देश की इंवेस्टिगेटिंग सिस्टम ही नहीं, न्याय-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। इसका जवाब जज की कम संख्या पर भावुक होने वाले मुख्य न्यायायधीश जस्टिस तीर्थसिंह ठाकुर के लिए भी देना बहुत मुश्किल होगा, क्योंकि मान लीजिए, अगर केंद्र, राज्य सरकार या महाराष्ट्र एटीएस ने किसी व्यक्ति, खासकर किसी महिला, को झूठे केस में फंसा दिया था तो देश की अदालतें आठ साल तक क्या कर रही थीं। साध्वी की ज़मानत किस सबूत के आधार पर सुप्रीम कोर्ट तक ख़ारिज़ होती रही और अगर प्रज्ञा वास्तव में साज़िश में शामिल रही हैं, तो उन्हें अब क्लीनचिट क्यों दी जा रही है। एजेंसियों से यह क्यों नहीं पूछा गया कि प्रज्ञा अगर वह निर्दोष थीं तो उन्हें क्लीनचिट देने में इतना लंबा वक़्त कैसे लग गया।“

कहा जाता है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्रिक देश है, यहां स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका है। हर नागरिक को बोलने, लिखने, रहने और धर्म के चयन के मौलिक अधिकार मिले हैं। लिहाज़ा, देश की सबसे बड़ी अदालत को ज़िम्मेदारी लेनी ही होगी कि कोई सरकार या जांच एजेंसी किसी भी नागरिक, चाहे वह हिंदू हो या मुसलमान, को बिना सबूत के लंबे समय तक जेल में न रखे। यदि ऐसा होता है, तो यह मौलिक अधिकार का उल्लंघन है, जिसे रोकना न्यायपालिका का काम है। लेकिन साध्वी और पुरोहित के केस में न्यायपालिका या तो पहले अपनी ज़िम्मेदारी सही तरीक़े से नहीं निभा पाई या अब नहीं निभा पा रही है, क्योंकि दोनों में से केवल एक ही संभव है। या तो साध्वी के ख़िलाफ़ सबूत होगा या सबूत नहीं होगा। सबूत पहले था लेकिन अब नहीं है, यह फ़ॉर्मूला नहीं चलेगा। अगर क्लीनचिट दी जा रही है, तो एटीएस से पूछना होगा कि इतनी प्रतिष्ठित संस्था क्या ऐसे ही काम करती है?

पूरक आरोप पत्र में एनआईए ने एटीएस पर कई गंभीर आरोप भी लगाए हैं। आरोप इतने ज्यादा संगीन हैं कि एटीएस की भूमिका की ही जांच की नौबत आ गई है। यहां फोरेंसिक साइंस लैबोरेटरी कर्नाटक के डायरेक्टर रह चुके बीएम मोहन के दावे पर गौर करना होगा, क्योंकि उनके कार्यकाल में कई अहम नारको टेस्ट हुए थे। बीएम मोहन ने आईबीएन7 के डॉ. प्रवीण तिवारी से बातचीत के दौरान दावा किया है कि सिमी के कुछ आतंकियों का नार्को करते समय समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव ब्लास्ट के बारे में उन्हें अहम् जानकारियां मिली थीं। मोहन का दावा है कि इन इनपुट्स के आधार पर जांच एजेंसियां अगर सबूत जुटातीं, तो आतंकवादी धमाकों की कहानी कुछ और होती। उनका कहना है कि नार्को, ब्रेन मैपिंग, लाइ डिटेक्टर तीनों ही टेस्ट में सिमी के आतंकियों ने समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव ब्लासट मे हाथ होने की बात स्वीकार की थी। इन लोगों ने सिमी चीफ सफदर नागौरी की पूरी साज़िश का ख़ाका तैयार किए जाने की बात भी कही थी।

हेमंत करकरे ने आख़िर एफएसएल के इनपुट्स पर ध्यान देकर जांच क्यों नहीं की। जब साध्वी और अन्य के ख़िलाफ़ सबूत नहीं मिले तो दूसरे अंगल की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया गया? करकरे काबिल अफसर माने जाते थे। मुंबई के कई पत्रकार उन्हें बहुत अच्छा इंसान भी मानते हैं। वह सात साल रॉ के अधिकारी के रूप में ऑस्ट्रेलिया में रह चुके थे और कहा जाता है कि कंधार विमान हाइजैक में आतंकियों से संपर्क स्थापित करने में अहम रोल निभाया था और आईबी के अजित डोवाल की मदद की थी, जिससे सभी यात्री सुरक्षित भारत लाए जा सके थे। संभवतः इसीलिए सीएम मिनिस्टर विलासराव देशमुख ने जनवरी 2008 में उन्हें केपी रघुवंशी की जगह एटीएस प्रमुख बनाया था। बहरहाल, मालेगांव ब्लास्ट की सुनवाई फिलहाल मुंबई कोर्ट में चल रही है। लिहाजा, अदालत को ही तय करना होगा कि इनमें से किन तथ्यों के आधार पर केस की सुनवाई आगे बढ़ाई जाए, क्योंकि अंततः मालेगांव ब्लास्ट में दूध का दूध पानी का पानी अदालत को ही करना है। ताकि साध्वी को क्लीनचिट देने से उठे सवालों का जवाब मिल सके।

बुधवार, 25 मई 2016

भारत को क्या मिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वनेता बनने से?

मोदी की विदेश नीति की समीक्षा
हरिगोविंद विश्वकर्मा
दो साल के कार्यकाल में 35 देशों की यात्रा करके प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ख़ुद तो विश्वनेताओं की क़तार में आ गए, लेकिन उनके विदेश दौरे और विदेश नीति से देश को कितना फायदा हुआ? यह चर्चा इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि जनता ने 1984 के के बाद पहली बार किसी नेता को स्पष्ट बहुमत दिया था और मोदी ने सत्ता संभालते समय सबको साथ लेकर चलने का संकेत दिया था। शपथग्रहण समारोह में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ समेत दक्षिण एशियाई सहयोग समिति सार्क के सभी राष्ट्राध्यक्षों को बुलाया था।

मोदी के इस क़दम को शपथग्हण डिप्लोमेसी कहते हुए राजनयिक स्तर पर सराहा गया था। विदेशी मामलों में दख़ल रखने वाले टीकाकारों ने इसे एक सकारात्मक शुरुआत करार दिया था। पड़ोसियों से संबंध सुधारने की दिशा में इसे अच्छी पहल मानकर पूरे देश ने भी उस क़दम का स्वागत और सराहना की थी। अब सवाल उठता है कि मोदी पड़ोसी देशों से मधुर संबंध बनाने में कामयाब रहे या नहीं, इसका आकलन ज़रूरी है। वैसे मोदी ख़ुद तो विश्वनेता बन गए, क्योंकि उनकी एक अपील पर संयुक्त राष्ट्रसंघ ने भारत की प्राचीन योग परंपरा को स्वीकार कर 21 जून को अतंरराष्ट्रीय योग दिवस मानने की घोषणा कर दी। भारत जैसे देश के लिए यह बहुत बड़ी बात थी।

अगर मोदी के दो साल का आकलन करें तो कई फ्रंट पर सफलता उम्मीद से ज़्यादा मिली जबकि कई मोर्चे पर उनकी विदेश नीति असफल रही है। योग के बाद मोदी की सबसे बड़ी कामयाबी दूसरी सालगिरह के ऐन मौक़े पर मिली। जब भारत ने ईरान के साथ चाबहार पोर्ट परियोजना के डील पर प्रेसिडेंट हसन रोहानी और मोदी की मौजूदगी में हस्ताक्षर किया। इस समझौते के महत्व पर ज़्यादा कुछ नहीं लिखा गया लेकिन यह बताना ज़रूरी है कि अभी तक भारत अपने सामान अफगानिस्तान, ईरान समेत मध्य एशिया और पूर्वी यूरोप तक समुद्री रास्ते से पाकिस्तानी बंदरगाहो के ज़रिए भेजता रहा है।

लिहाज़ा, इस डील से नई दिल्ली की कारोबार के क्षेत्र में इस्लामाबाद पर निर्भरता ख़त्म ही नहीं होगी और देश वाया अफगानिस्तान सीधे ईरान और दूसरे देशों में माल भेज सकेगा। इतना ही नहीं, आतंकवादियों की सप्लाई करने वाले इस कनफ्यूज़्ड देश को भारत भविष्य में अलग-थलग करने में भी कामयाब हो सकता है। ख़ुद पाकिस्तानी हुक़्मरान भी महसूस करने लगे हैं कि अगर चाबहार परियोजना सफल हुई तो उनका देश विश्वमंच पर अलग-थलग पड़ सकता है। लिहाजा, समझौते को मोदी के दो साल के कार्यकाल की सबसे बड़ी जीत मानने में गुरेज नहीं।

वैसे सत्ता की बाग़डोर संभालने के बाद से ही मोदी ने जिस तरह मिशन विश्व-भ्रमण शुरू किया, उससे राजनीतिक हलक़ों में अटकलें लगाई जाने लगीं कि कहीं उनकी इच्छा विश्वनेता बनने की तो नहीं है? जानकार कहने लगे थे कि मोदी के बेतहाशा विदेश दौरे से लगता है कि पांच साल में वह अपने को विश्वनेता के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। फिलहाल, मोदी 35 देशों की यात्रा और क़रीब 50 देशों के राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों से मुलाकात करके विश्वनेता की क़तार में आ गए हैं।

शपथ लेने के बाद भूटान से विदेश दौरे जो सिलसिला शुरू हुआ, वह जारी है। मोदी अब तक अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, बेल्जियम, टर्की और कनाडा जैसे बड़े देशों और अफ़गानिस्तान, बांग्लादेश, ब्राज़ील, फिजी, ईरान, आयरलैंड, कज़ाकिस्तान, किर्जिज़्स्तान, नेपाल, मंगोलिया, मलेशिया, मॉरीशस, बर्मा, पाकिस्तान, फ़िज़ी, सउदी अरब, सिंगापुर, सेचेलिस, श्रीलंका, तजाकिस्तान, तुर्कमिनिस्तान, यूनाइटेड अरब अमीरात और उज़्बेकिस्तान जैसे मध्यम और छोटे देशों की यात्रा कर चुके हैं। सिंगापुर तो वहां के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे ली कुआन येव के अंतिम संस्कार में चले गए थे। जहां उनके क़दम रूस, फ्रांस, सिंगापुर और नेपाल की धरती पर दो-दो बार पड़े हैं, वहीं अपने मित्र बराक ओबामा के देश अमेरिकी वह तीन बार जा चुके हैं। मोदी ओबामा को भी गणतंत्र दिवस के मौक़े पर भारत बुलाने में भी सफल रहे और बराक के साथ 'मन की बात' भी पेश किया। अब चौथी बार जाने की तैयारी कर रहे हैं और सितंबर में पांचवी बार अमेरिका पहुंचेंगे।

पिछले दो साल में प्रधानमंत्री के विदेश दौरे की देश-विदेश की मीडिया में सबसे ज़्यादा चर्चा रही। अलबत्ता, लकीर के फकीर की तरह काम करने वाली भारतीय विदेश नीति को रिसेट करने के लिए उनकी काफी तारीफ भी हुई। मोदी डिप्लोमैसी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि भारत और अमेरिका की दोस्ती उनके कार्यकाल में पहले से ज्यादा मज़बूत हुई। हालांकि, कूटनीतिक स्तर पर इस डिप्लोमेसी की असफलता यह रही कि ओबामा मोदी के ही कार्यकाल से पाकिस्तान को एफ-16 लड़ाकू विमान बेच रहे हैं। वैसे, राहत की बात यह है कि यूएस कांग्रेस ने पाकिस्तान को मदद देने वाले बिल को रोक लिया है।

बहरहाल, जैसे अटलबिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के साथ मधुर संबंध के हिमायती थे, उसी लाइन ऑफ ऐक्शन पर मोदी भी चल रहे हैं। इसीलिए क्रम में नवाज़ शरीफ के जन्मदिन अचानक पाकिस्तान पहुंच गए और उन्हें बधाई दी। लेकिन उनकी बथडे डिप्लोमेसी कारगर नहीं हुई, क्योंकि पाकिस्तान पीठ में छुरा घोंपने की अपनी आदत से बाज़ नहीं आया और पठानकोट में आतंकवादी हमला हो गया। आम चुनाव में कांग्रेस की पाकिस्तान नीति को जमकर कोसने वाले मोदी की सरकार ने भी वही सब किया जो भारत कांग्रेस की छत्रछाया में पिछले कई दशक से करता आ रहा है। यानी विरोध दर्ज कराना और हमले का प्रमाण देना।

अगर भारत-नेपाल संबंधों की विवेचना करें तो भारत अपने इस परंपरागत मित्र भी नाराज़ करता नज़र आ रहा है। दरअसल, नेपाल के नए संविधान में उचित भागीदारी को लेकर असंतुष्ट मधेसी समुदाय ने नेपाल-भारत सीमा पर क़रीब पांच महीने नाकेबंदी कर रखी, इससे नेपाल में ज़रूरी सामान की भारी किल्लत हुई। भारत ने इस नाकेबंदी को ख़त्म करवाने में वह भूमिका नहीं निभाया जो निभा सकता था। संभवतः उसी से सबक लेकर नेपाल ने चीन के साथ रेल परियोजनाओं पर समझौता किया है, ताकि काठमांडो की नई दिल्ली पर निर्भरता कम हो। यह चीन की बहुत बड़ी कूटनीतिक जीत है।

चीन ने यहीं नहीं भारत को आंख दिखाया, बल्कि बीजिंग ने संयुक्त राष्ट्रसंघ में जैश-ए मोहम्मद के सरगना मौलाना मसूद अजहर को आतंकवादी घोषित करने के भारत के प्रस्तावन को वीटो कर दिया। मोदी के कार्यकाल में विदेश नीति की यह सबसे बड़ी असफलता रही। इतना ही नहीं जर्मनी में रह रहे उइगुर नेता डोलकुन इसा को अमेरिकी ‘इनीशिएटिव्‍स फॉर चाइना’ की ओर से एक कॉन्‍फ्रेंस में शामिल होने के लिए भारत बुलाया गया था। लेकिन उन्हें जारी वीजा भारत ने चीन के विरोध में रद्द कर दिया। दरअसल, चीन इसा को उसी तरह आतंकवादी मानता है, जैसे भारत मौलाना मसूद को। चीन का कहना है कि उसके मुस्लिम बहुल प्रांत शिनजियांग में आतंकवाद को बढ़ावा देने में वर्ल्‍ड उइगुर कांग्रेस का ही हाथ है। तुर्किक मूल के मुसलमानों की तादाद शिनजियांग में एक करोड़ हैं। वह शिनजियांग में चीनी आबादी का विरोध करते हैं और इससे कई साल से शिनजियांग अशांत प्रांत माना जाता है।

दरअसल, चीन के साथ रिश्ते पर बात करते समय यह नहीं भूलना चाहिए कि आर्थिक व सामरिक दृष्टि से बीजिंग नई दिल्ली से बीस है। ऐसे में मोदी कितने ही बड़े राष्ट्रवादी क्यों ना हों, लेकिन चीन को नाराज़ करने का जोखिम नहीं ले सकते। चीन को वैश्विक शक्ति उसकी आर्थिक ताकत के कारण माना जाता है। मोदी के नेतृत्व में भारत को पता है कि केवल स्थायी और ऊंची आर्थिक वृद्धि दर के बल पर भारत, चीन के साथ एशिया के पॉवर गैप को भर सकता है। लिहाज़ा, मोदी चाहते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्‍था मज़बूत हो और वह इस एजंडे पर काम भी कर रहे हैं।

वैसे मोदी डिप्लोमैसी की बड़ी उपलब्धि प्रवासी भारतीयों के साथ कनेक्टिविटी रही। जैसे आम चुनाव में मोदी देश के हर शहर को गुजरात से जोड़ रहे थे, उसी तरह आजकल वह हर देश को भारत से जोड़ रहे हैं। मतलब, वह हर देश के साथ देश का रिश्ता गढ़ ही लेते हैं। टीकाकार मोदी की इस ख़ूबी के क़ायल भी हैं। वैसे, मोदी अपनी हर विदेश यात्रा की जमकर मार्केटिंग भी करते हैं। इस तरह की रिपोर्टिंग करवाते हैं कि सूचनाओं के लिए मीडिया पर निर्भर देश की अवाम सोचने लगती है कि मोदी का क्रेज़ जैसे चुनाव में देश में था, अब वही क्रेज़ अब विदेशों में है। अमेरिका में मैडिसन स्क्वेयर गार्डन हो या चीन का शंघाई, हर जगह मोदी ने भारतीय मूल के लोगों को संबोधित किया। जापान, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, मंगोलिया और तेहरान में भी भारतीय मूल के लोगों ने मोदी मैजिक अनुभव किया।

मोदी की विदेश यात्राओं का कितना फ़ायदा इस देश या देशवासियों को हुआ? इस पर अभी कुछ कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी। हां, इतना ज़रूर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है जो विज़िबल हो। यानी चाबहार पोर्ट डील के अलावा विश्वमंच पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, जो उल्लेखनीय या ऐतिहासिक घटना कहलाए। यह दावा करना कि मोदी की विदेश यात्राओं से दुनिया में भारत की हैसियत बढ़ गई है, सही नहीं होगा। ऐसा कहने वाले झूठे आशावाद की परिकल्पना कर रहे हैं।

राष्ट्रीय हित साधने में भारत को चीन से नसीहत लेनी चाहिए। अपना राष्ट्रीय हित साधने में बीजिंग नंबर एक है। अपने फ़ायदे के लिए चीन कब क्या कर दे, कोई नहीं जानता?  इसीलिए कोई चीन पर विश्वास नहीं रहता है। चीन ने पाकिस्तान तक से दोस्ती सोची समझी रणनीति के तहत की है। चीन अपने को सिर्फ़ अपने प्रति जिम्मेदार मानता है, इसीलिए अमेरिका ही नहीं पश्चिम के सभी देश चीन से आशंकित रहते हैं और भारत में चीन का विकल्प दिखते हैं। लिहाज़ा, ये देश विश्वमंच पर पीठ थपथपाने वाला आशावादी बयान देकर नई दिल्ली को प्रोत्साहित करते रहते हैं। मोदी को भी विदेशों से वहीं प्रोत्‍साहन मिला है, और वह उसी से गदगद हैं।

भारत की विश्वमंच पर आज भी वही औक़ात है, उसकी जो स्वतंत्रता मिलने के समय थी। मोदी जिस देश की यात्रा करते हैं, वह देश संयुक्त राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता का समर्थन करता है। अमेरिका भी कई बार समर्थन कर चुका है। चीन व पाकिस्तान के छोड़ दें, तो हर छोटा-बड़ा देश मानता है कि भारत को वीटो पावर मिलनी चाहिए। मोदी के शासन में लोग वही जुमला दोहराते हैं. अगर ध्यान से देखे तो निकट भविष्य में भारत को स्ताई सदस्यात मिलेगी, इसमें बड़ा संदेह है। कभी-कभी तो लगता है कि भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य कभी नहीं बन पाएगा।

मोदी के सत्ता संभालते समय थी देश ने कयास लगाया था कि कुछ ठोस क़दम उठाए जाएंगे। मसलन, स्विस और दूसरे विदेशी बैंकों में जमा काला धन भारत आएगा। भारत की छवि सशक्त देश की बनेगी, लेकिन इस फ्रंट पर लफ़्फ़ाज़ी के सिवाय हुआ कुछ नहीं। काले धन पर तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को सफाई द्नी पड़ी कि वह चुनावी जुमला था। यानी मोदी ने कैजुअली कह दिया था कि उनकी सरकार हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करवाएगी।

सीमा पर पाकिस्तानी रेंजर्स अंधाधुंध फायरिंग करते रहते हैं। हाफिज़ सईद भारत को धमकी देता रहता है। मुंबई आतंकी हमले के मास्टरमाइंड ज़किउर रहमान लखवी जेल से बाहर है। भारत विरोध जताने के अलावा कुछ नहीं कर पाया। दाऊद इब्राहिम के बारे में नई दिल्ली अब भी प्रमाण देने में व्यस्त है कि यह अपराधी कराची में ही है। इससे भारत की छवि दुनिया में “साफ़्ट नेशन”की बन गई है। साफ़्ट नेशन की यही इमैज विश्वमंच पर भारत की भूमिका को सीमित कर देती है। वाजपेयी ने परमाणु विस्फोट करके इस इमैज से निकलने की कोशिश की थी, लेकिन बहुमत न होने से वह बैकफुट पर आ गए थे। मोदी के साथ ऐसी कोई मज़बूरी नहीं थी। उन्हें महानायक बनने का सुनहरा मौक़ा मिला था, लेकिन उनके एक साल के कामकाज पर नज़र डालें तो यही लगता है, फिलहाल मोदी वह मौक़ा गंवा रहे हैं।

बुधवार, 18 मई 2016

कानून को ठेंगा : कितनी शादियां करेगा वह

हरिगोविंद विश्वकर्मा
क़रीब छह साल पहले उसने दूसरी शादी की थी। वह भी बिना तलाक़ लिए। इसके बावजूद तब किसी को कोई आपत्ति न हुई थी। अब वह तीसरी शादी करने जा रहा है। और मज़ेदार बात यह है कि इस बार भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है। ज़ाहिर है आने वाले दिनों में वह चौथी, पांचवी या उससे अधिक शादियां कर सकता है क्योंकि किसी को कोई आपत्ति ही नहीं। यानी अगर कोई आपत्ति न करे तो करते रहो शादी पर शादी... है न विचित्र वाकया।

यह घटना है मुंबई से सटे डोंबिवली का। जहां इन दिनों सुनील सालन नाम का शख़्स तीसरी शादी की तैयारी कर रहा है। मज़ेदार बात ये हैं कि लोकल पुलिस भी ख़ामोश हैं क्योंकि इस शादी से किसी को कोई ऐतराज़ नहीं है। मानपाड़ा थाने के इंचार्ज ने कहा कि सालन की दोनों बीवियों, बच्चों, दोनों सास-ससुर और सालों और बाक़ी रिश्तेदारों को कोई आपत्ति नहीं। फिर पुलिस क्या करे। हां, दूसरी पत्नी के एक रिश्तेदार को आपत्ति है लेकिन उनकी आपत्ति मायने नहीं रखती क्योंकि वह बहुत दूर के रिश्तेदार हैं।

दरअसल, तीसरी बार फेरे लेने के लिए क़रीब-क़रीब तैयार सालन की दो बीवियों से कुल पांच संतानें हैं। फिलहाल तो उसे अपनी नई-नवेली दुल्हन का इंतज़ार है तो दोनों बीवियों को छोटी बहन के रूप में आने वाली नई-नवेली सौतन का। जबकि पांचों बच्चे नई-नवेली मम्मी को देखने के लिए लालायित हैं। ज़ाहिर है ऊपर से घर में हर्ष-उल्लास है। लेकिन अंदर ही अंदर हर कोई मज़बूर है। विरोध करना मुसीबत को न्यौता देने के समान है।

अगर, पूरे मामले पर ग़ौर करे तो सुनील मानपाड़ा पुलिस स्टेशन की हद में रहता पड़ता है। उत्तराधिकार में बहुत बड़ी संपत्ति पिता से मिली है। यानी अच्छा खाता कमाता है। उम्र चालीस के ऊपर है। उसने 18-19 साल पहले प्रेम-विवाह किया था। जब ख़ूबसूरत प्रेमिका बीवी बनी तो लगा कि घर-परिवार में ख़ुशहाली का बसेरा हो गया। फिर बच्चे भी हुए। एक-एक करके तीन। घर में किलकारियां गूंजने लगीं। औसत सोच-समझ वाली एक भारतीय महिला को और क्या चाहिए। लिहाज़ा सालन की बीवी को लगा वह धरती की सबसे ख़ुशनसीब औरत है।
शायद उसकी ख़ुशी को किसी की नज़र लग गई। जी हां. तीसरे बच्चे के जन्म के बाद सालन की प्रेमिका से पत्नी बनी महिला में दिलचस्पी कम होने लगी। जिस स्त्री के साथ वह कभी जीने मरने की कसमें खाता था, जो स्त्री कभी उसे चांद की टुकड़ा नजर आती थी, वही उसे अचानक कुरूप लगने लगी। सालन का मन बीवी की ओर से पूरी तरह विरक्त हो गया। इसी दौरान उसकी मुलाकात दूसरी युवती से हुई जो अविवाहित थी। जान-पहचान दोस्ती में बदल गई। चंद दिन बाद ही सालन ने महसूस किया कि उसका दिल युवती पर आ गया है। यानी दोस्ती प्यार में बदल गई।

सालन ने प्रपोज़ किया और प्रेमिका ने हां कर दी। सालन के मन में लड्डू फूटने लगे। बस क्या था, सालन दूसरी शादी की योजना बनाने लगा। इसकी भनक पत्नी को लग गई। उसने विरोध किया और रोना-धोना शुरू किया। पर सालन ने उससे साफ़-साफ़ कह दिया कि विरोध करेगी तो बच्चों समेत उसे घर से निकाल देगा। पत्नी को अपनी असली हैसियत का पता चला कि वह पति की रहमोकरम पर है। यानी अगर स्त्री कमा नहीं रही है और विशुद्ध हाऊसवाइफ़ है तो 21वीं सदी में वह अबला ही है।

उसे अपना ही नहीं बच्चों का भी भविष्य अंधकारमय दिखा। लिहाज़ा उसने हालात से समझौता करना ही मुनासिब समझा। अपना विरोध वापस ले लिया। बस क्या था, सालन ने दूसरी शादी कर ली। यानी एक स्त्री ने ही उससे उसका पति छीन लिया। बहरहाल, पहली पत्नी और तीनों बच्चों ने घर के छठे सदस्य का स्वागत किया। दूसरी पत्नी से भी दो बच्चे हुए। यानी कुल दो बीवियां और पांच बच्चे। आठ सदस्यों का परिवार। दूसरी बीवी का दूसरा बच्चा तो अभी दो साल का ही है। पिछले एक साल से सालन का मन फिर भटकने लगा। चंद महीने पहले उसकी जान-पहचान तीसरी युवती से हुई। कुछ दिन में रिश्ता इतना गहराया शारीरिक संबंध बन गया। वे एक दूसरे के बिना जीने की कल्पना तक से कतराने लगे। सालन ने घर में जब ये फ़ैसला सुनाया तो सब सन्न। किसी को कुछ सूझा नहीं।

दरअसल, सालन घर का कमाने वाला इकलौता सदस्य है। उसे रोका गया तो भी वह नहीं रुकेगा। हां, जीवन-यापन के लिए जो पैसे वह दोनों पत्नियों और पांचों बच्चों को दे रहा है, उसे भी बंद कर देगा। इसीलिए घर के लोगों ने उसके फ़ैसले को स्वीकार करना ही श्रेयस्कर समझा क्योंकि किसी के पास और कोई चारा नहीं।

सुनील सालन तो एक मिसाल भर है। पुरुष-प्रधान भारतीय समाज में बड़ी संख्या में पुरुषों के पास दो या दो से ज़्यादा पत्नियां हैं। सालन जैसे ग़ुमनाम पुरुष ही नहीं कई नामचीन नेता, पत्रकार, साहित्यकार और बुद्धिजीवियों की दो-दो पत्नियां है, इनमें कुछ लोगों के पास तीन-तीन बीवियां हैं। इन महिलाओं को पत्नी या बीवी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि पत्नी तो केवल पहली ही होती है। बाक़ी स्त्रियों को तो पत्नी का दर्जा ही नहीं मिलता। इस्लाम को छोड़ दें तो हर मज़हब में पति या पत्नी से वैधानिक रूप से बिना तलाक़ लिए किसी भी पुरुष या स्त्री की शादी संभव नहीं।

कई पुरुष मिलेंगे जिन्होंने पत्नी से बिना वैधानिक तलाक़ के दूसरी शादी कर ली है। उत्तर प्रदेश बिहार में तो इसकी बहुतायत है। शादी के बाद कई बार पुरुषों का कंवारी लड़की से शारीरिक संबंध हो जाता है, और वे शादी कर लेते हैं। लेकिन बिना वैधानिक तलाक़ के हुई शादी ग़ैरक़ानूनी मानी जाती है। देश की कोई अदालत ऐसी महिलाओं को पत्नी का दर्जा नहीं देती। दूसरी शादी के लिए बीवी से कंसेंट के नाम पर स्टैंप पेपर पर दस्तख़त करवा लेते हैं। इस तरीक़े को फ़िल्मी तलाक़ कह सकते हैं। जी हां, फ़िल्मों में तलाक़ के काग़ज़ात ख़ुद या किसी के हाथ या पोस्ट से भेज दिए जाते हैं और साइन कर देने से तलाक़ मान लिया जाता है।

दुनिया की कोई भी अदालत इस तलाकनामे को मंज़ूर नहीं करती और रद्दी की टोकरी में फेंक देती है। दरअसल, हर अदालत पति-पत्नी के वैधानिक अलगाव को ही तलाक़ को मानती। ये तलाक़नामा फ़ैमिली कोर्ट की ओर से जारी होता है। पति और पत्नी, विधिवत अलग होने के लिए फ़ैमिली कोर्ट में याचिका दाख़िल करते हैं। दोनों को नोटिस जारी होता है और अदालत में बयान दर्ज होता हैं। एक दूसरे से अलग होने की ठोस वजह बताई जाती। इसके बाद भी फ़ैमिली कोर्ट रिश्ता तोड़ने से पूर्व सुलह का एक और मौक़ा देती है। हां, दंपति के बीच सुलह की हर संभावना ख़त्म होने पर ही तलाक़ की इजाज़त दी जाती है। तलाक़ के बाक़ी सभी तरीक़े फ़र्ज़ी तलाक़ माने जाते हैं।

वैसे कई मुस्लिम देशों में भी एक से ज़्यादा निकाह की रवायत ख़त्म कर दी गई है। अपने देश में भी एक से अधिक निकाह यानी पहली बीवी के होते दूसरी शादी की वैधता पर बहस चल ही रही है। ये बहस तब शुरू हुई जब राजस्थान पुलिस ने लियाक़त अली को पहली पत्नी के रहते निकाह करने पर नौकरी से निकाल दिया जिसे राजस्थान हाईकोर्ट ने भी सही ठहराया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी उस पर मुहर लगा दी। देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा कि कोई कर्मचारी पत्नी के होते दूसरी शादी करेगे तो नौकरी से हाथ धो बैठेगा। 1986 के बहुचर्चित केस का फ़ैसला 25 जनवरी, 2010 को आया। यानी अब धर्म का बहाना लेकर भी कोई दूसरी शादी करेगा तो मामला अदालत तय करेगी चाहे वो मुस्लिम ही क्यों न हो। टर्की और ट्यूनीशिया में पत्नी के होते निकाह ग़ैरक़ानूनी है। मिश्र, सीरिया, जॉर्डन, इराक, यमन, मोरक्को और यहां तक कि पड़ोसी पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी इस पर अदालतें फैसला सुनाती हैं। लेकिन भारत में तमाम अदालतों की आलोचना के बाद ये आज भी जारी है।

इस्लाम के इसी प्रावधान का फायदा उठाकर कई स्त्रियां दूसरी स्त्रियों के पति छीन चुकी हैं। हेमा मालिनी और अनुराधा बाली इसकी मिसाल हैं। प्रकाश कौर से धर्मेंद्र को छीनने के लिए हेमा मालिनी ख़ुद आयशा बी बन गईं जबकि धर्मेंद्र को दिलावर खान बना दिया। इसी तरह अनुराधा ने चंदर मोहन को सीमा विश्नोई से छीनने के लिए ख़ुद फ़िज़ा बन गई जबकि चंदर को चांद मोहम्मद बना दिया। यानी बिगमी क़ानून के शिकंजे से बचने के लिए इन लोगों ने मज़हब का सहारा लिया।

आज पुरुष-महिला के बीच समानता की बढ़-चढ़कर हो रही है। मगर सालन जैसे लोगों का ऐयाशी के लिए बार-बार शादी करके इस दावे को झुठलाते हैं। ये समय की मांग है कि स्त्री को महज मनोरंजन समझने वालों पर अंकुश लगाने के लिए कठोर क़ानून बनाने की ज़रूरत है। इतना ही नहीं उत्तराधिकार क़ानून पर सख़्ती से अमल किया जाना चाहिए। इसमें बेटी को पिता की संपत्ति में हिस्सेदार तो बना दिया गया है लेकिन इस क़ानून पर अमल परंपरा के ख़िलाफ़ माना जाता हैं। और परंपरा यह है कि बेटी पराया धन होती है, उसका पिता की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं। तभी तो आज भी लड़कियां शादी के बाद मायके चली जाती हैं और पिता की संपत्ति पर उनका दावा ख़त्म हो जाता है जबकि बेटा या बेटे पिता की दौलत पर ऐश करते हैं।

दरअसल, सुनील सालन की दोनों बीवियां उसकी तीसरी शादी का विरोध इसलिए भी नहीं कर पा रही हैं क्योंकि वे जीवन-यापन के लिए पति पर बुरी तरह निर्भर हैं। दोनों महिलाओं के पास किसी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं है। इसीलिए न चाहते हुए भी पति की तीसरी शादी को क़बूल कर रही हैं। अन्यथा जैसे कोई पुरुष अपनी बीवी के जीवन में किसी दूसरे पुरुष की कल्पना तक नहीं कर पाता। उसी तरह महिला भी अपने पति के जीवन में दूसरी स्त्री सहन नहीं कर सकती। लेकिन सामाजिक असुरक्षा के चलते वे भारी मन से पति की इच्छा को स्वीकार करती हैं।

अगर बिगमी क़ानून के ट्रायल पर गौर करें तो उसकी रफ़्तार बहुत धीमी होती है। मुकदमे के निपटारे में सालों-साल लग जाते हैं। दिल्ली के 41 वर्षीय जगदीश प्रसाद ने पहली पत्नी से तलाक विए बिना 1970 में दूसरी शादी कर ली। पत्नी ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया। तीस हज़ारी कोर्ट में मुक़दमे के निपटारे में 37 साल ख़र्च हो गए। अगस्त 2008 में फ़ैसला आने के समय जगदीश 78 साल का हो चुका था। हालांकि अदालत ने उसे बिगमी को दोषी क़रार दिया गया और सज़ा और ज़ुर्माना हुआ लेकिन इतनी लंबी अदालती लड़ाई तोड़कर रख देती है। इसीलिए स्त्री क़ानून के झमेले में न पड़ कर पति की इच्छा को स्वीकार कर लेती हैं।

समाप्त


मंगलवार, 17 मई 2016

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री कहीं वाक़ई फ़र्ज़ी तो नहीं !

हरिगोविंद विश्वकर्मा
लगता है, दिल्ली के चीफ़ मिनिस्टर अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी अभी तक दिल्ली सरकार में मंत्री रहे अपने विधायक जीतेंद्र सिंह तोमर की फ़र्ज़ी डिग्रियों के मामले में गिरफ़्तारी और फिर तिहाड़ जेल की हवा खाने के वाक़ये से नहीं उबर पाएं हैं। इसीलिए अरविंद समेत आप के क़रीब-क़रीब सभी प्रमुख नेता इन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डिग्री को फ़र्ज़ी साबित करने के लिए जी जान से जुटे हुए हैं। इस क्रम में 'आप' नेताओं की ओर से रोज़ाना नए-नए खुलाए करने के दावे किए जा रहे हैं।

'आप' के लीडरान आशुतोष, संजय सिंह आदि दावा कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जो डिग्री बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और वित्तमंत्री अरुण जेटली ने जारी की है, वह फ़र्ज़ी है। आशुतोष ने तंज कसते हुए कहा है कि जालसाज़ी करने के लिए भी अक्ल चाहिए। हो सकता है, उनका इशारा जीतेंद्र सिंह तोमर की ओर हो, जिन्होंने ‘अक्ल का इस्तेमाल’ करते हुए बड़ी चतुराई से फ़र्ज़ी डिग्री को एक बार तो असली साबित ही कर दिया था, लेकिन संबंधित संस्थानों की ओर से डिग्री देने से इनकार करने पर बेचारे फंस गए थे और मंत्रिपद ही नहीं गया, ख़ुद भी जेल गए।

बहरहाल, आशुतोष ने दावा किया है कि बैचलर और मास्टर की डिग्रियों में नरेंद्र मोदी के नाम में अंतर है, जो नहीं होना चाहिए। आशुतोष का तर्क है कि किसी का नाम बदलने के लिए क़ानूनी प्रक्रिया होती है। आशुतोष ने यह भी दावा करते हैं कि 1977 की मार्कशीट है, लेकिन डिग्री 1978 की है। बीए की मार्कशीट पर नाम नरेंद्रकुमार दामोदरदास मोदी लिखा है, जबकि एमए डिग्री में नरेंद्र दामोदरदास मोदी  है। हालांकि इस बार में गुजरात विश्वविद्यालय के कुलपति महेश पटेल साफ़ कर चुके हैं कि ख़ुद मोदी ने 1981 में दाखिला लेते समय प्रवेश फॉर्म पर नरेंद्रकुमार मोदी लिखा था, जो डीयू के सर्टिफिकेट में लिखा था, लेकिन मोदी ने ही 1982 में नरेद्र मोदी कर दिया था। यहां सवाल यह भी है कि क्या कोई संस्थान किसी छात्र को नाम में संशोधन करने की इजाजत देता है। इस बात की पड़ताल होनी चाहिए।

वैसे अरविंद केजरीवाल को उनकी हरकतों और बड़बोलेपन की वजह से भले ही लोगों ने उन्हें सीरियसली लेना बंद कर दिया हो और उन पर सोशल मीडिया में जोक पर जोक बनाए जा रहे हों, लेकिन देश के प्रधानमंत्री की डिग्री के बारे में अरविंद और आम आदमी पार्टी के आरोप को बिना गहन जांच के ख़ारिज़ भी नहीं किया जा सकता है। ऐसे में गाहे-बगाहे मन में सवाल ज़रूर उठता है कि कहीं नरेंद्र मोदी की बीए की डिग्री और उसके बाद एमए की डिग्री वाक़ई फ़र्ज़ी तो नहीं है।

दरअसल, कहा जाता है कि नरेंद्र मोदी ने महज़ 17 साल की उम्र में अपना घर छोड़कर निकल गए थे। तब तक उन्होंने केवल 10वीं तक की पढ़ाई बड़नगर के गुजराती मीडियम के भागवताचार्य नारायणाचार्य हाईस्कूल से पूरी की थी। इंटर में उन्होंने एडमिशन तो लिया था, लेकिन इंटर पूरा किए बिना घर से चले गए थे। बहराहल, वापस आकर मोदी ने दोबारा 12वीं पास की या नहीं, यह जानकारी कहीं भी उपलब्ध नहीं है। इसकी पुष्टि केवल प्रधानमंत्री ही कर सकते हैं।

अलबत्ता, सन् 1990 में तत्कालीन पत्रकार (अब सीनियर कांग्रेस लीडर) राजीव शुक्ला के टीवी कार्यक्रम ‘रूबरू’ में तत्कालीन बीजेपी जनरल सेक्रेटरी नरेंद्र मोदी ने स्वीकार किया था कि उन्होंने नियमित रूप से केवल स्कूली शिक्षा पूरी की है। जब शुक्ला ने दोबारा पूछा कि स्कूली शिक्षा का मतलब प्राइमरी तक? तब मोदी ने कहा था –प्राइमरी नहीं, हाईस्कूल। उसी इंटरव्यू में मोदी ने कहा कि बाद में संघ के एक अधिकारी के आग्रह पर उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एक्सटर्नल इग्ज़ाम देकर राजनीति शास्त्र में बीए किया और उसके बाद गुजरात विश्वविद्यालय से एक्सटर्नल एग्ज़ाम देकर संपूर्ण राजनीति शास्त्र से एमए कर लिया।

बहरहाल केजरीवाल ने डीयू से आग्रह किया है कि प्रधानमंत्री की डिग्री वेबसाइट पर सार्वजनिक करे और यह सुनिश्चित करे कि डिग्री के दस्तावेज सुरक्षित हैं। 'आप' का आरोप है कि वास्‍तव में डीयू के पास ऐसे डाक्‍यूमेंट्स ही नहीं हैं, जिससे साबित हो कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने 1978 में यूनिवर्सिटी से डिग्री हासिल की। पीएम ने यह जानकारी वर्ष 2014 के चुनाव के अपने हलफनामे में दी है।

'आप' का कहना था कि उसने पीएम मोदी की ओर से दी गई ग्रेजुएशन की तारीख वाले दिन 'नरेंद्र महावीर मोदी' के ग्रेजुएट होने की जानकारी हासिल की है। आप के अनुसार, यह 'नरेंद्र महावीर मोदी'  राजस्थान के अलवर से हैं जबकि पार्टी ने स्‍कूल सर्टिफिकेट के आधार पर कहा है कि पीएम मोदी गुजरात के बड़नगर से हैं। पीएम मोदी जैसे नाम वाले शख्स ने माना कि 1975 से 1978 तक डीयू में था।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय प्रधानमंत्री की डिग्री सही मानता है, लेकिन उसके पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। डीयू की केंद्रीय जन सूचना अधिकारी जयचंद्रा ने पिछले साल सितंबर में मुंबई के आरटीआई कार्यकर्ता अनिल गलगली को भेजे जबाब में कहा था चार दशक पुराना रिकॉर्ड उनके पास नहीं हैं। इसलिए वर्ष 1978 में पास छात्र-छात्राओं की जानकारी के लिए संबंधित कॉलेज से संपर्क करें। मगर विवाद बढ़ने के बाद डीयू ने मोदी की डिग्री सार्वजनिक की। विश्वविद्यालय प्रशासन ने तर्क दिया है कि मोदी ने 1978 में कक्षाएं अटेंड की थी और परीक्षा में पास हुए थे, लेकिन विश्वविद्यालय के पास कोई रिकॉर्ड नहीं है।

क्या ऐसा संभव है, जहां से कोई छात्र पढ़ाई किया हो, उस संस्थान के पास उस छात्र का कोई रिकॉर्ड ही न हो। किसी भी व्यक्ति ने जहां भी पढ़ाई की है, अगर वहां जाकर रिकॉर्ड मांगे तो पूरा रिकॉर्ड मिलेगा, क्योंकि हर छात्र का रिकॉर्ड सुरक्षित रखना संस्थान की ज़िम्मेदारी होती है। ऐसे में दिल्ली विश्वविद्यालय जैसा संस्थान ऐसा कैसे कह सकता है कि मोदी ने चूंकि 40 साल पहले पढ़ाई की थी, इसलिए उनका कोई रिकॉर्ड नहीं है।

बहरहाल, आम आदमी पार्टी के नेताओं का यह भी कहना है कि सत्तर और अस्सी के दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय डिग्री पाने वाले सभी छात्रों को सर्टिफिकेट हाथ ले लिखकर देता था, लेकिन मोदी की जो डिग्री जारी की गई है, वह कंप्यूटराइज़्ड फॉन्ट में है। इससे संदेह गहरा जाता है। इतना ही नहीं, जिस तरह गुजरात विश्वविद्यालय ने मोदी के भरे गए फॉर्म को झेरॉक्स कॉपी जारी करके साबित कर दिया है कि मोदी ने 1981 से 83 तक उनके यहां पढ़ाई की थी, उसी तरह दिल्ली विश्वविद्यावय को भी पूरा दस्तावेज़ सार्वजनिक कर देना चाहिए। मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं, उनकी डिग्री पर ससपेंस कतई ठीक नहीं। अगर इसमें लेट किया गया तो आम लोगों को लगने लगेगा कि दाल में कहीं कुछ काला है। वैसे सोशल मीडिया पर कानाफूसी होने लगी है कि कहीं प्रधानमंत्री की डिग्री कहीं वाक़ई फ़र्ज़ी तो नहीं हैं!