शनिवार, 30 जुलाई 2016

लोकगीत कजरी - कजरी सुनकर अपने आपको जीने लगते हैं हम

हरिगोविंद विश्वकर्मा
घिर-घिर आई बदरिया, सजन घर नाही रे रामा और धीमे धीमे बरसो से बदरिया सजन घर नही आयो रे रामा... देखिए, पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के इस परंपरागत लोकगीत कजरी। यह खूबसूरत कजरी, इस गीत में नायिका जिसका पति परदेश में है, कि तरह अपने प्रियतम को मिस कर रही है। मसलन बादल घिर आए हैं, और रिमझिम बारिश भी हो रही है, मगर मेरे पास प्रियतम नहीं हैं, वह मुझसे बहुत दूर हैं।

इसी तरह हरे रामा नाचत मुरैला बाग देखन हम जाबै रे हरी!” पूर्वांचल उत्तर प्रदेश के इस परंपरागत लोकगीत कजरी को सुनकर हर कोई अपने गांव पहुंच जाता है। सावन के महीने में गांव में होने का अपना अलग मज़ा होता है। दरअसल, कजरी और सावन का चोलीदामन का संबंध है। मुंबई में पिछले 12 साल से कजरी महोत्सव हो रहा है और यह आयोजन रविवार की शाम (31 जुलाई 2014) से शुरू हो रहा है, जो 15 अगस्त तक चलेगा।

दरअसल, गगनचुंबी इमारतों वाले शहर मुंबई के बहुत व्यस्त और आपाधापी भरे जीवन में 3.13 और 5.15 की लोकल गाड़ी पकड़कर अपने घर या ऑफिस पहुंचने की मजबूरी ने मुंबई के लोगों को अपने आपसे ही दूर कर दिया है। लोग क्या थे और क्या हो गए...? ट्रैफिक से बचने के लिए कोस्टल रोड और फ्रीवे और समुद्र को चीरते सीलिंक की सुविधाओं में तलाशते मुंबई के लोग जीवन को सरल और सुविधा संपन्न बनाने के चक्कर में रात-दिन कठिनाई भरी राहम में चलने के लिए अभिशप्त होते हैं।

दरअसल, मुंबईकर, कंक्रीट के जंगल में मशीन जैसा जीवन जीने के अलावा और क्या कर रहे हैं। इस यंत्रवत और आर्टिफिशियल लाइफ में जीवन तो है नहीं। इसमें न लोग ख़ुद हैं, न ही उनकी परंपराएं। सच कहें तो इस तरह के तनाव भरे माहौल में रहते–रहते, जीते-जीते लोग जीना ही भूल गए हैं और जो जी रहे हैं, वह तो जीवन ही नहीं है। यानी लोग पैसे से हर सुख-सुविधाएं तो जुटा लेते हैं, लेकिन इस चक्कर में अपने नैसर्गिक जीवन ने दूर हो जाते हैं। जीने के यह नीरस सिलसिला जब ख़त्म होगा तो हमारे पर अपना असली जीवन जीने के लिए दिन ही नहीं होंगे।

ऐसे तनाव भरे माहौल में ख़ासकर बारिश की रिमझिम के बीच लोगों को अपने गांव की गलियों, चकरोट और कच्चे रास्तों पर ले जाती है कजरी। कजरी सुनकर अचानक याद आता है, अरे, हम कभी बचपन में गांव में होते थे, जहां सावन महीना शुरू होते ही गांवों में कजरी और झूलों की धूम मच जाती थी। कजरी सुनते-सुनते याद आता है, शाम को दोस्तों के साथ खलिहान में खेलना, धमाचौकड़ी करना। आहीपाही का खेल। चकरोच और पगडंडियों में बेतहाशा भागना। सुबह उठकर सानी-पानी करना। थन का ताजा दूध पीना। पेड़ों पर चढ़कर दातून तोड़ना। डाकिए का इंतज़ार करना, जो हमारे प्रियजनों की चिट्ठियां लाता था। इतना ही नहीं कजरी सुनते-सुनते है, एक बिछड़न सा महसूस करने लगते हैं, कि पड़ोस की भाभी कितने दर्द भरे गीत गाती हैं। कजरी में ये सारे इलिमेंट्स होते हैं। इसके अलावा कजरी में इंसानों ही नहीं मवेशियों का जिक्र, पक्षियों का कलरव, नदी-नाले और झरने का जिक्र होता है। सावन में पेड़-पौधे की हरियाली और उनकी घनी छांव कजरी में समाहित रहती है।

हालांकि बदलते परिवेश में सावन में गांवों में सुनाई देने वाले इन सदाबहार लोकगीतों के बोल धीरे धीरे गांव में ही मंद पड़ने लगे हैं। आधुनिकरण के दौर में गांवों के भी शहर में तब्दील होने की प्रक्रिया के चलते गांवों से भी यह गौरवशाली परंपरा विलुप्त सी हो रही है, लेकिन डेढ़ हज़ार किलोमीटर दूर देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में यह परंपरा अब भी जीवित है। जी हां, मुंबई में हर साल सावन में कजरी महोत्सव हमें साल भर जीने के लिए पर्याप्त ऊर्जा तो दे ही देती है।

हमारे दिल को छूने वाली कजरी यूं तो पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में सबसे ज़्यादा लोकप्रिय लोकगीतों में से है, लेकिन मिर्जापुर, बनारस और जौनपुर में इसकी एक विशिष्ट शैलियां विकसित हुईं जो कहीं-कहीं गांवों में आज भी देखने को मिलती हैं। कजरी लोकगीत की सबसे बड़ी ख़ासियत यह है कि इसमें गांव का ही चित्रण होता है। गांव से जुड़ी छोटी-छोटी बातों, परंपराओं को कजरी में बहुत मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से पिरोया जाता है, इसीलिए जब भी हम कजरी सुनते हैं तो ख़ुद-ब-ख़ुद ख़यालों खो जाते हैं। कजरी सुनते हुए धीरे-धीरे ऐसा लगने लगता है, हम फिर से अपना अतीत जी रहे हैं। यह सुखद एहसास बस कजरी ही देती है।

आधुनिकता, मोबाइल, इंटरनेट, फेसबुक और वाट्सअप के दौर में गांव की ढेर सारी बातें हमारी सोच से विस्मृत होती जा रही हैं। ऐसे में कजरी हमने हर साल भले एक महीने के लिए अपनी दुनिया में वापस तो ले आती है। इस तरह कजरी हमारे जीवन के हर पहलू को अंदर तक छू जाती है। दिल को छूने की इस गौरवशाली परंपरा में बड़ी संख्या में महिलाए जुटती हैं। मुंबई में उत्तरप्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के सच्चे प्रतिनिधि बन गए सामाजिक संस्था अभियान के संस्थापक और मुंबई भाजपा के महामंत्री अमरजीत मिश्र अपनी व्यक्तिगत पहल से पिछले अभियान के बैनर तले 12 साल से देश की आर्थिक राजधानी में कजरी महोत्सव का आयोजन करते आ रहे हैं।

ऐसे समय जब इंद्र देवता इस पंचवटी भूमि पर खासे मेहरबान हैं और सावनी वातावरण जैसे खुशनुमा मौसम ने सावन से पहले ही लोगों का मन मोह लिया है, निश्चित तौर पर सावन की रिमझिम फुहारों के बीच इस बार मुंबई में रहनेवाले उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों पर कजरी की मीठी रसधार बरसेगी। मिर्ज़ापुर, उत्तरप्रदेश की मशहूर कजरी गायिका और पारंपरिक कजरी विधा की शीर्ष प्रतिनिधि मधु पांडेय और मुंबई के सदाबहार लोकगायक सुरेश शुक्ला अभियान के कजरी महोत्सव में अपनी गायिकी की छंटा बिखेरेंगे।

इस साल भी कजरी महोत्सव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ मुहिम को समर्पित है। उत्तर भारत की स्त्रियों में कजरी गाने और खेलने की परंपरार है। विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होनेवाले महोत्सव के दौरान समाज में अहम् योगदान करनेवाली चुनिंदा महिलाओं को रोज़ाना "स्त्री शक्ति सम्मान" दिया जाएगा। ताकि महिलाओं और बेटियों को उनकी तरह बनने की प्रेरणा मिले। इस वर्ष सफल स्त्री के सम्मान का अनोखा तरीका होगा। सम्मानित स्त्री के हाथों उसकी मां को अभियान का थैंक यू मां अकिंत स्मृति चिन्ह प्रदान किया जाएगा। यह सफल बेटी का मां के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का एक अनोखा तरीका होगा।

भारत की लोक संस्कृति का परंपराओं से गहरा और अटूट रिश्ता है। ऐसा ही पारंपरिक त्योहार कजरी तीज का है। भाद्रपद कृष्ण पक्ष तृतीया को संपूर्ण पूर्वी उत्तर प्रदेश में कजरी-तीज का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। इस अवसर पर सुहागिनें कजरी खेलने अपने मायके जाती हैं। महिलाएं नदी-तालाब आदि से मिट्टी लाकर उसका पिंड बनाती हैं और उसमें जौ के दाने बो देती हैं। नित्य-प्रति इसमें पानी डालने से पौधे निकल आते हैं। इन पौधों को कजरी वाले दिन लड़कियां अपने भाई तथा बुजुर्गों के कान पर रखकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। इस प्रक्रिया को 'जरई खोंसना' कहते हैं। इसके एक दिन पूर्व यानि भाद्रपद कृष्ण पक्ष द्वितीया को 'रतजगा' का त्योहार होता है। इस अवसर पर पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश में उत्सव का माहौल रहता है। तीज के दिन महिलाएं झूले डालती हैं। महिलाएं रात भर कजरी खेलती हैं। सजी धजी महिलाएं सावन का आनंद लेती दिखाई देती हैं। भारतीय परंपरा में सावन आने का मतलब है सुहागनों के सजने संवरने के दिन। हाथों में हरी चूड़ियों और मेंहदी के साथ वे सावन मनाती हैं। कजरी खेलना और कजरी गाना दोनों अलग चीजें हैं। श्रद्धा उमंग और खुमारी के संगम से शुरू होने वाले इस महीने का चरम हरियाली तीज पर पहुंचकर समाप्त होता था

कजरी का आरंभ देवी वंदना से होता है। रतजगा में गायन के साथ हास-परिहास, नकल, जोगीरा तथा प्रात: स्नान से पूर्व पतियों का नाम लेकर गाने की परंपरा है। रचना विधान की दृष्टि से कजरी का नाम 'चौलर' या चौलीर है। चौलीर में पांच फूल और चार बंदिशें होती हैं, पांचवें फूल पर कजरी समाप्त हो जाती है। यह कजरी बिना वा यंत्रों के भी गाई जा सकती है। कजरी का दूसरा भेद है शायरी। यह भेद अपेक्षाकृत नया है। इसमें बंदिशों की संख्या निश्चित नहीं होती। इसे प्राय: पुरुष गाते हैं। गायक की आवाज तेज हो और साथ में ढोल-नगाड़े की थाप हो तभी इस कजरी की रंगत जमती है।

कजली यों तो पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश का लोकगीत है किंतु मिर्जापुर, बनारस और जौनपुर में इसकी विशिष्ट शैलियां विकसित हुईं जो आज भी मौजूद हैं। बड़ी पुरानी लोकोक्ति है- 'लीला राम नगर कै भारी कजरी मिर्जापुर सरनाम'। इससे कजरी का मिर्जापुर से संबंध स्पष्ट होता है कि कजरी की जन्मस्थली मिर्जापुर ही है। कजरी के जन्मदाता के रूप में राजा दानो राय का नाम लिया जाता है। उन्होंने कज्जला देवी (विंध्याचल देवी) की स्तुति के रूप में कजरी का आविष्कार किया। एक अन्य मान्यता के अनुसार दानो राय की मौत के बाद महिलाओं ने अपना दु:ख व्यक्त करने के लिए नए राग में जिस गीत की रचना की वही कजरी है। कजरी का आरंभ ज्येष्ठ मास के गंगा दशहरा से होता है। तीन मास-तेरह दिन तक कजरी गाने का विधान है। गंगा दशहरा से आरंभ होनेवाली यह गायन परंपरा नागपंचमी से लेकर कजरी तीज तक अपने चरमोत्कर्ष पर रहती है।


मिर्जापुर और बनारस की कजरी में शैली का अंतर स्पष्ट प्रतीत होता है। यद्यपि कजरी की उत्पत्ति के बारे में विद्वानों में मतभेद नहीं है फिर भी इस बात पर सभी एकमत हैं कि कजरी का प्रचलन मिर्जापुर से ही बढ़ा। कजरी गायन क्षेत्र से जुड़े लोगों का मानना है कि कजरी का मायका मिर्जापुर और ससुराल बनारस में है। बनारस और मिर्जापुर में कजरी को पर्याप्त संरक्षण मिला, जिससे यह खूब विकसित हुई। बनारस के संगीतकारों ने इस क्षेत्र के प्रचलित लोकगीतों की तरह कजरी को भी शास्त्रीय सुरों में ढालकर उपशास्त्रीय गायन की एक नई विधा विकसित की जो काफी लोकप्रिय हुई। धीरे-धीरे इस लोकगीत की लोकप्रियता ग्राम्यांचलों में भी कम हो रही है। लोकसंगीत एवं लोकसंस्कृति के प्रमुख अंग के रूप में कजरी भी लुप्त होने के कगार पर है। इस लोक संस्कृति की रक्षा इससे जुड़ कर ही की जा सकती है।

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

महात्मा गांधी की हत्या का रहस्य - आखिर क्यों मिले थे देवदास गांधी नाथूराम गोडसे से?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
सीनियर बीजेपी लीडर और राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद में राष्ट्रपिता मोहनदास कर्मचंद गांधी की हत्या पर चर्चा कराने की पैरवी की है। कहना न होगा कि गाहे-बगाहे स्वामी ने क़रीब सात दशक पुराने गांधी हत्याकांड के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है। दरअसल, राष्ट्रपिता की हत्या से जुड़े कई पहलू ऐसे हैं, जिन पर कभी चर्चा तक नहीं हुई। लिहाज़ा, यह सुनहरा मौक़ा है, जब उस दुखद घटना के हर पहलू की चर्चा करके उसे सार्वजनिक किया जाए और देश के लोगों का भ्रम दूर किया जाए कि आख़िर वास्तविकता क्या है।

दरअसल, गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 4 फरवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया माधव सदाशिव गोलवलकर उर्फ गुरुजी को गिरफ़्तार करवाने के बाद  आरएसएस समेत कई हिंदूवादी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन गांधी की हत्या में संघ की संलिप्तता का कोई प्रमाण न मिलने पर छह महीने बाद 5 अगस्त 1948 को गुरुजी रिहा कर दिए गए थे और तत्कालीन गृहमंत्री सरदार बल्लभभाई पटेल ने संघ को क्लीनचिट देते हुए 11 जुलाई 1949 को उस पर लगे प्रतिबंध को उठाने की घोषणा की थी। दरअसल, क़रीब डेढ़ साल हुई जांच पड़ताल के बाद सरदार पटेल ने भी माना था कि गांधीजी की हत्या में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं, क्योंकि नाथूराम गोडसे ने हत्या का आरोप अकेले अपने ऊपर ले लिया था।

पिछली कांग्रेस सरकार के शासनकाल में हुए कई घोटालों को उजागर करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी के सवाल को एकदम से ख़ारिज़ भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि वाक़ई हत्या के बाद महात्मा गांधी की लाश का पोस्टमार्टम नहीं हुआ था, इससे आधिकारिक तौर पर पता नहीं चल सका कि आख़िर हत्यारे नाथूराम ने उन पर कितनी गोलियां चलाई थी। हालांकि गोडसे ने अपने बयान में कहा था कि वह गांधीजी पर दो ही गोली चलाना चाहता था लेकिन तीन गोली चल गई, जबकि कई लोग दावा कर रहे थे कि उसकी रिवॉल्वर से तीन नहीं कुल चार गोलियां चली थीं।

बहरहाल, सबसे बड़ी बात गोली लगने के बाद महात्मा गांधी को घायल अवस्था में किसी अस्पताल नहीं ले जाया गया, बल्कि उन्हें वहीं घटनास्थल पर ही मृत घोषित कर दिया गया और उनका शव उनके आवास बिरला हाऊस में रखा गया। जबकि क़ानूनन जब भी किसी व्यक्ति पर पर गोलीबारी होती और गोली उसे लगती है, तब सबसे पहले उसे पास के अस्पताल ले जाया जाता है। वहां मौजूद डॉक्टर ही बॉडी का परिक्षण करने के बाद उसे ऑन एडमिशनया आफ्टर एडमिशनमृत घोषित करते हैं।

दरअसल, गांधी की हत्या से जुड़े हर पहलू को नेहरू की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अनावश्यक रूप से रहस्यमय बना दिया। देश के लोग आज तक ढेर सारे बिंदुओं से अनजान है। गांधी की हत्या क़रीब सात दशक से पहेली बनी हुई है। यहां तक कि गांधी के जीवन के निगेटिव पहलुओं को उकेरते हुए जितनी भी किताबें छपती थीं, सब पर सरकार की ओर से प्रतिबंध लगा दिया जाता था, जिससे बाद में लेखक-प्रकाशक कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाते थे और कोर्ट के आदेश के बाद वह प्रतिबंध हटता था।

दरअसल, गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे के अपने इकबालिया बयान साफ़-साफ़ कहा था कि गांधी की हत्या केवल उन्होंने (गोडसे ने) ही की है। इसमें कोई न तो शामिल है और न ही कोई साज़िश रची गई। गांधी की हत्या के लिए ख़ुद गोडसे मानते थे कि उन्होंने एक इंसान की हत्या की है, इसलिए उन्हें फांसी मिलनी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने जज आत्माचरण के फांसी देने के फ़ैसले के ख़िलाफ अपील ही नहीं की। उन्होंने हाईकोर्ट में अपील केवल हत्या का साज़िश करार देने के पुलिस के फ़ैसले के ख़िलाफ़ की थी।

देश के विभाजन के लिए गांधी को ज़िम्मेदार मानने वाला नाथूराम चाहता था कि गांधीवाद के पैरोकार उससे गांधीवाद पर चर्चा करें, ताकि वह साबित कर सकें कि गांधीवाद से देश का कितना नुक़सान हुआ। गांधी की हत्या के बाद नाथूराम को पहले दिन तुगलक रोड पुलिस स्टेशन के हवालात में रखा गया था। उस समय गांधी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी गोडसे से मिलने गए थे। दरअसल, देवदास को लगा था कि किसी सिरफिरे, विद्रूप या असभ्य आचरण वाले व्यक्ति ने उनके पिता की हत्या की होगी, लेकिन जैसे ही वह हवालात के बाहर पहुंचे गोडसे ने ही उऩ्हें पहचान लिया।

नाथूराम ने कहा, “मैं समझता हूं आप श्रीयुत देवदास गांधी हैं।इस पर देवदास ख़ासे हैरान हुए, उन्होंने कहा, “आप मुझे कैसे जानते हैं।इस पर नाथूराम ने कहा, “हम लोग एक संपादक सम्मेलन में मिल चुके हैं। वहां आप हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक के नाते और मैं हिंदूराष्ट्र के संपादक के रूप में आया था।नाथूराम ने कहा, “आज आप मेरी वजह से अपने पिताको खो चुके हैं। आप और आपके परिवार पर जो वज्रपात हुआ है, उसका मुझे ख़ेद हैं। मैंने गांधी की हत्या व्यक्तिगत नहीं, बल्कि राजनीतिक कारणों से की है। आप पुलिस से पूछिए, अगर पौने घंटे का वक़्त दें, जिससे मैं आपको बता सकूं कि मैंने गांधीजी की हत्या आख़िर क्यों की?”

हालांकि उस समय पुलिस वालों ने देवदास-गोडसे मुलाकात को तीन मिनट से ज़्यादा बढ़ाने से इनकरा कर दिया जिससे गांधी की हत्या पर गोडसे देवदास के साथ चर्चा नहीं कर सके थे। दरअसल, नाथूराम गांधी की हत्या पर गांधीवादियों से चर्च करना चाहता था। वह अपना पक्ष रखना चाहता था, इसीलिए जब गांधी के तीसरे पुत्र रामदास गांधी ने नाथूराम को फ़ासी की सज़ा सुनाए जाने के तीन महीने बाद अंबाला जेल में 17 मई 1949 को एक लंबा भावपूर्ण पत्र भेजा और नाथूराम को अहसास कराने की कोशिश कि गांधी की हत्या करके नाथूराम ने ऐसी ग़लती की जिसका एहसास उन्हें नहीं हैं, तब नाथूराम ने उनसे भी इस विषय पर चर्चा करने की अपील की थी।

रामदास ने लिखा था, “मेरे पिताजी के नाशवान देह का ही आपने अंत किया है, और कुछ नहीं। इसका ज्ञान आपको एक दिन होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।” 3 जून 1949 को रामदास को भेजे जवाब में नाथूराम ने उनसे मिलने और गांधी की हत्या पर बातचीत करने की तीव्र इच्छा जताई। हालांकि उसके बाद रामदास और नाथूराम के बीच कई पत्रों का आदान-प्रदान हुआ। रामदास तो नाथूराम से मिलने के लिए तैयार हो गए थे, लेकिन उन्हें नेहरू ने इजाज़त नहीं दी। इस पर दो बड़े गांधीवादियों आचार्य विनोबा भावे और किशोरी लाल मश्रुवाला को नाथूराम से मिलने और उसके साथ चर्चा करके उसका पक्ष जानने की कोशिश की जानी थी, लेकिन ऊपर से उसके लिए भी इजाज़त नहीं दी गई। इस तरह गांधी की हत्या पर बहस की नाथूराम की इच्छा अधूरी रह गई।

दरअसल, नाथूराम ने इकबालिया बयान में स्वीकार किया था कि गांधी की हत्या केवल उसने ही की है। नाथूराम ने बाद में दूसरे आरोपी अपने छोटे भाई गोपाल गोडसे को बताया, “शुक्रवार शाम 4.50 बजे मैं बिड़ला भवन के द्वार पर पहुंच गया। मैं चार-पांच लोगों के झुंड के साथ रक्षक को झांसा देकर अंदर जाने में कामयाब रहा। वहां मैं भीड़ में अपने को छिपाए रहा, ताकि किसी को मुझे पर शक न हो। 5.10 बजे मैंने गांधीजी को अपने कमरे से निकलकर प्रार्थना सभा की ओर जाते हुए देखा। मैं मार्ग में सभास्थल की सीढ़ियों के पास खड़े लोगों के साथ खड़ा होकर इंतज़ार करने लगा। गांधीजी दो लड़कियों के कंधे पर हाथ रखे चले आ रहे थे। जब गांधी मेरे क़रीब पहुंचे तब मैंने जेब में हाथ डालकर सेफ्टीकैच खोल दिया। अब मुझे केवल तीन सेकेंड का समय चाहिए था। मैंने पहले गांधीजी का उनके महान् कार्यों के लिए हाथ जोड़कर प्रणाम किया और दोनों लड़कियों को उनसे अलग करके फायर कर दिया। मैं दो गोली चलाने वाला था लेकिन तीन चल गई और गांधीजी आहकहते हुए वहीं गिर पड़े। गांधीजी ने हे राम उच्चरण नहीं किया था।

नाथूराम ने गोपाल को आगे बताया, मेरे हाथ में पिस्तौल थी, उसमें अभी भी चार गोलियां थीं। मैं और गोली नहीं दागूंगा, यह भरोसा किसी को नहीं ता। इसलिए सभी लोग गांधी को छोड़कर दूर भाग गए। मैंने जब समर्पण की मुद्रा में हाथ ऊपर किए तब भी मेरे क़रीब आगे की हिम्मत किसी की नहीं पड़ रही थी। पुलिवाले की थी। मैं ख़ुद पुलिस पुलिस चिल्लाया। मैं काफी उत्तेजित महसूस कर रहा था। पांच छह मिनट बाद एक व्यक्ति को भरोसा हो गया कि मैं गोली नहीं चलाऊंगा और वह मेरे पास आया। इसके बाद सब मेरे पास पहुंचे और मुझ पर छड़ी और हाथ से प्रहार भी किए।

जब नाथूराम को तुगलक रोड थाने ले जाया गया तो उसने फ़ौरन डॉक्टर बुलाकर अपनी जांच कराने की इच्छा जताई। डॉक्टर के आते ही उसने कहा, डॉक्टर, मेरे शरीर का परीक्षा किजिए, मेरा हृदय, मेरी नाड़ी व्यवस्थित है या नहीं यह देखकर बताइए। डॉक्टर ने जांच करके कहा कि वह पूरी तरह फिट हैं। तब नाथूराम ने कहा, ऐसा मैंने इसलिए करवाया क्योंकि गांधी जी की हत्या मैंने अपने होशोंहवास में की है। सरकार मुझे विक्षिप्त घोषित न कर दे। इसलिए मैंने चाहता था, कोई डॉक्टर मुझे पूरी तरह फिट घोषित करे।

बहरहाल, गांधी की हत्या को साज़िश साबित करके और नाथूराम गोडसे के साथ उनके मित्र और सहयोगी नारायण आप्टे उर्फ नाना को अंबाला जेल में 15 नंवबर 1949 को फांसी पर लटका दिया गया था, लेकिन गांधी की हत्या से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं, जिन्हें लोग जानते ही नहीं। इसलिए सुब्रमण्यम स्वामी की बात मानकर महात्मा गांधी की हत्या के हर पहलू पर चर्चा बहुत ज़रूरी है, ताकि लोग जान सकें कि आख़िर क्या है, गांधी जी की हत्या का रहस्य?


रविवार, 24 जुलाई 2016

एक गोभक्त से भेंट -हरिशंकर परसाई

हरिशंकर परसाई ने यह व्यंग्य 1968 में लिखा था.. आज भी कितना प्रासंगिक है... ज़रूर पढ़े..
एक गोभक्त से भेंट
एक शाम रेलवे स्टेशन पर एक स्वामीजी के दर्शन हो गए। ऊँचे, गोरे और तगड़े साधु थे। चेहरा लाल। गेरुए रेशमी कपड़े पहने थे। साथ एक छोटे साइज़ का किशोर संन्यासी था। उसके हाथ में ट्रांजिस्टर था और वह गुरु को रफ़ी के गाने के सुनवा रहा था।
मैंने पूछा – स्वामी जी, कहाँ जाना हो रहा है?
स्वामीजी बोले – दिल्ली जा रहे हैं, बच्चा!
स्वामीजी बात से दिलचस्प लगे। मैं उनके पास बैठ गया। वे भी बेंच पर पालथी मारकर बैठ गए। सेवक को गाना बंद करने के लिए कहा।
कहने लगे – बच्चा, धर्मयुद्ध छिड़ गया। गोरक्षा-आंदोलन तीव्र हो गया है। दिल्ली में संसद के सामने सत्याग्रह करेंगे।
मैंने कहा – स्वामीजी, यह आंदोलन किस हेतु चलाया जा रहा है ?
स्वामीजी ने कहा – तुम अज्ञानी मालूम होते हो, बच्चा! अरे गौ की रक्षा करना है। गौ हमारी माता है। उसका वध हो रहा है।
मैंने पूछा – वध कौन कर रहा है?
वे बोले- विधर्मी कसाई।
मैंने कहा – उन्हें वध के लिए गौ कौन बेचते हैं? वे आपके सधर्मी गोभक्त ही हैं न?
स्वामीजी ने कहा – सो तो हैं। पर वे क्या करें? एक तो गाय व्यर्थ खाती है, दूसरे बेचने से पैसे मिल जाते हैं।
मैंने कहा – यानी पैसे के लिए माता का जो वध करा दे, वही सच्चा गो-पूजक हुआ!
स्वामीजी मेरी तरफ़ देखने लगे। बोले – तर्क तो अच्छा कर लेते हो, बच्चा! पर यह तर्क की नहीं, भावना की बात है। इस समय जो हज़ारों गोभक्त आंदोलन कर रहे हैं, उनमें शायद ही कोई गौ पालता हो। पर आंदोलन कर रहे हैं। यह भावना की बात है।
स्वामीजी से बातचीत का रास्ता खुल चुका था। उनसे जमकर बातें हुईं, जिसमें तत्व मंथन हुआ। जो तत्व प्रेमी हैं, उनके लाभार्थ वार्तालाप नीचे दे रहा हूँ।
स्वामी और बच्चा की बात-चीत —
– स्वामीजी, आप तो गाय का दूध ही पीते होंगे?
– नहीं बच्चा, हम भैंस के दूध का सेवन करते हैं। गाय कम दूध देती है और वह पतला होता है। भैंस के दूध की बढ़िया गाढ़ी मलाई और रबड़ी बनती है।
– तो क्या सभी गोभक्त भैंस का दूध पीते हैं ?
– हाँ, बच्चा, लगभग सभी।
– तब तो भैंस की रक्षा हेतु आंदोलन करना चाहिए। भैंस का दूध पीते हैं, मगर माता गौ को कहते हैं। जिसका दूध पिया जाता है, वही तो माता कहलाएगी।
– यानी भैंस को हम माता… नहीं बच्चा, तर्क ठीक है, पर भावना दूसरी है।
– स्वामीजी, हर चुनाव के पहले गोभक्ति क्यों ज़ोर पकड़ती है? इस मौसम में कोई ख़ास बात है क्या?
– बच्चा, जब चुनाव आता है, तम हमारे नेताओं को गोमाता सपने में दर्शन देती है। कहती है – बेटा चुनाव आ रहा है। अब मेरी रक्षा का आंदोलन करो। देश की जनता अभी मूर्ख है। मेरी रक्षा का आंदोलन करके वोट ले लो। बच्चा, कुछ राजनीतिक दलों को गोमाता वोट दिलाती है, जैसे एक दल को बैल वोट दिलाते हैं। तो ये नेता एकदम आंदोलन छेड़ देते हैं और हम साधुओं को उसमें शामिल कर लेते हैं। हमें भी राजनीति में मज़ा आता है। बच्चा, तुम हमसे ही पूछ रहे हो। तुम तो कुछ बताओ, तुम कहाँ जा रहे हो ?
– स्वामीजी मैं ‘मनुष्य-रक्षा आंदोलन’ में जा रहा हूँ।
– यह क्या होता है, बच्चा ?
– स्वामीजी, जैसे गाय के बारे में मैं अज्ञानी हूँ, वैसे ही मनुष्य के बारे में आप हैं।
– पर मनुष्य को कौन मार रहा है ?
– इस देश के मनुष्य को सूखा मार रहा है, अकाल मार रहा है, महँगाई मार रही है। मनुष्य को मुनाफ़ाखोर मार रहा है,काला-बाज़ारी मार रहा है। भ्रष्ट शासन-तंत्र मार रहा है। सरकार भी पुलिस की गोली से चाहे जहाँ मनुष्य को मार रही है, स्वामीजी, आप भी मनुष्य-रक्षा आंदोलन में शामिल हो जाइए न!
– नहीं बच्चा, हम धर्मात्मा आदमी हैं। हमसे यह नहीं होगा। एक तो मनुष्य हमारी दृष्टि में बहुत तुच्छ है। ये मनुष्य ही तो हैं, जो कहते हैं, मंदिरों और मठों में लगी जायदाद को सरकार जब्त करले, बच्चा तुम मनुष्य को मरने दो। गौ की रक्षा करो। कोई भी जीवधारी मनुष्य से श्रेष्ठ है। तुम देख नहीं रहे हो, गोरक्षा के जुलूस में जब झगड़ा होता है, तब मनुष्य ही मारे जाते हैं।एक बात और है, बच्चा! तुम्हारी बात से प्रतीत होता है कि मनुष्य-रक्षा के लिए मुनाफ़ाख़ोर और काला-बाज़ारी के खिलाफ़ संघर्ष लड़ना पड़ेगा। यह हमसे नहीं होगा। यही लोग तो मंदिरो, मठो व गोरक्षा-आंदोलन के लिए धन देते हैं। हम इनके खिलाफ़ कैसे लड़ सकते हैं
– ख़ैर, छोड़िए मनुष्य को। गोरक्षा के बारे में मेरी ज्ञान-वृद्धि कीजिए। एक बात बताइए, मान लीजिए आपके बरामदे में गेहूँ सूख रहे हैं। तभी एक गोमाता आकर गेहूँ खाने लगती है। आप क्या करेंगे ?
– बच्चा ? हम उसे डंडा मारकर भगा देंगे।
– पर स्वामीजी, वह गोमाता है पूज्य है। बेटे के गेहूँ खाने आई है। आप हाथ जोड़कर स्वागत क्यों नहीं करते कि आ माता, मैं कृतार्थ हो गया। सब गेहूँ खा जा।
– बच्चा, तुम हमें मूर्ख समझते हो?
– नहीं, मैं आपको गोभक्त समझता था।
– सो तो हम हैं, पर इतने मूर्ख भी नहीं हैं कि गाय को गेहूँ खा जाने दें।
– पर स्वामीजी, यह कैसी पूजा है कि गाय हड्डी का ढाँचा लिए हुए मुहल्ले में काग़ज़ और कपड़े खाती फिरती है और जगह-जगह पिटती है!
– बच्चा, यह कोई अचरज की बात नहीं है। हमारे यहाँ जिसकी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते हैं। यही सच्ची पूजा है। नारी को भी हमने पूज्य माना और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो।
– स्वामीजी, दूसरे देशों में लोग गाय की पूजा नहीं करते, पर उसे अच्छी तरह रखते हैं और वह खूब दूध देती है।
– बच्चा, दूसरे देशों की बात छोड़ो। हम उनसे बहुत ऊँचे हैं। देवता इसीलिए सिर्फ़ हमारे यहाँ अवतार लेते हैं। दूसरे देशों में गाय दूध के उपयोग के लिए होती है, हमारे यहाँ वह दंगा करने, आंदोलन करने के लिए होती है। हमारी गाय और गायों से भिन्न है।
– स्वामीजी, और सब समस्याएँ छोड़कर आप लोग इसी एक काम में क्यों लग गए हैं ?
– इसी से सबका भला हो जाएगा, बच्चा! अगर गोरक्षा का क़ानून बन जाए, तो यह देश अपने-आप समृद्ध हो जाएगा। फिर बादल समय पर पानी बरसाएँगे, भूमि ख़ूब अन्न देगी और कारखाने बिना चले भी उत्पादन करेंगे। धर्म का प्रताप तुम नहीं जानते। अभी जो देश की दुर्दशा है, वह गौ के अनादर का परिणाम है।
– स्वामीजी, पश्चिम के देश गौ की पूजा नहीं करते, बल्कि गो-मास खाते हैं, फिर भी समृद्ध हैं?
– उनका भगवान दूसरा है बच्चा। उनका भगवान इस बात का ख़्याल नहीं करता।
– और रूस जैसे देश भी गाय को नहीं पूजते, पर समृद्ध हैं?
– उनका तो भगवान ही नहीं बच्चा। उन्हें दोष नहीं लगता।
– यानी भगवान रखना भी एक झंझट ही है। वह हर बात का दंड देने लगता है।
– तर्क ठीक है, बच्चा, पर भावना ग़लत है।
– स्वामीजी, जहाँ तक मैं जानता हूँ, जनता के मन में इस समय गोरक्षा नहीं है, महँगाई और आर्थिक शोषण है। जनता महँगाई के ख़िलाफ़ आंदोलन करती है। जनता आर्थिक न्याय के लिए लड़ रही है। और इधर आप गोरक्षा-आंदोलन लेकर बैठ गए हैं। इसमें तुक क्या है ?
– बच्चा, इसमें तुक है। तुम्हे अंदर की बात बताता हूंl देखो, जनता जब आर्थिक न्याय की माँग करती है, तब उसे किसी दूसरी चीज़ में उलझा देना चाहिए, नहीं तो वह ख़तरनाक हो जाती है। जनता कहती है – हमारी माँग है महँगाई कम हो, मुनाफ़ाख़ोरी बंद हो, वेतन बढ़े, शोषण बंद हो, तब हम उससे कहते हैं कि नहीं, तुम्हारी बुनियादी माँग गोरक्षा है, आर्थिक क्रांति की तरफ़ बढ़ती जनता को हम रास्ते में ही गाय के खूँटे से बाँध देते हैं। यह आंदोलन जनता को उलझाए रखने के लिए है।
– स्वामीजी, किसकी तरफ़ से आप जनता को इस तरह उलझाए रखते हैं?
– जनता की माँग का जिन लोगो पर असर पड़ेगा, उसकी तरफ़ से। यही धर्म है। एक उदाहरन देते हैं।
बच्चा, ये तो तुम्हे पता ही है कि लूटने वालों के ग्रुप मे सभी धर्मो के सेठ शामिल हैं और लूटे जाने वाले गरीब मज्दूरो मे भी सभी धर्मो के लोग शामिल हैं, मान लो एक दिन सभी धर्मो के हज़ारों भूखे लोग इकटठे होकर हमारे धर्म के किसी सेठ के गोदाम में भरे अन्न को लूटने के लिए निकल पड़ेl सेठ हमारे पास आया। कहने लगा- स्वामीजी, कुछ करिए। ये लोग तो मेरी सारी जमा-पूँजी लूट लेंगे। आप ही बचा सकते हैं। आप जो कहेंगे, सेवा करेंगे। बस बच्चा, हम उठे, हाथ में एक हड्डी ली और मंदिर के चबूतरे पर खड़े हो गए। जब वे हज़ारों भूखे गोदाम लूटने का नारा लगाते आये, तो मैंने उन्हें हड्डी दिखायी और ज़ोर से कहा- किसी ने भगवान के मंदिर को भ्रष्ट कर दिया। वह हड्डी किसी पापी ने मंदिर में डाल दी। विधर्मी हमारे मंदिर को अपवित्र करते हैं।, हमारे धर्म को नष्ट करते हैं। हमें शर्म आऩी चाहिए। मैं इसी क्षण से यहाँ उपवास करता हूँ। मेरा उपवास तभी टूटेगा, जब मंदिर की फिर से पुताई होगी और हवन करके उसे पुनः पवित्र किया जाएगा। बस बच्चा, वह जनता जो इकट्ठी होकर सेठ से लड़ने आ रही थी, वो धर्म के नाम पर आपस में ही लड़ने लगी। मैंने उनका नारा बदल दिया। जव वे लड़ चुके, तब मैंने कहा–धन्य है इस देश की धर्म-प्राण जनता! धन्य हैं अनाज के व्यापारी सेठ अमुकजी! उन्होंने मंदिर की शुद्धि का सारा ख़र्च देने को कहा है। बच्चा जिस सेठ का गोदाम लूटने भूखे लोग जा रहे थे, वो उसकी ही जय बोलने लगे। बच्चा, यह है धर्म का प्रताप। अगर इस जनता को गोरक्षा-आंदोलन में न लगाएँगे, यह रोजगार प्रापती के लिये आंदोलन करेगी, तनख़्वाह बढ़वाने का आंदोलन करेगी, मुनाफ़ाख़ोरी के ख़िलाफ़ आंदोलन करेगा। जनता को बीच में उलझाए रखना हमारा काम है बच्चा।
– स्वामीजी, आपने मेरी बहुत ज्ञान-वृद्धि की। एक बात और बताइए। कई राज्यों में गोरक्षा के लिए क़ानून है। बाक़ी में लागू हो जाएगा। तब यह आंदोलन भी समाप्त हो जाएगा। आगे आप किस बात पर आंदोलन करेंगे।
– अरे बच्चा, आंदोलन के लिए बहुत विषय हैं। सिंह दुर्गा का वाहन है। उसे सरकसवाले पिंजरे में बंद करके रखते हैं और उससे खेल कराते हैं। यह अधर्म है। सब सरकसवालों के ख़िलाफ़ आंदोलन करके, देश के सारे सरकस बंद करवा देंगे। फिर भगवान का एक अवतार मत्स्यावतार भी है। मछली भगवान का प्रतीक है। हम मछुओं के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ देंगे। सरकार का मछली पालन विभाग बंद करवाँयेंगेे।
बच्चा, लोगो की मुसीबतें तो तब तक खतम नही होंगी, जब तक लूट खत्म नही होगी, एक मुद्दा और भी बन सकता है बच्चा, हम जनता मे ये बात फैला सकते हैं कि हमारे धर्म के लोगो की सभी मुसीबतों का कारण दूसरे धर्मो के लोग हैं, हम किसी ना किसी तरह जनता को धर्म के नाम पर उलझये रखेगे बच्चा।
इतने में गाड़ी आ गई। स्वामीजी उसमें बैठकर चले गए। बच्चा, वहीं रह गया।

शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

सत्तावर्ग बनाम प्रजावर्ग

हरिगोविंद विश्वकर्मा
इस देश के सवर्णों (जनरल कैटेगरी) को लगता है कि बीजेपी और कांग्रेस जैसी पाटियां ही उनके हितों की रक्षा कर रही हैं। इसी तरह पिछड़े वर्ग (मंडलवाले) के लोगों को लगता है, महज सपा-आरजेडी और उनके जैसी दूसरी पार्टियां ही उनकी पैरोकार हैं। इसी तरह दलितों (एससी-एसटी) को लगता है कि केवल बसपा और लोजपा उनकी आवाज़ और उनके स्वाभिमान की रक्षा करती हैं। यूपी बिहार के यादवों को लगता है मुलायम-लालू उनका ही उद्धार कर रहे हैं। इसी आधार पर ये लोग अपने नेताओं के लिए किसी को भी मारने या अपमानित करने के लिए तत्पर रहते हैं। इन तमाम को नहीं पता कि ये लोग बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं।

दरअसल, सवर्ण हो या बैकवर्ड या फिर दलित, सभी क्राइसेस ऑफ इन्फॉरमेशन यानी अज्ञानता के शिकार हैं। एक दूसरे के ख़ून के प्यासे हो चुके इन तीनों कैटेगरीज़ के लोगों पता ही नहीं कि देश में केवल दो वर्ग है। सत्ता वर्ग और प्रजा वर्ग। सारे नेता चाहे वे जिस पार्टी के हों, सत्ता वर्ग के हैं और पार्टी लाइन से ऊपर उठकर हमेशा हर नेता दूसरे नेता को डिफेंड करता है। कोई नेता क्या है? क्या वह हमारे आपकी तरह बस और ट्रेन या रिक्शे में सफ़र करता है। नहीं, उसकी आर्थिक हैसियत पर रिसर्च करिए। तब उसका समर्थन या विरोध कीजिए।

नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री हैं। कहते हैं, चाय बेचकर पीएम बने हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने चायवालों के लिए क्या किया? प्रधानमंत्री बनते ही सबसे पहले दिल्ली कटरा (वैष्णोदेवी) के बीच श्रीशक्ति एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाया, जो पूरी तरह एसी ट्रेन है। आगे बुलेट ट्रेन चलाएंगे। इन सब में कितने चायवाले यात्रा करेंगे? आप सोचिए, बुलेट ट्रेन चलाने पर जितना ख़र्च आ रहा है, उससे पूरे देश के लोगों का मुफ़्त इलाज हो सकता है। उनकी जान बचाई जा सकती है, ख़ासकर उनकी जो महंगे इलाज के कारण उपचार नहीं करवा पा रहे हैं और बिना पूरा जीवन जीए मर रहे हैं। आए दिन हम सोशल नेटवर्क पर ऐसे लोगों के नाम देखते रहते हैं। खैर, मोदी ने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह चायवालों के नहीं सत्तावर्ग के प्रतिनिधि हैं।

दुनिया जानती है, पवार, मायावती, मुलायम-लालू, पासवान, जयललिता, करुणानिधि, ठाकरे और दूसरे ढेर सारे नेताओं ने राजनीति में आने के बाद अकूत धन बनाया। जिसका उनके ज्ञात आय के स्रोत से कोई मिलान नहीं। फिर मोदी ने किसके ख़िलाफ़ कार्रवाई की। नाम बताइए। मोदी ने तो रॉबर्ट वाड्रा तक को छोड़ दिया, जिसके ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की बात कहकर सत्ता में आए। आप सोच रहे होंगे कि कोई कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? तो जान लीजिए ये सभी लोग सत्तावर्ग परिवार के हैं। इन्हें पोलिटिकल फैमिली भी कह सकते हैं। एक दूसरे को बचाते हैं। इस सत्ता परिवार में तमाम मीडिया घराने के मालिक भी आते हैं, जो पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं।

इन सत्ता-परिवार में सोनिया, मुलायम, लालू, मायावती, गडकरी, पवार, करुणानिधि, जयललिता, बादल, नीतीश, ममता, राज-उद्धव ठाकरे, सोरेन, अब्दुल्ला व मुफ्ती परिवार, गहलोत, फडनवीस, चव्हाण, पटनायक, सिंधिया, जिंदल, केजरीवाल के अलावा सभी नेता, सभी 790 सांसद, 99 फ़ीसदी विधायक हैं। हमें लगता है ये एक दूसरे के विरोधी हैं, लेकिन यक़ीन मानिए ये एक दूसरे के हितैषी हैं। इनकी मदद करते हैं सभी औद्योगिक घराने। इसके अलावा अमिताभ बच्चन, शाहरुख, सलमान, आमिर-अक्षय, तेंदुलकर, धोनी और बाक़ी खरबपति लोग भी सत्तावर्ग क्लब में शामिल हैं। इसमें दो राय नहीं कि पूरा देश महज 5 फ़ीसदी संपन्न लोगों का होकर रह गया है। वहीं लोग क़ायदे की ज़िंदगी जी रहे हैं। अंग्रेज़ों के जाने के बाद शुरुआत में जिन्हें मौक़ा मिला, उन्होंने बहुत बड़ी संपत्ति हथिया ली और वही लोग धन्नासेठ कहलाते हैं। इसी तरह जिन लोगों को नौकरियां मिलीं, उन्होंने अपने परिवार और उसके बाद क़रीबी ओर उसके बाद दूर के रिश्तेदारों को कहीं न कहीं सेट कर दिया।

ख़ूब डींग हांकी जाती है कि भारत लोकतांत्रिक देश है। यहां जनता के हित के लिए जनता के द्वारा चलाई जा रही जनता की सरकार है। अच्छा बताएं, देश और देश के लोकतंत्र में जनता की कितनी भागीदारी है? किसी को पता है, देश को कौन-कौन लोग चला रहे हैं? जो लोग देश को चला रहे हैं, वे आम आदमी के कितने हितैषी हैं? यह समझना बहुत ज़रूरी है कि इस देश में लोगों पर शासन कौन लोग कर रहे हैं? बहुत लंबे और गहन रिसर्च और अध्ययन के बाद देश में संपन्न लोगों का वर्गीकरण किया गया है।

1. बेशुमार दौलत किसके पास ?

पहली कैटेगरी
एक अरब 28 करोड़ की आबादी वाले इस देश में खरबपति (हज़ार करोड़ रुपए से ज़्यादा संपत्ति वाले) केवल 55 (पचपन) लोग हैं, जिनमें बड़े उद्योगपति, टॉप-लिस्टेड बिल्डर्स और कुछ बहुत भ्रष्ट नेता हैं। यही लोग प्रमुख राजनीतिक दलों की फंडिंग करते हैं। पूरी व्यवस्था पर एक तरह से इन्हीं का कंट्रोल है। सरकार किसी की भी रहे, इनकी कोई फाइल किसी भी मंत्रालय में नहीं रुकती। जो रोकने की कोशिश भी करता है, उसे उसके पद से हटा दिया जाता है।

दूसरी कैटेगरी
दुनिया भर में सुपररिच लोगों का हिसाब-क़िताब रखने वाली अंतरराष्ट्रीय ऐसेंजी बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप यानी बीसीजी की अभी हाल ही में आई सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में सुपररिच लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ गई। एजेंसी ने कहा कि 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर यानी 650+ करोड़ रुपए की संपत्ति वालों की संख्या 2013 के 284 से बढ़कर 2014 में 928 हो गई। यानी देश में मात्र 929 लोगों के पास कम से कम 650 करोड़ रुपए की संपत्ति है। इनमें इनमें उद्योगपतियों, बड़े समाचार पत्रों और चैनल्स के मालिक, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता आते हैं।

तीसरी कैटेगरी
अगर व्यक्तिगत संपत्ति कम करके लगभग 200 करोड़ रुपए कर दें तो, धन्नासेठों की संख्या भी 7850 हो जाती है। इनमें उद्योगपतियों, बिल्डर, कारोबारी, भ्रष्ट नेता, अभिनेता और बड़े खिलाड़ी आते हैं। यानी इस देश में 0.0006133 फ़ीसदी लोगों के पास 200 करोड़ या उससे ज़्यादा संपत्ति है।

चौथी कैटेगरी
अगर घर की संपत्ति के अलावा बाक़ी संपत्ति को न्यूनतम 25 करोड़ रुपए कर दे, तो कोटक वेल्थ मैनेजमेंट की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, 2015 में भारत में सुपर रिच की संख्या 1 लाख 37 हज़ार (137100) हो गई है। यह देश की आबादी का 0.0100 फ़ीसदी है। इस वर्ग के सुपर रिच की यह संख्या 2014 में एक लाख सत्रह हज़ार थी।

पांचवी कैटेगरी
अगर घर जैसी संपत्ति को छोड़कर व्यक्तिगत संपत्ति 6 करोड़ रुपए की संपत्ति को आधार बनाएं तो बीसीजी की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, भारत में केवल 1.75 लाख परिवारों की निजी संपत्ति क़रीब 6 करोड़ रुपये या उससे अधिक हैं। यानी इस देश में केवल 0.0150 प्रतिशत लोग ही जिन्हें सही मायने में आर्थिक रूप से सुखी और चिंतामुक्त कहा जा सकता है।

इन पांचों कैटेगरीज़ के लोग मनचाही ज़िंदगी जीते हैं। महंगाई कितनी भी बढ़ जाय इनको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। इनके पास इतनी ज़्यादा दौलत है कि इनकी सौ पीढ़ियां भी ख़र्च नहीं कर पाएंगी। इन पर किसी संकट का असर नहीं होता। ये ठाट से 24 घंटे एसी वाली जगह रहते हैं। ये केवल प्लेन से सफ़र करते हैं। जिस संकट आप रोज़ाना दो-चार होते हैं, उससे इनका कभी सामना नहीं होता। इनके सामने रोज़ी-रोटी का संकट नहीं जो आम आदमी रोज़ाना झेलता है। ये जो दान देते हैं, या धर्म-कर्म करते हैं, वह इसलिए करते हैं ताकि इन्हें इनकम टैक्स में छूट मिले। वरना ये हमारे आपकी ओर देखना भी पसंद नहीं करते हैं।

देश की संसद पर इन्हीं का क़ब्ज़ा है। कार्यपालिका और न्यायपालिका को इन्होंने बंधक बना रखा है। इकॉनॉमी पर इनका दख़ल है। शेयर बाज़ार में यही निवेश करते हैं। मुंबई में करोड़ों रुपए के महंगे फ़्लैट ख़रीदने की हैसियत इनकी ही है। हर छोटी-बड़ी इंडस्ट्रीज़ इनके कंट्रोल में है। खेल संघों में अहम पदों पर यही हैं। छोटे-बड़े सभी संस्थानों में इनका ही वर्चस्व है। मीडिया के असली ओनर यही हैं, जहां पत्रकारों को टूल की तरह इस्तेमाल करते हैं और ज़रूरत ख़त्म होने पर दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकते हैं। समस्याओं हल करने के लिए एसी कमरे में बैठकर यही लोग डायलॉग करते हैं।

2. बेशुमार आमदनी किसकी ?

पहली कैटेगरी
अगर सालाना कमाई को 1 करोड़ रुपए बेस मान लें तो वित्त मंत्रालय के मुताबिक, केवल 42,800 (42 हज़ार आठ सौ) लोगों की सालाना आमदनी 1 करोड़ रुपए या उससे ज़्यादा है। जो आबादी का मात्र 0.00354 फ़ीसदी है। इसमें उद्योगपति, बिल्डर, कारोबारी के साथ भ्रष्ट नौकरशाह, भ्रष्ट पुलिस अफ़सर, भ्रष्ट जज और बड़े अभिनेता और खिलाड़ी शामिल हैं। मज़ेदार बात है कि देश की कुल संपत्ति का 95 हिस्सा इन्हीं 0.00354 फ़ीसदी लोगों के पास है। यही लोकसभा, राज्यसभा और राज्य की विधानसभाओं में पहुंचने की हैसियत रखते हैं। या अपने ख़ास लोगों को फंडिंग के ज़रिए संसद-विधानसभाओं में पहुंचाते हैं, जो इनके हित के मुताबिक़ फ़ैसले लेते हैं।

दूसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में सत्तावर्ग के प्रति स्वामिभक्ति दिखाने वाले चमचे लोग आते हैं। इनकी सालाना कमाई 20 लाख से एक करोड़ रुपए (1.67 लाख से लेकर 8.33 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इनकी आबादी 4.06 लाख है। ये भी आबादी का महज 0.0319 फ़ीसदी हिस्सा हैं। इस कैटेगरीज़ के लोग सत्तावर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इनकी आबादी महज़ 0.03544 फीसदी है, जो कुल आबादी का 32वां हिस्ता नहीं बल्कि एक बत्तीसवें फ़ीसदी के आसपास है।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी में आबादी का 0.108 फ़ीसदी हिस्सा यानी 13.78 लाख लोग आते हैं। जिनकी आमदनी 10 से 20 लाख रुपए (83 हज़ार से लेकर 1.67 लाख रुपए प्रति माह) के बीच होती है। इन पर भी महंगाई का बहुत ज़्यादा असर नहीं होता है। इस वर्ग के क़रीब 95 फ़ीसदी लोग सत्ता परिवार की ओर झुके रहते हैं। यानी उनकी दलाली या चमचागिरी करते हैं। बदले में इन्हें अच्छा जीवन जीने की गारंटी मिलती है।

चौथी कैटेगरी
इस कैटेगरी की संख्या 17.88 लाख है, जो आबादी का 0.140 फ़ीसदी है। ये हर साल 5 से 10 लाख रुपए (क़रीब 42 हज़ार से लेकर 83 हज़ार रुपए प्रति माह) की कमाई करते हैं। ये मध्यम वर्ग के आदमी कहे जाते हैं। इसमें हमारे आप के बीच के अच्छा सेलरी वाले सीनियर पत्रकार भी आते हैं। इस वर्ग के 90 फ़ीसदी से ज़्यादा लोग यथास्थितिवादी होते हैं। परिवार पालने या दूसरी मज़बूरियों के चलते ज़मीर से समझौता करके सत्ता वर्ग की हां में हां मिलाते हैं और फ़ेसबुक या दूसरी सोशल नेटवर्किंग साइट पर अपनी जमात यानी आम आदमी को ख़ूब गाली देते हैं या उसकी आलोचना करते हैं। पेट पालने की मज़बूरी में ये समाज का भला करने वालों के ख़िलाफ़ माहौल बनाते हैं।

इन चारों कैटेगरीज़ को मिला दीजिए, तो कुल 0.28344 फ़ीसदी होता है. यह आबादी का आधा फ़ीसदी भी नहीं है। यानी मुट्ठी भर लोग देश को चलाते या उनका समर्थन करते हैं। अब सोचिए, इस देश में इंसान की तरह रहने वालों की संख्या कितनी कम है।

पांचवीं कैटेगरी
सालाना कमाई को और कम करें तो कितने भयावह आंकड़े आते हैं, यह देखिए...
आमदनी की पांचवी कैटेगरी के लोगों की आमदनी 1.80 लाख से 5 लाख रुपए (15 हजार से क़रीब 42 हज़ार रुपए प्रति माह) के बीच होती हैं। टैक्स देने वालों में ये सबसे नीचे हैं। इन्हें लोअर मिडिल क्लास कहे जाते हैं जिनकी जनसंख्या 2 करोड़ 88 लाख से ज़्यादा है। यह कुल आबादी का 2.271 फ़ीसदी है।

पूरे देश में टेक्सपेयर्स की कुल संख्या 2016 के बजट के अनुसार 4 फ़ीसदी यानी 5 करोड़ 16 लाख है। यानी जितने संपन्न हैं सब इसी में हैं।रिटर्न फाइल करने वाले टैक्‍सपेयर्स में से 54 फीसदी (2.78 करोड़) के ऊपर जीरो टैक्‍स दिया। यानी ये बॉर्डर पर रह गए। यानी असली टैक्स देने वाले केवल 46 फ़ीसदी यानी 2 करोड़ 37 लाख लोग हैं। इनकी आबादी 2 फ़ीसदी भी नहीं है। बहरहाल, इन 2 फ़ीसदी लोगो पर आश्रित व्यक्तियों को भी जोड़ दिया जाए तो बमुश्किल 5 फ़ीसदी होता है। यानी महज 5 फ़ीसदी लोग इंसान की तरह रहते हैं। बाक़ी लोग जीवन के लिए संघर्ष करते हैं।

3. इनके हिस्से कुछ भी नहीं आया?
आइए उनकी बात करे जिनके हिस्से कुछ भी नहीं आया।

पहली कैटेगरी
इस कैटेगरी में देश की 27 करोड़ आबादी आती है। इन्हें रोज़ाना दो डॉलर यानी 130 से 135 रुपए मजदूरी मिलती है। ये लोअर मज़दूर वर्ग के लोग हैं इनकी सालाना आमदनी 50 हज़ार से ज़्यादा नहीं होती। इनकी तादाद 23.3 यानी क़री-क़रीब एक चौथाई आबादी अपना ख़ून पसीना बहाने का बावजूद महज 130 रुपए रोज़ पाती है।

दूसरी कैटेरगी
इस कैटेगरी में मनरेगा के तहत न्यूनतम 100 दिन काम पाने वाले लोग भी आते हैं, जिन्हें दैनिक मज़दूरी 174 रुपए मिलती है। इऩकी सालाना आमदनी 16 हज़ार से 1 लाख 80 हज़ार रुपए (क़रीब 14 सौ रुपए से लेकर 15 हज़ार रुपए प्रति माह) होती है। ये बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। इस कैटेगरी में 49 करोड़ 69 लाख 60 हजार लोग काम करने वाले हैं। इनकी आबादी आबादी का 38.82 फ़ीसदी है। इनमें ज़्यादातर दिहाड़ी मज़दूर हैं। अस्थाई ड्राइवर और छोटा-मोटा काम करने वाले हैं।

तीसरी कैटेगरी
इस कैटेगरी के लोग कुछ भी नहीं करते। यानी बेरोज़गार हैं। इंटनैशनल लेबर ऑर्गनाइज़ेशन की ग्लोबल इंप्लॉयमेंट ट्रेंड 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 4 करोड़ 56 लाख पंजीकृत बेरोज़गार हैं। यानी आबादी के 3.8 फ़ीसदी हिस्से के पास काम ही नहीं है। ये अपने माता-पिता या संरक्षक पर निर्भर होते हैं। इनका जीवन संकटपूर्ण होता है। बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। अपराध, नक्सलाइट या आतंकवाद की दुनिया में आने वाले 99 फ़ीसदी इसी कैटेगरी के होते हैं।

3. क्या है नौकरियों की हक़ीक़त ?
नौकरी में जिस आरक्षण ने देश के युवकों को अगड़े-पिछड़े या हिंदू-मुस्लिम के नाम पर आपस में लड़ा रहा है, उसकी हालत देखिए। इंडियन इकॉनमी में नौकरी की औक़ात केवल 2.3 फ़ीसदी है। यानी महज़ 2.3 फ़ीसदी के लिए युवक धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा और नस्ल के नाम पर बंटे हैं। इस नौकरी की संख्या महज 2.96 करोड़ है। यानी देश में कुल 2 करोड़ 96 लाख 50 हज़ार लोग ही ठीकठाक नौकरी करते हैं। यानी देश के युवकों की नज़र 97.7 फ़ीसदी हिस्से पर न होकर महज 2.3 फ़ीसदी हिस्से पर है।

बहरहाल, 2.96 करोड़ सेलरीड लोगों में 2 करोड़ लोग केंद्र सरकार, सभी राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों की नौकरी के अलावा बैंक और दूसरे सावर्जनिक उपक्रम में काम करते हैं। केंद्र सरकार के पास 47 लाख कर्मचारी और 52 लाख पेंशन पाने वाले रिटायर्ड लोग हैं। अकेले भारतीय रेलवे में 13 लाख 34 हज़ार कर्मचारी हैं। अभी जो पे कमिशन लागू हुआ, उसका फायदा इन्हीं एक करोड़ कर्मियों को मिलेगा। ये लोग मुफ़्त की तनख्वाह लेते हैं। काम कुछ नहीं करते।

इसी तरह प्राइवेट सेक्टर में 96 लाख लोग नौकरी करते हैं। जिनमें 50 सबसे बड़ी निज़ी कंपनियों में बमुश्किल 10 लाख लोगों को नौकरी मिली हुई है। बाक़ी 86 लाख लोग छोटी-छोटी कंपनियों में काम करते हैं, जहां कंपनियां जब चाहें, उन्हें नौकरी से निकाल दें।

भारतीय बैंकों में कुल 11 लाख 51 हज़ार (पब्लिक सेक्टर बैंकों में 8 लाख 30 हजार, निजी बैंकों में 2 लाख 96 हज़ार और विदेशी बैंकों में क़रीब 25 हज़ार) कर्मचारी हैं। बैंको में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे ज़्यादा 1 लाख 98 हज़ार लोगों को नौकरी दे रखी है। इसी तरह देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलांयस इंडस्ट्रीज़ में कुल 24,930 कर्मचारी हैं। अनिल अंबानी की रिलायंस ने अपनी बेवसाइट पर कर्मचारियों की संख्या नहीं लिखी है, परंतु माना जा रहा है कि कंपनी ने अपनी सभी कंपनियों में 20 हजार स्टॉफ रखे हैं। टाटा का कारोबार 100 से ज़्यादा देशों में हैं, इसकी बेवसाइट के मुताबिक़ समूह में 6 लाख कर्मचारी हैं। टाटा ने कितने भारतीयों को नौकरी दी है, इसकी ब्यौरा छुपा लिया है। विशेषज्ञों के मुताब़िक कंपनी ने 35 हज़ार भारतीय नागरिकों को नौकरी दी है।

देश के सबसे बड़े प्रकाशन समूह टाइम्स ऑफ इंडिया ने 11000 लोगों को नौकरी दी है। सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी माइक्रोसॉफ्ट है, जिसने पूरी दुनिया में एक लाख 18 हज़ार लोगों को नौकरी दी है। भारत में इसके पांच हज़ार से भी कम कर्मचारी हैं, जबकि भारत में सबसे ज़्यादा कमाई करती है। दूसरी सबसे बड़ी कंपनी अमेरिका की आईबीएम में 73 हज़ार कर्मचारी हैं। हिंदुस्तान यूनीलीवर के यहां 18000 लोग नौकरी करते हैं। नेस्ले कंपनी के पांचों मैगी प्लांट्स में 1500 लोग काम करते हैं और कंपनी हर साल 500 करोड़ रुपए मुनाफा कमाती है। इसी तरह सबसे बड़ी मोबाइल कंपनी वोडाफोन इंडिया के पास 11500 कर्मचारी हैं और यह कंपनी भारत से हर साल 20 हज़ार करोड़ कमाकर अपने देश भेजती है।

प्रजावर्ग की आबादी का 95 फ़ीसदी है। ये अनाज की बोरी की तरह ट्रेन में ठुंसने वाले लोग होते हैं। इनके न तो पैदा होने की नोटिस ली जाती है न ही मरने की। लोकतंत्र, लोकतंत्र के स्तंभ- कार्यपालिका, विधायिका, न्यायपालिका और मीडिया, तमाम व्यवस्थाएं- शासन-तंत्र, पुलिस, बैंक, सभी योजनाएं इनके लिए बेमानी हैं। चाहे साबित हो या न हो, पर पूरा देश जान गया है कि सत्ता के शिखर पर बैठे लोग महाभ्रष्ट हैं। ख़ुलेआम लूट रहे हैं। लूटमारी के धंधे में कोई नेता किसी से कम नहीं है। ये इतने निरंकुश हैं कि इन्हें अपने किए पर ज़रा भी पछतावा नहीं है। इनकी छांव में फल-फूल रहे, इनके चमचे, इन भ्रष्टों का बेखौफ़ होकर बचाव करते हैं। भारतीय क़ानून में बचाव-पक्ष को दिए जाने वाले मौक़े का नाजायज़ तरीक़े से दुरुपयोग कर रहे हैं।

दरअसल, क़ुदरत ने जो दिया है वह समस्त देशवासियों के लिए पर्याप्त है। लेकिन सत्ता में बैठे लालची लोगों ने आम लोगों के हिस्से के रिसोर्सेज़ पर भी क़ब्ज़ा कर लिया है। रूलिंग क्लास ने आम लोगों का हक़ मारने का सामाजिक और नैतिक अपराध किया है। लिहाज़ा इनके साथ अपराधियों की तरह सलूक किया जाना चाहिए। इनके लिए दंड निर्धारित किया जाना चाहिए।

बुधवार, 20 जुलाई 2016

क्यों अमेरिकी युवाओं को पसंद आ रहे हैं डोनाल्‍ड ट्रंप? क्या अमेरिकी जनता भारत की तरह सोचने लगी ?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया भर के मुसलमानों और दूसरे समुदाय के लोगों के ख़िलाफ़ खुलेआम ज़हर उगलने और अमेरिका में उन्हें अस्थाई रूप से न घुसने देने का आह्वान करने वाले अमेरिका के खरबपति उद्योपति डोनाल्ड जॉन ट्रंप जब से रिपब्लिकन पार्टी की ओर से देश के 45वें राष्ट्रपति के लिए उम्मीदवार बनाए गए हैं, हर जगह एक ही चर्चा है, क्या वाक़ई ट्रंप की तरह कथिततौर पर ख़तरनाक सोच वाला व्यक्ति दुनिया का सबसे ताकतवर आदमी बनकर ह्वाइट हाऊस पर क़ाबिज़ हो जाएगा?

कई लोग तो डोनाल्ड ट्रंप को उम्मीदवार बनाए जाने से ही हैरान हैं। ऐसे लोग ट्रंप को जिद्दी, सिरफिरा और अनाप-शनाप बोलनेवाला करार देते हुए कहते हैं कि पैसे का भरपूर उपयोग करके ट्रंप ने अमेरिका की जनता को पूरी तरह भ्रमित कर दिया। इतना ही नहीं, ट्रंप का विरोध करने वाले यह भी मानते हैं कि अमेरिकियों ने इस बार कथिततौर पर एक अलोकतांत्रिक और असभ्य से व्यक्ति को राष्ट्रपति पद के लायक मान लिया है। बहरहाल, ट्रंप का मुक़ाबला डैमोक्रेटिक पार्टी की तरफ से राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार और पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन से हो रहा।

धरती के सबसे शक्तिशाली पद के लिए हो रहे चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को जिस तरह से अमेरिकी जनता, ख़ासकर युवाओं का समर्थन मिल रहा है, वह 2014 में नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार की याद दिला रहा है, जब दो ढाई साल पहले सेक्यूलर पॉलिटिक्स करने वाली ताकतों की हर संभव कोशिश के बावजूद गठबंधन के दौर में भारत के मतदाताओं ने भारतीय जनता पार्टी को 282 सीटों का स्पष्ट बहुमत का तोहफा दे दिया था, जिसके बाद कथिततौर पर सांप्रदायिक, तानाशह और मौत के सौदागर नरेंद्र मोदी देख के प्रधानमंत्री बने थे।

दरअसल, किसी भी विचारधारा को आम लोगों पर जब कुछ ज़्यादा ही थोपा जाने लगता है, तब एक समय के बाद लोगों को संदेह होने लगता है और उन्हें लगने लगता है, यह तो कुछ ज़्यादा ही हो रहा है। यही 2002 के बाद तीन बार विधानसभा चुनाव में गुजरात में हुआ। जब सेक्यूलर पॉलिटिक्स करने वाले
नरेंद्र मोदी को तानाशाह, हत्यारा, मौत का सौदागर वगैरह कहने लगे थे। सबसे बड़ी बात पहले तो जनता को लगा कि मोदी ने ज़रूर ग़लत किया, लेकिन यह जुमला इतना ज़्यादा उछाला गया कि लोगों को लगा कि इसमें वेस्टेड इंटरेस्ट है। बस क्या था मोदी का विरोध करने वाले ही हाशिए पर चले गए। मज़ेदार बात यह रही कि जब मोदी का विरोध कम होने की बजाय राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ने लगा, तब देश की जनता ने मोदी को प्रधानमंत्री बना दिया।

कहना न होगा, अब भारत के हालात अमेरिका में दोहराए जा रहे हैं। सेक्यूलर जमात के लोग आतंकवाद का उस स्तर पर विरोध नहीं करते और झट से कह देते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। लेकिन सारे आतंकवादी एक ही धर्म के प्रॉडक्ट क्यों हैं, इस सवाल पर चुप्पी साध जाते हैं। चूंकि आतंकवाद भले अमेरिका ने पैदा किया हो, लेकिन हाल के सालों में अमेरिकी जनता आतंकवाद की बड़ी विक्टिम रही है। इसीलिए उसे ट्रंप का मुस्लिम विरोध अच्छा लग रहा है। इसीलिए अमेरिकी जनता भी आजकल वैसा ही सोच रही है, जैसा पिछले आम चुनाव में भारत की जनता सोच रही थी।

गौर करने वाली बात है कि डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन कुछ दिन पहले तक अपनी जीत के प्रति पूरी तरह आश्वस्त थीं। लेकिन अब वह बिलकुल नहीं हैं। यानी इस डेमोक्रेट प्रत्याशी को अब पक्के तौर पर नहीं लग रहा है कि वह ट्रंप को हरा पाएंगी। दरअसल, हिलेरी को लगता है कि वह नहीं जीतेंगी क्योंकि ट्रंप कथित तौर पर अपने सिरफिरेपन के कारण अमेरिकियों पर छा गए हैं। हिलेरी की चिंता के पीछे उनके देश का मौजूदा रवैया एक वजह है। चुनाव में ट्रंप अपने बड़बोलेपन के कारण आम अमेरिकियों पर छा से गए हैं। अमेरिका में मुस्लिमों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाने, देश में सतर्कता बढ़ाए जाने एवं कट्टरपंथ इस्लामी आतंकवादीको कुचलने का ट्रंप की जुमला आम अमेरिकियों को ज़्यादा बेहतर लग रहा है।

अगर ट्रंप को मिल रहे समर्थन की बात करें तो अमेरिका को चीन से भी बड़ी चिंता है। इसके अलावा यूरोप में शरणार्थियों का बोझ कब अमेरिकियों के सिर पर न आ जाए, यह डर भी है। ऐसे में अमेरिकी जनता ऐसा नेता खोज रही थी जो कूटनीति में नहीं, धमकियों से बात करे। जो हर बात पर सिर फोड़ देंगे’, ‘धक्के देकर बाहर निकाल देंगे’, ‘उठाकर पटक देंगे’, ‘मारकर भगा देंगेवाली भाषा बोले जो बहुतों को अच्छी भी लगती है। ट्रंप इस सांचे में एकदम फिट बैठ रहे हैं। कई लोगों को लगता है कि अगर ट्रंप राष्ट्रपति बन गए तो अमेरिका शांति का दूत नहीं, धौंस देने वाल देश बन जाएगा।

दरअसल, अमेरिका के ओरलैंडो में आतंकी वारदात के बाद ट्रंप ज़्यादा मुखर हो गए हैं। ओरलैंडो शूटआउट पर उन्होंने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। ट्रंप ने साफ़-साफ कहा था, ‘‘ओरलैंडो के गे क्लब पर फायरिंग करने वाले अफगान मूल के बंदूकधारी उमर मतीन ने हत्याओं को अंजाम देते समय अल्ला हो अकबरकहा था। इसमें 50 से अधिक लोगों की मौत हो गई। ट्रंप ने एक चुनावी रैली में कहा, “इन हत्यारों को यहां अमेरिका में नहीं होना चाहिए। हमारे समक्ष कट्टरपंथी इस्लामी आतंकवाद की समस्या है।

वैसे पिछले दौ दशक से दुनिया भर में हो रही आतंकवादी वारदात से अमेरिकी जनता भी तंग आ चुकी है। 2001 में दुनिया से सबसे क्रूरतम आतंकी हमले की गवाह रही अमेरिकी जनता आतंकवाद ख़ासकर इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक ऐंड सीरिया (आईएसआईएस) से सुरक्षा को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं है। इस आतंकी संगठन में जिस तरह एजुकेटेड मुस्लिम यूथ शामिल हो रहे हैं, इससे अमेरिकी जनता को लगता है कि ख़तरा सिर पर सवार है। अमेरिका के लोग आशंकित रहते हैं कि न जाने कहां और कब आईएस का हमला हो जाए। इसीलिए अमेरिकी मतदाताओं की पसंद नरम हिलेरी की बजाय गरम ट्रंप हैं।

अमेरिका को सबसे गहरी चोट देने वाले आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मार गिराने वाले राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हालांकि अपने कार्यकाल में अच्छी नीतियां बनाईं पर इतनी अच्छी नहीं कि अमेरिका पुरानी ऊंचाइयों को छू सके। अमेरिकी जनता अपने वर्तमान और भविष्य को लेकर चिंता में डूबी है। ट्रंप चुनावी रैलियों में कह रहे हैं कि वह अमेरिका की खोई चमक फिर से लौटाएंगे। दो टूक शब्दों में कहते है, ‘‘हम सीरिया से लोगों को आने नहीं दे सकते और इसे तत्काल रोका जाएगा। हमारे देश में हज़ारों लोग आ रहे हैं। हमें नहीं मालूम कि कौन हैं। कोई कागजात नहीं हैं।"

अमेरिका में गैरक़ानूनी रूप से रहने वालों के लिए भी डोनाल्ड ट्रंप की सीधी योजना है - निर्वासन। वह कहते हैं, दो साल में यह काम पूरा हो जाएगा। बहरहाल, सीमा मामलों के अधिकारी कहते हैं- कुछ समय पहले ही साल भर में क़रीब चार लाख लोगों को निर्वासित किया गया था। बहरहाल, ट्रंप की नीति पर बहस शुरू हो गई है कि अमेरिका में अवैध रूप से रह रहे 1.1 करोड़ लोगों को वह कैसे निकालेंगे और मैक्सिको की 1609 किलोमीटर लंबी सीमा पर दीवार कैसे बनाएंगे? डोनाल्ड ट्रंप को लोगों का और पार्टी के उन मतदाताओं का अच्छा समर्थन मिल रहा है।

डोनाल्ड ट्रंप मुस्लिमों का अमेरिका में प्रवेश प्रतिबंधित करने और अवैध प्रवासियों को देश से बाहर निकालने का अपने रूख को बार बार दोहरा रहे हैं।  रिपब्लिकन पार्टी की ओर से उम्मीदवार बनने के बाद ट्रंप ने एक रैली में अपने विवादास्पद भाषण को वापस लेने से इंकार कर दिया। सीएनएन के साथ साक्षात्कार में, ट्रंप ने इतना ज़रूर कहा, “मुस्लिमों का अमेरिका में प्रवेश अस्थायी तौर पर रोकने वाले बयान वापस नहीं लिया। दृढ़ रूख अख्तियार करते हुए ट्रंप ने कहा कि वह इससे उन्हें खुदको नुकसान भी पहुंचे, तो भी वह इसकी परवाह नहीं करते। इसी के साथ, उन्होंने कहा कि वह आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ने में मुस्लिम देशों के साथ मिलकर काम करेंगे। ट्रंप ने यह तर्क भी दिया कि इसकी जिम्मेदारी पहले उन देशों पर है।

न्यूयॉर्क टाइम्स और सीबीएस न्यूज के पोल बताते हैं कि ट्रंप को मतदाता पसंद कर रहे हैं और उन्हें राष्ट्रपति के तौर पर उन्हें ही देखना चाहते हैं। 76 वर्षीय रिटायर टीचर डेलोर्स स्टॉकेट कहते हैं, मैं ट्रंप का सहयोग करूंगा, क्योंकि अगर आप विकल्प के तौर पर बाहरी व्यक्ति को लाते हैं, तो वह कम अनुकूल रहेगा। वैकल्पिक व्यक्ति में यह जरूरी नहीं कि उसके विचार भी हमारी तरह हों या फिर वह हमारी बातों से सहमत हो। डोनाल्ड ट्रंप के बारे में सीएनएन ने कुछ दिन पूर्व विश्व के विभिन्न देशों के कई लोगों से बात की, जिसमें जहां मुस्लिम दशों के लोग चाहते हैं कि ट्रंप राष्ट्रपति न बने जबकि इस्लामिक आतंकवाद से पीड़ित लोगों ने एक स्वर से ट्रंप को हिलेरी क्लिंटन से बेहतर उम्मीदवार करार दिया है। लोग मान रहे हैं कि ट्रंप आतंकवाद के मुकाबले ताकतवर साबित होंगे। हालांकि लंदन की फैशन की दुनिया में जुड़े सीमन मार्टिन कहते हैं कि यदि ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए तो उनका मानवजाति से विश्वास समाप्त हो जाएगा।


अलविदा ड्रिबलिंग के बादशाह मोहम्मद शाहिद...

अलविदा ड्रिबलिंग के बादशाह मोहम्मद शाहिद...

हरिगोविंद विश्वकर्मा
दुनिया भर में अपनी ड्रिबलिंगका लोहा मनवाने वाले दिग्गज खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद जैसा खिलाड़ी भारतीय हॉकी में शायद ही देखने को मिले। शाहिद को लेफ़्ट इन पोजिशन पर खेलने वाला भारत का सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी माना जाता है। हॉकी की दुनिया में उन्हें ड्रिब्लिंग का बादशाह भी कहा जाता था। ज़फर इक़बाल के साथ भारत की अग्रिम पंक्ति में उनकी जोड़ी से हर प्रतिद्वंद्वी टीम थर्राती थी। हॉकी में उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1981 में पद्मश्री से सम्मानित किया था। उसी साल उन्हें अर्जुन पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था।

इस पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान का लंबी बीमारी के बाद आज (20 जुलाई 2016) गुड़गांव के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। मैं जब बनारस में यूएनआई का ब्यूरो चीफ़ था तब मेरे सहकर्मी फोटोग्राफर विजय यादव मुझे शाहिद से मिलवाने उनके घर ले गए थे। इसके बाद शाहिद अकसर दशाश्वमेध घाट पर आते और मेरी उनसे मुलाक़ात होती थी।

वाराणसी में 14 अप्रैल 1960 को जन्मे शाहिद किशोरावस्था से ज़बरदस्त क्रिकेट खेलते थे। इसीलिए उन्हें 1979 में फ्रांस में महज़ 19 साल की उम्र में जूनियर हॉकी विश्वकप में बतौर फॉरवर्ड खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करने का मौक़ा मिला। उनकी प्रतिभा को देखकर फौरन उन्हें सीनियर टीम में ले लिया गया और भास्करन के नेतृत्व में उन्हों मास्को ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उस बार भारत आख़िरी बार ओलंपिक खेल में गोल्ड मेडल जीता था। भारत ने मॉस्को ओलंपिक के बाद ओलंपिक में पदक नहीं जीता। 1982 और 1986 एशियाड खेलों में सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल दिलाने में इस खिलाड़ी की अहम भूमिका रही थी।

शाहिद ने अपने 11 साल के इंटरनेशनल हॉकी करियर के दौरान कुल 167 मैच खेले और 66 गोल किये। उनका करियर वर्ष 1980 से लेकर 1990 तक चला। अपने जादुई खेल से विपक्षी रक्षापंक्ति को परेशान करने वाले बनारस के इस खिलाड़ी ने चैंपियंस ट्राफी में पाकिस्‍तान के खिलाफ वर्ष 1980 में करियर का आगाज किया और आखिरी मैच 1990 के बीजिंग एशियाड में प्रबल प्रतिद्वंद्वी पाकिस्‍तान के खिलाफ ही खेला।

हालांकि 1980 के बाद 1984 के लॉस एंजेलिस और 1988 के सियोल ओलंपिक में भी मोहम्मद शाहिद ने भारत का प्रतिनिधित्व किया। शाहिद अपनी कप्‍तानी में टीम को प्रतिष्ठित अजलान शाह कप में भी स्‍वर्ण पदक दिला चुके हैं। 1985 में मलेशिया के इपोह शहर में अजलान शाह कप में शाहिद टीम के कप्‍तान थे और भारत ने इसमें गोल्‍ड जीता था। वर्ष 1986 में भारत-पाकिस्तान की टेस्‍ट सीरीज में भी भारत ने जीत हासिल की और शाहिद इस दौरान भारतीय टीम के कप्‍तान थे।


पेट में दर्द की शिकायत पर उन्हें 29 जून को वाराणसी के सर सुंदरलाल अस्पताल में दाखिल कराया गया था। वहां हालत न सुधरने पर उन्हें एयरलिफ्ट करके गुड़गांव के मेदांता मेडिसिटी अस्पताल में दाखिल कराया गया। उनका लीवर ट्रांसप्लांट किया जाना था लेकिन किडनी के काम न करने के कारण ट्रांसप्लांट भी संभव नहीं हो पा रहा था। पिछले कुछ दिनों से उनके डायलिसिस की प्रक्रिया चल रही थी। आईसीयू में भर्ती शाहिद ने बुधवार को आखिरी सांस ली। अस्पताल में उनके साथ उनकी पत्नी परवीन शाहिद, बेटी हिना, बेटा मोहम्मद सैफ और परिवार के अन्य लोग उपस्थित रहे।


मास्को ओलंपिक में उनके साथ खेल चुके एमके कौशिक ने कहा कि अंतिम समय तक उन्होंने जिंदादिली नहीं छोड़ी। कौशिक ने मास्को ओलंपिक की यादों को ताजा करते हुए कहा कि वह 1980 में काफी युवा था और हम उससे सीनियर थे। वह सभी का सम्मान करता और खूब हंसी मजाक करता लेकिन इसका पूरा ध्यान रखता कि कोई आहत ना हो। उसके ड्रिबलिंग कौशल ने भारत को स्वर्ण पदक जिताने में मदद की और पूरी दुनिया ने उसके फन का लोहा माना। पेनल्टी कार्नर बनाने से लेकर गोल करने तक में उसका कोई सानी नहीं था।

विश्व कप 1975 में भारत की खिताबी जीत के नायक और मेजर ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार ने उन्हें अपने दौर में दुनिया के तीन सर्वश्रेष्ठ ड्रिबलरों में शुमार किया। अशोक कुमार ने कहा कि लखनऊ होस्टल के दिनों में ही शाहिद को देखकर उन्हें अनुमान हो गया था कि यह भारत के महानतम खिलाड़ियों में से एक होगा। उन्होंने कहा कि उस दौर में यानी ध्यानचंद के बाद के दौर में इनामुर रहमान और पाकिस्तान के शहनाज शेख के अलावा किसी को ड्रिबल के लिये जाना गया तो वह शाहिद थे।

उन्होंने ये भी कहा कि मैं शाहिद को लखनउ होस्टल के दिनों से जानता था जब हम इंडियन एयरलाइंस के सालाना शिविर के लिये केडी सिंह बाबू स्टेडियम जाते थे। मैं युवा लड़कों के साथ अभ्यास करना पसंद करता था जिनमें से शाहिद एक था। उसका खेल इतनी कम उम्र में भी सीनियर खिलाड़ियों की तरह था और मैं तभी समझ गया था कि एक दिन यह भारत के महानतम खिलाड़ियों में से एक होगा।