शनिवार, 26 नवंबर 2016

जनरल क़मर जावेद बाजवा के पाकिस्तान का सेनाध्यक्ष बनने के बाद भारत को सीमा पर ज़्यादा चौकस रहना होगा

हरिगोविंद विश्वकर्मा
पाकिस्तान के निवर्तमान चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टॉफ़ जनरल राहील शरीफ़ भारत के लिए बेहद ख़तरनाक साबित हुए, उनके कार्यकाल में भारत और पाकिस्तान के बीच सीमा पर सबसे ज़्यादा सीज़फायर का उल्लंघन हुआ था। लेकिन कश्मीर मामलों के विशेषज्ञ सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल क़मर जावेद बाजवा भारत के नज़रिए से जनरल शरीफ़ से भी ज़्यादा ख़तरनाक जनरल साबित हो सकते हैं, क्योंकि उनको कश्मीर मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है और वह सैन्य ट्रेनिंग मामलों में भी बहुत कुशल सेना अधिकारी रहे हैं। सबसे अहम पाकिस्तानी आईएसआई के डायरेक्टर जनरल को भी कोर कमांडर बनाकर कराची भेजा जा रहा है यानी वहां भी नया व्यक्ति आएगा।

लिहाज़ा, जनरल याह्या खान (1966 से 1971), जनरल असलम बेग (1988 से 1991) और जनरल अशरफ परवेज कयानी (2007 से 2013) के रूप में देश को तीन-तीन सेनाध्यक्ष देने वाले बलूच रेजीमेंट के जनरल बाजवा के पाकिस्तान का नया चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टॉफ़ बनाए जाने के बाद भारत को ज़्यादा सीमा पर चौकस नज़र रखनी होगी, क्योंकि जनरल बाजवा कश्मीर में पोस्टिंग के दौरान बेहद निरंकुश थे और उनके 26 महीने का कार्यकाल में पाकिस्तान की ओर से एलओसी पर सबसे ज़्यादा सीज़फायर का उल्लंघन हुआ था।

जनरल क़मर जावेद बाजवा के कार्यकाल में भारतीय सेना को सीमा -लाइन ऑफ़ कंट्रोल (एलओसी) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) दोनों पर ख़ासा मुस्तैद रहना होगा। ख़ासकर पाकिस्तान कश्मीर ही नहीं पूरे भारत को अस्थिर करने के लिए जनरल बाजवा की अगुवाई में ज़्यादा से ज़्यादा आतंकवादियों की घुसपैठ कराने का दुस्साहस ज़्यादा कर सकता है, क्योंकि ख़ुद जनरल बाजवा कश्मीर के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ हैं। भारतीय सैनिकों का सिर जनरल बाजवा के कार्यकाल में काटा गया था।

दरअसल, लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और भारत से लगी अतंरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर सक्रिय दो बटालियनों में से एक 10 वीं कोर (कोर्प टेन) के अगस्त 2013 से सितंबर 2015 तक कमांडर रहे हैं। 10 कोर पाकिस्तान की सबसे बड़ी बटालियान है और जिसकी तैनाती सियाचिन से रावलपिंडी तक है। इसमें पूरा लाइन ऑफ कंट्रोल का एरिया भी शामिल है। इसके अलावा लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा नॉर्दर्न एरिया फोर्स कमांड के चीफ रहे हैं। इस रेजिमेंट की तैनाती पूरे गिलगिट-बल्तिस्तान में रही है।

राजनीतिक हलकों में यह माना जा रहा है कि जनरल बाजवा को उनके कश्मीर अनुभव के आधार पर ही प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने उन्हें सेना प्रमुख के पद की रेस में जनरल स्टाफ के प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल जुबैर महमूद हयात पर तरजीह दी। वरिष्ठता क्रम में फ़िलहाल सैन्य मुख्यालय में चीफ ऑफ जनरल स्टाफ पद पर तैनात लेफ्टिनेंट जनरल हयात जनरल बाजवा से ऊपर थे। लिहाज़ा, सेनाप्रमुख पद पर पहले उनका दावा था। हालांकि हयात को ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ कमिटी के चेयरमन पद पर नियुक्त करके नवाज़ शरीफ ने उन्हें संतुष्ट करने की कोशिश की है। बहरहाल, प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति मामनून हुसैन ने दोनों सैन्य अधिकारियों को थ्री स्टार से प्रोन्नत कर फोर स्टार रैंक दे दिया।

वस्तुतः वरिष्ठता क्रम में दूसरा नाम लेफ्टिनेंट जनरल अश्फाक नदीम अहमद का था जो मुल्तान के कोर कमांडर हैं। इससे पहले वह चीफ ऑफ जनरल स्टाफ रह चुके हैं। उन्होंने स्वात और उत्तरी वज़ीरीस्तान में चरमपंथियों के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई की है। बहरहाल, चारो नामों में लेफ्टिनेंट जनरल जावेद इक़बाल रामदेई के सेना प्रमुख बनाए जाने की चर्चा ज़्यादा थी, क्योंकि घायल सैनिक होने के कारण वह सेना और देश में ज़्यादा लोकप्रिय हासिल हैं। यही लोकप्रियता उनके आड़े आ गई। हालांकि जनरल राहील शरीफ़ भी नहीं चाहते थे कि लेफ्टिनेंट इक़बाल उनके उत्तराधिकारी बनें।

बहरहाल, तमाम सस्पेंस और अटकलों को विराम देते हुए शनिवार को घोषित किया गया कि लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा पाकिस्तान का 16 वें आर्मी चीफ होंगे। वज़ीरे आजम नवाज शरीफ ने उनको आर्मी चीफ़ के पद पर नियुक्त करने का फ़ैसला लिया। शरीफ ने उपलब्ध सीमित विकल्प में लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा में ज़्यादा भरोसा जताया। जनरल बाजवा 29 नवंबर को जनरल राहिल शरीफ के स्थान पर पाकिस्तानी फौज के नये प्रमुख बन जाएंगे।

दरअसल, 24 अक्टूबर 1980 को 16 बलोच रेजिमेंट में कमीशन पाने वाले जनरल बाजवा का 10 कोर के कमांडर के तौर पर कार्यकाल काफी चर्चित रहा। 10 कोर का गठन 1974 में लेफ्टिनेंट जनरल अफ़ताब अहमद ख़ान ने 1974 में की। इसका मुख्यालय रावलपिंडी में है। इसे उर्दू में आफ़ताब यानी 10 सूर्य किरण के नाम पर किया गया। यह कश्मीर में हर ऑपरेशन के लिए ज़िम्मेदार होती है। बहरहाल, 10 कोर ने जनरल अशफ़ाक़ कियानी के बाद देश को दूसरा सेनाध्यक्ष दिया है।

पाकिस्तान में सेना प्रमुख बदलना बहुत बड़ी घटना मानी जाती है। संभवतः वहां प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति चुनने से ज़्यादा मशक़्कत भरा सैनाध्यक्ष का चयन होता है। बहरहाल, पाकिस्तान ने शांति के साथ अपने सेनाध्यक्ष को बदल दिया। हमारे पड़ोसी मुल्क में सेनाध्यक्ष को जैसी ताक़त हासिल है, उसे देखते हुए यह बहुत बड़ी घटना मानी जाती है। यह तय था कि जनरल शरीफ को सेवा विस्तार नहीं मिलने जा रहा है। तभी से नए सेना प्रमुख के नाम की अटकल लगाई जा रही थी।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और उत्तरी इलाके गिलगिट-बल्तिस्तान में मामलों से निपटने में माहिर माने जाने वाले लेफ्टिनेंट जनरल बाजवा अभी तक पाकिस्‍तानी सेना मुख्‍यालय (जीएचक्‍यू) में प्रशिक्षण और मूल्यांकन विभाग में महानिरीक्षक पद पर कार्यरत थे। कांगों में संयुक्त राष्ट्र के इंटरनैशनल पीस मिशन के दौरान भी ब्रिगेडियर रहते हुए बाजवा अपनी सेवाएं दे चुके हैं। वहां पर वह भारत में सेना प्रमुख रह चुके जनरल बिक्रम सिंह के मातहत थे। इसके अलावा, बाजवा क्‍वेटा के इन्‍फैंट्री स्‍कूल में भी काम कर चुके हैं।

पाकिस्तानी सूत्रों का कहना है कि कश्मीर मामले का अच्छा जानकार माने जाने वाले जनरल बाजवा जेहादी ताकतों को पाकिस्तान के लिए बड़ा खतरा भी मानते हैं। अब आने वाला समय ही बताएगा कि कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों को पाकिस्तानी सेना की मदद में इजाफा होगा या कमी आएगी। वैसे बाजवा के करीबियों के मुताबिक़, वह सुर्खियों में रहना पसंद नहीं करते और अपनी सेनाओं से करीबी से जुड़े रहते हैं। दरअसल, जनरल कमर जावेद बाजवा को पाकिस्‍तान की सेना और राजनीति में बेहद मजबूत पकड़ मानी जाती है। वह कश्‍मीर ऑपरेशंस पर बेहद रुचि लेते हैं और कट्टर विचारधारा के हैं।

जनरल रहील शरीफ और पीएम नवाज शरीफ के रिश्तों में खटास सार्वजनिक थी। इस वजह पिछले दो साल के दौरान देश में सत्ता विभाजित थी। जनरल शरीफ़ जहां राष्ट्रीय सुरक्षा नीति से जुड़े सारे फ़ैसले ले रहे थे, वहीं नवाज़ शरीफ की सरकार अर्थव्यवस्था और सामान्य प्रशासन संभाल रही थी। माना जा रहा है कि जनरल बाजवा और नवाज़ शरीफ के बीच रिश्ते बेहतर रहेंगे। पाक के रक्षा हलक़ों में इन दिनों बलूचिस्तान के मामले में नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की नीतियों के प्रति गहरी चिंता जताई जा रही है। बाजवा की चुनौतियों में इसे प्रमुख मुद्दा बताया जा रहा है।

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पास सेनाध्यक्ष को सेवावृद्धि देने का अधिकार है, कहा जा रहा है कि इसी खटास के कारण जनरल शरीफ़ को सेवा विस्तार नहीं दिया गया। बेबाक और अनुशासित सैन्य अफसर जनरल जहांगीर करामत को छोड़ दें तो क़रीब क़रीब सारे सेनाध्यक्षों ने सेवावृद्धि ली है। 1998 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नवाज शरीफ ने जनरल करामत से पद छोड़ने का आग्रह किया था। इसके बाद उन्होंने समयपूर्व इस्तीफा दे दिया था। उसके बाद सेनाध्यक्ष पद पर जनरल परवेज मुशर्रफ की नियुक्ति का रास्ता साफ हुआ था। मुशर्रफ ने 1999 में करगिल में घुसपैठ की साजिश अंजाम दी। बाद की घटनाओं की अंतिम परिणति नवाज शरीफ के तख्ता पलट में हुई थी।


शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

ग़ज़ल - ख़यालों में वफा

ख़यालों में वफा
जो भी सच है उसको कबूल कर
कल्पनाओं से अपने को दूर कर

वह तेरा नहीं है उसको भूल जा
कुछ बोलने को मत मजबूर कर

उससे मिलना महज संयोग था
जो तेरा भ्रम है उसको दूर कर

वो तेरा होता तो तेरे साथ होता
उसे अपनाने का मत कसूर कर

निगल जा सच को ज़हर समझ
बस ख़यालों में वफा भरपूर कर


हरिगोविंद विश्वकर्मा

बुधवार, 16 नवंबर 2016

बाल ठाकरे की कीर्ति हिंदुस्तान की सरहद के बाहर तक गई ( पुण्यतिथि पर विशेष)

हरिगोविंद विश्वकर्मा
शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे भारत के उन चंद नेताओं में से रहे जिनकी न्यूज़वैल्यू अंतिम समय तक जस की जस रही। यही वजह से है कि उनकी कीर्ति हिंदुस्तान की सरहद के बाहर तक गई और क़द पाने वाले ठाकरे महाराष्ट्र के इकलौते नेता रहे। इसमें दो राय नहीं कि मराठी मानुस से  जैसा मान-सम्मान और प्यार बाल ठाकरे को मिला वह विरले ही राजनेताओं को मिल पाता है। शिवसेना का आम कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि मराठी समाज का एक बहुत बड़ा तबका आज भी ठाकरे को भगवान की तरह पूजता है। यही वजह है कि उनकी पुण्यतिथि पर शिवाजी पार्क में ठाकरे को श्रद्धा सुमन अर्पित करने वालों का तांता लग जाता है।

बहरहाल, देश भर में बालासाहेबके रूप में लोकप्रिय रहे ठाकरे देश के उन नेताओं में से रहे जिनका करिश्मा लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। उनकी एक झलक पाने के लिए लोग लालायित रहते थे। उनकी सभाओं में अपार भीड़ जुटती थी। इसीलिए उनकी शुमार उन नेताओं में होती है, जिन्होंने केवल अपने ही दम पर एक राजनीतिक दल को खड़ा ही नहीं किया, बल्कि उसे सत्ता भी दिलवाई। लेकिन ख़ुद कभी कोई पद क़बूल नहीं किया। उनका यही त्याग उन्हें बाक़ी राजनेताओं से उन्हें अलग करता है।

महाराष्ट्र की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में प्रोग्रेसिव ऐक्टिविस्ट प्रबोधनकार ठाकरे उर्फ केशव के घर 23 जनवरी 1926 को जन्मे ठाकरे बचपन से ही होनहार थे। पुणे की आबोहवा का असर उन पर जीवन भर रहा और वह पूरी तरह मराठी संस्कृति में रच-बस गए थे। उनकी वाणी में जादू ही नहीं, करिश्मा भी था जिसमें भीड़ खींचने का माद्दा होता था। उनके अंदर व्यंग्य कार्टूनिस्ट ने बचपन में ही जन्म ले लिया था। परंतु उसे सही फोरम 1950 के दशक में मिला जब कार्टूनिस्ट के रूप में उन्हें फ्रीप्रेस जर्नल में नौकरी मिल गई। उनके कार्टून इतने अपीलिंग थे कि टाइम्स ऑफ इंडिया भी संडे एडिशन में छापने लगा। इस प्रोत्साहन से प्रेरित होकर ठाकरे ने 1960 में कार्टून साप्ताहिक मार्मिक शुरू किया।

बाल ठाकरे का कारवां एक बार मंज़िल की ओर बढ़ा तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मराठी समाज के हितों और अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने 19 जून 1960 में शिवसेना की स्थापना की। शिवसेना का लक्ष्य शुरू में मराठीभाषियों को नौकरी दिलाना था, क्योंकि उन दिनों नौकरी में मराठी कम्युनिटी के लोग बाक़ी लोगों के मुक़ाबले पिछड़े थे। ऐसे में ठाकरे की पहल को अभूतपूर्व प्रतिसाद मिला। ख़ासकर मराठी युवाओं ने उन्हें सिर आंखों पर बिठा लिया। उन्होंने मुंबई ट्रेड यूनियनों में कम्युनिस्टों का एकाधिकार ही ख़त्म कर दिया। उसकी जगह शिवसेना की कामगार सेना ने ले ली। ये वह दौर था जब तत्कालीन मुख्यमंत्री वसंतराव नाईक खुलकर ठाकरे को प्रमोट कर रहे थे। इसीलिए ठाकरे के उदय में वसंतराव नाईक का बड़ा योगदान माना जाता है।

मराठी मानुस के लिए बहुत ज़्यादा डेडिकेटेड ठाकरे जीवन भर मराठी भाषा और संस्कृति के पैरोकर रहे। उनकी राह में जो भी आया, उससे उनका पंगा हो गया। चाहे वो साठ के दशक में गुजराती मारवाड़ी रहे हों या फिर सत्तर के दशक में दक्षिण भारतीय या फिर अस्सी-नब्बे के दशक में उत्तरप्रदेश और बिहार के लोग। यही वजह है कि अभी 2010 में जब क्रिकेटर सचिन तेंडुलकर ने मुंबई के बारे में ठाकरे की नीति के विपरीत कमेंट किया तो ठाकरे उन पर भी भड़क उठे। हालांकि तकनीकी तौर पर ठाकरे ने कभी किसी भी व्यक्ति या समुदाय का सीधे विरोध नहीं किया। वह तो बस मराठी समाज को उसका अधिकार देने की पैरवी करते रहे हैं सो उनकी विचारधारा से इत्तिफाक न रखने वालों से टकराव लाजिमी ही था।

छह दशक के पब्लिक लाइफ़ में ठाकरे हमेशा किसी न किसी विवाद में रहे। सबसे बड़ा विवाद उनकी हिंदुत्ववादी विचारधारा पर रहा। उनके अतिवादी हिंदुत्ववाद ने उन्हें कट्टर मुस्लिम विरोधी बना दिया। शिवसेना उन लोगों का विरोध करती थी, जिनकी आस्था, उनके अनुसार, भारत की बजाय पाकिस्तान में थी। वह मुंबई में अशांति के लिए बांग्लादेशियों को ज़िम्मेदार ही मानते थे। इसी लाइन पर चलते हुए ठाकरे ने 2002 में इस्लामी आतंकवाद का मुक़ाबला करने के लिए हिंदू आत्मघाती दस्ता बनाने की पैरवी। उनका बयान मीडिया की सुर्खियां में रहा। हिंदू संस्कृति के पैरोकार ठाकरे वेलेंटाइन डे को हिंदू सभ्यता के अनुकूल नहीं मानते थे। उनके भाषण के कारण निर्वाचन आयोग ने उनसे छह साल के लिए मतदान का अधिकार भी छीन लिया था।

हिटलर एवं इंदिरा गांधी के प्रशंसक और तमिल चीतों के समर्थक ठाकरे का यह करिश्मा ही था सत्तर के दशक तक छोटी पार्टी रही, शिवसेना अस्सी के दशक में सशक्त जनाधार वाली पार्टी बना गई। ठाकरे ने ऐलान किया कि विधान भवन पर भगवा ध्वज फहराकर रहेंगे। लक्ष्य हासिल करने के लिए 1987 में बीजेपी से गठबंधन किया। 1995 में शरद पवार और कांग्रेस से उब चुकी जनता ने भगवा गठबंधन पर भरोसा जताया। चुनावों में इस गठजोड़ ने कांग्रेस को धूल चटा दी और ठाकरे का सपना साकार हुआ। लेकिन जनता की उम्मीदों को पूरा करने के लिए जो टीम बनी, उसने ईमानदारी से काम नहीं किया और 1999 के चुनाव में पिछड़ गया। यानी अगली पीढ़ी के नेता ठाकरे की विरासत को संभाल नहीं पाए।

इस बात में दो राय नहीं रही कि ठाकरे का उत्तराधिकारी बनने में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की लड़ाई से सबसे ज़्यादा नुकसान शिवसेना को उठाना पड़ा। फ़िलाहाल उनकी विरासत उनके पुत्र उद्धव ठाकरे संभाल रहे हैं। बहरहाल, उद्धव-राज की लड़ाई के चलते शिवसेना भगवा ब्रिगेड में भाजपा के बाद नंबर दो की हैसियत वाली पार्टी बन गई। जहां बाल ठाकरे के दौर में सत्तारूढ़ भगवा गठबंधन में शिवसेना सरकार का नेतृत्व कर रही थी और उसने राज्य को मनोहर जोशी और नारायण राणे (अब कांग्रेस में) के रूप में दो चीफ़ मिनिस्टर दिए, वहीं ठाकरे के बाद बीजेपी ने शिवसेना को दूसरे नंबर पर ढकेलते हुए सरकार की कमान अपने हाथ में ले ली।

सन् 2014 के विधान सभा चुनाव में शिवसेना बीजेपी का क़रीब तीन दशक पुराना गठबंधन ही टूट गया और दोनों दल एक दूसरे के सामने आ गए। बहरहाल, चुनाव में एक बार तो 288 सीटों वाली विधानसभा में अपने ही दम पर सरकार बनाती दिखने लगी, लेकिन 22 सीट कम रह गए। बीजेपी ने 27.8 फ़ीसदी वोट हासिल किया और उसके 122 विधायक जीते। दूसरी ओर शिवसेना महज 19.3 फ़ीसदी वोट हासिल कर पाई और 63 सीटों के साथ उसकी स्थिति कमोबेश 2009 के चुनाव जैसी ही रही।

चुनाव प्रचार के दौरान शिवसेना और बीजेपी में इतनी कटुता आ गई कि एक लगा कि दोनों का फिर से गठबंधन असंभव है। उद्धव ठाकरे और उनके सिपहसालारों ने तो चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के ख़िलाफ़ बहुत तल्ख भाषण दिया। बहरहाल, उद्धव को अपनी पार्टी में बग़ावत को रोकने के लिए बहुत मजबूरी में बीजेपी के साथ पोस्ट-इलेक्शन गठबंधन करना पड़ा। उद्धव ने बीजेपी के देवेंद्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार तो कर लिया, लेकिन हार की पीड़ा अब तक जज्ब नहीं कर पाए हैं। यही वजह है कि सरकार में रहने के बावजूद उद्धव का व्यवहार विपक्षी नेता जैसा होता है। शिवसेना के मुखपत्र सामना के जरिए वह अब भी बीजेपी और केंद्र सरकार पर हमला करते रहते हैं।

यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 500 और 1000 रुपए के नोट को बंद करने के फ़ैसले पर भी शिवसेना सरकार में रहकर भी विपक्षी दलों के साथ खड़ी नज़र आ रही है। राजनीतिक हलकों में माना जाता है कि अगर ठाकरे जीवित होते तो यह तल्खी इतनी न बढ़ती। वैसे ठाकरे की राजनीतिक विरासत संभाल रहे हैं उद्धव का पहले अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से ही सबसे ज़्यादा ख़तरा था, क्योंकि शिवसेना कार्यकर्ता राज ठाकरे में बाल ठाकरे की छवि और स्टाइल देखते थे। यही वजह है कि जब राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया तो एक बार मराठी मुद्दे पर उद्धव को ओवरटेक करने लगे थे।

यही वजह है कि ठाकरे के ज़िंदा रहते ही एमएनएस राज्य में बड़ी ताक़तवर पार्टी बनकर उभरी और 2009 के विधान सभा चुनाव में उसके 13 विधायक चुने गए। 2009 के चुनाव के बाद एक बार तो ऐसा लगा कि राज ठाकरे शिवसेना को ही ख़त्म कर देंगे, क्योंकि बड़ी संख्या में शिवसेना कार्यकर्ता एमएनएस में शामिल होने लगे थे। राज ठाकरे की अपरिपक्व और बचकानी राजनीति के चलते उद्धव ठाकरे को शिवसेना की विचारधारा में राज ठाकरे से एक तरह से वॉकओवर मिल गया। 2014 के चुनाव में तो मराठीवाद का नारा देने वाले राज को मराठी जनता ने अस्वीकार कर दिया और पार्टी महज खाता ही खुल पाया वह भी दूसरे दल से आए नेता ने जीत दर्ज करके एमएनएस के सूपड़ा साफ़ होने से बचाया। अब राज ठाकरे उद्धव ठाकरे के लिए दूर-दूर तक कोई चुनौती ही नहीं रह गए।



शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

क्या मोदी की योजना की पानी फेर रहे हैं RBI, बैंकर्स और नौकरशाह?

हरिगोविंद विश्वकर्मा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 के नोट को वापस लेने की घोषणा करके अपने ढाई साल के कार्यकाल में सबसे बेहतरीन फ़ैसला लिया है। कई लोग उम्मीद कर रहे थे कि सत्ता संभालते ही मोदी 500 और 1000 की नोट बंद कर देंगे, लेकिन उन्होंने यह फ़ैसला लेने में ढाई साल लगा दिया। खैर देर आयद, दुरुस्त आयद। इससे बहुत थोड़े से लोगों को दो-चार दिन असुविधा हो सकती है, लेकिन इसके बाद इस फ़ैसले का दूरगामी परिणाम दिखेगा, लेकिन उससे पहले कुछ दिन तक जनता और देश को भयानक मौद्रिक संकट से गुज़र पड़ सकता, क्योंकि सरकारी मशीनरी इस योजना को पूरे मन से लागू नहीं कर रही है।

दरअसल, देश के उद्योगपतियों, बिल्डरों और कारोबारियो के अलावा जजों, नौकरशाहों, पुलिस अफसरों, सैन्य अफसरों, खिलाड़ियों, बड़े संपादकों ने काले धन का जखीरा कैश के रूप में जमा करके रखा है। इसके अलावा बहुत बड़ा काला धन सरकारी मुलाज़िंमों के पास जमा है। देश में सरकारी कर्मचारियों (केंद्र, राज्य, पब्लिक सेक्टर, बैंक) की कुल संख्या 2 करोड़ हैं। बैंकों में कुल 11 लाख 51 हज़ार (पब्लिक सेक्टर बैंकों में 8 लाख 30 हजार, निजी बैंकों में 2 लाख 96 हज़ार और विदेशी बैंकों में क़रीब 25 हज़ार) लोग काम करते हैं। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया ने सबसे ज़्यादा 1 लाख 98  हज़ार लोगों को नौकरी दे रखी है। सबसे ज़्यादा काला धन सरकारी नौकरी करने वाले इन लोगों के पास है, क्योंकि ये लोग वेतन तो ह्वाइट लेते हैं, लेकिन रिश्वत कैश वसूलते हैं। इसीलिए ये लोग नहीं चाहते कि नरेंद्र मोदी की योजना सफल हो और काला धन बाहर आए।

बैंकों में जो अफरातफरी मची है, उसके लिए बैंक अफसरों-कर्मचारियो, नौकरशाहों और पुलिस अफसरों के नैक्सस की साज़िश है। ज़रूरत से ज़्यादा पैसा रखने वाले यो लोग नहीं चाहते हैं कि प्रधानमंत्री की योजना सफल हो। इसीलिए 10 नवंबर से एटीएम और बैंकों में जिस तरह की लाइन लग रही है, वह अभूतपूर्व घटना है। बैंक के कर्मचारी तो ग्राहकों से बहुत बदतमीज़ी से पेश आ रहे हैं। जो कुछ हो रहा है, उससे लग रहा है कि पानी सिर के ऊपर से जाने लगा है। जो कुछ हो रहा है, उससे साफ़ लग रहा है कि रिजर्व बैंक गवर्नर ऊर्जित पटेल और वित्त मंत्रालय के दूसरे अफसरान हालात का संभाल नहीं पा रहे हैं या जानबूझकर इस फ़ैसले को फेल करना चाहते हैं या जानबूझ कर योजना पर पानी फेर रहे हैं। सबसे ज़्यादा लापरवाही नीजी क्षेत्र के बैंक और उसके कर्मचारी कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें इस योजना से कोई लाभ नहीं, उल्टा घाटा ही है।

यहां एक उदारहण, वरिष्ठ पत्रकार और नवभारत टाइम्स (मुंबई) के सीनियर क्राइम रिपोर्टर सुनील मेहरोत्रा शुक्रवार को पांच सौ-पांच सौ के चार हज़ार रुपए की पुरानी नोट को एक्सचेंज कराने के लिए निजी क्षेत्र की सबसे बड़ी बैंक आईसीआईसीआई बैंक की मुंबई के वरली में कमला मिल शाखा में गए। क़रीब तीन घंटे लाइन में लगने के बाद उनसे बैंक के लोग ठीक से पेश नहीं आए। लिहाज़ा, उनको बिना नोट बदले ही वापस लौटना पड़ा। सुनील मेहरोत्रा के मुताबिक, विरोध दर्ज कराने पर बैंक अधिकारी ने कहा, कोटक महिंद्रा बैंक वाले अपने बैंक के अलावा किसी दूसरे बैंक के ग्राहकों से पुराने रुपए ले ही नहीं रहे हैं, हमने तो आपके लिए अलग काउंटर बनाया है। सुनील कहते हैं, यह जवाब सुनकर मुझे ऐसा लगा जैसे किसी बैंक में भीख मानने के लिए खड़ा हूं। कुछ मिनट अपमान सहन करने के बाद बिना रकम लिए यह कहकर वापस चल दिया कि आप लोग कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। यह केंद्र सरकार का आदेश है कि किसी भी बैंक से ग्राहक आया हो आपको नोट बदलनी ही पड़ेगी। या तो सामने लिख दीजिए कि दूसरे बैंक के ग्राहकों की रकम एक्सचेंज नहीं की जा सकती। तब यहां जिनका अकाउंट दूसरे बैंक में हैं, वे लोग नहीं आएंगे।

यह केवल सुनील मेहरोत्रा की समस्या नहीं हैं। यही बर्ताव पूरे देश में हर खाताधारक के साथ बैंक वाले कर रहे हैं। यह साफ़ लग रहा है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया 500 व 1000 की नोट बंद करने पैदा हालात को संभाल नहीं पा रहा है। बैंकों के अफ़सरान एवं कर्मचारी और वित्त मंत्रालय के नौकरशाह सब मिलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक करने वाली योजना पर जानबूझकर पानी फेर रहे हैं? दरअसल, पहले आम आदमी को लगा था कि प्रधानमंत्री की 500 और 1000 रुपए की नोट बंद करने की योजना सही है, लेकिन पूरे देश में पिछले तीन-चार दिन से जिस तरह भगदड़ मच रही है, उससे तो यही लग रहा है कि हालात सरकार के हाथ से बाहर निकल रहे हैं।

शुक्रवार की सुबह सात बजे से देश भर के एटीएम और बैंकों में रेलमपेल भीड़ लगी है। ऐसा लगा आज के बाद एटीएम और बैंक कभी खुलेंगे ही नहीं। सबसे दुर्भाग्य की बात कि ज़्यादातर एटीएम में पैस खत्म होने का बोर्ड लगा है। बैंकों में ज़्यादातर जगह भीड़ क़ाबू में करने के लिए पुलिस बुलानी पड़ रही है। खाताधारकों का बैंक गार्डों और बैंक अधिकारियों से गर्मागर्म बहस हो रही है। लोग देर रात तक बंद पड़े एटीएम के पास खड़े रहे। अब लोग वाक़ई नाराज़ होने लगे हैं, क्योंकि अब उनके पास बचे हुए 100 या 50 नोट ख़त्म होने लगे हैं और ज़रूरत की रकम उनके हाथ में नहीं आ रही है। बैंक में पैसे होने के बावजूद उनका दैनिक जीवन कष्टमय हो चुका है। प्रधानमंत्र ने इतना बड़ा फ़ैसला लिया है तो अउन्हें देश में ही रह कर हालात पर ख़ुद नियंत्रण रखना चाहिए। 500 व 1000 की नोट बंद करने की निगेटिव इंपैक्ट अपेक्षित था।

इस योजना से 80 करोड़ लोगों को कोई असर ही नहीं पड़ेगा। इसमें पहली कैटेगरी 27 करोड़ आबादी आती है। इन्हें रोज़ाना दो डॉलर यानी 130 से 135 रुपए मजदूरी मिलती है। लोअर मज़दूर वर्ग के इन लोगों की सालाना आमदनी 50 हज़ार से ज़्यादा नहीं होती। इनकी तादाद 23.3 करोड़ यानी क़रीब-क़रीब एक चौथाई है। दिन भर ख़ून पसीना बहाने का बावजूद ये लोग महज 130 रुपए रोज़ पाते हैं। दूसरी कैटेगरी में 49 करोड़ 69 लाख 60 हजार लोग काम करने वाले हैं। इनमें से कुछ को मनरेगा के तहत न्यूसाल भर में न्यूनतम 100 दिन काम और 174 रुपए दैनिक मज़दूरी मिलती है। इऩकी सालाना आमदनी 16 हज़ार से 1 लाख 80 हज़ार रुपए होती है। ये बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। तीसरी और अंतिम कैटेगरी में बेरोज़गार हैं, जिनकी 4 करोड़ 56 लाख हैं। यह आबादी का 3.8 फ़ीसदी है। ये अपने माता-पिता या संरक्षक पर निर्भर होते हैं। इनका जीवन संकटपूर्ण होता है। बड़ी मुश्किल से पेट पाल पाते हैं और प्रलोभन दिए जाने पर अपराध की दुनिया में उतर जाते हैं। तीनों केगरी को मिलाकर 80 फ़ीसदी लोग होते हैं। इन पर 500-1000 की नोट बंद करने से न लाभ होगा न नुकसान।

दरअसल, 500-1000 के नोट बंद करने का सबसे ज़्यादा असर जिन 1 फ़ीसदी लोगों पर पड़ रहा है, उनके कारण देश की कुल आबादी की 20 जनता का पेट भरता है। ऐसे में कह सकते हैं कि इन नोटों को बंद करने का असर ज़्यादा से ज़्यादा 20 फ़ीसदी जनता पर पड़ रहा है। ज़रूरत इस बात की है, कि जो लोग 500 और 1000 के नोट ले रहे हैं, उनको भी राडार पर रखने की। ख़ासकर गहने के कारोबार से जुड़े लोगों पर कड़ी निगरानी रखने का वक्त आ गया है। इसके अलावा चार्टर्ड अकाउंटेंट पर भी नज़र रखी जानी चाहिए, जो लोगों को 500 या 1000 के पुराने नोट को बदलने की तरकीब बता रहे हैं। इसका एक और विकल्प हो सकता है कि जितने लोग 500 यी 1000 के नोट दे रहे हैं, उनसे उनके पैन कार्ड की फोटो कॉपी ले लेनी चाहिए।


बुधवार, 9 नवंबर 2016

भारत के लिए ट्रंपकार्ड हो सकते हैं डोनॉल्ड ट्रंप

हरिगोविंद विश्वकर्मा
पूरी दुनिया की भविष्यवाणी को झूठ साबित करते हुए कथित तौर पर बहुत ख़तरनाक विचारधारा वाले डोनॉल्ड जॉन ट्रंप आख़िरकार दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी बन गए हैं और अगले साल के आरंभ में वह ह्वाइट हाऊस पर क़ाबिज़ हो जाएंगे। रिपब्लिकन पार्टी के ट्रंप के अमेरिका के 45 वें राष्ट्रपति चुने जाने से दुनिया का एक तबक़ा आशंकित है। अपेक्षाकृत ज़्यादा क़ाबिल, उदारवादी और सौम्य महिला हिलेरी क्लिंटन के रिजेक्शन के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिकी जनता भी आजकल वैसा ही सोचने लगी है, जैसा ढाई साल पहले हुए आम चुनाव में भारत की जनता सोच रही थी?

दरअसल, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रेसिडेंट डोनॉल्ड ट्रंप में प्राइमा फेसाई कई समानताएं हैं। यह संयोग है कि राग सेक्यूलर आलापने वाले लोग न तो मोदी को पसंद करते हैं और न ही ट्रंप को। सेक्लयूर विचारक 2002 के गुजरात दंगों के चलते मोदी को 14 साल बाद भी माफ़ करने की स्थिति में नहीं हैं। उऩकी मोदी की नापसंदी इस स्तर तक है कि मोदी का विरोध करने वाले किसी भी ऐरे-गैरे नत्थू खैरे के साथ हो लेते हैं। इसी तरह ट्रंप से उदारवादियों की खुन्नस मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने और अमेरिका में मुसलमानों को अस्थाई रूप से प्रवेश न देने वाले उनके बयान के चलते है।

इसी बिना पर सेक्यूलर विचारधारा के लोग जुलाई से ही ट्रंप को ज़िद्दी, सिरफिरा और अनाप-शनाप बोलनेवाला नेता करार देते रहे और कहते रहे कि पैसे का भरपूर उपयोग करके उन्होंने अमेरिकी जनता को भ्रमित करके चुनाव जीत लिया। इसके बावजूद डोनॉल्ड को ह्वाइट हाऊस में जाने से नहीं रोका जा सका। दरअसल, ऐसा लगता है जुलाई से नवंबर तक ट्रंप का जिस तरह विरोध बढ़ता रहा, उसी अनुपात में अमेरिकी जनता उनका समर्थन करती रही। ट्रंप की जीत 2014 में मोदी के प्रचार की याद दिला रही थी, जब सेक्यूलर विचारधारा के लोगों की की मोदी के ख़िलाफ़ हर कोशिश नाकाम हो गई। गठबंधन के दौर में मतदाताओं ने मोदी को 282 सीटों का स्पष्ट बहुमत दिया था और सांप्रदायिक, तानाशाह और मौत का सौदागर जैसे शब्दों से अलंकृत मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए थे।

ऐसा, लगता है अमेरिकी जनता एक ऐसा प्रेसिडेंट खोज रही थी जो कूटनीति की नहीं, बल्कि धमकियों की भाषा बोले और हर बात पर धौंस जमाए। कमोबेश ट्रंप इस सांचे में एकदम फिट बैठते हैं। माना जा रहा है कि ट्रंप के नेतृत्व में अंकल सैम शांति का दूत नहीं, धौंस जमाने वाले देश बन रहे हैं। अपने बयानों में ट्रंप कथित तौर पर कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद को अमेरिका के लिए गंभीर चुनौती मानते रहे हैं। हालांकि वह कह चुके हैं कि इस्लामिक आतंक के ख़िलाफ़ लड़ाई में भारत और मुस्लिम देशों के साथ मिलकर काम करेंगे।

जो भी हो, नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप की अप्रत्याशित और हैरतअंगेज जीत के बाद उनके बारे में अपरिपक्व बयान देने का समय नहीं रहा, क्योंकि यह अमेरिकी जनता का जनादेश है। लिहाज़ा, ट्रंप ये करेंगे या ट्रंप वो करेंगे, ऐसे बयान देने का बचपना करने की बजाय हर किसी को अब अमेरिकी जनता के फ़ैसले का सम्मान करते हुए उसे उसी तरह स्वीकार करना चाहिए, जिस तरह ढाई साल पहले पूरी दुनिया ने भारत की जनता का जनादेश स्वीकार करते हुए मोदी को भारतीय जनता का आधिकारिक प्रतिनिधि माना और उनका स्वागत किया था।

कहना न होगा, भारत के हालात अमेरिका में दोहराए गए। इसकी एक वजह यह भी है कि सेक्यूलर जमात के लोग आतंकवाद का उस स्तर पर विरोध नहीं करते, जितना करना चाहिए और झट से कह देते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं, लेकिन इस सवाल का जवाब नहीं देते कि सारे आतंकवादी एक ही धर्म के प्रॉडक्ट क्यों हैं। बेशक आतंकवाद को अमेरिका ने पैदा किया, लेकिन हाल के सालों में वहां की जनता भी आतंकवाद की बड़ी विक्टिम रही है। कहा जा रहा है कि इसीलिए अमेरिकी जनता को ट्रंप का मुस्लिम विरोध अच्छा लगा और उन्हें राष्ट्रपति चुन लिया। यानी इस्लामिक टेरॉरिज़्म को जड़ से कुचलने के नारे पर ही ट्रप को अमेरिकी जनता का इतना समर्थन मिला।

बहरहाल, अगर पिछले चार-पांच महीने के घटनाक्रम पर नज़र डालें तो, इस बार का अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव भारत के नज़रिए से काफ़ी अहम रहा। कहा जाने लगा है कि भारत के लिए डोनॉल्ड ट्रंपकार्ड साबित हो सकते हैं, क्योंकि प्रत्याशी बनने से पहले से ही ट्रंप दुनिया से इस्लामिक आतंकवादको जड़ से कुचलने की बात कर रहे हैं। चूंकि भारत आतंकवाद से सबसे ज़्यादा पीड़ित देशों की शुमार में रहा है और चार दशक से आतंकवाद, ख़ासकर पाकिस्तान स्पॉन्सर्ड दहशतगर्दी, का दंश झेल रहा है। ऐसे में ट्रंप की ख़तरनाक कार्रवाई से भारत को नुकसान नहीं, बल्कि फ़ायदा मिल सकता है। यह भारतीय विदेश मंत्रालय में बैठे लोगों को सोचना होगा कि कैसे ट्रंप से अधिकतम लाभ ले सकते हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भारत से द्विपक्षीय संबंध अहम मुद्दा था। दुनिया के सबसे ताक़तवर व्यक्ति बने ट्रंप का भारत के प्रति अप्रोच हिलेरी क्लिंटन के मुक़ाबले ज़्यादा सकारात्मक लगा। सबसे मज़ेदार बात यह कि चुनाव प्रचार और प्रेसिडेंशियल डिबेट्स में ट्रंप भारत और नरेंद्र मोदी की चर्चा करते रहे। ट्रंप
भारत को अमेरिका का नैचुरल अलाई मानते हैं। यह भारत के नीति-नियंताओं के लिए अच्छी ख़बर है, जिससे भारत फ़ायदे में रह सकता है।

डोलॉल्ड ट्रंप प्रचार के दौरान अगर किसी विदेशी नेता का नाम सबसे ज़्यादा ले रहे थे तो वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे। ट्रंप भारत और भारतीय प्रधानमंत्री के प्रशंसक के रूप में उभरे हैं। दुनिया भर के मुसलमानों के ख़िलाफ़ खुलेआम ज़हर उगलने वाले ट्रंप को आरंभ में भारत विरोधी माना जा रहा था, लेकिन भारत और भारतीयों को उन्होंने ग्रेट कंट्री ऐंड ग्रेट पीपल’  कहकर अपनी असली मंशा का परिचय दे दिया। ट्रंप के रुख से यही लगता है, उनके दुनिया का सबसे ताकतवर व्यक्ति बनने और ह्वाइट हाऊस पर क़ाबिज़ होने से भारत फ़ायदे में रहेगा।

कहा जा रहा है कि कमोबेश 70 वर्षीय ट्रंप भारत को हिंदू देश मानते हैं, क्योंकि प्रचार में उन्होंने भारत को ग्रेट नेशन क़रार देते हुए कहा था, विश्व सभ्यता एवं अमेरिकी संस्कृति में विलक्षणयोगदान के लिए भारतीय समुदाय की मैं प्रशंसा करता हूं। वैश्विक सभ्यता और अमेरिकी संस्कृति में हिंदू समुदाय ने असाधारण योगदान दिया है। हम हमारे मुक्त उद्यम, कड़ी मेहनत, पारिवारिक मूल्यों और दृढ़ अमेरिकी विदेश नीति के साझा मूल्यों को रेखांकित करना चाहते हैं।

ट्रंप वादा कर चुके हैं किट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन में भारत और अमेरिका 'बेस्ट फ्रेंड' बनेंगे। वह मोदी के कथित आर्थिक सुधारों की भी जमकर तारीफ़ करते रहे हैं। ट्रंप के मुताबिक़, मोदी की वजह से ही भारत आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है। ट्रंप कहते हैं कि मोदी ने जो क़दम उठाए, वैसे ही क़दम अमेरिका में भी उठाए जाने ज़रूरी है।

भारत को इनक्रेडिबल पीपल का इनक्रेडिबल कंट्री करार देते हुए ट्रंप कह चुके हैं, “मैं हिंदुओं व भारत का बहुत बड़ा फैन हूं और ट्रंप ऐडमिनिस्ट्रेशन में भारतीय और हिंदू समुदाय वाइटहाउस में हमारे सच्चे दोस्त होंगे। हिंदुओं और इंडो-अमेरिकी लोगों की कई पीढ़ियों ने देश को मज़बूती दी है। भारतीय मूल के लोग कठोर परिश्रम और उद्यमी होते हैं। मेरा भारत में बहुत ज्यादा विश्वास है। 19 महीने पहले भारत में वहां था और वहां कई बार और जाने की सोच रहा हूं।


ट्रंप कहते हैं, “इस्लामिक आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में अब तक भारत की भूमिका ज़बरदस्त रही है। हमारा शानदार दोस्त भारत कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद के ख़िलाफ़ अमेरिका के साथ है। भारत को आतंकवाद से ज़ख़्म ही ज़ख़्म मिला है। संसद पर हमला और मुंबई पर आतंकी हमला भारत कभी नहीं भूल सकता। मुंबई एक ऐसी जगह है, जिसे मैं प्यार करता हूं और समझता हूं। इस तरह के बयान यही संक्त देते हैं कि ट्रंप भारत के लिए आतंकवाद से लड़ने में ट्रंपकार्ड हो सकते हैं।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

कविता - विधवा

विधवा

एक विधवा
पूछ रही थी
उसके शहीद बेटे की
युवा पत्नी को भी
विधवा ही कहा जाएगा..

फिर उसे याद आया
विधवा, जवानी
हमदर्दी, वासनामयी आंखें
मुआवजा, दफ्तरों का चक्कर

वह घिघिया पड़ी
नहीं नहीं
शहीदों की पत्नियों को
सम्मान दो
उन्हें विधवा मत कहो

वह बुदबुदाती है
आजादी के बाद
देश ने
इतनी तरक्की कर ली
कितने नामकरण हो गए
फिर भी
विधवा विधवा ही रह गई

-हरिगोविंद विश्वकर्मा